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संस्कृत व्याकरण-पाठ

धातु रूपाणि

 

1)  धातुः नाम किम् ? (धातु किसे कहते है?)

स. क्रियापदों के मूल रूप को धातु कहते है।

2) संस्कृत भाषायां धातवः कति सन्ति ? (संस्कृत भाषा के कितने धातु है?)

स. सामान्यतः संस्कृत भाषा में दो हजार से ज्यादा धातुओं हैं।

3) तेषां विभागोSपिकृतो वा ? (क्या उसके विभाग किये है?)

स. धातुओं के भेदों के आधार पर 10 गणों (विभाग)में विभाजित किये है। हर गण प्रकृति के आधार पर अपना नाम सार्थक होगा। पाणिनी सूत्र “सुप्तिडन्तं पदम्”  के अनुसार सुबंतों को शब्दों के रूप में, तिजंतों को धातों के रूप में जानकर उससे पदसंज्ञा बनी। इसलिए पहला गण “भू” धातु होने पर उस गण को “भ्वादि” गण कहते है। इसका विवरण इसप्रकार....

प्रथमः गणः

प्रथमः धातु (भू)

भ्वादिः गणः

द्वितीयः गणः

प्रथमः धातु (अदे)

अदादिः गणः

तृतीयः गणः

प्रथमः धातु (हृ)

जुहोत्यादिः गणः

चतुर्थः गणः

प्रथमः धातु (दिल्)

दिवादिः गणः

पञ्चमः गणः

प्रथमः धातु (सु)

स्वादिः गणः

षष्ठः गणः

प्रथमः धातु (तुद्)

तुदादिः गणः

सप्तमः गणः

प्रथमः धातु (रूथ्)

रूधादिः गणः

अष्टमः गणः

प्रथमः धातु (तन्)

तनादिः गणः

नवमः गणः

प्रथमः धातु (क्री)

क्र्यादिः गणः

दशमः गणः

प्रथमः धातु (चुर्)

चुरादिः गणः

4. विकरणं नाम किम् ? (विकरणम् किसे कहते है?)

स. विकरण-प्रत्ययस्य मूल-रूपं भवति। धातुतः क्रियापदस्य निर्माणार्थं सोपानानि सन्ति। सोपानेषु विकरण-प्रत्ययस्य रूपं परिवर्तते। उदा – भ्वादिगणे विकरण-प्रत्ययः शप् इति। इसी प्रकार दस गण भी है।

गणः

विकरण-प्रत्ययस्य मूल-रूपं

  1. भ्वादिः गणः

शप्

  1. अदादिः गणः

शप् लोपः

  1. जुहोत्यादिः गणः

शप् लोपः

  1. दिवादिः गणः

श्यन्

  1. स्वादिः गणः

श्नु

  1. तुदादिः गणः

  1. रूधादिः गणः

श्नम्

  1. तनादिः गणः

  1. क्र्यादिः गणः

श्ना

  1. चुरादिः गणः

णिच+शप्

5. को नाम लकारः ? तेषां क्रिंप्रयोजनम् ? (लकार किसे कहते है? उसका प्रयोजन क्या है?)

स. लकारः पाणिनी व्याकरण सूत्र में लस्य के अनुसार भूत, भविष्यत्, वर्तमान काल के आज्ञा, अनुज्ञा को समझाने केलिए हुई। लकारः दस प्रकार के है – वे लट्,लिट्,लज्,लुङ,लुट्,लृट्,लृज्,विदिलिज्,लोट्,आशील्रिज् आदि।

6. पुरूषाः कतिं ? (पुरूष कितने प्रकार के है?)

स. पुरूष तीन प्रकार के है – 1. प्रथम पुरूष 2. मध्यम पुरूष 3. उत्तम पुरूष

7. वचनानि कानि ? (वचन कितने प्रकार के है?)

स. 1. एक वचन 2. द्वि वचन 3. बहु वचन

8. धातवः कति विधानि ? (धातु कितने प्रकार के है?)

स. धातु तीन प्रकार के है। 1. परस्मैपद 2. आत्मनेपद 3. उभयपद

   पुरूषः परस्मैपदिनः आत्मनेपदिनः

वर्तमान लट् (वर्तमान काल)

1. प्रथम पुरूषः – तिः – तः = अन्ति = ते – इते - अन्ते

2. मध्यम पुरूषः – सि – थः – थ = से – इथे - ध्वे

3. उत्तम पुरूषः – मि – वः – मः = इ – आवहे – आमहे

भूते लङ् (भूतकाल)

1. प्रथम पुरूषः – अत् – अताम् = अन्ति = अत – एताम् - अन्त

2. मध्यम पुरूषः – अ(:) – अतम् – अत = अथाः – एताम् - अध्वम्

3. उत्तम पुरूषः – अम् – आव – आम = ए – आवाहि – आमाहि

भविष्यति लृट् (भविष्यत् काल)

1. प्रथम पुरूषः  स्यति – स्यतः – स्यन्ति = स्यते – स्येते - स्यन्ते

2. मध्यम पुरूषः स्यसि – स्यथः – स्यथ = स्यसे – स्यथे - स्यध्वे

3. उत्तम पुरूषः स्यमि – स्यावः – स्यामः = इ – आवहे - आमहे

लोट् (आशीरर्धकम्)

1. प्रथम पुरूषः – तु – ताम् – अन्तु = ताम् – इताम् - अन्ताम्

2. मध्यम पुरूषः – हि – तम् – त = स्व – इथाम् - ध्वम्

3. उत्तम पुरूषः – आनि – आव – आम = ऐ – आवहै - आमहै

विधिलिङ् (विधिलिंग)

1. प्रथम पुरूषः – इत् – ईताम् – ईयुः = ईत ईयाताम् - ईरन्

2. मध्यम पुरूषः – ईः – ईतम् – ईत = ईथाः ईयाथाम् - ईध्वम्

3. उत्तम पुरूषः – ईयम् – ईव – ईम = ईय – ईवहि – ईमहि

  1. भ्वादिगणः

         परस्मैपदिनः

  1. भू सत्तायाम् (रहना) वर्तमाने लट् (वर्तमान काल) 

     पुरूषः        एकवचन       द्विवचनम्     बहुवचनम्

प्रथम पुरूषः   –   भवति     –     भवतः    -   भवन्ति

मध्यम पुरूषः  –   भवसि     –      भवथः    –    भवथ 

उत्तम पुरूषः   –  भवामि     –      भवावः    –    भवामः

भूते लङ् (भूतकाल)

 प्रथम पुरूषः  –  अभवत्    –     अभवताम्   -    अभवन्

 मध्यम पुरूषः –  अभवः    -     अभवतम्    -    अभवत

   उत्तम पुरूषः  –  अभवम्    -     अभवाव     -    अभवाम

भविष्यति लृट् (भविष्यत् काल)

प्रथम पुरूषः   -  भविष्यति  -     भविष्यतः   -    भविष्यन्ति

मध्यम पुरूषः  -  भविष्यसि -      भविष्यथः  -     भविष्यथ

उत्तम पुरूषः   -  भविष्यामि -     भविष्यावः  -     भविष्यामः

लोट् (आशीरर्धकम्)

1. प्रथम पुरूषः –   भवतु,भवतात् -   भवताम्   -     भवन्तु

2. मध्यम पुरूषः –  भव, भवतात् -   भवतम्   -      भवत

3. उत्तम पुरूषः   –   भवानि      -   भवाव   -      भवाम

विधिलिङ् (विधिलिंग)

1. प्रथम पुरूषः  –   भवेत्       -   भवेताम्  -     भवेयुः

2. मध्यम पुरूषः –   भवेः       -   भवेतम्   -    भवेत

3. उत्तम पुरूषः –   भवेयम्      -   भवेव   -     भवेम

2. गम्लृ – गतौ (जाना) वर्तमाने लट् (वर्तमान काल)

     पुरूषः         एकवचन       द्विवचनम्     बहुवचनम

प्रथम पुरूषः   –   गच्छति     –     गच्छतः    -   गच्छन्ति

मध्यम पुरूषः  –   गच्छसि     –     गच्छथः    –    गच्छथ 

उत्तम पुरूषः   –  गच्छामि     –      गच्छावः    –    गच्छामः

भूते लङ् (भूतकाल)

 प्रथम पुरूषः  –  अगच्छत्    –     अगच्छताम्   -    अगच्छन्

 मध्यम पुरूषः –  अगच्छः    -     अगच्छतम्    -    अगच्छत

   उत्तम पुरूषः  –  अगच्छम्    -     अगच्छाव     -    अगच्छाम

भविष्यति लृट् (भविष्यत् काल)

प्रथम पुरूषः   -  गामिष्यति  -     गामिष्यतः   -    गामिष्यन्ति

मध्यम पुरूषः  -  गामिष्यसि -      गामिष्यथः  -     गामिष्यथ

उत्तम पुरूषः   -  गामिष्यामि -     गामिष्यावः  -     गामिष्यामः

लोट् (आशीरर्धकम्)

