कफ़न - प्रेमचंद

1

झोपड़े के द्वार परबाप और बेटा दोनों एक बुझे हुए अलाव के पास और अन्दर बेटे की जवान बीवीबुधिया प्रसव-वेदना से पछाड़ खा रही थी। रह-रहकर उसके मुँह से ऐसी दिल हिलादेने वाली आवाज़ निकलती थी, कि दोनों कलेजा थाम लेते थे। जाड़े की रात थी, प्रकृति सन्नाटे में डूबी हुई, सारा गाँव अन्धकार में लय हो गया था।

घीसू ने कहा - मालूम होता है, बचेगी नहीं। सारा दिन दौड़ते ही गया, ज़रा देख तो आ।

माधव चिढ़कर बोला - मरना ही है तो जल्दी मर क्यों नही जाती ? देखकर क्या करूं?

'तूबड़ा बेदर्द है बे ! साल-भर जिसके साथ सुख-चैन से रहा, उसी के साथ इतनीबेवफाई!' 'तो मुझसे तो उसका तड़पना और हाथ-पाँव पटकना नहीं देखा जाता।'

चमारोंका कुनबा था और सारे गाँव में बदनाम। घीसू एक दिन काम करता तो तीन दिनआराम करता। माधव इतना कामचोर था कि आधे घंटे काम करता तो घंटे भर चिलमपीता। इसीलिये उन्हें कहीं मज़दूरी नहीं मिलती थी। घर में मुट्ठी भर अनाजभी मौजूद हो, तो उनके लिए काम करने कि कसम थी। जब दो-चार फाके हो जाते तोघीसू पेड़ पर चढ़कर लकड़ियां तोड़ लाता और माधव बाज़ार में बेच आता। जब तकवह पैसे रहते, दोनों इधर उधर मारे-मारे फिरते। गाँव में काम कि कमी ना थी।किसानों का गाँव था, मेहनती आदमी के लिए पचास काम थे। मगर इन दोनों को उसवक़्त बुलाते, जब दो आदमियों से एक का काम पाकर भी संतोष कर लेने के सिवाऔर कोई चारा ना होता। अगर दोनों साधू होते, तो उन्हें संतोष और धैर्य केलिए, संयम और नियम की बिल्कुल ज़रूरत न होती। यह तो इनकी प्रकृति थी।विचित्र जीवन था इनका! घर में मिट्टी के दो-चार बर्तन के सिवा और कोईसम्पत्ति नहीं थी। फटे चीथड़ों से अपनी नग्नता को ढांके हुए जीये जाते थे।संसार की चिंताओं से मुक्त! कर्ज़ से लदे हुए। गालियाँ भी खाते, मार भीखाते, मगर कोई गम नहीं। दीं इतने की वसूली की बिल्कुल आशा ना रहने पर भीलोग इन्हें कुछ न कुछ कर्ज़ दे देते थे। मटर, आलू कि फसल में दूसरों केखेतों से मटर या आलू उखाड़ लाते और भून-भूनकर खा लेते या दस-पांच ईखेंउखाड़ लाते और रात को चूसते। घीसू ने इसी आकाश-वृति से साठ साल कि उम्र काटदी और माधव भी सपूत बेटे कि तरह बाप ही के पद चिन्हों पर चल रहा था, बल्किउसका नाम और भी उजागर कर रहा था। इस वक़्त भी दोनो अलाव के सामने बैठकरआलू भून रहे थे, जो कि किसी खेत से खोद लाए थे। घीसू की स्त्री का तो बहुतदिन हुए देहांत हो गया था। माधव का ब्याह पिछले साल हुआ था। जबसे यह औरतआयी थी, उसने इस खानदान में व्यवस्था की नींव डाली थी और इन दोनो बे-गैरतोंका दोजख भरती रहती थी। जब से वह आयी, यह दोनो और भी आराम तलब हो गए थे।बल्कि कुछ अकड़ने भी लगे थे। कोई कार्य करने को बुलाता, तो निर्बयाज भाव सेदुगनी मजदूरी माँगते। वही औरत आज प्रसव-वेदना से मर रही थी, और यह दोनोंशायद इसी इंतज़ार में थे कि वह मर जाये, तो आराम से सोयें।

घीसू ने आलू छीलते हुए कहा- जाकर देख तो, क्या दशा है उसकी? चुड़ैल का फिसाद होगा, और क्या! यहाँ तो ओझा भी एक रुपया माँगता है!

माधव तो भय था कि वह कोठरी में गया, तो घीसू आलू का एक बड़ा भाग साफ कर देगा। बोला- मुझे वहाँ जाते डर लगता है।

'डर किस बात का है, मैं तो यहाँ हूँ ही।' 'तो तुम्ही जाकर देखो ना।'

'मेरीऔरत जब मरी थी, तो मैं तीन दिन तक उसके पास से हिला तक नही; और फिर मुझसेलजायेगा कि नहीं? जिसका कभी मुँह नही देखा; आज उसका उधड़ा हुआ बदन देखूं।उसे तन कि सुध भी तो ना होगी। मुझे देख लेगी तो खुलकर हाथ-पाँव भी ना पटकसकेगी!'

'मैं सोचता हूँ, कोई बाल बच्चा हुआ, तो क्या होगा? सोंठ, गुड़, तेल, कुछ भी तो नही है घर में!'

'सबकुछ आ जाएगा। भगवान् दे तो! जो लोग अभी एक पैसा नहीं दे रहे हैं, वो ही कलबुलाकर रुपये देंगे। मेरे नौ लड़के हुए, घर में कभी कुछ ना था, भगवान् नेकिसी ना किसी तरह बेड़ा पार ही लगाया।'

जिस समाज में रात-दिन मेहनतकरने वालों की हालात उनकी हालात से कुछ अच्छी ना थी, और किसानों के मुकाबलेमें वो लोग, जो किसानों की दुर्बलताओं से लाभ उठाना जानते थे, कहीँज़्यादा सम्पन्न थे, वहाँ इस तरह की मनोवृति का पैदा हो जान कोई अचरज कीबात नहीं थी। हम तो कहेंगे, घीसू किसानों से कहीँ ज़्यादा विचारवान था औरकिसानों के विचार-शुन्य समूह में शामिल होने के बदले बैठक बाजों की कुत्सितमंडली में जा मिलता था। हाँ, उसमें यह शक्ति ना थी कि बैठक बाजों के नियमऔर नीति का पालन कर्ता। इसलिये जहाँ उसकी मंडली के और लोग गांव के सरगना औरमुखिया बने हुए थे, उस पर सारा गांव ऊँगली उठाता था। फिर भी उसे यह तस्कीनतो थी ही, कि अगर वह फटेहाल हैं तो उसे किसानों की-सी जी-तोड़ मेहनत तोनही करनी पड़ती, और उसकी सरलता और निरीहता से दूसरे लोग बेजा फायदा तो नहीउठाते। दोनो आलू निकाल-निकालकर जलते-जलते खाने लगे। कल से कुछ नही खाया था।इतना सब्र ना था कि उन्हें ठण्डा हो जाने दे। कई बार दोनों की ज़बान जलगयी। छिल जाने पर आलू का बहरी हिस्सा बहुत ज़्यादा गरम ना मालूम होता, लेकिन दोनों दांतों के तले पड़ते ही अन्दर का हिस्सा ज़बान, तलक और तालूजला देता था, और उस अंगारे को मुँह में रखने से ज़्यादा खैरियत तो इसी मेंथी कि वो अन्दर पहुंच जाये। वहाँ उसे ठण्डा करने के लिए काफी समान था।इसलिये दोनों जल्द-जल्द निगल जाते । हालांकि इस कोशिश में उन्ही आंखों सेआँसू निकल आते ।

घीसू को उस वक़्त ठाकुर की बरात याद आयी, जिसमेंबीस साल पहले वह गया था। उस दावत में उसे जो तृप्ति मिली थी, वो उसके जीवनमें एक याद रखने लायक बात थी, और आज भी उसकी याद ताज़ा थी।

बोला- वह भोज नही भूलता। तबसे फिर उस तरह का खाना और भर पेट नही मिला। लड़कीवालों ने सबको भरपेट पूड़ीयां खिलायी थी, सबको!

छोटे-बड़ेसबने पूड़ीयां खायी और असली घी की! चटनी, रायता, तीन तरह के सूखे साग, एकरसदार तरकारी, दही, चटनी, मिठाई, अब क्या बताऊँ कि उस भोग में क्या स्वादमिल, कोई रोक-टोक नहीं थी, जो चीज़ चाहो, मांगो, जितना चाहो खाओ। लोगों नेऐसा खाया, ऐसा खाया, कि किसी से पानी न पीया गया। मगर परोसने वाले हैं किपत्तल में गरम-गरम गोल-गोल सुवासित कचौड़ियां डाल देते हैं। मन करते हैं किनहीं चाहिए, पत्तल को हाथ से रोके हुए हैं, मगर वह हैं कि दिए जाते हैं औरजब सबने मुँह धो लिया, तो पान इलाइची भी मिली। मगर मुझे पान लेने की कहाँसुध थी! खड़ा हुआ ना जाता था। झटपट अपने कम्बल पर जाकर लेट गया। ऐसा दिलदरियाव था वह ठाकुर!

माधव नें पदार्थों का मन ही मन मज़ा लेते हुएकहा- अब हमें कोई ऐसा भोजन नही खिलाता। 'अब कोई क्या खिलायेगा। वह ज़मानादूसरा था। अब तो सबको किफायत सूझती है। शादी-ब्याह में मत खर्च करो।क्रिया-कर्म में मत खर्च करो। पूछो, गरीबों का माल बटोर-बटोर कर कहाँरखोगे? बटोरने में तो कामं नही है। हाँ , खर्च में किफायती सूझती है। '

'तुमने बीस-एक पूड़ीयां खायी होंगी?'

'बीस से ज़्यादा खायी थी!'

'मैं पचास खा जाता!'

'पचास से कम मैंने भी ना खायी होगी।अच्छा पट्ठा था ।तू तो मेरा आधा भी नही है।'

आलूखाकर दोनों ने पानी पिया और वहीँ अलाव के सामने अपनी धोतियाँ ओढ़्कर पाँवपेट पर डाले सो रहे। जैसे दो बड़े-बड़े अजगर गेदुलियाँ मारे पड़े हो।

और बुधिया अभी तक कराह रही थी।

सबेरे माधव ने कोठरी में जाकर देखा, तो उसकी स्त्री ठण्डी हो गयी थी। उसके मुँह पर मक्खियां भिनक रही थी।पथराईहुई आँखें ऊपर टंगी हुई थी । साड़ी देह धुल से लथपथ हो रही थी थी। उसके पेट में बच्चा मर गया था।

माधवभागा हुआ घीसू के पास आया। फिर दोनों ज़ोर-ज़ोर से है-है करने और छातीपीटने लगे। पडोस्वालों ने यह रोना धोना सुना, तो दौड हुए आये और पुरानीमर्यादा के अनुसार इन अभागों को समझाने लगे।

मगर ज़्यादा रोने-पीटने का अवसर ना था। कफ़न और लकड़ी की फिक्र करनी थी। घर में तो पैसा इस तरह गायब था, जैसे चील के घोसले में मॉस!

बाप-बेटेरोते हुए गाव के ज़मिन्दार के पास गए। वह इन दोनों की सूरत से नफरत करतेथे। कयी बार इन्हें अपने हाथों से पीट चुके थे। चोरी करने के लिए, वाडे परकाम पर न आने के लिए। पूछा- क्या है बे घिसुआ, रोता क्यों है? अब तो तूकहीँ दिखलायी भी नहीं देता! मालूम होता है, इस गाव में रहना नहीं चाहता।

घीसूने ज़मीन पर सिर रखकर आंखों से आँसू भरे हुए कहा - सरकार! बड़ी विपत्तिमें हूँ। माधव की घर-वाली गुज़र गयी। रात-भर तड़पती रही सरकार! हम दोनोंउसके सिरहाने बैठे रहे। दवा दारु जो कुछ हो सका, सब कुछ किया, पर वोह हमेंदगा दे गयी। अब कोई एक रोटी देने वाला भी न रह मालिक! तबाह हो गए । घरउजाड़ गया। आपका ग़ुलाम हूँ, अब आपके सिवा कौन उसकी मिट्टी पार लगायेगा।हमारे हाथ में जो कुछ था, वोह सब तो दवा दारु में उठ गया...सरकार की ही दयाहोगी तो उसकी मिट्टी उठेगी। आपके सिवा किसके द्वार पर जाऊं!