1. प्रथम पुरूषः –   गच्छतु, गच्छतात् -   गच्छताम्   -     गच्छन्तु

2. मध्यम पुरूषः –  गच्छ, गच्छतात् -   गच्छतम्   -      गच्छत

3. उत्तम पुरूषः –   गच्छानि      -   गच्छाव   -      गच्छाम

विधिलिङ् (विधिलिंग)

1. प्रथम पुरूषः  –   गच्छेत्       -   गच्छेताम्   -    गच्छेयुः

2. मध्यम पुरूषः –   गच्छेः       -   गच्छेतं     -     गच्छेत

3. उत्तम पुरूषः –   गच्छेयम्      -   गच्छेव   -     गच्छेम

 

3. स्था – गतिनिवृत्तौ (उठना) वर्तमाने लट् (वर्तमान काल)

     पुरूषः         एकवचन       द्विवचनम्     बहुवचनम्

प्रथम पुरूषः   –   तिष्ठति     –     तिष्ठतः    -   तिष्ठन्ति

मध्यम पुरूषः  –   तिष्ठसि     –     तिष्ठथः    –    तिष्ठथ 

उत्तम पुरूषः   –  तिष्ठामि     –      तिष्ठावः    –    तिष्ठामः

भूते लङ् (भूतकाल)

 प्रथम पुरूषः  –  अतिष्ठत्    –     अतिष्ठतां   -    अतिष्ठन्

 मध्यम पुरूषः –  अतिष्ठः    -     अतिष्ठतम्    -    अतिष्ठत

   उत्तम पुरूषः  –  अतिष्ठम्    -     अतिष्ठाव     -    अतिष्ठाम

भविष्यति लृट् (भविष्यत् काल)

प्रथम पुरूषः   -  स्थास्यति  -     स्थास्यतः   -    स्थास्यन्ति

मध्यम पुरूषः  -  स्थास्यसि -      स्थास्यथः  -     स्थास्यथ

उत्तम पुरूषः   -  स्थास्यामि -     स्थास्यावः  -     स्थास्यामः

लोट् (आशीरर्धकम्)

1. प्रथम पुरूषः –   तिष्ठतु, तिष्ठतात् -   तिष्ठताम्   -     तिष्ठन्तु

2. मध्यम पुरूषः –  तिष्ठ, तिष्ठतात् -   तिष्ठतम्   -      तिष्ठत

3. उत्तम पुरूषः –   तिष्ठानि      -   तिष्ठाव   -      तिष्ठाम

विधिलिङ् (विधिलिंग)

1. प्रथम पुरूषः  –   तिष्ठेत्       -   तिष्ठेताम्   -    तिष्ठेयुः

2. मध्यम पुरूषः –   तिष्ठेः       -   तिष्ठेतं     -     तिष्ठेत

3. उत्तम पुरूषः –   तिष्ठेयम्      -   तिष्ठेव   -     तिष्ठेम

4. दृशिर् (देखना) प्रेक्षणे वर्तमाने लट् (वर्तमान काल)

     पुरूषः         एकवचन       द्विवचनम्     बहुवचनम्

प्रथम पुरूषः   –   पश्यति     –     पश्यतः    -   पश्यन्ति

मध्यम पुरूषः  –   पश्यसि     –     पश्यथः    –    पश्यथ 

उत्तम पुरूषः   –  पश्यामि     –      पश्यावः    –    पश्यामः

भूते लङ् (भूतकाल)

 प्रथम पुरूषः  –  अपश्यत्    –     अपश्यतां   -    अपश्यन्

 मध्यम पुरूषः –  अपश्यः    -     अपश्यतम्    -    अपश्यत

   उत्तम पुरूषः  –  अपश्यम्    -     अपश्याव     -    अपश्याम

भविष्यति लृट् (भविष्यत् काल)

प्रथम पुरूषः   -  दक्ष्यति  -     दक्ष्यतः   -    दक्ष्यन्ति

मध्यम पुरूषः  -  दक्ष्यसि -      दक्ष्यथः  -     दक्ष्यथ

उत्तम पुरूषः   -  दक्ष्यामि -     दक्ष्यावः  -     दक्ष्यामः

लोट् (आशीरर्धकम्)

प्रथम पुरूषः –   पश्यतु, पश्यतात् -   पश्यताम्   -     पश्यन्तु

मध्यम पुरूषः –  पश्य, पश्यतात् -   पश्यतम्   -      पश्यत

उत्तम पुरूषः –   पश्यनि      -   पश्याव   -      पश्याम

विधिलिङ् (विधिलिंग)

प्रथम पुरूषः  –   पश्येत्       -   पश्येताम्   -    पश्येयुः

मध्यम पुरूषः –   पश्येः       -   पश्येतं     -     पश्येत

उत्तम पुरूषः –   पश्येयम्      -   पश्येव   -     पश्येम

5. घुषिर वविशब्दने वर्तमाने लट् (वर्तमान काल)

     पुरूषः         एकवचन       द्विवचनम्     बहुवचनम् 

प्रथम पुरूषः   –   घोषति     –     घोषतः    -   घोषन्ति

मध्यम पुरूषः  –   घोषसि     –     घोषथः    –    घोषथ 

उत्तम पुरूषः   –  घोषामि     –      घोषावः    –    घोषामः

भूते लङ् (भूतकाल)

 प्रथम पुरूषः  –  अघोषत्    –     अघोषतां   -    अघोषन्

 मध्यम पुरूषः –  अघोषः    -     अघोषतम्    -    अघोषत

   उत्तम पुरूषः  –  अघोषम्    -     अघोषाव     -    अघोषाम

भविष्यति लृट् (भविष्यत् काल)

प्रथम पुरूषः   -  घोषष्यति  -     घोषष्यतः   -    घोषष्यन्ति

मध्यम पुरूषः  -  घोषष्यसि -      घोषष्यथः  -     घोषष्यथ

उत्तम पुरूषः   -  घोषष्यामि -     घोषष्यावः  -     घोषष्यामः

लोट् (आशीरर्धकम्)

प्रथम पुरूषः –   घोषतु, घोषतात् -   घोषताम्   -     घोषन्तु

मध्यम पुरूषः –  घोष          -   घोषतम्   -      घोषत

उत्तम पुरूषः –   घोषनि      -   घोषाव   -      घोषाम

विधिलिङ् (विधिलिंग)

प्रथम पुरूषः  –   घोषेत्       -   घोषेताम्   -    घोषेयुः

मध्यम पुरूषः –   घोषेः       -   घोषेतं     -     घोषेत

उत्तम पुरूषः –   घोषेयम्      -   घोषेव   -     घोषेम

 

6. तु प्लवनसंतरयोः वि+तृ वर्तमाने लट् (वर्तमान काल)

 

     पुरूषः         एकवचन       द्विवचनम्     बहुवचनम्

प्रथम पुरूषः   –   वितरति     –     वितरतः    -   वितरन्ति

मध्यम पुरूषः  –   वितरसि     –     वितरथः    –   वितरथ 

उत्तम पुरूषः   –  वितरामि     –      वितरावः    –  वितरामः

भूते लङ् (भूतकाल)

 प्रथम पुरूषः  –  व्यतरत्    –     व्यतरतां   -    व्यतरन्

 मध्यम पुरूषः –  व्यतरः    -     व्यतरतम्    -   व्यतरत

   उत्तम पुरूषः  –  व्यतरम्    -     व्यतराव     -  व्यतराम

भविष्यति लृट् (भविष्यत् काल)

प्रथम पुरूषः   -  वितरिष्यति  -   वितरिष्यतः   - वितरिष्यन्ति

मध्यम पुरूषः  -  वितरिष्यसि  -   वितरिष्यथः  -  वितरिष्यथ

उत्तम पुरूषः   -  वितरिष्यामि -   वितरिष्यावः  -  वितरिष्यामः

लोट् (आशीरर्धकम्)

प्रथम पुरूषः –   वितरतु, वितरातात् -   वितरताम्   - वितरन्तु

मध्यम पुरूषः –  वितर          -   वितरतम्   -   वितरत

उत्तम पुरूषः –   वितराणि      -   वितराव   -      वितराम

विधिलिङ् (विधिलिंग)

प्रथम पुरूषः  –   वितरेत्       -   वितरेताम्   -    वितरेयुः

मध्यम पुरूषः –   वितरेः       -   वितरेतं     -     वितरेत

उत्तम पुरूषः –   वितरेयम्      -   वितरेव   -     वितरेम

अदादिगणः

7. अस् भुवि वर्तमाने लट् (वर्तमान काल)

 

   पुरूषः         एकवचन       द्विवचनम्     बहुवचनम्

प्रथम पुरूषः   –   अस्ति     –     स्तः    -   सन्ति

मध्यम पुरूषः  –   असि     –     स्थः    –    स्थ 

उत्तम पुरूषः   –  अस्मि     –      स्वः    –    स्मः

भूते लङ् (भूतकाल)

 प्रथम पुरूषः  –  आसीत्    –     आस्ताम्   -    आसन्

 मध्यम पुरूषः –  आसीः    -     आस्तम्    -    आस्त

   उत्तम पुरूषः  –  आसम्    -     आस्व     -    आस्म

भविष्यति लृट् (भविष्यत् काल)

प्रथम पुरूषः   -  भविष्यति  -     भविष्यतः   -    भविष्यन्ति

मध्यम पुरूषः  -  भविष्यसि -      भविष्यथः  -     भविष्यथ

उत्तम पुरूषः   -  भविष्यामि -     भविष्यावः  -     भविष्यामः

लोट् (आशीरर्धकम्)

प्रथम पुरूषः –   अस्तु, स्तात् -   स्ताम्   -     सन्तु

मध्यम पुरूषः –  एधि,स्तात्   -   स्तम्   -      स्त

उत्तम पुरूषः –   असानि      -   असाव   -    असाम

विधिलिङ् (विधिलिंग)

प्रथम पुरूषः  –   स्यात्       -   सयातां  -    स्युः

मध्यम पुरूषः –   स्याः     -   स्यातं     -     स्यात

उत्तम पुरूषः –   स्यम्      -   स्याव   -     स्याम

 

दिवादि गणः

8. दिवुक्रीडा-विगीषा-व्यवहार-द्युति-स्तुति?

मोद – मद – स्वप्न – कन्ति – गतिषु -

 वर्तमाने लट् (वर्तमान काल)

 

      पुरूषः         एकवचन       द्विवचनम्     बहुवचनम्

प्रथम पुरूषः   –   दीव्यति     –     दीव्यतः    -   दीव्यन्ति

मध्यम पुरूषः  –   दीव्यसि     –     दीव्यथः    –    दीव्यथ 

उत्तम पुरूषः   –  दीव्यामि     –     दीव्यावः    –    दीव्यामः

भूते लङ् (भूतकाल)

 प्रथम पुरूषः  –  अदीव्यत्    –     अदीव्यतां   -    अदीव्यन्

 मध्यम पुरूषः –  अदीव्यः    -     अदीव्यतम्   -    अदीव्यत

   उत्तम पुरूषः  –  अदीव्यम्    -     अदीव्याव    -    अदीव्याम

भविष्यति लृट् (भविष्यत् काल)

प्रथम पुरूषः   -  देविष्यति  -     देविष्यतः   -    देविष्यन्ति

मध्यम पुरूषः  -  देविष्यसि -      देविष्यथः  -     देविष्यथ

उत्तम पुरूषः   -  देविष्यमि -     देविष्यावः  -     देविष्यामः

लोट् (आशीरर्धकम्)

प्रथम पुरूषः –   दीव्यतु, दीव्यतात् -   दीव्यताम्   -    दीव्यन्तु

मध्यम पुरूषः –  दीव्य, दीव्यतात्  -   दीव्यतम्    -    दीव्यत

उत्तम पुरूषः –   दीव्यनि         -   दीव्याव    -    दीव्याम

विधिलिङ् (विधिलिंग)

प्रथम पुरूषः  –   दीव्येत्       -   दीव्येताम्   -    दीव्येयुः

मध्यम पुरूषः –   दीव्येः       -   दीव्येतम्    -    दीव्येत्

उत्तम पुरूषः –   दीव्येयम्      -   दीव्येव     -    दीव्येम

 

9. सम्+तुष्  वर्तमाने लट् (वर्तमान काल)

 

     पुरूषः         एकवचन       द्विवचनम्     बहुवचनम्

प्रथम पुरूषः   –   संतुष्यति     –     संतुष्यतः    -   संतुष्यन्ति

मध्यम पुरूषः  –   संतुष्यसि     –     संतुष्यथः    –   संतुष्यथ 

उत्तम पुरूषः   –  संतुष्यामि     –     संतुष्यावः    –   संतुष्यामः

भूते लङ् (भूतकाल)

 प्रथम पुरूषः  –  समतुष्यत्    –     समतुष्यतां   -    समतुष्यन्

 मध्यम पुरूषः –  समतुष्यः    -    समतुष्यतम्    -    समतुष्यत

   उत्तम पुरूषः  –  समतुष्यम्   -    समतुष्याव     -    समतुष्याम

भविष्यति लृट् (भविष्यत् काल)

प्रथम पुरूषः   -  संन्तोक्ष्यति  -     संन्तोक्ष्यतः   -    संन्तोक्ष्यन्ति

मध्यम पुरूषः  -  संन्तोक्ष्यसि -     संन्तोक्ष्यथः   -     संन्तोक्ष्यथ

उत्तम पुरूषः   -  संन्तोक्ष्यामि -    संन्तोक्ष्यावः   -     संन्तोक्ष्यामः

लोट् (आशीरर्धकम्)

प्रथम पुरूषः –   संन्तुष्यतु -   संन्तुष्यताम्   -     संन्तुष्यन्तु

मध्यम पुरूषः –  संन्तुष्य  -   संन्तुष्यतम्   -      संन्तुष्यत

उत्तम पुरूषः –   संन्तुष्यानि – संन्तुष्याव     -      संन्तुष्याम

विधिलिङ् (विधिलिंग)

प्रथम पुरूषः  –   संन्तुष्येत्       -   संन्तुष्येताम्   -  संन्तुष्येयुः

मध्यम पुरूषः –   संन्तुष्येः        -   संन्तुष्येतं     -  संन्तुष्येत

उत्तम पुरूषः –   संन्तुष्येयम्      -   संन्तुष्येव     -   संन्तुष्येम

तुदादिगणः

10. प्र+विश्  वर्तमाने लट् (वर्तमान काल)

       पुरूषः         एकवचन       द्विवचनम्     बहुवचनम्

प्रथम पुरूषः   –   प्रविशति     –     प्रविशतः    -   प्रविशन्ति

मध्यम पुरूषः  –   प्रविशसि     –     प्रविशथः    –   प्रविशथ 

उत्तम पुरूषः   –  प्रविशामि     –     प्रविशावः    –   प्रविशामः

भूते लङ् (भूतकाल)

 प्रथम पुरूषः  –  प्राविशत्    –     प्राविशतां   -    प्राविशन्

 मध्यम पुरूषः –  प्राविशः    -    प्राविशतम्    -    प्राविशत

 उत्तम पुरूषः  –  प्राविशम्   -    प्राविशाव     -    प्राविशाम

भविष्यति लृट् (भविष्यत् काल)

प्रथम पुरूषः   -  प्रवेक्ष्यति  -     प्रवेक्ष्यतः   -    प्रवेक्ष्यन्ति

मध्यम पुरूषः  -  प्रवेक्ष्यसि -     प्रवेक्ष्यथः   -     प्रवेक्ष्यथ

उत्तम पुरूषः   -  प्रवेक्ष्यामि -    प्रवेक्ष्यावः   -     प्रवेक्ष्यामः

लोट् (आशीरर्धकम्)

प्रथम पुरूषः –   प्रविशतु -   प्रविशताम्   -     प्रविशन्तु

मध्यम पुरूषः –  प्रविश  -   प्रविशतम्   -      प्रविशत

उत्तम पुरूषः –   प्रविशानि – प्रविशाव     -     प्रविशाम

विधिलिङ् (विधिलिंग)

प्रथम पुरूषः  –   प्रविशेत्       -   प्रविशेताम्   -  प्रविशेयुः

मध्यम पुरूषः –   प्रविशेः        -   प्रविशेतं     -  प्रविशेत

उत्तम पुरूषः –   प्रविशेयम्      -   प्रविशेव     -   प्रविशेम

11. मुच्लृ माजने (मुच्)  वर्तमाने लट् (वर्तमान काल)

    पुरूषः         एकवचन       द्विवचनम्     बहुवचनम्

प्रथम पुरूषः   –   मुञ्चति     –     मुञ्चतः    -   मुञ्चन्ति

मध्यम पुरूषः  –   मुञ्चसि     –     मुञ्चथः    –   मुञ्चथ 

उत्तम पुरूषः   –  मुञ्चामि     –     मुञ्चावः    –   मुञ्चामः

भूते लङ् (भूतकाल)

 प्रथम पुरूषः  –  अमुञ्चत्    –     अमुञ्चतां   -    अमुञ्चन्

 मध्यम पुरूषः –  अमुञ्चः    -    अमुञ्चतम्    -    अमुञ्चत

   उत्तम पुरूषः  –  अमुञ्चम्   -    अमुञ्चाव     -    अमुञ्चाम

भविष्यति लृट् (भविष्यत् काल)