ज़मीन्दारसाहब दयालु थे। मगर घीसू पर दया करना काले कम्बल पर रंग चढाना था। जीं मेंतो आया, कह दे, चल, दूर हो यहाँ से। यों तोबुलाने से भी नही आता, आज जबगरज पढी तो आकर खुशामद कर रह है। हरामखोर कहीँका, बदमाश! लेकिन यह क्रोधया दण्ड का अवसर न था। जीं में कूदते हुए दो रुपये निकालकर फ़ेंक दिए। मगरसांत्वना का एक शब्द भी मुँह से न निकला। उसकी तरफ ताका तक नहीं। जैसे सिरके बोझ उतारा हो। जब ज़मींदर साहब ने दो रुपये दिए, तो गाव के बनिए-महाजनोंको इनकार का सहस कैसे होता? घीसू ज़मीन्दार का ढिंढोरा भी पीटना जानता था।किसी ने दो आने दिए, किसी ने चार आने। एक घंटे में घीसू और माधव बाज़ार सेकफ़न लाने चले। इधर लोग बांस-वांस काटने लगे।

गाव की नर्म दिल स्त्रियां आ-आकर लाश देखती थी, और उसकी बेबसी पर दो बूँद आँसू गिराकर चली जाती थी।

बाज़ारमें पहुंचकर, घीसू बोला - लकड़ी तो उसे जलाने भर की मिल गयी है, क्योंमाधव! माधव बोला - हाँ, लकड़ी तो बहुत है, अब कफ़न चाहिऐ।

'तो चलो कोई हल्का-सा कफ़न ले लें।

'हाँ, और क्या! लाश उठते उठते रात हो जायेगी। रात को कफ़न कौन देखता है!'

'कैसा बुरा रिवाज है कि जिसे जीते-जीं तन धांकने को चीथडा भी न मिले, उसे मरने पर नया कफ़न चाहिऐ।'

'कफ़न लाश के साथ जल ही तो जाता है।'

'क्या रखा रहता है! यहीं पांच रुपये पहले मिलते, तो कुछ दवा-दारु कर लेते।

दोनोंएक दुसरे के मन की बात ताड़ रहे थे। बाज़ार में इधर-उधर घुमते रहे। कभी इसबजाज की दुकान पर गए, कभी उस दुकान पर! तरह-तरह के कपडे, रेशमी और सूतीदेखे, मगर कुछ जंचा नहीं. यहाँ तक कि शाम हो गयी. तब दोनों न-जाने किस दयवीप्रेरणा से एक मधुशाला के सामने जा पहुंचे और जैसे पूर्व-निश्चित व्यवस्थासे अन्दर चले गए. वहाँ ज़रा देर तक दोनों असमंजस में खडे रहे. फिर घीसू नेगड्डी के सामने जाकर कहा- साहूजी, एक बोतल हमें भी देना। उसके बाद कुछचिखौना आया, तली हुई मछ्ली आयी, और बरामदे में बैठकर शांतिपूर्वक पीने लगे।कई कुज्जियां ताबड़्तोड़ पीने के बाद सुरूर में आ गए. घीसू बोला - कफ़नलगाने से क्या मिलता? आख़िर जल ही तो जाता. कुछ बहु के साथ तो न जाता. माधवआसमान की तरफ देखकर बोला, मानो देवताओं को अपनी निश्पाप्ता का साक्षी बानारह हो - दुनिया का दस्तूर है, नहीं लोग ब्राहमणोंको हज़ारों रुपये क्योंदे देते हैं? कौन देखता है, परलोक में मिलता है या नहीं!

'बडे आदमियों के पास धन है,फूंके।हमारे पास फूंकने को क्या है!'

'लेकिन लोगों को जवाब क्या दोगे? लोग पूछेंगे नहीं, कफ़न कहाँ है?'

घीसूहसा - अबे, कह देंगे कि रुपये कंमर से खिसक गए। बहुत ढूँढा , मिले नहीं।लोगों को विश्वास नहीं आएगा, लेकिन फिर वही रुपये देंगे। माधव भी हंसा - इनअनपेक्षित सौभाग्य पर. बोला - बड़ी अच्छी थी बेचारी! मरी तो ख़ूब खिलापिला कर!

आधी बोतल से ज़्यादा उड़ गयी। घीसू ने दो सेर पूड़ियाँमंगायी. चटनी, आचार, कलेजियां. शराबखाने के सामने ही दुकान थी. माधव लपककरदो पत्तलों में सारे सामान ले आया. पूरा डेढ़रुपया खर्च हो गया. सिर्फथोड़े से पैसे बच रहे. दोनो इस वक़्त इस शान से बैठे पूड़ियाँ खा रहे थेजैसे जंगल में कोई शेर अपना शिकार उड़ रह हो. न जवाबदेही का खौफ था, नबदनामी का फिक्र।इन सब भावनाओं को उन्होने बहुत पहले ही जीत लिया था.

घीसूदार्शनिक भाव से बोला - हमारी आत्म प्रसन्न हो रही है तो क्या उसे पुन्न नहोगा? माधव ने श्रध्दा से सिर झुकाकर तस्दीख कि - ज़रूर से ज़रूर होगा।भगवान्, तुम अंतर्यामी हो. उसे बैकुंठले जाना ।हम दोनो हृदय सेआशीर्वाद दे रहे हैं. आज जो भोजन मिला , वह कहीँ उम्र-भर न मिल था. एक क्षणके बाद मॅन में एक शंका जागी. बोला - क्यों दादा, हम लोग भी एक न एक दिनवहाँ जायेंगे ही? घीसू ने इस भोले-भाले सवाल का कुछ उत्तर न दिया. वोहपरलोक कि बाते सोचकर इस आनंद में बाधा न डालना चाहता था।

'जो वहाँ हम लोगों से पूछे कि तुमने हमें कफ़न क्यों नही दिया तो क्या कहेंगे?'

'कहेंगे तुम्हारा सिर!'

'पूछेगी तो ज़रूर!'

'तूकैसे जानता है कि उसे कफ़न न मिलेगा? तू मुझेईसा गधा समझता है? साठ सालक्या दुनिया में घास खोदता रह हूँ? उसको कफ़न मिलेगा और बहुत अच्छामिलेगा!' माधव को विश्वास न आया। बोला - कौन देगा? रुपये तो तुमने चाट करदिए। वह तो मुझसे पूछेगी। उसकी माँग में तो सिन्दूर मैंने डाला था।

घीसू गरम होकर बोला - मैं कहता हूँ, उसे कफ़न मिलेगा, तू मानता क्यों नहीं?

'कौन देगा, बताते क्यों नहीं?' 'वही लोग देंगे, जिन्होंने अबकी दिया । हाँ, अबकी रुपये हमारे हाथ न आएंगे। '

ज्यों-ज्योंअँधेरा बढता था और सितारों की चमक तेज़ होती थी, मधुशाला, की रोनक भी बढतीजाती थी। कोई गाता था, दींग मारता था, कोई अपने संगी के गले लिपट जाता था।कोई अपने दोस्त के मुँह में कुल्हड़ लगाए देता था। वहाँ के वातावरण मेंसुरूर था, हवा में नशा। कितने तो यहाँ आकर एक चुल्लू में मस्त हो जाते थे।शराब से ज़्यादा यहाँ की हवा उन पर नशा करती थी। जीवन की बाधाये यहाँ खीचलाती थी और कुछ देर के लिए यह भूल जाते थे कि वे जीते हैं कि मरते हैं। या नजीते हैं, न मरते हैं। और यह दोनो बाप बेटे अब भी मज़े ले-लेकरचुस्स्कियां ले रहे थे। सबकी निगाहें इनकी और जमी हुई थी। दोनों कितनेभाग्य के बलि हैं! पूरी बोतल बीच में है।

भरपेट खाकर माधव ने बचीहुई पूडियों का पत्तल उठाकर एक भिखारी को दे दिया, जो खडा इनकी और भूखीआंखों से देख रह था। और देने के गौरव, आनंद, और उल्लास का अपने जीवन मेंपहली बार अनुभव किया।

घीसू ने कहा - ले जा, ख़ूब खा और आर्शीवाद दे।बीवी कि कमायी है, वह तो मर गयी। मगर तेरा आर्शीवाद उसे ज़रूर पहुंचेगा।रोएँ-रोएँ से आर्शीवाद दो, बड़ी गाडी कमायी के पैसे हैं!

माधव ने फिर आसमान की तरफ देखकर कहा - वह बैकुंठ में जायेगी दादा, बैकुंठ की रानी बनेगी।

घीसूखड़ा हो गया और उल्लास की लहरों में तैरता हुआ बोला - हाँ बीटा, बैकुंठमें जायेगी। किसी को सताया नहीं, किसी को दबाया नहीं। मरते-मरते हमारीजिन्दगी की सबसे बड़ी लालसा पूरी कर गयी। वह न बैकुंठ जायेगी तो क्यामोटे-मोटे लोग जायेंगे, जो गरीबों को दोनों हाथों से लूटते हैं, और अपनेपाप को धोने के लिए गंगा में नहाते हैं और मंदिरों में जल चडाते हैं?

श्रद्धालुताका यह रंग तुरंत ही बदल गया। अस्थिरता नशे की खासियत है। दु:ख और निराशाका दौरा हुआ। माधव बोला - मगर दादा, बेचारी ने जिन्दगी में बड़ा दु:ख भोगा।कितना दु:ख झेलकर मरी!

वह आंखों पर हाथ रखकर रोने लगा, चीखें मार-मारकर।

घीसूने समझाया - क्यों रोता हैं बेटा, खुश हो कि वह माया-जाल से मुक्त हो गई, जंजाल से छूट गयी। बड़ी भाग्यवान थी, इतनी जल्द माया-मोह के बन्धन तोड़दिए।

और दोनों खडे होकर गाने लगे -

  "ठगिनी क्यों नैना झाम्कावे! ठगिनी ...!"

पियाक्क्ड्डोंकी आँखें इनकी और लगी हुई थी और वे दोनो अपने दिल में मस्त गाये जाते थे।फिर दोनों नाचने लगे। उछले भी, कूदे भी। गिरे भी, मटके भी। भाव भी बनाए, अभिनय भी किये, और आख़िर नशे से मदमस्त होकर वहीँ गिर पडे।

 

पूस की रात - प्रेमचंद

1

झोपड़े के द्वार परबाप और बेटा दोनों एक बुझे हुए अलाव के पास और अन्दर बेटे की जवान बीवीबुधिया प्रसव-वेदना से पछाड़ खा रही थी। रह-रहकर उसके मुँह से ऐसी दिल हिलादेने वाली आवाज़ निकलती थी, कि दोनों कलेजा थाम लेते थे। जाड़े की रात थी, प्रकृति सन्नाटे में डूबी हुई, सारा गाँव अन्धकार में लय हो गया था।

घीसू ने कहा - मालूम होता है, बचेगी नहीं। सारा दिन दौड़ते ही गया, ज़रा देख तो आ।

माधव चिढ़कर बोला - मरना ही है तो जल्दी मर क्यों नही जाती ? देखकर क्या करूं?

'तूबड़ा बेदर्द है बे ! साल-भर जिसके साथ सुख-चैन से रहा, उसी के साथ इतनीबेवफाई!' 'तो मुझसे तो उसका तड़पना और हाथ-पाँव पटकना नहीं देखा जाता।'

चमारोंका कुनबा था और सारे गाँव में बदनाम। घीसू एक दिन काम करता तो तीन दिनआराम करता। माधव इतना कामचोर था कि आधे घंटे काम करता तो घंटे भर चिलमपीता। इसीलिये उन्हें कहीं मज़दूरी नहीं मिलती थी। घर में मुट्ठी भर अनाजभी मौजूद हो, तो उनके लिए काम करने कि कसम थी। जब दो-चार फाके हो जाते तोघीसू पेड़ पर चढ़कर लकड़ियां तोड़ लाता और माधव बाज़ार में बेच आता। जब तकवह पैसे रहते, दोनों इधर उधर मारे-मारे फिरते। गाँव में काम कि कमी ना थी।किसानों का गाँव था, मेहनती आदमी के लिए पचास काम थे। मगर इन दोनों को उसवक़्त बुलाते, जब दो आदमियों से एक का काम पाकर भी संतोष कर लेने के सिवाऔर कोई चारा ना होता। अगर दोनों साधू होते, तो उन्हें संतोष और धैर्य केलिए, संयम और नियम की बिल्कुल ज़रूरत न होती। यह तो इनकी प्रकृति थी।विचित्र जीवन था इनका! घर में मिट्टी के दो-चार बर्तन के सिवा और कोईसम्पत्ति नहीं थी। फटे चीथड़ों से अपनी नग्नता को ढांके हुए जीये जाते थे।संसार की चिंताओं से मुक्त! कर्ज़ से लदे हुए। गालियाँ भी खाते, मार भीखाते, मगर कोई गम नहीं। दीं इतने की वसूली की बिल्कुल आशा ना रहने पर भीलोग इन्हें कुछ न कुछ कर्ज़ दे देते थे। मटर, आलू कि फसल में दूसरों केखेतों से मटर या आलू उखाड़ लाते और भून-भूनकर खा लेते या दस-पांच ईखेंउखाड़ लाते और रात को चूसते। घीसू ने इसी आकाश-वृति से साठ साल कि उम्र काटदी और माधव भी सपूत बेटे कि तरह बाप ही के पद चिन्हों पर चल रहा था, बल्किउसका नाम और भी उजागर कर रहा था। इस वक़्त भी दोनो अलाव के सामने बैठकरआलू भून रहे थे, जो कि किसी खेत से खोद लाए थे। घीसू की स्त्री का तो बहुतदिन हुए देहांत हो गया था। माधव का ब्याह पिछले साल हुआ था। जबसे यह औरतआयी थी, उसने इस खानदान में व्यवस्था की नींव डाली थी और इन दोनो बे-गैरतोंका दोजख भरती रहती थी। जब से वह आयी, यह दोनो और भी आराम तलब हो गए थे।बल्कि कुछ अकड़ने भी लगे थे। कोई कार्य करने को बुलाता, तो निर्बयाज भाव सेदुगनी मजदूरी माँगते। वही औरत आज प्रसव-वेदना से मर रही थी, और यह दोनोंशायद इसी इंतज़ार में थे कि वह मर जाये, तो आराम से सोयें।

घीसू ने आलू छीलते हुए कहा- जाकर देख तो, क्या दशा है उसकी? चुड़ैल का फिसाद होगा, और क्या! यहाँ तो ओझा भी एक रुपया माँगता है!

माधव तो भय था कि वह कोठरी में गया, तो घीसू आलू का एक बड़ा भाग साफ कर देगा। बोला- मुझे वहाँ जाते डर लगता है।

'डर किस बात का है, मैं तो यहाँ हूँ ही।' 'तो तुम्ही जाकर देखो ना।'

'मेरीऔरत जब मरी थी, तो मैं तीन दिन तक उसके पास से हिला तक नही; और फिर मुझसेलजायेगा कि नहीं? जिसका कभी मुँह नही देखा; आज उसका उधड़ा हुआ बदन देखूं।उसे तन कि सुध भी तो ना होगी। मुझे देख लेगी तो खुलकर हाथ-पाँव भी ना पटकसकेगी!'

'मैं सोचता हूँ, कोई बाल बच्चा हुआ, तो क्या होगा? सोंठ, गुड़, तेल, कुछ भी तो नही है घर में!'

'सबकुछ आ जाएगा। भगवान् दे तो! जो लोग अभी एक पैसा नहीं दे रहे हैं, वो ही कलबुलाकर रुपये देंगे। मेरे नौ लड़के हुए, घर में कभी कुछ ना था, भगवान् नेकिसी ना किसी तरह बेड़ा पार ही लगाया।'

जिस समाज में रात-दिन मेहनतकरने वालों की हालात उनकी हालात से कुछ अच्छी ना थी, और किसानों के मुकाबलेमें वो लोग, जो किसानों की दुर्बलताओं से लाभ उठाना जानते थे, कहीँज़्यादा सम्पन्न थे, वहाँ इस तरह की मनोवृति का पैदा हो जान कोई अचरज कीबात नहीं थी। हम तो कहेंगे, घीसू किसानों से कहीँ ज़्यादा विचारवान था औरकिसानों के विचार-शुन्य समूह में शामिल होने के बदले बैठक बाजों की कुत्सितमंडली में जा मिलता था। हाँ, उसमें यह शक्ति ना थी कि बैठक बाजों के नियमऔर नीति का पालन कर्ता। इसलिये जहाँ उसकी मंडली के और लोग गांव के सरगना औरमुखिया बने हुए थे, उस पर सारा गांव ऊँगली उठाता था। फिर भी उसे यह तस्कीनतो थी ही, कि अगर वह फटेहाल हैं तो उसे किसानों की-सी जी-तोड़ मेहनत तोनही करनी पड़ती, और उसकी सरलता और निरीहता से दूसरे लोग बेजा फायदा तो नहीउठाते। दोनो आलू निकाल-निकालकर जलते-जलते खाने लगे। कल से कुछ नही खाया था।इतना सब्र ना था कि उन्हें ठण्डा हो जाने दे। कई बार दोनों की ज़बान जलगयी। छिल जाने पर आलू का बहरी हिस्सा बहुत ज़्यादा गरम ना मालूम होता, लेकिन दोनों दांतों के तले पड़ते ही अन्दर का हिस्सा ज़बान, तलक और तालूजला देता था, और उस अंगारे को मुँह में रखने से ज़्यादा खैरियत तो इसी मेंथी कि वो अन्दर पहुंच जाये। वहाँ उसे ठण्डा करने के लिए काफी समान था।इसलिये दोनों जल्द-जल्द निगल जाते । हालांकि इस कोशिश में उन्ही आंखों सेआँसू निकल आते ।

घीसू को उस वक़्त ठाकुर की बरात याद आयी, जिसमेंबीस साल पहले वह गया था। उस दावत में उसे जो तृप्ति मिली थी, वो उसके जीवनमें एक याद रखने लायक बात थी, और आज भी उसकी याद ताज़ा थी।

बोला- वह भोज नही भूलता। तबसे फिर उस तरह का खाना और भर पेट नही मिला। लड़कीवालों ने सबको भरपेट पूड़ीयां खिलायी थी, सबको!

छोटे-बड़ेसबने पूड़ीयां खायी और असली घी की! चटनी, रायता, तीन तरह के सूखे साग, एकरसदार तरकारी, दही, चटनी, मिठाई, अब क्या बताऊँ कि उस भोग में क्या स्वादमिल, कोई रोक-टोक नहीं थी, जो चीज़ चाहो, मांगो, जितना चाहो खाओ। लोगों नेऐसा खाया, ऐसा खाया, कि किसी से पानी न पीया गया। मगर परोसने वाले हैं किपत्तल में गरम-गरम गोल-गोल सुवासित कचौड़ियां डाल देते हैं। मन करते हैं किनहीं चाहिए, पत्तल को हाथ से रोके हुए हैं, मगर वह हैं कि दिए जाते हैं औरजब सबने मुँह धो लिया, तो पान इलाइची भी मिली। मगर मुझे पान लेने की कहाँसुध थी! खड़ा हुआ ना जाता था। झटपट अपने कम्बल पर जाकर लेट गया। ऐसा दिलदरियाव था वह ठाकुर!

माधव नें पदार्थों का मन ही मन मज़ा लेते हुएकहा- अब हमें कोई ऐसा भोजन नही खिलाता। 'अब कोई क्या खिलायेगा। वह ज़मानादूसरा था। अब तो सबको किफायत सूझती है। शादी-ब्याह में मत खर्च करो।क्रिया-कर्म में मत खर्च करो। पूछो, गरीबों का माल बटोर-बटोर कर कहाँरखोगे? बटोरने में तो कामं नही है। हाँ , खर्च में किफायती सूझती है। '

'तुमने बीस-एक पूड़ीयां खायी होंगी?'

'बीस से ज़्यादा खायी थी!'

'मैं पचास खा जाता!'

'पचास से कम मैंने भी ना खायी होगी।अच्छा पट्ठा था ।तू तो मेरा आधा भी नही है।'

आलूखाकर दोनों ने पानी पिया और वहीँ अलाव के सामने अपनी धोतियाँ ओढ़्कर पाँवपेट पर डाले सो रहे। जैसे दो बड़े-बड़े अजगर गेदुलियाँ मारे पड़े हो।

और बुधिया अभी तक कराह रही थी।

सबेरे माधव ने कोठरी में जाकर देखा, तो उसकी स्त्री ठण्डी हो गयी थी। उसके मुँह पर मक्खियां भिनक रही थी।पथराईहुई आँखें ऊपर टंगी हुई थी । साड़ी देह धुल से लथपथ हो रही थी थी। उसके पेट में बच्चा मर गया था।

माधवभागा हुआ घीसू के पास आया। फिर दोनों ज़ोर-ज़ोर से है-है करने और छातीपीटने लगे। पडोस्वालों ने यह रोना धोना सुना, तो दौड हुए आये और पुरानीमर्यादा के अनुसार इन अभागों को समझाने लगे।

मगर ज़्यादा रोने-पीटने का अवसर ना था। कफ़न और लकड़ी की फिक्र करनी थी। घर में तो पैसा इस तरह गायब था, जैसे चील के घोसले में मॉस!

बाप-बेटेरोते हुए गाव के ज़मिन्दार के पास गए। वह इन दोनों की सूरत से नफरत करतेथे। कयी बार इन्हें अपने हाथों से पीट चुके थे। चोरी करने के लिए, वाडे परकाम पर न आने के लिए। पूछा- क्या है बे घिसुआ, रोता क्यों है? अब तो तूकहीँ दिखलायी भी नहीं देता! मालूम होता है, इस गाव में रहना नहीं चाहता।

घीसूने ज़मीन पर सिर रखकर आंखों से आँसू भरे हुए कहा - सरकार! बड़ी विपत्तिमें हूँ। माधव की घर-वाली गुज़र गयी। रात-भर तड़पती रही सरकार! हम दोनोंउसके सिरहाने बैठे रहे। दवा दारु जो कुछ हो सका, सब कुछ किया, पर वोह हमेंदगा दे गयी। अब कोई एक रोटी देने वाला भी न रह मालिक! तबाह हो गए । घरउजाड़ गया। आपका ग़ुलाम हूँ, अब आपके सिवा कौन उसकी मिट्टी पार लगायेगा।हमारे हाथ में जो कुछ था, वोह सब तो दवा दारु में उठ गया...सरकार की ही दयाहोगी तो उसकी मिट्टी उठेगी। आपके सिवा किसके द्वार पर जाऊं!

ज़मीन्दारसाहब दयालु थे। मगर घीसू पर दया करना काले कम्बल पर रंग चढाना था। जीं मेंतो आया, कह दे, चल, दूर हो यहाँ से। यों तोबुलाने से भी नही आता, आज जबगरज पढी तो आकर खुशामद कर रह है। हरामखोर कहीँका, बदमाश! लेकिन यह क्रोधया दण्ड का अवसर न था। जीं में कूदते हुए दो रुपये निकालकर फ़ेंक दिए। मगरसांत्वना का एक शब्द भी मुँह से न निकला। उसकी तरफ ताका तक नहीं। जैसे सिरके बोझ उतारा हो। जब ज़मींदर साहब ने दो रुपये दिए, तो गाव के बनिए-महाजनोंको इनकार का सहस कैसे होता? घीसू ज़मीन्दार का ढिंढोरा भी पीटना जानता था।किसी ने दो आने दिए, किसी ने चार आने। एक घंटे में घीसू और माधव बाज़ार सेकफ़न लाने चले। इधर लोग बांस-वांस काटने लगे।

गाव की नर्म दिल स्त्रियां आ-आकर लाश देखती थी, और उसकी बेबसी पर दो बूँद आँसू गिराकर चली जाती थी।

बाज़ारमें पहुंचकर, घीसू बोला - लकड़ी तो उसे जलाने भर की मिल गयी है, क्योंमाधव! माधव बोला - हाँ, लकड़ी तो बहुत है, अब कफ़न चाहिऐ।

'तो चलो कोई हल्का-सा कफ़न ले लें।

'हाँ, और क्या! लाश उठते उठते रात हो जायेगी। रात को कफ़न कौन देखता है!'

'कैसा बुरा रिवाज है कि जिसे जीते-जीं तन धांकने को चीथडा भी न मिले, उसे मरने पर नया कफ़न चाहिऐ।'

'कफ़न लाश के साथ जल ही तो जाता है।'

'क्या रखा रहता है! यहीं पांच रुपये पहले मिलते, तो कुछ दवा-दारु कर लेते।

दोनोंएक दुसरे के मन की बात ताड़ रहे थे। बाज़ार में इधर-उधर घुमते रहे। कभी इसबजाज की दुकान पर गए, कभी उस दुकान पर! तरह-तरह के कपडे, रेशमी और सूतीदेखे, मगर कुछ जंचा नहीं. यहाँ तक कि शाम हो गयी. तब दोनों न-जाने किस दयवीप्रेरणा से एक मधुशाला के सामने जा पहुंचे और जैसे पूर्व-निश्चित व्यवस्थासे अन्दर चले गए. वहाँ ज़रा देर तक दोनों असमंजस में खडे रहे. फिर घीसू नेगड्डी के सामने जाकर कहा- साहूजी, एक बोतल हमें भी देना। उसके बाद कुछचिखौना आया, तली हुई मछ्ली आयी, और बरामदे में बैठकर शांतिपूर्वक पीने लगे।कई कुज्जियां ताबड़्तोड़ पीने के बाद सुरूर में आ गए. घीसू बोला - कफ़नलगाने से क्या मिलता? आख़िर जल ही तो जाता. कुछ बहु के साथ तो न जाता. माधवआसमान की तरफ देखकर बोला, मानो देवताओं को अपनी निश्पाप्ता का साक्षी बानारह हो - दुनिया का दस्तूर है, नहीं लोग ब्राहमणोंको हज़ारों रुपये क्योंदे देते हैं? कौन देखता है, परलोक में मिलता है या नहीं!

'बडे आदमियों के पास धन है,फूंके।हमारे पास फूंकने को क्या है!'

'लेकिन लोगों को जवाब क्या दोगे? लोग पूछेंगे नहीं, कफ़न कहाँ है?'

घीसूहसा - अबे, कह देंगे कि रुपये कंमर से खिसक गए। बहुत ढूँढा , मिले नहीं।लोगों को विश्वास नहीं आएगा, लेकिन फिर वही रुपये देंगे। माधव भी हंसा - इनअनपेक्षित सौभाग्य पर. बोला - बड़ी अच्छी थी बेचारी! मरी तो ख़ूब खिलापिला कर!

आधी बोतल से ज़्यादा उड़ गयी। घीसू ने दो सेर पूड़ियाँमंगायी. चटनी, आचार, कलेजियां. शराबखाने के सामने ही दुकान थी. माधव लपककरदो पत्तलों में सारे सामान ले आया. पूरा डेढ़रुपया खर्च हो गया. सिर्फथोड़े से पैसे बच रहे. दोनो इस वक़्त इस शान से बैठे पूड़ियाँ खा रहे थेजैसे जंगल में कोई शेर अपना शिकार उड़ रह हो. न जवाबदेही का खौफ था, नबदनामी का फिक्र।इन सब भावनाओं को उन्होने बहुत पहले ही जीत लिया था.