प्रथम पुरूषः   -  मोक्ष्यति  -     मोक्ष्यतः   -    मोक्ष्यन्ति

मध्यम पुरूषः  -  मोक्ष्यसि -     मोक्ष्यथः   -     मोक्ष्यथः

उत्तम पुरूषः   -  मोक्ष्यामि -    मोक्ष्यावः   -     मोक्ष्यामः

लोट् (आशीरर्धकम्)

प्रथम पुरूषः –   मुञ्चतु -   मुञ्चताम्   -     मुञ्चन्तु

मध्यम पुरूषः –  मुञ्च  -   मुञ्चतम्    -      मुञ्चत

उत्तम पुरूषः –   मुञ्चनि –  मुञ्चव     -      मुञ्चम

विधिलिङ् (विधिलिंग)

प्रथम पुरूषः  –   मुञ्चेत्       -   मुञ्चेताम्   -  मुञ्चेयुः

मध्यम पुरूषः –   मुञ्चेः        -   मुञ्चेतं     -  मुञ्चेत

उत्तम पुरूषः –   मुञ्चेम्       -   मुञ्चेव      -  मुञ्चेम

 

12. इष् – इच्छायाम्  वर्तमाने लट् (वर्तमान काल)

     पुरूषः         एकवचन       द्विवचनम्     बहुवचनम्

प्रथम पुरूषः   –   इच्छति     –     इच्छतः    -   इच्छन्ति

मध्यम पुरूषः  –   इच्छसि     –     इच्छथः    –   इच्छथ 

उत्तम पुरूषः   –  इच्छामि     –     इच्छावः    –   इच्छामः

भूते लङ् (भूतकाल)

 प्रथम पुरूषः  –  ऐच्छत्    –     ऐच्छतां   -    ऐच्छन्

 मध्यम पुरूषः –  ऐच्छः    -    ऐच्छतम्    -   ऐच्छत

   उत्तम पुरूषः  –  ऐच्छम्   -    ऐच्छाव     -    ऐच्छाम

भविष्यति लृट् (भविष्यत् काल)

प्रथम पुरूषः   -  एषिष्यति  -     एषिष्यतः   -    एषिष्यन्ति

मध्यम पुरूषः  -  एषिष्यसि -     एषिष्यथः   -     एषिष्यथः

उत्तम पुरूषः   -  एषिष्यामि -    एषिष्यावः   -     एषिष्यामः

लोट् (आशीरर्धकम्)

प्रथम पुरूषः –   इच्छतु -   इच्छताम्   -     इच्छन्तु

मध्यम पुरूषः –  इच्छ  -   इच्छतम्    -     इच्छत

उत्तम पुरूषः –   इच्छनि –  इच्छव     -      इच्छम

विधिलिङ् (विधिलिंग)

प्रथम पुरूषः  –   इच्छेत्       -   इच्छेताम्   -  इच्छेयुः

मध्यम पुरूषः –   इच्छेः        -   इच्छेतं     -  इच्छेत

उत्तम पुरूषः –   इच्छेम्       -   इच्छेव      -  इच्छेम

13. लिख् – अक्षरविन्यासे  वर्तमाने लट् (वर्तमान काल)

      पुरूषः         एकवचन       द्विवचनम्     बहुवचनम् 

प्रथम पुरूषः   –   लिखति     –     लिखतः    -   लिखन्ति

मध्यम पुरूषः  –   लिखसि     –     लिखथः    –   लिखथ 

उत्तम पुरूषः   –  लिखामि     –     लिखावः    –   लिखामः

भूते लङ् (भूतकाल)

 प्रथम पुरूषः  –  अलिखत्  –    अलिखतां   -   अलिखन्

 मध्यम पुरूषः –  अलिखः  -    अलिखतम्    -  अलिखत

   उत्तम पुरूषः  –  अलिखम्   -   अलिखाव     -  अलिखाम

भविष्यति लृट् (भविष्यत् काल)

प्रथम पुरूषः   -  लेखिष्यति  -    लेखिष्यतः   -    लेखिष्यन्ति

मध्यम पुरूषः  -  लेखिष्यसि -     लेखिष्यथः   -    लेखिष्यथः

उत्तम पुरूषः   -  लेखिष्यामि -    लेखिष्यावः   -    लेखिष्यामः

लोट् (आशीरर्धकम्)

प्रथम पुरूषः –   लिखतु -   लिखताम्   -     लिखन्तु

मध्यम पुरूषः –  लिख  -   लिखतम्    -     लिखत

उत्तम पुरूषः –   लिखानि –  लिखाव    -      लिखाम

विधिलिङ् (विधिलिंग)

प्रथम पुरूषः  –   लिखेत्       -   लिखेताम्   -  लिखेयुः

मध्यम पुरूषः –   लिखेः        -   लिखेतं     -  लिखेत

उत्तम पुरूषः –   लिखेयम्       -   लिखेव     -  लिखेम

14. डु कृ ञ् - करणे  वर्तमाने लट् (वर्तमान काल)

     पुरूषः         एकवचन       द्विवचनम्     बहुवचनम्

प्रथम पुरूषः   –   करोति     –     कुरूतः    -   कुर्वन्ति

मध्यम पुरूषः  –   करोषि     –     कुरूथः    –   कुरूथ 

उत्तम पुरूषः   –  करोमि     –     कर्वः      –   कुर्मः

भूते लङ् (भूतकाल)

 प्रथम पुरूषः  –  अकरोत्    –     अकुरूतां   -    अकुर्वन्

 मध्यम पुरूषः –  अकुरोः    -    अकुरूतम्    -   अकुरूत

   उत्तम पुरूषः  –  अकरवम्   -    अकर्व     -    अकुर्म

भविष्यति लृट् (भविष्यत् काल)

प्रथम पुरूषः   -  करिष्यति  -     करिष्यतः   -    करिष्यन्ति

मध्यम पुरूषः  -  करिष्यसि -     करिष्यथः   -     करिष्यथः

उत्तम पुरूषः   -  करिष्यामि -    करिष्यावः   -     करिष्यामः

लोट् (आशीरर्धकम्)

प्रथम पुरूषः  –  करोति  -   कुरूताम्   -     कुर्वन्तु

मध्यम पुरूषः –  कुरू    -   कुरूतम्    -     कुरूत

उत्तम पुरूषः –   करवाणि –   करवाव     -   करवाम

विधिलिङ् (विधिलिंग)

प्रथम पुरूषः  –   कुर्यात्       -   कुर्याताम्   -  कुर्युः

मध्यम पुरूषः –   कुर्याः       -   कुर्यातम्     -  कुर्यात

उत्तम पुरूषः  –  कुर्याम्       -   कुर्याव      -  कुर्याम

15. क्रीञ् – कीञ् द्रव्यविनिमये वर्तमाने लट् (वर्तमान काल)

पुरूषः         एकवचन       द्विवचनम्     बहुवचनम्

 

प्रथम पुरूषः   –   क्रीणाति     –     क्रीणीतः    -   क्रीणन्ति

मध्यम पुरूषः  –   क्रीणासि     –     क्रीणीथः    –   क्रीणीथ 

उत्तम पुरूषः   –  क्रीणामि     –     क्रीणीवः    –   क्रीणीमः

भूते लङ् (भूतकाल)

 प्रथम पुरूषः  –  अक्रीणात्    –  अक्रीणीतां   -    अक्रीणान्

 मध्यम पुरूषः –  अक्रीणाः    -  अक्रीणीतम्    -   अक्रीणीत

   उत्तम पुरूषः  –  अक्रीणाम्   -   अक्रीणीव     -   अक्रीणीम

भविष्यति लृट् (भविष्यत् काल)

प्रथम पुरूषः   -  क्रेष्यति  -     क्रेष्यतः   -    क्रेष्यन्ति

मध्यम पुरूषः  -  क्रेष्यसि -     क्रष्यथः   -     क्रेष्यथः

उत्तम पुरूषः   -  क्रेष्यामि -    क्रोष्यावः   -    क्रेष्यामः

लोट् (आशीरर्धकम्)

प्रथम पुरूषः –   क्रीणातु -   क्रीणीताम्   -     क्रीणन्तु

मध्यम पुरूषः –  क्रीणाहि  -   क्रीणीतम्    -     क्रीणीत

उत्तम पुरूषः –   क्रीणानि –  क्रीणीव       -     क्रीणीम

विधिलिङ् (विधिलिंग)

प्रथम पुरूषः  –   क्रीणीयात्     -   क्रीणीयाताम्   -  क्रीणीयुः

मध्यम पुरूषः –   क्रीणीयाः     -   क्रीणीयातम्    -  क्रीणीयात

उत्तम पुरूषः –   क्रीणीयाम्     -   क्रीणीयाव      -  क्रीणीयाम

 

चुरादिगणः

16. चुर – स्तेये  वर्तमाने लट् (वर्तमान काल)