घीसूदार्शनिक भाव से बोला - हमारी आत्म प्रसन्न हो रही है तो क्या उसे पुन्न नहोगा? माधव ने श्रध्दा से सिर झुकाकर तस्दीख कि - ज़रूर से ज़रूर होगा।भगवान्, तुम अंतर्यामी हो. उसे बैकुंठले जाना ।हम दोनो हृदय सेआशीर्वाद दे रहे हैं. आज जो भोजन मिला , वह कहीँ उम्र-भर न मिल था. एक क्षणके बाद मॅन में एक शंका जागी. बोला - क्यों दादा, हम लोग भी एक न एक दिनवहाँ जायेंगे ही? घीसू ने इस भोले-भाले सवाल का कुछ उत्तर न दिया. वोहपरलोक कि बाते सोचकर इस आनंद में बाधा न डालना चाहता था।

'जो वहाँ हम लोगों से पूछे कि तुमने हमें कफ़न क्यों नही दिया तो क्या कहेंगे?'

'कहेंगे तुम्हारा सिर!'

'पूछेगी तो ज़रूर!'

'तूकैसे जानता है कि उसे कफ़न न मिलेगा? तू मुझेईसा गधा समझता है? साठ सालक्या दुनिया में घास खोदता रह हूँ? उसको कफ़न मिलेगा और बहुत अच्छामिलेगा!' माधव को विश्वास न आया। बोला - कौन देगा? रुपये तो तुमने चाट करदिए। वह तो मुझसे पूछेगी। उसकी माँग में तो सिन्दूर मैंने डाला था।

घीसू गरम होकर बोला - मैं कहता हूँ, उसे कफ़न मिलेगा, तू मानता क्यों नहीं?

'कौन देगा, बताते क्यों नहीं?' 'वही लोग देंगे, जिन्होंने अबकी दिया । हाँ, अबकी रुपये हमारे हाथ न आएंगे। '

ज्यों-ज्योंअँधेरा बढता था और सितारों की चमक तेज़ होती थी, मधुशाला, की रोनक भी बढतीजाती थी। कोई गाता था, दींग मारता था, कोई अपने संगी के गले लिपट जाता था।कोई अपने दोस्त के मुँह में कुल्हड़ लगाए देता था। वहाँ के वातावरण मेंसुरूर था, हवा में नशा। कितने तो यहाँ आकर एक चुल्लू में मस्त हो जाते थे।शराब से ज़्यादा यहाँ की हवा उन पर नशा करती थी। जीवन की बाधाये यहाँ खीचलाती थी और कुछ देर के लिए यह भूल जाते थे कि वे जीते हैं कि मरते हैं। या नजीते हैं, न मरते हैं। और यह दोनो बाप बेटे अब भी मज़े ले-लेकरचुस्स्कियां ले रहे थे। सबकी निगाहें इनकी और जमी हुई थी। दोनों कितनेभाग्य के बलि हैं! पूरी बोतल बीच में है।

भरपेट खाकर माधव ने बचीहुई पूडियों का पत्तल उठाकर एक भिखारी को दे दिया, जो खडा इनकी और भूखीआंखों से देख रह था। और देने के गौरव, आनंद, और उल्लास का अपने जीवन मेंपहली बार अनुभव किया।

घीसू ने कहा - ले जा, ख़ूब खा और आर्शीवाद दे।बीवी कि कमायी है, वह तो मर गयी। मगर तेरा आर्शीवाद उसे ज़रूर पहुंचेगा।रोएँ-रोएँ से आर्शीवाद दो, बड़ी गाडी कमायी के पैसे हैं!

माधव ने फिर आसमान की तरफ देखकर कहा - वह बैकुंठ में जायेगी दादा, बैकुंठ की रानी बनेगी।

घीसूखड़ा हो गया और उल्लास की लहरों में तैरता हुआ बोला - हाँ बीटा, बैकुंठमें जायेगी। किसी को सताया नहीं, किसी को दबाया नहीं। मरते-मरते हमारीजिन्दगी की सबसे बड़ी लालसा पूरी कर गयी। वह न बैकुंठ जायेगी तो क्यामोटे-मोटे लोग जायेंगे, जो गरीबों को दोनों हाथों से लूटते हैं, और अपनेपाप को धोने के लिए गंगा में नहाते हैं और मंदिरों में जल चडाते हैं?

श्रद्धालुताका यह रंग तुरंत ही बदल गया। अस्थिरता नशे की खासियत है। दु:ख और निराशाका दौरा हुआ। माधव बोला - मगर दादा, बेचारी ने जिन्दगी में बड़ा दु:ख भोगा।कितना दु:ख झेलकर मरी!

वह आंखों पर हाथ रखकर रोने लगा, चीखें मार-मारकर।

घीसूने समझाया - क्यों रोता हैं बेटा, खुश हो कि वह माया-जाल से मुक्त हो गई, जंजाल से छूट गयी। बड़ी भाग्यवान थी, इतनी जल्द माया-मोह के बन्धन तोड़दिए।

और दोनों खडे होकर गाने लगे -

  "ठगिनी क्यों नैना झाम्कावे! ठगिनी ...!"

पियाक्क्ड्डोंकी आँखें इनकी और लगी हुई थी और वे दोनो अपने दिल में मस्त गाये जाते थे।फिर दोनों नाचने लगे। उछले भी, कूदे भी। गिरे भी, मटके भी। भाव भी बनाए, अभिनय भी किये, और आख़िर नशे से मदमस्त होकर वहीँ गिर पडे।

 

पंच परमेश्वर - प्रेमचंद

1

जुम्मनशेख अलगू चौधरी मेंगाढ़ी मित्रता थी। साझे में खेती होती थी। कुछ लेन-देन में भी साझा था। एकको दूसरे पर अटल विश्वास था। जुम्मन जब हज करने गये थे, तब अपना घर अलगू कोसौंप गये थे, और अलगू जब कभी बाहर जाते, तो जुम्मन पर अपना घर छोड़ देतेथे। उनमें न खाना-पाना का व्यवहार था, न धर्म का नाता; केवल विचार मिलतेथे। मित्रता का मूलमंत्र भी यही है।
इस मित्रता का जन्म उसी समय हुआ, जबदोनों मित्र बालक ही थे, और जुम्मन के पूज्य पिता, जुमराती, उन्हें शिक्षाप्रदान करते थे। अलगू ने गुरू जी की बहुत सेवा की थी, खूब प्याले धोये।उनका हुक्का एक क्षण के लिए भी विश्राम न लेने पाता था, क्योंकि प्रत्येकचिलम अलगू को आध घंटे तक किताबों से अलग कर देती थी। अलगू के पिता पुरानेविचारों के मनुष्य थे। उन्हें शिक्षा की अपेक्षा गुरु की सेवा-शुश्रूषा परअधिक विश्वास था। वह कहते थे कि विद्या पढ़ने ने नहीं आती; जो कुछ होता है, गुरु के आशीर्वाद से। बस, गुरु जी की कृपा-दृष्टि चाहिए। अतएव यदि अलगू परजुमराती शेख के आशीर्वाद अथवा सत्संग का कुछ फल न हुआ, तो यह मानकर संतोषकर लेना कि विद्योपार्जन में मैंने यथाशक्ति कोई बात उठा नहीं रखी, विद्याउसके भाग्य ही में न थी, तो कैसे आती?
मगर जुमराती शेख स्वयं आशीर्वादके कायल न थे। उन्हें अपने सोटे पर अधिक भरोसा था, और उसी सोटे के प्रतापसे आज-पास के गॉँवों में जुम्मन की पूजा होती थी। उनके लिखे हुए रेहननामेया बैनामे पर कचहरी का मुहर्रिर भी कदम न उठा सकता था। हल्के का डाकिया, कांस्टेबिल और तहसील का चपरासी--सब उनकी कृपा की आकांक्षा रखते थे। अतएवअलगू का मान उनके धन के कारण था, तो जुम्मन शेख अपनी अनमोल विद्या से हीसबके आदरपात्र बने थे।


                                                    २
जुम्मन शेख की एक बूढ़ी खाला (मौसी) थी।उसके पास कुछ थोड़ी-सी मिलकियत थी; परन्तु उसके निकट संबंधियों में कोई नथा। जुम्मन ने लम्बे-चौड़े वादे करके वह मिलकियत अपने नाम लिखवा ली थी। जबतक दानपत्र की रजिस्ट्री न हुई थी, तब तक खालाजान का खूब आदर-सत्कार कियागया; उन्हें खूब स्वादिष्ट पदार्थ खिलाये गये। हलवे-पुलाव की वर्षा- सी कीगयी; पर रजिस्ट्री की मोहर ने इन खातिरदारियों पर भी मानों मुहर लगा दी।जुम्मन की पत्नी करीमन रोटियों के साथ कड़वी बातों के कुछ तेज, तीखे सालनभी देने लगी। जुम्मन शेख भी निठुर हो गये। अब बेचारी खालाजान को प्राय:नित्य ही ऐसी बातें सुननी पड़ती थी।
बुढ़िया न जाने कब तक जियेगी।दो-तीन बीघे ऊसर क्या दे दिया, मानों मोल ले लिया है ! बघारी दाल के बिनारोटियॉँ नहीं उतरतीं ! जितना रुपया इसके पेट में झोंक चुके, उतने से तो अबतक गॉँव मोल ले लेते।
कुछ दिन खालाजान ने सुना और सहा; पर जब न सहा गयातब जुम्मन से शिकायत की। तुम्मन ने स्थानीय कर्मचारी—गृहस्वांमी—के प्रबंधदेना उचित न समझा। कुछ दिन तक दिन तक और यों ही रो-धोकर काम चलता रहा। अन्तमें एक दिन खाला ने जुम्मन से कहा—बेटा ! तुम्हारे साथ मेरा निर्वाह नहोगा। तुम मुझे रुपये दे दिया करो, मैं अपना पका-खा लूँगी।
जुम्मन ने घृष्टता के साथ उत्तर दिया—रुपये क्या यहाँ फलते हैं?
खाला ने नम्रता से कहा—मुझे कुछ रूखा-सूखा चाहिए भी कि नहीं?
जुम्मन ने गम्भीर स्वर से जवाब़ दिया—तो कोई यह थोड़े ही समझा था कि तु मौत से लड़कर आयी हो?
खालाबिगड़ गयीं, उन्होंने पंचायत करने की धमकी दी। जुम्मन हँसे, जिस तरह कोईशिकारी हिरन को जाली की तरफ जाते देख कर मन ही मन हँसता है। वह बोले—हॉँ, जरूर पंचायत करो। फैसला हो जाय। मुझे भी यह रात-दिन की खटखट पसंद नहीं।
पंचायतमें किसकी जीत होगी, इस विषय में जुम्मन को कुछ भी संदेह न थ। आस-पास केगॉँवों में ऐसा कौन था, उसके अनुग्रहों का ऋणी न हो; ऐसा कौन था, जो उसकोशत्रु बनाने का साहस कर सके? किसमें इतना बल था, जो उसका सामना कर सके? आसमान के फरिश्ते तो पंचायत करने आवेंगे ही नहीं।

                                              ३
इसके बाद कईदिन तक बूढ़ी खाला हाथ में एक लकड़ी लिये आस-पास के गॉँवों में दौड़तीरहीं। कमर झुक कर कमान हो गयी थी। एक-एक पग चलना दूभर था; मगर बात आ पड़ीथी। उसका निर्णय करना जरूरी था।
बिरला ही कोई भला आदमी होगा, जिसकेसमाने बुढ़िया ने दु:ख के ऑंसू न बहाये हों। किसी ने तो यों ही ऊपरी मन सेहूँ-हॉँ करके टाल दिया, और किसी ने इस अन्याय पर जमाने को गालियाँ दीं।कहा—कब्र में पॉँव जटके हुए हैं, आज मरे, कल दूसरा दिन, पर हवस नहीं मानती।अब तुम्हें क्या चाहिए? रोटी खाओ और अल्लाह का नाम लो। तुम्हें अबखेती-बारी से क्या काम है? कुछ ऐसे सज्जन भी थे, जिन्हें हास्य-रस केरसास्वादन का अच्छा अवसर मिला। झुकी हुई कमर, पोपला मुँह, सन के-से बालइतनी सामग्री एकत्र हों, तब हँसी क्यों न आवे? ऐसे न्यायप्रिय, दयालु, दीन-वत्सल पुरुष बहुत कम थे, जिन्होंने इस अबला के दुखड़े को गौर से सुनाहो और उसको सांत्वना दी हो। चारों ओर से घूम-घाम कर बेचारी अलगू चौधरी केपास आयी। लाठी पटक दी और दम लेकर बोली—बेटा, तुम भी दम भर के लिये मेरीपंचायत में चले आना।
अलगू—मुझे बुला कर क्या करोगी? कई गॉँव के आदमी तो आवेंगे ही।
खाला—अपनी विपद तो सबके आगे रो आयी। अब आनरे न आने का अख्तियार उनको है।
अलगू—यों आने को आ जाऊँगा; मगर पंचायत में मुँह न खोलूँगा।
खाला—क्यों बेटा?
अलगू—अब इसका कया जवाब दूँ? अपनी खुशी। जुम्मन मेरा पुराना मित्र है। उससे बिगाड़ नहीं कर सकता।
खाला—बेटा, क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात न कहोगे?
हमारेसोये हुए धर्म-ज्ञान की सारी सम्पत्ति लुट जाय, तो उसे खबर नहीं होता, परन्तु ललकार सुनकर वह सचेत हो जाता है। फिर उसे कोई जीत नहीं सकता। अलगूइस सवाल का काई उत्तर न दे सका, पर उसके
हृदय में ये शब्द गूँज रहे थे-
क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात न कहोगे?


                                                 ४
संध्यासमय एक पेड़ के नीचे पंचायत बैठी। शेख जुम्मन ने पहले से ही फर्श बिछा रखाथा। उन्होंने पान, इलायची, हुक्के-तम्बाकू आदि का प्रबन्ध भी किया था।हॉँ, वह स्वय अलबत्ता अलगू चौधरी के साथ जरा दूर पर बैठेजब पंचायत में कोई आजाता था, तब दवे हुए सलाम से उसका स्वागत करते थे। जब सूर्य अस्त हो गयाऔर चिड़ियों की कलरवयुक्त पंचायत पेड़ों पर बैठी, तब यहॉँ भी पंचायत शुरूहुई। फर्श की एक-एक अंगुल जमीन भर गयी; पर अधिकांश दर्शक ही थे। निमंत्रितमहाशयों में से केवल वे ही लोग पधारे थे, जिन्हें जुम्मन से अपनी कुछ कसरनिकालनी थी। एक कोने में आग सुलग रही थी। नाई ताबड़तोड़ चिलम भर रहा था। यहनिर्णय करना असम्भव था कि सुलगते हुए उपलों से अधिक धुऑं निकलता था याचिलम के दमों से। लड़के इधर-उधर दौड़ रहे थे। कोई आपस में गाली-गलौज करतेऔर कोई रोते थे। चारों तरफ कोलाहल मच रहा था। गॉँव के कुत्ते इस जमाव कोभोज समझकर झुंड के झुंड जमा हो गए थे।
पंच लोग बैठ गये, तो बूढ़ी खाला ने उनसे विनती की--
‘पंचों, आज तीन साल हुए, मैंने अपनी सारी जायदाद अपने भानजे जुम्मन के नाम लिख दीथी। इसे आप लोग जानते ही होंगे। जुम्मन ने मुझे ता-हयात रोटी-कपड़ा देनाकबूल किया। साल-भर तो मैंने इसके साथ रो-धोकर काटा। पर अब रात-दिन का रोनानहीं सहा जाता। मुझे न पेट की रोटी मिलती है न तन का कपड़ा। बेकस बेवा हूँ।कचहरी दरबार नहीं कर सकती। तुम्हारे सिवा और किसको अपना दु:ख सुनाऊँ? तुमलोग जो राह निकाल दो, उसी राह पर चलूँ। अगर मुझमें कोई ऐब देखो, तो मेरेमुँह पर थप्पड़ मारी। जुम्मन में बुराई देखो, तो उसे समझाओं, क्यों एक बेकसकी आह लेता है ! मैं पंचों का हुक्म सिर-माथे पर चढ़ाऊँगी।’
रामधनमिश्र, जिनके कई असामियों को जुम्मन ने अपने गांव में बसा लिया था, बोले—जुम्मन मियां किसे पंच बदते हो? अभी से इसका निपटारा कर लो। फिर जोकुछ पंच कहेंगे, वही मानना पड़ेगा।
जुम्मन को इस समय सदस्यों मेंविशेषकर वे ही लोग दीख पड़े, जिनसे किसी न किसी कारण उनका वैमनस्य था।जुम्मन बोले—पंचों का हुक्म अल्लाह का हुक्म है। खालाजान जिसे चाहें, उसेबदें। मुझे कोई उज्र नहीं।
खाला ने चिल्लाकर कहा--अरे अल्लाह के बन्दे ! पंचों का नाम क्यों नहीं बता देता? कुछ मुझे भी तो मालूम हो।
जुम्मन ने क्रोध से कहा--इस वक्त मेरा मुँह न खुलवाओ। तुम्हारी बन पड़ी है, जिसे चाहो, पंच बदो।
खालाजानजुम्मन के आक्षेप को समझ गयीं, वह बोली--बेटा, खुदा से डरो। पंच न किसी केदोस्त होते हैं, ने किसी के दुश्मन। कैसी बात कहते हो! और तुम्हारा किसीपर विश्वास न हो, तो जाने दो; अलगू चौधरी को तो मानते हो, लो, मैं उन्हींको सरपंच बदती हूँ।
जुम्मन शेख आनंद से फूल उठे, परन्तु भावों को छिपा कर बोले--अलगू ही सही, मेरे लिए जैसे रामधन वैसे अलगू।
अलगू इस झमेले में फँसना नहीं चाहते थे। वे कन्नी काटने लगे। बोले--खाला, तुम जानती हो कि मेरी जुम्मन से गाढ़ी दोस्ती है।
खालाने गम्भीर स्वर में कहा--‘बेटा, दोस्ती के लिए कोई अपना ईमान नहीं बेचता।पंच के दिल में खुदा बसता है। पंचों के मुँह से जो बात निकलती है, वह खुदाकी तरफ से निकलती है।’
अलगू चौधरी सरपंच हुएं रामधनमिश्र और जुम्मन के दूसरे विरोधियों ने बुढ़िया को मन में बहुत कोसा।
अलगूचौधरी बोले--शेख जुम्मन ! हम और तुम पुराने दोस्त हैं ! जब काम पड़ा, तुमने हमारी मदद की है और हम भी जो कुछ बन पड़ा, तुम्हारी सेवा करते रहेहैं; मगर इस समय तुम और बुढ़ी खाला, दोनों हमारी निगाह में बराबर हो। तुमकोपंचों से जो कुछ अर्ज करनी हो, करो।
जुम्मन को पूरा विश्वास था कि अबबाजी मेरी है। अलग यह सब दिखावे की बातें कर रहा है। अतएव शांत-चित्त हो करबोले--पंचों, तीन साल हुए खालाजान ने अपनी जायदाद मेरे नाम हिब्बा कर दीथी। मैंने उन्हें ता-हयात खाना-कप्ड़ा देना कबूल किया था। खुदा गवाह है, आजतक मैंने खालाजान को कोई तकलीफ नहीं दी। मैं उन्हें अपनी मॉँ के समानसमझता हूँ। उनकी खिदमत करना मेरा फर्ज है; मगर औरतों में जरा अनबन रहती है, उसमें मेरा क्या बस है? खालाजान मुझसे माहवार खर्च अलग मॉँगती है। जायदादजितनी है; वह पंचों से छिपी नहीं। उससे इतना मुनाफा नहीं होता है कि माहवारखर्च दे सकूँ। इसके अलावा हिब्बानामे में माहवार खर्च का कोई जिक्र नही।नहीं तो मैं भूलकर भी इस झमेले मे न पड़ता। बस, मुझे यही कहना है। आइंदापंचों का अख्तियार है, जो फैसला चाहें, करे।
अलगू चौधरी को हमेशा कचहरीसे काम पड़ता था। अतएव वह पूरा कानूनी आदमी था। उसने जुम्मन से जिरह शुरूकी। एक-एक प्रश्न जुम्मन के हृदय पर हथौड़ी की चोट की तरह पड़ता था। रामधनमिश्र इस प्रश्नों पर मुग्ध हुए जाते थे। जुम्मन चकित थे कि अलगू को क्याहो गया। अभी यह अलगू मेरे साथ बैठी हुआ कैसी-कैसी बातें कर रहा था ! इतनीही देर में ऐसी कायापलट हो गयी कि मेरी जड़ खोदने पर तुला हुआ है। न मालूमकब की कसर यह निकाल रहा है? क्या इतने दिनों की दोस्ती कुछ भी काम न आवेगी?
जुम्मन शेख तो इसी संकल्प-विकल्प में पड़े हुए थे कि इतने में अलगू ने फैसला सुनाया--
जुम्मन शेख तो इसी संकल्प-विकल्प में पड़े हुए थे कि इतने में अलगू ने फैसला सुनाया--
जुम्मनशेख ! पंचों ने इस मामले पर विचार किया। उन्हें यह नीति संगत मालूम होताहै कि खालाजान को माहवार खर्च दिया जाय। हमारा विचार है कि खाला की जायदादसे इतना मुनाफा अवश्य होता है कि माहवार खर्च दिया जा सके। बस, यही हमाराफैसला है। अगर जुम्मन को खर्च देना मंजूर न हो, तो हिब्वानामा रद्द समझाजाय।
यह फैसला सुनते ही जुम्मन सन्नाटे में आ गये। जो अपना मित्र हो, वहशत्रु का व्यवहार करे और गले पर छुरी फेरे, इसे समय के हेर-फेर के सिवा औरक्या कहें? जिस पर पूरा भरोसा था, उसने समय पड़ने पर धोखा दिया। ऐसे हीअवसरों पर झूठे-सच्चे मित्रों की परीक्षा की जाती है। यही कलियुग की दोस्तीहै। अगर लोग ऐसे कपटी-धोखेबाज न होते, तो देश में आपत्तियों का प्रकोपक्यों होता? यह हैजा-प्लेग आदि व्याधियॉँ दुष्कर्मों के ही दंड हैं।
मगररामधन मिश्र और अन्य पंच अलगू चौधरी की इस नीति-परायणता को प्रशंसा जीखोलकर कर रहे थे। वे कहते थे--इसका नाम पंचायत है ! दूध का दूध और पानी कापानी कर दिया। दोस्ती, दोस्ती की जगह है, किन्तु धर्म का पालन करना मुख्यहै। ऐसे ही सत्यवादियों के बल पर पृथ्वी ठहरी है, नहीं तो वह कब की रसातलको चली जाती।
इस फैसले ने अलगू और जुम्मन की दोस्ती की जड़ हिला दी। अब वे साथ-साथ बातें करते नहीं दिखायी देते। इतना पुराना मित्रता-रूपी वृक्ष
सत्य का एक झोंका भी न सह सका। सचमुच वह बालू की ही जमीन पर खड़ा था।
उनमेंअब शिष्टाचार का अधिक व्यवहार होने लगा। एक दूसरे की आवभगत ज्यादा करनेलगा। वे मिलते-जुलते थे, मगर उसी तरह जैसे तलवार से ढाल मिलती है।
जुम्मन के चित्त में मित्र की कुटिलता आठों पहर खटका करती थी। उसे हर घड़ी यही चिंता रहती थी कि किसी तरह बदला लेने का अवसर मिले।