      पुरूषः         एकवचन       द्विवचनम्     बहुवचनम्

प्रथम पुरूषः   –   चोरयति     –     चोरयतः    -   चोरयन्ति

मध्यम पुरूषः  –   चोरयसि     –     चोरयथः    –   चोरयथ 

उत्तम पुरूषः   –  चोरयामि     –     चोरयावः    –   चोरयामः

भूते लङ् (भूतकाल)

 प्रथम पुरूषः  –  अचोरयत्  –    अचोरयतां   -   अचोरयन्

 मध्यम पुरूषः –  अचोरयः  -    अचोरयतम्    -  अचोरयत

   उत्तम पुरूषः  –  अचोरयम्   -   अचोरयाव     -  अचोरयाम

भविष्यति लृट् (भविष्यत् काल)

प्रथम पुरूषः   -  चोरयिष्यति  -   चोरयिष्यतः   -   चोरयिष्यन्ति

मध्यम पुरूषः  -  चोरयिष्यसि -    चोरयिष्यथः   -  चोरयिष्यथ

उत्तम पुरूषः   -  चोरयिष्यामि -    चोरयिष्यावः  -  चोरयिष्यामः

लोट् (आशीरर्धकम्)

प्रथम पुरूषः –   चोरयतु -   चोरयताम्   -     चोरयन्तु

मध्यम पुरूषः –  चोरय  -   चोरयतम्    -     चोरयत

उत्तम पुरूषः –  चोरयानि –  चोरयाव     -     चोरयाम

विधिलिङ् (विधिलिंग)

प्रथम पुरूषः  –   चोरयेत्       -   चोरयेताम्   -  चोरयेयुः

मध्यम पुरूषः –   चोरयेः        -   चोरयेतं     -  चोरयेत

उत्तम पुरूषः –   चोरयेयम्       -   चोरयेव     -  चोरयेम

17. कथ – वाक्यप्रबंधने  वर्तमाने लट् (वर्तमान काल)

      पुरूषः         एकवचन       द्विवचनम्     बहुवचनम्

प्रथम पुरूषः   –   कथयति     –     कथयतः    -   कथयन्ति

मध्यम पुरूषः  –   कथयसि     –     कथयथः    –   कथयथ 

उत्तम पुरूषः   –  कथयामि     –     कथयावः    –   कथयामः

भूते लङ् (भूतकाल)

 प्रथम पुरूषः  –  अकथयत्  –    अकथयतां    -   अकथयन्

 मध्यम पुरूषः –  अकथयः  -    अकथयतम्    -  अकथयत

   उत्तम पुरूषः  –  अकथयम्   -   अकथयाव     -  अकथयाम

भविष्यति लट् (भविष्यत् काल)

प्रथम पुरूषः   -  कथयिष्यति  -    कथयिष्यतः  -   कथयिष्यन्ति

मध्यम पुरूषः  -  कथयिष्यसि -     कथयिष्यथः  -   कथयिष्यथ

उत्तम पुरूषः   -  कथयिष्यामि -    कथयिष्यावः   -  कथयिष्यामः

लोट् (आशीरर्धकम्)

प्रथम पुरूषः –   कथयतु -   कथयताम्   -     कथयन्तु

मध्यम पुरूषः –  कथय  -   कथयतम्    -     कथयत

उत्तम पुरूषः –   कथयानि –  कथयाव    -     कथयाम

विधिलिङ् (विधिलिंग)

प्रथम पुरूषः  –   कथयेत्       -   कथयेताम्   -  कथयेयुः

मध्यम पुरूषः –   कथयेः        -   कथयेतम्   -  कथयेत

उत्तम पुरूषः –   कथयेयम्       -   कथयेव    -  कथयेम

आत्मनेपदिनः

 

              लभः (पाना) 1. लट् (वर्तमान काल) 

पुरूषः         एकवचन       द्विवचनम्     बहुवचनम्

प्रथम पुरूषः    –   लभते      –     लभेते     -   लभन्ते

मध्यम पुरूषः  –    लभसे     –      लभेथे    –    लभध्वे 

उत्तम पुरूषः   –    लभे      –      लभावहे    –    लभामहे

2. लङ् (भूतकाल)

 प्रथम पुरूषः  –  अलभत     –     अलभेतां   -    अलभन्त

 मध्यम पुरूषः –  अलभथाः    -    अलभेथां    -   अलभध्वं

   उत्तम पुरूषः  –  अलभे      -     अलभावहि  -   अलभामहि

3. लृट् (भविष्यत् काल)

प्रथम पुरूषः   -  लप्स्यते  -     लप्स्येते   -    लप्स्यन्ते

मध्यम पुरूषः  -  लप्स्यसे -      लप्स्येथे  -     लप्स्यध्वे

उत्तम पुरूषः   -  लप्स्ये  -     लप्स्यावहे  -     लप्स्यामहे

4. लोट् (आशीरर्धकम्)

1. प्रथम पुरूषः –   लभताम् -   लभेताम्   -     लभन्ताम्

2. मध्यम पुरूषः –  लभस्व  -   लभेथाम्   -     लभध्वम्

3. उत्तम पुरूषः –   लभै    -   लभावहै    -     लभामहै

5. विधिलिङ् (विधिलिंग)

1. प्रथम पुरूषः  –   लभते       -   लभयाताम्  - लभेरन्

2. मध्यम पुरूषः –   लभेथाः      -   लभेयाथाम्  - लभेध्वं

3. उत्तम पुरूषः –   लभेय        -   लभेवाहि    - लभेमहि

मुद् - हर्षे (खुशी) 1. वर्तमाने लट् (वर्तमान काल)

पुरूषः         एकवचन       द्विवचनम्     बहुवचनम्

प्रथम पुरूषः   –   मोदते     –     मोदेते    -   मोदन्ते

मध्यम पुरूषः  –   मोदसे     –    मोदेथे    –   मोदध्वे 

उत्तम पुरूषः   –  मोदे       –    मोदावहे   –   मोदामहे

2. लङ् (भूतकाल)

 प्रथम पुरूषः  –  अमोदत    –     अमोदेताम्  -    अमोदन्त

 मध्यम पुरूषः –  अमोदथाः   -     अमोदेयाम्  -   अमोदध्वम्

   उत्तम पुरूषः  –  अमोदे      -     अमोदाविह  -   अमोदामाहि

भविष्यति लृट् (भविष्यत् काल)

प्रथम पुरूषः   -  मोदिष्यते    -   मोदिष्येते   -   मोदिष्यन्त

मध्यम पुरूषः  -  मोदिष्यसे    -   मोदिष्येथे   -   मोदिष्यध्वे

उत्तम पुरूषः   -  मोदिष्ये     -   मोदिष्यावहे  -   मोदिष्यामहे

लोट् (आशीरर्धकम्)

1. प्रथम पुरूषः –   मोदतां     -   मोदेतां   -     मोदन्तां

2. मध्यम पुरूषः –  मोदस्व    -   मोदेथां   -    मोदध्वं

3. उत्तम पुरूषः –   मोदै      -   मोदावहै  -    मोदामहै

विधिलिङ् (विधिलिंग)

1. प्रथम पुरूषः  –   मोदेत      -   मोदेयातां   -    मोदेरन्

2. मध्यम पुरूषः –   मोदेथाः     -   मोदथाथां   -    मोदेध्वं

3. उत्तम पुरूषः –    मोदेय      -   मोदेवाहि   -    मोदेमहि

 

 भाष् व्यक्तायां वाचि (बोलना)

वर्तमाने लट् (वर्तमान काल)

पुरूषः         एकवचन       द्विवचनम्     बहुवचनम्

 

प्रथम पुरूषः   –   भाषते     –     भाषेते    -   भाषन्ते

मध्यम पुरूषः  –   भाषसे     –     भाषेथे    –   भाषध्वे 

उत्तम पुरूषः   –  भाषे     –      भाषावहे    –    भाषामहे

भूते लङ् (भूतकाल)

 प्रथम पुरूषः  –  अभाषत    –     अभाषेताम्   -    अभाषन्त

 मध्यम पुरूषः –  अभाषथाः   -    अभाषेथाम्   -    अभाषध्वम्

   उत्तम पुरूषः  –  अभाषे      -    अभाषावहि   -    अभाषामहि

भविष्यति लृट् (भविष्यत् काल)

प्रथम पुरूषः   -  भाषिष्यते  -     भाषिष्येते   -    भाषिष्यन्ते

मध्यम पुरूषः  -  भाषिष्यसे  -     भाषिष्येथे   -    भाषिष्यध्वे

उत्तम पुरूषः   -  भाषिष्ये   -     भाषिष्यावहे  -    भाषिष्यामहे

लोट् (आशीरर्धकम्)

1. प्रथम पुरूषः –   भाषताम्    -   भाषेताम्      -     भाषन्ताम्

2. मध्यम पुरूषः –  भाषस्व     -   भाषेथाम्      -     भाषध्वम्

3. उत्तम पुरूषः –   भाषै       -   भाषावहै      -      भाषामहै

विधिलिङ् (विधिलिंग)

1. प्रथम पुरूषः  –   भाषेत       -   भाषेयाताम्   -    भाषरन्

2. मध्यम पुरूषः –   भाषेथाः      -   भाषेयाथाम्   -    भाषेध्वम्

3. उत्तम पुरूषः –   भाषेय        -   भाषेवाहि     -    भाषेमहि

 रमु - क्रीडायाम् (खेलना) वर्तमाने लट् (वर्तमान काल)

 

पुरूषः         एकवचन       द्विवचनम्     बहुवचनम्

 

प्रथम पुरूषः   –   रमते     –     रमेते    -   रमन्ते

मध्यम पुरूषः  –   रमसे     –     रमेथे    –   रमध्वे 

उत्तम पुरूषः   –  रमे       –     रमावहे   –   रमामहे

भूते लङ् (भूतकाल)

 प्रथम पुरूषः  –  अरमत   –     अरमेताम्   -    अरमन्त

 मध्यम पुरूषः –  अरमथाः  -    अरमेथाम्   -    अरमध्वम्

   उत्तम पुरूषः  –  अरमे     -    अरमावहि   -    अरमामहि

भविष्यति लृट् (भविष्यत् काल)

प्रथम पुरूषः   -  रंस्यते  -     रंस्येते   -    रंस्यन्ते

मध्यम पुरूषः  -  रंस्यसे  -     रंस्येथे   -    रंस्यध्वे

उत्तम पुरूषः   -  रंस्ये   -     रंस्यावहे  -    रंस्यामहे

लोट् (आशीरर्धकम्)

प्रथम पुरूषः –   रमताम्   -   रमेताम्       -     रमन्ताम्

मध्यम पुरूषः –  रमस्व    -   रमेथाम्       -     रमध्वम्

उत्तम पुरूषः –   रमै     -   रमावहै     -      रमामहै

विधिलिङ् (विधिलिंग)

प्रथम पुरूषः  –   रमेत       -   रमेयातां   -    रमेरन्

मध्यम पुरूषः –   रमेथाः      -   रमेथाथां   -   रमेध्वं

उत्तम पुरूषः –   रमेय        -   रमेवहि    -   रमेमहि

 वादि अभिवादनस्तुत्योः (वन्द)

 वर्तमाने लट् (वर्तमान काल)

पुरूषः         एकवचन       द्विवचनम्     बहुवचनम्

 

प्रथम पुरूषः   –   वन्दते     –     वन्देते    -   वन्दन्ते

मध्यम पुरूषः  –   वन्दसे     –     वन्देथे    –   वन्दध्वे 

उत्तम पुरूषः   –   वन्दे      –     वन्दावहे   –   वन्दामहे

भूते लङ् (भूतकाल)

 प्रथम पुरूषः  –  अवन्दत    –     अवन्देताम्   -    अवन्दन्त

 मध्यम पुरूषः –  अवन्दथाः   -     अवन्देयाम्   -    अवन्दहवम्

   उत्तम पुरूषः  –  अवन्दे      -     अवन्दावहि   -    अवान्दामहि

भविष्यति लृट् (भविष्यत् काल)

प्रथम पुरूषः   -  वन्दिष्यते  -     वन्दिष्येते   -    वन्दिष्यन्ते

मध्यम पुरूषः  -  वन्दिष्यसे  -     वन्दिष्येथे   -    वन्दिष्यध्वे

उत्तम पुरूषः   -  वन्दिष्ये   -     वन्दिष्यावहे  -    वन्दिष्यमहे

लोट् (आशीरर्धकम्)

प्रथम पुरूषः –   वन्दताम्    -     वन्देताम्     -     वन्दन्ताम्

मध्यम पुरूषः –  वन्दस्व     -     वन्देथाम्     -     वन्दध्वम्

उत्तम पुरूषः –   वन्दै       -     वन्दावहै      -     वन्दमहै

विधिलिङ् (विधिलिंग)

प्रथम पुरूषः  –   वन्देत      -   वन्देयाताम्   -    वन्देरन्

मध्यम पुरूषः –   वन्देथाः     -   वन्देयायाम्   -    वन्देध्वम्

उत्तम पुरूषः –    वन्देय      -   वन्देवहि     -     वन्देमहि

 

अदादि गणः अस् भुवि (वन्द) वर्तमाने लट् (वर्तमान काल)

 

पुरूषः         एकवचन       द्विवचनम्     बहुवचनम्

 

प्रथम पुरूषः   –   अस्ति     –     स्तः       -   सन्ति

मध्यम पुरूषः  –   असि      –     स्थः       –   स्थ 

उत्तम पुरूषः   –  अस्मि      –    स्वः        –   स्मः

भूते लङ् (भूतकाल)

 प्रथम पुरूषः  –  आसीत्    –     आस्ताम्    -    आसन्

 मध्यम पुरूषः –  आसीः     -     आस्तम्    -    आस्त

   उत्तम पुरूषः  –  आसम्     -     आस्व      -   आस्म

भविष्यति लृट् (भविष्यत् काल)

प्रथम पुरूषः   -  भविष्यति    -   भविष्यतः   -   भविष्यन्ति

मध्यम पुरूषः  -  भविष्यसि    -   भविष्यथः   -  भविष्यथ

उत्तम पुरूषः   -  भविष्यमि    -   भविष्यावः  -  भविष्यामः

लोट् (आशीरर्धकम्)

प्रथम पुरूषः –   अस्तु, स्तात्   -   स्तां      -    सन्तु

मध्यम पुरूषः –  एधि, स्तात्    -   स्तं      -    स्त

उत्तम पुरूषः –   असानि       -   असाव    -    असाम

विधिलिङ् (विधिलिंग)

प्रथम पुरूषः  –   स्यात्       -   स्यातां      -    स्युः

मध्यम पुरूषः –   स्याः        -  स्यातं       -    स्यात

उत्तम पुरूषः –   स्याम्       -   स्याव      -     स्याम

युध् संप्रहारे (युद्ध)

वर्तमाने लट् (वर्तमान काल)

      पुरूषः         एकवचन       द्विवचनम्     बहुवचनम्

प्रथम पुरूषः   –   युध्यते     –     युध्येते    -   युध्यन्ते

मध्यम पुरूषः  –   युध्यसे     –     युध्येथे    –   युध्यध्वे

उत्तम पुरूषः   –   युध्ये      –     युध्यावहे   –   युध्यामहे

भूते लङ् (भूतकाल)

 प्रथम पुरूषः  –  अयुध्यत   –     अयुध्येताम्   -   अयुध्यन्त

 मध्यम पुरूषः –  अयुध्यथाः  -     अयुध्येथाम्   -   अयुध्यध्वम्

   उत्तम पुरूषः  –  अयुध्ये     -     अयुध्यावाहि   -   अयुध्यामहि

भविष्यति लृट् (भविष्यत् काल)

प्रथम पुरूषः   -  योत्स्य   -       योत्स्यते   -    योत्स्यन्ते

मध्यम पुरूषः  -  योत्स्यसे  -      योत्स्येथे   -     योत्स्यध्वे

उत्तम पुरूषः   -  योत्स्यये  -     योत्स्यावहे  -     योत्स्यामहे

लोट् (आशीरर्धकम्)

प्रथम पुरूषः    –   युध्यतां      -   युध्येतां      -     युध्यन्तां

मध्यम पुरूषः   –  युध्यस्व      -   युध्येथां      -      युध्यध्वं

उत्तम पुरूषः    –   युध्यै       -   युध्यावहै     -    युध्यामहै

विधिलिङ् (विधिलिंग)

प्रथम पुरूषः     –   युध्येत      -   युध्येयातां      -    युध्यतां

मध्यम पुरूषः    –   युध्येथाः     -   युध्येयाथा     -     युध्यामहै

उत्तम पुरूषः    –   युध्येय       -   युध्येवहि      -     युध्येमहि

समासाः

जब दो या दो से अधिक शब्दों के विलाप से एक नया शब्द बनता है, उसे "समास"कहते है। सामासिक पद को विखंडित करने की क्रिया को "विग्रह"करते है। ये मुख्यतः चार प्रकार के है। 