                                                  ५
अच्छेकामों की सिद्धि में बड़ी दरे लगती है; पर बुरे कामों की सिद्धि में यहबात नहीं होती; जुम्मन को भी बदला लेने का अवसर जल्द ही मिल गया। पिछले सालअलगू चौधरी बटेसर से बैलों की एक बहुत अच्छी गोई मोल लाये थे। बैल पछाहींजाति के सुंदर, बडे-बड़े सीगोंवाले थे। महीनों तक आस-पास के गॉँव के लोगदर्शन करते रहे। दैवयोग से जुम्मन की पंचायत के एक महीने के बाद इस जोड़ीका एक बैल मर गया। जुम्मन ने दोस्तों से कहा--यह दग़ाबाज़ी की सजा है।इन्सान सब्र भले ही कर जाय, पर खुदा नेक-बद सब देखता है। अलगू को संदेह हुआकि जुम्मन ने बैल को विष दिला दिया है। चौधराइन ने भी जुम्मन पर ही इसदुर्घटना का दोषारोपण किया उसने कहा--जुम्मन ने कुछ कर-करा दिया है।चौधराइन और करीमन में इस विषय पर एक दिन खुब ही वाद-विवाद हुआ दोनोंदेवियों ने शब्द-बाहुल्य की नदी बहा दी। व्यंगय, वक्तोक्ति अन्योक्ति औरउपमा आदि अलंकारों में बातें हुईं। जुम्मन ने किसी तरह शांति स्थापित की।उन्होंने अपनी पत्नी को डॉँट-डपट कर समझा दिया। वह उसे उस रणभूमि से हटा भीले गये। उधर अलगू चौधरी ने समझाने-बुझाने का काम अपने तर्क-पूर्ण सोंटे सेलिया।
अब अकेला बैल किस काम का? उसका जोड़ बहुत ढूँढ़ा गया, पर न मिला।निदान यह सलाह ठहरी कि इसे बेच डालना चाहिए। गॉँव में एक समझू साहु थे, वहइक्का-गाड़ी हॉँकते थे। गॉँव के गुड़-घी लाद कर मंडी ले जाते, मंडी सेतेल, नमक भर लाते, और गॉँव में बेचते। इस बैल पर उनका मन लहराया। उन्होंनेसोचा, यह बैल हाथ लगे तो दिन-भर में बेखटके तीन खेप हों। आज-कल तो एक हीखेप में लाले पड़े रहते हैं। बैल देखा, गाड़ी में दोड़ाया, बाल-भौरी कीपहचान करायी, मोल-तोल किया और उसे ला कर द्वार पर बॉँध ही दिया। एक महीनेमें दाम चुकाने का वादा ठहरा। चौधरी को भी गरज थी ही, घाटे की परवाह न की।
समझूसाहु ने नया बैल पाया, तो लगे उसे रगेदने। वह दिन में तीन-तीन, चार-चारखेपें करने लगे। न चारे की फिक्र थी, न पानी की, बस खेपों से काम था। मंडीले गये, वहॉँ कुछ सूखा भूसा सामने डाल दिया। बेचारा जानवर अभी दम भी न लेनेपाया था कि फिर जोत दिया। अलगू चौधरी के घर था तो चैन की बंशी बचती थी।बैलराम छठे-छमाहे कभी बहली में जोते जाते थे। खूब उछलते-कूदते और कोसों तकदौड़ते चले जाते थे। वहॉँ बैलराम का रातिब था, साफ पानी, दली हुई अरहर कीदाल और भूसे के साथ खली, और यही नहीं, कभी-कभी घी का स्वाद भी चखने को मिलजाता था। शाम-सबेरे एक आदमी खरहरे करता, पोंछता और सहलाता था। कहॉँ वहसुख-चैन, कहॉँ यह आठों पहर कही खपत। महीने-भर ही में वह पिस-सा गया। इक्केका यह जुआ देखते ही उसका लहू सूख जाता था। एक-एक पग चलना दूभर था। हडिडयॉँनिकल आयी थी; पर था वह पानीदार, मार की बरदाश्त न थी।
एक दिन चौथी खेपमें साहु जी ने दूना बोझ लादा। दिन-भरका थका जानवर, पैर न उठते थे। पर साहुजी कोड़े फटकारने लगे। बस, फिर क्या था, बैल कलेजा तोड़ का चला। कुछ दूरदौड़ा और चाहा कि जरा दम ले लूँ; पर साहु जी को जल्द पहुँचने की फिक्र थी; अतएव उन्होंने कई कोड़े बड़ी निर्दयता से फटकारे। बैल ने एक बार फिर जोरलगाया; पर अबकी बार शक्ति ने जवाब दे दिया। वह धरती पर गिर पड़ा, और ऐसागिरा कि फिर न उठा। साहु जी ने बहुत पीटा, टॉँग पकड़कर खीचा, नथनों मेंलकड़ी ठूँस दी; पर कहीं मृतक भी उठ सकता है? तब साहु जी को कुछ शक हुआ।उन्होंने बैल को गौर से देखा, खोलकर अलग किया; और सोचने लगे कि गाड़ी कैसेघर पहुँचे। बहुत चीखे-चिल्लाये; पर देहात का रास्ता बच्चों की ऑंख की तरहसॉझ होते ही बंद हो जाता है। कोईनजर न आया। आस-पास कोई गॉँव भी न था। मारेक्रोध के उन्होंने मरे हुए बैल पर और दुर्रे लगाये और कोसने लगे--अभागे।तुझे मरना ही था, तो घर पहुँचकर मरता ! ससुरा बीच रास्ते ही में मर रहा। अबगड़ी कौन खीचे? इस तरह साहु जी खूब जले-भुने। कई बोरे गुड़ और कई पीपे घीउन्होंने बेचे थे, दो-ढाई सौ रुपये कमर में बंधे थे। इसके सिवा गाड़ी पर कईबोरे नमक थे; अतएव छोड़ कर जा भी न सकते थे। लाचार वेचारे गाड़ी पर हीलेटे गये। वहीं रतजगा करने की ठान ली। चिलम पी, गाया। फिर हुक्का पिया। इसतरह साह जी आधी रात तक नींद को बहलाते रहें। अपनी जान में तो वह जागते हीरहे; पर पौ फटते ही जो नींद टूटी और कमर पर हाथ रखा, तो थैली गायब ! घबराकर इधर-उधर देखा तो कई कनस्तर तेल भी नदारत ! अफसोस में बेचारे ने सिर पीटलिया और पछाड़ खाने लगा। प्रात: काल रोते-बिलखते घर पहँचे। सहुआइन ने जब यहबूरी सुनावनी सुनी, तब पहले तो रोयी, फिर अलगू चौधरी को गालियॉँ देनेलगी--निगोड़े ने ऐसा कुलच्छनी बैल दिया कि जन्म-भर की कमाई लुट गयी।
इसघटना को हुए कई महीने बीत गए। अलगू जब अपने बैल के दाम मॉँगते तब साहु औरसहुआइन, दोनों ही झल्लाये हुए कुत्ते की तरह चढ़ बैठते और अंड-बंड बकनेलगते—वाह ! यहॉँ तो सारे जन्म की कमाई लुट गई, सत्यानाश हो गया, इन्हेंदामों की पड़ी है। मुर्दा बैल दिया था, उस पर दाम मॉँगने चले हैं ! ऑंखोंमें धूल झोंक दी, सत्यानाशी बैल गले बॉँध दिया, हमें निरा पोंगा ही समझलिया है ! हम भी बनिये के बच्चे है, ऐसे बुद्धू कहीं और होंगे। पहले जाकरकिसी गड़हे में मुँह धो आओ, तब दाम लेना। न जी मानता हो, तो हमारा बैल खोलले जाओ। महीना भर के बदले दो महीना जोत लो। और क्या लोगे?
चौधरी केअशुभचिंतकों की कमी न थी। ऐसे अवसरें पर वे भी एकत्र हो जाते और साहु जी केबराने की पुष्टि करते। परन्तु डेढ़ सौ रुपये से इस तरह हाथ धो लेना आसान नथा। एक बार वह भी गरम पड़े। साहु जी बिगड़ कर लाठी ढूँढ़ने घर चले गए। अबसहुआइन ने मैदान लिया। प्रश्नोत्तर होते-होते हाथापाई की नौबत आ पहुँची।सहुआइन ने घर में घुस कर किवाड़ बन्द कर लिए। शोरगुल सुनकर गॉँव के भलेमानसघर से निकाला। वह परामर्श देने लगे कि इस तरह से काम न चलेगा। पंचायत करलो। कुछ तय हो जाय, उसे स्वीकार कर लो। साहु जी राजी हो गए। अलगू ने भीहामी भर ली।

                                                ६
पंचायत की तैयारियॉँ होने लगीं। दोनों पक्षों नेअपने-अपने दल बनाने शुरू किए। इसके बाद तीसरे दिन उसी वृक्ष के नीचेपंचायत बैठी। वही संध्या का समय था। खेतों में कौए पंचायत कर रहे थे।विवादग्रस्त विषय था यह कि मटर की फलियों पर उनका कोई स्वत्व है या नही, औरजब तक यह प्रश्न हल न हो जाय, तब तक वे रखवाले की पुकार पर अपनीअप्रसन्नता प्रकट करना आवश्यकत समझते थे। पेड़ की डालियों पर बैठीशुक-मंडली में वह प्रश्न छिड़ा हुआ था कि मनुष्यों को उन्हें वेसुरौवत कहनेका क्या अधिकार है, जब उन्हें स्वयं अपने मित्रों से दगां करने में भीसंकोच नहीं होता।
पंचायत बैठ गई, तो रामधन मिश्र ने कहा-अब देरी क्या है ? पंचों का चुनाव हो जाना चाहिए। बोलो चौधरी ; किस-किस को पंच बदते हो।
अलगू ने दीन भाव से कहा-समझू साहु ही चुन लें।
समझू खड़े हुए और कड़कर बोले-मेरी ओर से जुम्मन शेख।
जुम्मनका नाम सुनते ही अलगू चौधरी का कलेजा धक्-धक् करने लगा, मानों किसी नेअचानक थप्पड़ मारा दिया हो। रामधन अलगू के मित्र थे। वह बात को ताड़ गए।पूछा-क्यों चौधरी तुम्हें कोई उज्र तो नही।
चौधरी ने निराश हो कर कहा-नहीं, मुझे क्या उज्र होगा?
अपनेउत्तरदायित्व का ज्ञान बहुधा हमारे संकुचित व्यवहारों का सुधारक होता है।जब हम राह भूल कर भटकने लगते हैं तब यही ज्ञान हमारा विश्वसनीय पथ-प्रदर्शकबन जाता है।
पत्र-संपादक अपनी शांति कुटी में बैठा हुआ कितनी धृष्टताऔर स्वतंत्रता के साथ अपनी प्रबल लेखनी से मंत्रिमंडल पर आक्रमण करता है:परंतु ऐसे अवसर आते हैं, जब वह स्वयं मंत्रिमंडल में सम्मिलित होता है।मंडल के भवन में पग धरते ही उसकी लेखनी कितनी मर्मज्ञ, कितनी विचारशील, कितनी न्याय-परायण हो जाती है। इसका कारण उत्तर-दायित्व का ज्ञान है।नवयुवक युवावस्था में कितना उद्दंड रहता है। माता-पिता उसकी ओर से कितनेचितिति रहते है! वे उसे कुल-कलंक समझते हैंपरन्तु थौड़ी हीी समय में परिवारका बौझ सिर पर पड़ते ही वह अव्यवस्थित-चित्त उन्मत्त युवक कितना धैर्यशील, कैसा शांतचित्त हो जाता है, यह भी उत्तरदायित्व के ज्ञान का फल है।
जुम्मनशेख के मन में भी सरपंच का उच्च स्थान ग्रहण करते ही अपनी जिम्मेदारी काभाव पेदा हुआ। उसने सोचा, मैं इस वक्त न्याय और धर्म के सर्वोच्च आसन परबैठा हूँ। मेरे मुँह से इस समय जो कुछ निकलेगा, वह देववाणी के सदृश है-औरदेववाणी में मेरे मनोविकारों का कदापि समावेश न होना चाहिए। मुझे सत्य सेजौ भर भी टलना उचित नही!
पंचों ने दोनों पक्षों से सवाल-जवाब करने शुरूकिए। बहुत देर तक दोनों दल अपने-अपने पक्ष का समर्थन करते रहे। इस विषय मेंतो सब सहमत थे कि समझू को बैल का मूल्य देना चाहिए। परन्तु वो महाशय इसकारण रियायत करना चाहते थे कि बैल के मर जाने से समझू को हानि हुई। उसकेप्रतिकूल दो सभ्य मूल के अतिरिक्त समझू को दंड भी देना चाहते थे, जिससे फिरकिसी को पशुओं के साथ ऐसी निर्दयता करने का साहस न हो। अन्त में जुम्मन नेफैसला सुनाया-
अलगू चौधरी और समझू साहु। पंचों ने तुम्हारे मामले परअच्छी तरह विचार किया। समझू को उचित है कि बैल का पूरा दाम दें। जिस वक्तउन्होंने बैल लिया, उसे कोई बीमारी न थी। अगर उसी समय दाम दे दिए जाते, तोआज समझू उसे फेर लेने का आग्रह न करते। बैल की मृत्यु केवल इस कारण हुई किउससे बड़ा कठिन परिश्रम लिया गया और उसके दाने-चारे का कोई प्रबंध न कियागया।
रामधन मिश्र बोले-समझू ने बैल को जान-बूझ कर मारा है, अतएव उससे दंड लेना चाहिए।
जुम्मन बोले-यह दूसरा सवाल है। हमको इससे कोई मतलब नहीं !
झगडू साहु ने कहा-समझू के साथं कुछ रियायत होनी चाहिए।
जुम्मन बोले-यह अलगू चौधरी की इच्छा पर निर्भर है। यह रियायत करें, तो उनकी भलमनसी।
अलगू चौधरी फूले न समाए। उठ खड़े हुए और जोर से बोल-पंच-परमेश्वर की जय!
इसकेसाथ ही चारों ओर से प्रतिध्वनि हुई-पंच परमेश्वर की जय! यह मनुष्य का कामनहीं, पंच में परमेश्वर वास करते हैं, यह उन्हीं की महिमा है। पंच के सामनेखोटे को कौन खरा कह सकता है?
थोड़ी देर बाद जुम्मन अलगू के पास आए औरउनके गले लिपट कर बोले-भैया, जब से तुमने मेरी पंचायत की तब से मैंतुम्हारा प्राण-घातक शत्रु बन गया था; पर आज मुझे ज्ञात हुआ कि पंच के पदपर बैठ कर न कोई किसी का दोस्त है, न दुश्मन। न्याय के सिवा उसे और कुछनहीं सूझता। आज मुझे विश्वास हो गया कि पंच की जबान से खुदा बोलता है। अलगूरोने लगे। इस पानी से दोनों के दिलों का मैल धुल गया। मित्रता की मुरझाईहुई लता फिर हरी हो गई।

 

नमक का दारोगा - प्रेमचंद

जबनमक का नया विभागबना और ईश्वरप्रदत्त वस्तु के व्यवहार करने कानिषेध हो गया तो लोगचोरी-छिपे इसका व्यापार करने लगे। अनेकप्रकार के छल-प्रपंचों का सूत्रपातहुआ, कोई घूस से काम निकालताथा, कोई चालाकी से। अधिकारियों के पौ-बारह थे।पटवारीगिरी कासर्वसम्मानित पद छोड-छोडकर लोग इस विभाग की बरकंदाजी करतेथे।इसके दारोगा पद के लिए तो वकीलों का भी जी ललचाता था।

यह वह समय था जबऍंगरेजी शिक्षा और ईसाई मत को लोग एक ही वस्तु समझते थे। फारसीका प्राबल्य था। प्रेम की कथाएँ और शृंगार रस के काव्य पढकरफारसीदाँ लोगसर्वोच्च पदों पर नियुक्त हो जाया करते थे।