. अव्ययी भाव समासः २. तत्पुरूष समासः ३. द्वन्द्व समासः ४. बहुव्रीह समासः

अव्ययी भाव समासः

पूर्व पद प्रधान रूप से रहने से "अव्ययी भाव समासः" कहते है।

समस्त पदम्

विग्रहवाक्यम्

समास नाम

अधिहरि

हरौ इति

अव्ययी भाव समासः

समक्षम्

अक्ष्णोः समीपे

अव्ययी भाव समासः

उपकृण्णम्

कृष्णस्य समीपे

अव्ययी भाव समासः

उपलोचनम्

लोचनयोः समीपे

अव्ययी भाव समासः

सुमद्रम्

मद्राणाम् समृद्धिः

अव्ययी भाव समासः

दुर्यवनम्

यवनानां वर्यृद्धिः

अव्ययी भाव समासः

निष्कण्टकम्

कण्टकानां अभावः

अव्ययी भाव समासः

निर्मक्षिकम्

मक्षिकानां अभावः

अव्ययी भाव समासः

निष्पापंम्

पापानां अभावः

अव्ययी भाव समासः

अतिहिमम्

हिमस्य अत्ययः

अव्ययी भाव समासः

अतिनिद्रम्

निद्रासम्प्रतिनयुज्यते

अव्ययी भाव समासः

इति हरि

हरि शब्दस्य प्रादुर्भाव

अव्ययी भाव समासः

अनुगड्गम्

गड्गाया, पश्चात्

अव्ययी भाव समासः

अनुरूपम्

रूपस्य योग्यम्

अव्ययीभाव समासः

प्रत्यहम्

अहनि अहनि

अव्ययीभाव समासः

प्रत्यक्षम्

अक्षणोः प्रति

अव्ययीभाव समासः

परोक्षम्

अक्षणोः परम्

अव्ययीभाव समासः

यथाशक्ति

शक्तिं अनतिक्रम्य

अव्ययीभाव समासः

शाकप्रति

शकस्य लेशः

अव्ययीभाव समासः

सूपप्रति

स्पस्य लेशः

अव्ययीभाव समासः

अनुज्गयेष्ठम्

ज्येष्ठस्य आनुपूषर्येण

अव्ययीभाव समासः

सचक्रम्

चक्रेण युगपात्

अव्ययीभाव समासः

सतृणम्

तृणामपि अंपरित्यज्य

अव्ययीभाव समासः

साग्नि

अग्निग्रन्यपर्यन्तम्

अव्ययीभाव समासः

 

तत्पुरूष समासः

 

 

 

उत्तर पद प्रधान रूप से रहने से तत्पुरूष समास कहते है। ये प्रथमातत्पुरूष समासः, द्वितीयतत्पुरूष समासः, तृतीयातत्पुरूष समासः, चतुथीतत्पुरूष समासः, पञ्चमीतत्पुरूष समासः, षष्ठीतत्पुरूष समासः, सप्तमीतत्पुरूष समासः, नञ् तत्पुरूष समासः।

समस्त पदम्

विग्रहवाक्यम्

समास नाम

अर्धपिप्पली

अर्ध पिप्पल्या

प्रथमातत्पुरूष समासः

पूर्वकायः

पूर्व कायस्य

प्रथमातत्पुरूष समासः

अर्धर्चम्

ऋचः अर्थम्

प्रथमातत्पुरूष समासः

उत्तरकायः

उत्तरं कायस्य

प्रथमातत्पुरूष समासः

कृष्णश्रितः

कृणं श्रितः

द्वितीयतत्पुरूष समासः

अन्नबुभुक्षुः

अन्नं बुभुक्षुः

द्वितीयतत्पुरूष समासः

ग्रामगतः

ग्रामं गतः

द्वितीयतत्पुरूष समासः

मुहूर्त सुखम्

मुहर्त सुखम्

द्वितीयतत्पुरूष समासः

कान्तारातीतः

कान्तारं अतीतः

द्वितीयतत्पुरूष समासः

शड्कुलाखण्डः

शड्कुलया खण्डः

तृतीयातत्पुरूष समासः

धान्यार्थः

धान्येन अर्थः

तृतीयातत्पुरूष समासः

मासावरः

मासेन अवरः

तृतीयातत्पुरूष समासः

मासपूर्वः

मासेन पूर्वः

तृतीयातत्पुरूष समासः

विद्यानिपुणः

विद्यया निपुणः

तृतीयातत्पुरूष समासः

पितृसदृशः

पित्रा सदृशः

तृतीयातत्पुरूष समासः

हरित्रातः

हरिणा त्रातः

तृतीयातत्पुरूष समासः

दध्योदनः

दध्नओदनः

तृतीयातत्पुरूष समासः

युपदारू

युपाय दारू

चतुथीतत्पुरूष समासः

कुण्डलहिरण्यम्

कुण्डलाय हिरण्यम्

चतुथीतत्पुरूष समासः

गुरूदक्षिणा

गुरवे दक्षिणा

चतुथीतत्पुरूष समासः

भूतबलिः

भूतेभ्यः बलिः

चतुथीतत्पुरूष समासः

गोसुखम्

गवे सुखम्

चतुथीतत्पुरूष समासः

गोरक्षितम्

गोभ्यः रक्षितम्

चतुथीतत्पुरूष समासः

सिंहभयम्

सिंहात्भयम्

पञ्चमीतत्पुरूष समासः

वृश्चिकभीः

वृश्चिकात् भीः

पञ्चमीतत्पुरूष समासः

व्याघ्रभीतः

व्याघ्रात् भीतः

पञ्चमीतत्पुरूष समासः

पापभयम्

पापात् भयम्

पञ्चमीतत्पुरूष समासः

सुखापेत्

सुखात् अपेतः

पञ्चमीतत्पुरूष समासः

चोरभयम्

चोरात् भयम्

पञ्चमीतत्पुरूष समासः

अश्वपतितः

अश्वात् पतिः

पञ्चमीतत्पुरूष समासः

कृष्णभक्तः

कृष्णस्य भक्तः

षष्ठीतत्पुरूष समासः

राजपुरूषः

राज्ञः पुरूषः

षष्ठीतत्पुरूष समासः

देवपूजकः

देवानां पुरूषः

षष्ठीतत्पुरूष समासः

वृक्षमूलम्

वृक्षस्य मूलम्

षष्ठीतत्पुरूष समासः

मिथिलानाथः

मिथिलायाः नाथः

षष्ठीतत्पुरूष समासः

सीतापतिः

सीतायाः पतिः

षष्ठीतत्पुरूष समासः

राजदूतः

राज्ञः दूतः

षष्ठीतत्पुरूष समासः

अक्षशौण्डः

अक्षषु शौण्डः

सप्तमीतत्पुरूष समासः

कर्मकुशलः

कर्मणि कुशलः

सप्तमीतत्पुरूष समासः

आतपशुष्कः

आतपेशुष्कः

सप्तमीतत्पुरूष समासः

कार्यदक्षः

कार्ये दक्षः

सप्तमीतत्पुरूष समासः

आश्रमवासः

आश्रमे वासः

सप्तमीतत्पुरूष समासः

स्थालीपक्वः

स्थाल्यां पक्वः

सप्तमीतत्पुरूष समासः

अब्राह्मणः

न ब्राह्मणः

नञ् तत्पुरूष समासः

अनश्वः

न अश्वः

नञ् तत्पुरूष समासः

अधर्मः

न धर्मः

नञ् तत्पुरूष समासः

अनुदारः

न उदारः

नञ् तत्पुरूष समासः

अपरिग्रहः

न परिग्रहः

नञ् तत्पुरूष समासः

अनिच्छा

न इच्छा

नञ् तत्पुरूष समासः

अज्ञानम्

न ज्ञानम्

नञ् तत्पुरूष समासः

 

कर्मधारयसमासः

 

जिस समास के दोनों पदों में विशेष्य् - विशेषणम् या उपमेय – उपमान सम्बंध हो उसे "कर्मधारयसमासः" कहते है। ये विशेषण पूर्वपद कर्मधारयसमासः, विशेष्य कर्मधारयसमासः, विशेषणोभयपद कर्मधारयसमासः, उपमानपूर्वपद कर्मधारयसमासः, उपमानोत्तरपद कर्मधारयसमासः, संभावना पुर्वपद कर्मधारयसमासः।

समस्त पदम्

विग्रहवाक्यम्

समास नाम

कृष्णसर्पः

कृष्णः च असौसर्पः च

विशेषण पूर्वपद कर्मधारयसमासः

रक्तलता

रक्ता च सा लता च

विशेषण पूर्वपद कर्मधारयसमासः

नीलोत्पलम्

नीलम् च तत् उत्पलम्

विशेषण पूर्वपद कर्मधारयसमासः

वैथ्याकरणखसूचिः

वैथ्याकरणः च असौखसूचिः

विशेषण पूर्वपद कर्मधारयसमासः

गोपालबालः

गोपालः च असौ बालः च

विशेषण पूर्वपद कर्मधारयसमासः

मयूख्यंसकाः

मयूराः च ते व्यासकाष च

विशेषण पूर्वपद कर्मधारयसमासः

शीतोष्णम्

शीतम् च उष्णाम् च

विशेषणोभयपद कर्मधारयसमासः

कृष्णश्वेतः

कृष्णः च असौश्वेतः च

विशेषणोभयपद कर्मधारयसमासः

स्नातानुलिप्तः

स्तातः च असौ अनुलिप्तः

विशेषणोभयपद कर्मधारयसमासः

कृताकतम्

कृतम् च अकृतम च

विशेषणोभयपद कर्मधारयसमासः

शुक्लकृष्णः

शुक्लः च असौ कृष्णः च

विशेषणोभयपद कर्मधारयसमासः

घनश्यामः

घनः इव शयामः

उपमानपूर्वपद कर्मधारयसमासः

कम्बुग्रीवा

कम्बु इव कानी

उपमानपूर्वपद कर्मधारयसमासः

चन्द्रमुखम्

चन्द्र इव मुखम्

उपमानपूर्वपद कर्मधारयसमासः

पुरूषव्याघ्र

पुरूषः व्याघ्रः इव

उपमानोत्तरपद कर्मधारयसमासः

मुखकमलम्

मुख्म् कमलम्

उपमानोत्तरपद कर्मधारयसमासः

नरसिंहः

नरः सिंहः इव

उपमानोत्तरपद कर्मधारयसमासः

पुरूषर्पथः

पुरूष त्रषभः इव

उपमानोत्तरपद कर्मधारयसमासः

कपिकुञ्जरः

कपिः कुञ्जरः इव

उपमानोत्तरपद कर्मधारयसमासः

तमालवृक्षः

तमालः इति वृक्षः

सम्भावनापूर्वपदकर्मधारयसमासः

विन्धयपर्वतः

विन्धयः इति पर्वतः

सम्भावनापूर्वपदकर्मधारयसमासः

अयोध्यानगरी

अयोध्या इति नगरी

अवधारणापूर्वपदकर्मधारयसमासः

अविद्याश्रुङ्खला

अविद्या इति श्रुङ्खला

अवधारणापूर्वपदकर्मधारयसमासः

मुखचन्दः

मुखम् एवं चन्द्र

अवधारणापूर्वपदकर्मधारयसमासः

शीलधनम्

शीलम् एवं धनम्

अवधारणापूर्वपदकर्मधारयसमासः

 

द्विगु समासः

 

पूर्वपद संख्या "द्विगु समासः" है। ये तीन भेद है- गति समासः, प्रादि समासः, उपपद समासः।

समस्त पदम्

विग्रहवाक्यम्

समास नाम

पञ्जगवम्

पञ्जानां गवां समाहारः

द्विगु समासः

त्रिलोकम्, त्रलोकी

त्रयाणां लोकानां समाहारः

द्विगु समासः

त्रिभुवनम्

त्रयाणां वुनानां समाहारः

द्विगु समासः

नवरात्रम्

नवानां एत्रीणां समाहारः

द्विगु समासः

पञ्चरात्रम्

पञ्चानां एत्रीणां समाहारः

द्विगु समासः

पञ्चवटी

पञ्चानां वटानां समाहारः

द्विगु समासः

षाण्मातुरः

षण्णां मातृणां अपत्यं पुमान्

द्विगु समासः

सप्तर्पयः

सप्त च ते ऋषयः च

द्विगु समासः

 

गति समासः

 

समस्त पदम्

विग्रहवाक्यम्

समास नाम

शुक्लीकृत्य

अशुक्लं शुक्लं कृत्वा

विशेषणोभयपद कर्मधारयसमासः

पटपटा कृत्य

पटत् पटत् इति कृत्वा

विशेषणोभयपद कर्मधारयसमासः

 

प्रादि समासः

 

समस्त पदम्

विग्रहवाक्यम्

समास नाम

प्राचार्यः

प्रगतः आचार्यः

प्रादि समासः

सुपुरूषः

शोभनः पुरूषः

प्रादि समासः

कुपुरूषः

कुत्सितः पुरूषः

प्रादि समासः

उपपद समासः

समस्त पदम्

विग्रहवाक्यम्

समास नाम

कुम्भाकारः

कुम्भं करोति इति

उपपद समासः

भूधरः

भूमिं धरति इति

उपपद समासः

द्वन्द्व समासः

 

उत्तरपद पूर्वपद दोनों प्रधान रूप से होने से द्वन्द्व समासः कहते है। ये इतरेतरयोग द्वन्द्व समासः, समाहार द्वन्द्व समासः, एकशेष द्वन्द्व समासः। 

 

समस्त पदम्

विग्रहवाक्यम्

समास नाम

रामकृष्णौ

रामः च कृष्णः च

इतरेतरयोग द्वन्द्व समासः

रामलक्ष्मणौ

रामः च लक्ष्मणः च

इतरेतरयोग द्वन्द्व समासः

भीमार्जुनौ

भीमः च अर्जुनः च

इतरेतरयोग द्वन्द्व समासः

पत्रपुष्पफलानि

पत्रम् च पुष्पम् च फलम् च

इतरेतरयोग द्वन्द्व समासः

पाणिपादम्

पाणीच पादौच तेषा समाहार

इतरेतरयोग द्वन्द्व समासः

मार्दभिकपाण विकम्

मार्दडिगकाः च पापा विका,

च तेषां समाहार

समाहार द्वन्द्व समासः

राथिकाश्वारो हम्

राथिकाः च अश्वारोहाः च

समाहार द्वन्द्व समासः

शीतोष्णम्

शीतम् च उष्णाम् च तयो समाहार

समाहार द्वन्द्व समासः

पितरौ

माता च पिता च

एकशेष द्वन्द्व समासः

श्वशुरौ

शवश्रृः च श्वशुरः च

एकशेष द्वन्द्व समासः

दम्पती

जाया च पतिः च

एकशेष द्वन्द्व समासः

शिवौ

शिवा च शिवा च

एकशेष द्वन्द्व समासः

 

 

बहुव्रीहि समासः

 

अन्य पदार्थ प्रधान रूप से होने से बहुव्रीहि समासः कहते है। ( पूर्वपद और उत्तरपद दोनों प्रधान न थे, अन्य पद प्रधान रहते है) इसमें ज्यादातर यस्य सः, यस्याः सा आयेगा। ये..

द्विपद बहुव्रीहि समासः, बहुपद बहुव्रीहि समासः, संख्योतरपद बहुव्रीहि समासः, संख्योयभपद बहुव्रीहि समासः, सहपूर्वपद बहुव्रीहि समासः, व्यतिहार लक्षण बहुव्रीहि समासः, दिगंतराल लक्षण बहुव्रीहि समासः।

 

समस्त पदम्

विग्रहवाक्यम्

समास नाम

चित्रगुः

चित्राः गावः यस्य सः

द्विपद बहुव्रीहि समासः

प्राप्तोदकः

प्राप्तं उदकं यं सः

द्विपद बहुव्रीहि समासः

भुक्तोदनः

भुक्तं ओदनं येन सः

द्विपद बहुव्रीहि समासः

ऊढरथः

ऊढः रथः येन सः

द्विपद बहुव्रीहि समासः

दत्तपशुः

दत्तः पशुः यस्मै सः

द्विपद बहुव्रीहि समासः

उद्यतशरः

उद्यताः शशः यस्मात्

द्विपद बहुव्रीहि समासः

महाबलः

महत् बलम् यस्य सः

द्विपद बहुव्रीहि समासः

चक्रपाणि

चक्रम् पाणौ यस्य सः

द्विपद बहुव्रीहि समासः

सुगात्री

शोभनं गात्रं यस्याः सः

द्विपद बहुव्रीहि समासः

कृशोर्दारी

कृशं उदरं यस्याः सः

द्विपद बहुव्रीहि समासः

वीरपुरूषः

वीराः पुरूषाः यस्मिन् साः

द्विपद बहुव्रीहि समासः

अधिकोन्तसः

अधिकः उन्नतः अंसः यस्यसः

बहुपद बहुव्रीहि समासः

उपदशाः

दशानां समीपे ये सन्ति

संख्योतरपद बहुव्रीहि समासः

द्वित्राः

द्वौ वा त्रयो वा

संख्योयभपद बहुव्रीहि समासः

त्रिचतुराः

त्रयोवात्तारो वा

संख्योयभपद बहुव्रीहि समासः

सकृष्णः

कृष्णेन सह वर्तते

सहपूर्वपद बहुव्रीहि समासः

सपुत्रः

पुत्रेण सह वर्तते

सहपूर्वपद बहुव्रीहि समासः

सकलाः

कलाभिः सह वर्तन्ते

सहपूर्वपद बहुव्रीहि समासः

सबान्धवः

बान्धवैः सहितः

सहपूर्वपद बहुव्रीहि समासः

केशाकेशि

केशेषु केशेषु गृहीत्वा

व्यतिहार लक्षण बहुव्रीहि समासः

दण्डादण्डि

दण्डैः दण्डैः प्रहृत्य इदं

व्यतिहार लक्षण बहुव्रीहि समासः

मुष्टामुष्टि

मुष्टिभिः मुष्टिभिः प्रहृत्य

व्यतिहार लक्षण बहुव्रीहि समासः

दक्षिणपूर्वा

दक्षिणस्याः च पूर्वास्याः

च दिशः अन्तरालम्

दिगंतराल लक्षण बहुव्रीहि समासः