मुंशीवंशीधर भीजुलेखा की विरह-कथा समाप्त करके सीरी और फरहाद केप्रेम-वृत्तांत को नल औरनील की लडाई और अमेरिका के आविष्कार सेअधिक महत्व की बातें समझते हुएरोजगार की खोज में निकले।

उनकेपिता एक अनुभवीपुरुष थे। समझाने लगे, 'बेटा! घर की दुर्दशा देखरहे हो। ॠण के बोझ से दबेहुए हैं। लडकियाँ हैं, वे घास-फूस कीतरह बढती चली जाती हैं। मैं कगारे परका वृक्ष हो रहा हूँ, नमालूम कब गिर पडूँ! अब तुम्हीं घर के मालिक-मुख्तारहो।

'नौकरीमें ओहदे कीओर ध्यान मत देना, यह तो पीर का मजार है। निगाहचढावे और चादर पर रखनीचाहिए। ऐसा काम ढूँढना जहाँ कुछ ऊपरी आयहो। मासिक वेतन तो पूर्णमासी काचाँद है, जो एक दिन दिखाई देता हैऔर घटते-घटते लुप्त हो जाता है। ऊपरी आयबहता हुआ स्रोत है जिससेसदैव प्यास बुझती है। वेतन मनुष्य देता है, इसी सेउसमें वृध्दिनहीं होती। ऊपरी आमदनी ईश्वर देता है, इसी से उसकी बरकत होतीहैं, तुम स्वयं विद्वान हो, तुम्हें क्या समझाऊँ।

'इसविषय में विवेककी बडी आवश्यकता है। मनुष्य को देखो, उसकीआवश्यकता को देखो और अवसर कोदेखो, उसके उपरांत जो उचित समझो, करो। गरजवाले आदमी के साथ कठोरता करने मेंलाभ ही लाभ है। लेकिनबेगरज को दाँव पर पाना जरा कठिन है। इन बातों कोनिगाह में बाँधलो यह मेरी जन्म भर की कमाई है।

इसउपदेश के बादपिताजी ने आशीर्वाद दिया। वंशीधर आज्ञाकारी पुत्रथे। ये बातें ध्यान सेसुनीं और तब घर से चल खडे हुए। इस विस्तृतसंसार में उनके लिए धैर्य अपनामित्र, बुध्दि अपनी पथप्रदर्शक औरआत्मावलम्बन ही अपना सहायक था। लेकिनअच्छे शकुन से चले थे, जातेही जाते नमक विभाग के दारोगा पद पर प्रतिष्ठितहो गए। वेतन अच्छाऔर ऊपरी आय का तो ठिकाना ही न था। वृध्द मुंशीजी कोसुख-संवादमिला तो फूले न समाए। महाजन कुछ नरम पडे, कलवार की आशालतालहलहाई।पडोसियों के हृदय में शूल उठने लगे।

जाडेके दिन थे औररात का समय। नमक के सिपाही, चौकीदार नशे में मस्तथे। मुंशी वंशीधर को यहाँआए अभी छह महीनों से अधिक न हुए थे, लेकिन इस थोडे समय में ही उन्होंनेअपनी कार्यकुशलता और उत्तमआचार से अफसरों को मोहित कर लिया था। अफसर लोगउन पर बहुत विश्वासकरने लगे।

नमकके दफ्तर से एकमील पूर्व की ओर जमुना बहती थी, उस पर नावों काएक पुल बना हुआ था।दारोगाजी किवाड बंद किए मीठी नींद सो रहे थे।अचानक ऑंख खुली तो नदी केप्रवाह की जगह गाडियों की गडगडाहट तथामल्लाहों का कोलाहल सुनाई दिया। उठबैठे।

इतनीरात गए गाडियाँक्यों नदी के पार जाती हैं? अवश्य कुछ न कुछगोलमाल है। तर्क ने भ्रम कोपुष्ट किया। वरदी पहनी, तमंचा जेब मेंरखा और बात की बात में घोडा बढाए हुएपुल पर आ पहुँचे। गाडियोंकी एक लम्बी कतार पुल के पार जाती देखी। डाँटकरपूछा, 'किसकीगाडियाँ हैं।

थोडी देर तक सन्नाटारहा। आदमियों में कुछ कानाफूसी हुई तब आगे वाले ने कहा-'पंडित अलोपीदीन की।

'कौन पंडितअलोपीदीन?

'दातागंज के।

मुंशीवंशीधर चौंके।पंडित अलोपीदीन इस इलाके के सबसे प्रतिष्ठितजमींदार थे। लाखों रुपए कालेन-देन करते थे, इधर छोटे से बडे कौनऐसे थे जो उनके ॠणी न हों। व्यापारभी बडा लम्बा-चौडा था। बडेचलते-पुरजे आदमी थे। ऍंगरेज अफसर उनके इलाके मेंशिकार खेलने आतेऔरउनके मेहमान होते। बारहों मास सदाव्रत चलता था।

मुंशीने पूछा, 'गाडियाँ कहाँ जाएँगी? उत्तर मिला, 'कानपुर । लेकिन इसप्रश्न पर किइनमेंक्या है, सन्नाटा छा गया। दारोगा साहब कासंदेह और भी बढा। कुछ देर तकउत्तर की बाट देखकर वह जोर से बोले, 'क्या तुम सब गूँगे हो गए हो? हम पूछतेहैं इनमें क्या लदा है?

जबइस बार भी कोईउत्तर न मिला तो उन्होंने घोडे को एक गाडी सेमिलाकर बोरे को टटोला। भ्रमदूर हो गया। यह नमक के डेले थे।

पंडितअलोपीदीन अपनेसजीले रथ पर सवार, कुछ सोते, कुछ जागते चले आतेथे। अचानक कई गाडीवानों नेघबराए हुए आकर जगाया और बोले-'महाराज!दारोगा ने गाडियाँ रोक दी हैं और घाटपर खडे आपको बुलाते हैं।

पंडितअलोपीदीन कालक्ष्मीजी पर अखंड विश्वास था। वह कहा करते थे किसंसार का तो कहना हीक्या, स्वर्ग में भी लक्ष्मी का ही राज्य है।उनका यह कहना यथार्थ ही था।न्याय और नीति सब लक्ष्मी के हीखिलौने हैं, इन्हें वह जैसे चाहती हैंनचाती हैं। लेटे ही लेटेगर्व से बोले, चलो हम आते हैं। यह कहकर पंडितजी नेबडी निश्ंचिततासे पान के बीडे लगाकर खाए। फिर लिहाफ ओढे हुए दारोगा के पासआकरबोले, 'बाबूजी आशीर्वाद! कहिए, हमसे ऐसा कौन सा अपराध हुआ कि गाडियाँरोक दी गईं। हम ब्राह्मणों पर तो आपकी कृपा-दृष्टि रहनी चाहिए।

वंशीधर रुखाई सेबोले, 'सरकारी हुक्म।

पं.अलोपीदीन नेहँसकर कहा, 'हम सरकारी हुक्म को नहीं जानते और नसरकार को। हमारे सरकार तोआप ही हैं। हमारा और आपका तो घर कामामला है, हम कभी आपसे बाहर हो सकतेहैं? आपने व्यर्थ का कष्टउठाया। यह हो नहीं सकता कि इधर से जाएँ और इस घाटके देवता कोभेंट न चढावें। मैं तो आपकी सेवा में स्वयं ही आ रहा था।वंशीधरपर ऐश्वर्य की मोहिनी वंशी का कुछ प्रभाव न पडा। ईमानदारी की नईउमंग थी। कडककर बोले, 'हम उन नमकहरामों में नहीं है जो कौडियों पर अपनाईमान बेचते फिरते हैं। आप इस समय हिरासत में हैं। आपको कायदे केअनुसारचालान होगा। बस, मुझे अधिक बातों की फुर्सत नहीं है।जमादार बदलूसिंह! तुमइन्हें हिरासत में ले चलो, मैं हुक्म देताहूँ।

पं.अलोपीदीनस्तम्भित हो गए। गाडीवानों में हलचल मच गई। पंडितजी केजीवन में कदाचित यहपहला ही अवसर था कि पंडितजी को ऐसी कठोर बातेंसुननी पडीं। बदलूसिंह आगेबढा, किन्तु रोब के मारे यह साहस न हुआकि उनका हाथ पकड सके। पंडितजी नेधर्म को धन का ऐसा निरादर करतेकभी न देखा था। विचार किया कि यह अभी उद्दंडलडका है। माया-मोह केजाल में अभी नहीं पडा। अल्हड है, झिझकता है। बहुतदीनभाव सेबोले, 'बाबू साहब, ऐसा न कीजिए, हम मिट जाएँगे। इज्जत धूल मेंमिलजाएगी। हमारा अपमान करने से आपके हाथ क्या आएगा। हम किसी तरह आपसे बाहरथोडे ही हैं।

वंशीधर ने कठोर स्वरमें कहा, 'हम ऐसी बातें नहीं सुनना चाहते।

अलोपीदीनने जिससहारे को चट्टान समझ रखा था, वह पैरों के नीचे खिसकता हुआमालूम हुआ।स्वाभिमान और धन-ऐश्वर्य की कडी चोट लगी। किन्तु अभीतक धन की सांख्यिकशक्ति का पूरा भरोसा था। अपने मुख्तार से बोले, 'लालाजी, एक हजार के नोटबाबू साहब की भेंट करो, आप इस समय भूखेसिंह हो रहे हैं।

वंशीधर ने गरम होकरकहा, 'एक हजार नहीं, एक लाख भी मुझे सच्चे मार्ग से नहीं हटा सकते।

धर्मकी इसबुध्दिहीन दृढता और देव-दुर्लभ त्याग पर मन बहुत झुँझलाया।अब दोनोंशक्तियों में संग्राम होने लगा। धन ने उछल-उछलकर आक्रमणकरने शुरू किए। एकसे पाँच, पाँच से दस, दस से पंद्रह और पंद्रहसे बीस हजार तक नौबत पहुँची, किन्तु धर्म अलौकिक वीरता के साथबहुसंख्यक सेना के सम्मुख अकेला पर्वत कीभाँति अटल, अविचलित खडाथा।

अलोपीदीन निराश होकरबोले, 'अब इससे अधिक मेरा साहस नहीं। आगे आपको अधिकार है।

वंशीधरने अपनेजमादार को ललकारा। बदलूसिंह मन में दारोगाजी को गालियाँदेता हुआ पंडितअलोपीदीन की ओर बढा। पंडितजी घबडाकर दो-तीन कदमपीछे हट गए। अत्यंत दीनतासे बोले, 'बाबू साहब, ईश्वर के लिए मुझपर दया कीजिए, मैं पच्चीस हजार परनिपटारा करने का तैयार हूँ।

'असम्भव बात है।

'तीस हजार पर?

'किसी तरह भी सम्भवनहीं।

'क्या चालीस हजार परभी नहीं।

'चालीस हजार नहीं, चालीस लाख पर भी असम्भव है।

'बदलूसिंह, इस आदमीको हिरासत में ले लो। अब मैं एक शब्द भी नहीं सुनना चाहता।

धर्मने धन को पैरोंतले कुचल डाला। अलोपीदीन ने एक हृष्ट-पुष्टमनुष्य को हथकडियाँ लिए हुएअपनी तरफ आते देखा। चारों ओर निराश औरकातर दृष्टि से देखने लगे। इसके बादमूर्छित होकर गिर पडे।

दुनियासोती थी परदुनिया की जीभ जागती थी। सवेरे देखिए तो बालक-वृध्दसबके मुहँ से यही बातसुनाई देती थी। जिसे देखिए वही पंडितजी केइस व्यवहार पर टीका-टिप्पणी कररहा था, निंदा की बौछारें हो रहीथीं, मानो संसार से अब पापी का पाप कटगया।

पानीको दूध के नामसे बेचने वाला ग्वाला, कल्पित रोजनामचे भरने वालेअधिकारी वर्ग, रेल मेंबिना टिकट सफर करने वाले बाबू लोग, जालीदस्तावेज बनाने वाले सेठ और साकारयह सब के सब देवताओं की भाँतिगर्दनें चला रहे थे।

जबदूसरे दिन पंडितअलोपीदीन अभियुक्त होकर कांस्टेबलों के साथ, हाथों में हथकडियाँ, हृदय मेंग्लानि और क्षोभ भरे, लज्जा सेगर्दन झुकाए अदालत की तरफ चले तो सारे शहरमें हलचल मच गई। मेलोंमें कदाचित ऑंखें इतनी व्यग्र न होती होंगी। भीड केमारे छत औरदीवार में कोई भेद न रहा।

किंतुअदालत मेंपहुँचने की देर थी। पं. अलोपीदीन इस अगाध वन के सिंहथे। अधिकारी वर्ग उनकेभक्त, अमले उनके सेवक, वकील-मुख्तार उनकेआज्ञा पालक और अरदली, चपरासी तथाचौकीदार तो उनके बिना मोल केगुलाम थे।

उन्हेंदेखते ही लोगचारों तरफ से दौडे। सभी लोग विस्मित हो रहे थे।इसलिए नहीं कि अलोपीदीन नेयह कर्म किया, बल्कि इसलिए कि वह कानूनके पंजे में कैसे आए? ऐसा मनुष्यजिसके पास असाध्य साधन करनेवाला धन और अनन्य वाचालता हो, वह क्यों कानूनके पंजे में आए? प्रत्येक मनुष्य उनसे सहानुभूति प्रकट करता था।

बडीतत्परता से इसआक्रमण को रोकने के निमित्त वकीलों की एक सेनातैयार की गई। न्याय के मैदानमें धर्म और धन में यध्द ठन गया।वंशीधर चुपचाप खडे थे। उनके पास सत्य केसिवा न कोई बल था, नस्पष्ट भाषण के अतिरिक्त कोई शस्त्र। गवाह थे, किंतुलोभ सेडाँवाडोल।

यहाँतक कि मुंशीजीको न्याय भी अपनी ओर कुछ खिंचा हुआ दीख पडता था।वह न्याय का दरबार था, परंतु उसके कर्मचारियों पर पक्षपात का नशाछाया हुआ था। किंतु पक्षपात औरन्याय का क्या मेल? जहाँ पक्षपातहो, वहाँ न्याय की कल्पना नहीं की जासकती। मुकदमा शीघ्र हीसमाप्त हो गया।

डिप्टीमजिस्ट्रेटने अपनी तजवीज में लिखा, पं. अलोपीदीन के विरुध्द दिएगए प्रमाण निर्मूल औरभ्रमात्मक हैं। वह एक बडे भारी आदमी हैं।यह बात कल्पना के बाहर है किउन्होंने थोडे लाभ के लिए ऐसादुस्साहस किया हो। यद्यपि नमक के दरोगा मुंशीवंशीधर का अधिक दोषनहीं है, लेकिन यह बडे खेद की बात है कि उसकी उद्दंडताऔरविचारहीनता के कारण एक भलेमानुस को कष्ट झेलना पडा। हम प्रसन्न हैं किवह अपने काम में सजग और सचेत रहता है, किंतु नमक के मुकदमे की बढी हुईनमकसे हलाली ने उसके विवेक और बुध्दि को भ्रष्ट कर दिया। भविष्यमें उसेहोशियार रहना चाहिए।

वकीलोंने यह फैसलासुना और उछल पडे। पं. अलोपीदीन मुस्कुराते हुए बाहरनिकले। स्वजन बाँधवोंने रुपए की लूट की। उदारता का सागर उमड पडा।उसकी लहरों ने अदालत की नींवतक हिला दी।

जबवंशीधर बाहरनिकले तो चारों ओर उनके ऊपर व्यंग्यबाणों की वर्षाहोने लगी। चपरासियों नेझुक-झुककर सलाम किए। किंतु इस समय एक कटुवाक्य, एक-एक संकेत उनकीगर्वाग्नि को प्रज्ज्वलित कर रहा था।

कदाचितइस मुकदमेमें सफल होकर वह इस तरह अकडते हुए न चलते। आज उन्हेंसंसार का एक खेदजनकविचित्र अनुभव हुआ। न्याय और विद्वत्ता, लंबी-चौडी उपाधियाँ, बडी-बडीदाढियाँ, ढीले चोगे एक भी सच्चे आदरका पात्र नहीं है।

वंशीधरने धन से बैरमोल लिया था, उसका मूल्य चुकाना अनिवार्य था।कठिनता से एक सप्ताह बीताहोगा कि मुअत्तली का परवाना आ पहुँचा।कार्य-परायणता का दंड मिला। बेचारेभग्न हृदय, शोक और खेद सेव्यथित घर को चले। बूढे मुंशीजी तो पहले ही सेकुडबुडा रहे थे किचलते-चलते इस लडके को समझाया था, लेकिन इसने एक न सुनी।सब मनमानीकरता है। हम तो कलवार और कसाई के तगादे सहें, बुढापे में भगतबनकर बैठें और वहाँ बस वही सूखी तनख्वाह! हमने भी तो नौकरी की है और कोईओहदेदार नहीं थे। लेकिन काम किया, दिल खोलकर किया और आप ईमानदारबनने चलेहैं। घर में चाहे ऍंधेरा हो, मस्जिद में अवश्य दियाजलाएँगे। खेद ऐसी समझपर! पढना-लिखना सब अकारथ गया।

इसकेथोडे ही दिनोंबाद, जब मुंशी वंशीधर इस दुरावस्था में घर पहुँचेऔर बूढे पिताजी ने समाचारसुना तो सिर पीट लिया। बोले- 'जी चाहताहै कि तुम्हारा और अपना सिर फोडलूँ। बहुत देर तक पछता-पछताकर हाथमलते रहे। क्रोध में कुछ कठोर बातें भीकहीं और यदि वंशीधर वहाँसे टल न जाता तो अवश्य ही यह क्रोध विकट रूप धारणकरता। वृध्दमाता को भी दु:ख हुआ। जगन्नाथ और रामेश्वर यात्रा की कामनाएँमिट्टी में मिल गईं। पत्नी ने कई दिनों तक सीधे मुँह बात तक नहीं की।

इसीप्रकार एकसप्ताह बीत गया। सांध्य का समय था। बूढे मुंशीजीबैठे-बैठे राम नाम की मालाजप रहे थे। इसी समय उनके द्वार पर सजाहुआ रथ आकर रुका। हरे और गुलाबीपरदे, पछहिए बैलों की जोडी, उनकीगर्दन में नीले धागे, सींग पीतल से जडेहुए। कई नौकर लाठियाँकंधों पर रखे साथ थे।

मुंशीजीअगवानी कोदौडे देखा तो पंडित अलोपीदीन हैं। झुककर दंडवत् की औरलल्लो-चप्पो की बातेंकरने लगे- 'हमारा भाग्य उदय हुआ, जो आपकेचरण इस द्वार पर आए। आप हमारेपूज्य देवता हैं, आपको कौन सा मुँहदिखावें, मुँह में तो कालिख लगी हुई है।किंतु क्या करें, लडकाअभागा कपूत है, नहीं तो आपसे क्या मुँह छिपाना पडता? ईश्वरनिस्संतान चाहे रक्खे पर ऐसी संतान न दे।

अलोपीदीन ने कहा- 'नहीं भाई साहब, ऐसा न कहिए।

मुंशीजी ने चकितहोकर कहा- 'ऐसी संतान को और क्या कँ?

अलोपीदीननेवात्सल्यपूर्ण स्वर में कहा- 'कुलतिलक और पुरुखों की कीर्तिउज्ज्वल करनेवाले संसार में ऐसे कितने धर्मपरायण मनुष्य हैं जोधर्म पर अपना सब कुछअर्पण कर सकें!

पं.अलोपीदीन नेवंशीधर से कहा- 'दरोगाजी, इसे खुशामद न समझिए, खुशामद करने के लिए मुझेइतना कष्ट उठाने की जरूरत न थी। उस रातको आपने अपने अधिकार-बल से अपनीहिरासत में लिया था, किंतु आज मैंस्वेच्छा से आपकी हिरासत में आया हूँ।मैंने हजारों रईस और अमीरदेखे, हजारों उच्च पदाधिकारियों से काम पडा किंतुपरास्त किया तोआपने। मैंने सबको अपना और अपने धन का गुलाम बनाकर छोड दिया।मुझेआज्ञा दीजिए कि आपसे कुछ विनय करूँ।

वंशीधरने अलोपीदीनको आते देखा तो उठकर सत्कार किया, किंतु स्वाभिमानसहित। समझ गए कि यहमहाशय मुझे लज्जित करने और जलाने आए हैं।क्षमा-प्रार्थना की चेष्टा नहींकी, वरन् उन्हें अपने पिता की यहठकुरसुहाती की बात असह्य सी प्रतीत हुई।पर पंडितजी की बातें सुनीतो मन की मैल मिट गई।

पंडितजीकी ओर उडतीहुई दृष्टि से देखा। सद्भाव झलक रहा था। गर्व ने अबलज्जा के सामने सिरझुका दिया। शर्माते हुए बोले- 'यह आपकी उदारताहै जो ऐसा कहते हैं। मुझसेजो कुछ अविनय हुई है, उसे क्षमाकीजिए। मैं धर्म की बेडी में जकडा हुआ था, नहीं तो वैसे मैं आपकादास हूँ। जो आज्ञा होगी वह मेरे सिर-माथे पर।

अलोपीदीन ने विनीतभाव से कहा- 'नदी तट पर आपने मेरी प्रार्थना नहीं स्वीकार की थी, किंतु आजस्वीकार करनी पडेगी।

वंशीधर बोले- 'मैंकिस योग्य हूँ, किंतु जो कुछ सेवा मुझसे हो सकती है, उसमें त्रुटि न होगी।

अलोपीदीनने एकस्टाम्प लगा हुआ पत्र निकाला और उसे वंशीधर के सामने रखकरबोले- 'इस पद कोस्वीकार कीजिए और अपने हस्ताक्षर कर दीजिए। मैंब्राह्मण हूँ, जब तक यहसवाल पूरा न कीजिएगा, द्वार से न हटूँगा।

मुंशीवंशीधर ने उसकागज को पढा तो कृतज्ञता से ऑंखों में ऑंसू भर आए।पं. अलोपीदीन ने उनकोअपनी सारी जायदाद का स्थायी मैनेजर नियतकिया था। छह हजार वाषक वेतन केअतिरिक्त रोजाना खर्च अलग, सवारीके लिए घोडा, रहने को बँगला, नौकर-चाकरमुफ्त। कम्पित स्वर मेंबोले- 'पंडितजी मुझमें इतनी सामर्थ्य नहीं है किआपकी उदारता कीप्रशंसा कर सकूँ! किंतु ऐसे उच्च पद के योग्य नहीं हूँ।

अलोपीदीन हँसकरबोले- 'मुझे इस समय एक अयोग्य मनुष्य की ही जरूरत है।

वंशीधरने गंभीर भावसे कहा- 'यों मैं आपका दास हूँ। आप जैसे कीर्तिवान, सज्जन पुरुष की सेवाकरना मेरे लिए सौभाग्य की बात है। किंतुमुझमें न विद्या है, न बुध्दि, नवह स्वभाव जो इन त्रुटियों कीपूर्ति कर देता है। ऐसे महान कार्य के लिए एकबडे मर्मज्ञ अनुभवीमनुष्य की जरूरत है।

अलोपीदीनने कलमदानसे कलम निकाली और उसे वंशीधर के हाथ में देकर बोले- 'नमुझे विद्वत्ता कीचाह है, न अनुभव की, न मर्मज्ञता की, नकार्यकुशलता की। इन गुणों के महत्वको खूब पा चुका हूँ। अबसौभाग्य और सुअवसर ने मुझे वह मोती दे दिया जिसकेसामने योग्यताऔर विद्वत्ता की चमक फीकी पड जाती है। यह कलम लीजिए, अधिकसोच-विचार न कीजिए, दस्तखत कर दीजिए। परमात्मा से यही प्रार्थना है कि वहआपको सदैव वही नदी के किनारे वाला, बेमुरौवत, उद्दंड, कठोर परंतुधर्मनिष्ठदारोगा बनाए रखे।

वंशीधरकी ऑंखेंडबडबा आईं। हृदय के संकुचित पात्र में इतना एहसान न समासका। एक बार फिरपंडितजी की ओर भक्ति और श्रध्दा की दृष्टि सेदेखा और काँपते हुए हाथ सेमैनेजरी के कागज पर हस्ताक्षर कर दिए।

अलोपीदीन नेप्रफुल्लित होकर उन्हें गले लगा लिया

शतरंज के खिलाड़ी - प्रेमचंद

वाजिदअली शाह का समय था। लखनऊ विलासिताके रंग में डूबा हुआ था। छोटे-बड़े, अमीर-गरीब, सभी विलासिता में डूबे हुएथे। कोई नृत्य और गान की मजलिस सजाता था , तो कोई अफीम की पीनक ही के मजेलेता था। जीवन के प्रत्येक विभाग में आमोद-प्रमोद को प्राधान्य था। शासनविभाग में, साहित्य क्षेत्र में, सामाजिक व्यवस्था में, कला कौशल में, उद्योग-धन्धों में, आहार-विहार में, सर्वत्र विलासिता व्याप्त हो रही था।कर्मचारी विषय-वासना में, कविगण प्रेम और विरह के वर्णन में, कारीगरकलाबत्तू और चिकन बनाने में , व्यावसायी सुर में, इत्र मिस्सी और उबटन कारोजगार करने में लिप्त था। सभी की आँखो में विलासिता का मद छाया हुआ था।संसार में क्या हो रहा है, इसकी किसी को खबर न थी। बटेर लड़ रहे है। तीतरोंकी लड़ाई के लिए पाली बदी जा रही है। कही चौरस बिछी हुई है। पौ बारह काशोर मचा हुआ है। कही शतरंज का घोर संग्राम छिड़ा हुआ है। राजा से लेकर रंकतक इसी धुन में मस्त थे। यहाँ तक कि फकीरों को पैसे मिलते तो वे रोटियाँ नलेकर अफीम खाते या मदक पीते। शतरंज ताश, गंजीफा खेलने में बुद्धि तीव्रहोती है, विचार शक्ति का विकास होता है, पेचीदा मसलों को सुलझाने की आदतपड़ती है, ये दलील जोर के साथ पेश की जाती थी। ( इस सम्प्रदाय के लोगो सेदुनिया अब भी खाली नही है।) इसलिए अगर मिर्जा सज्जाद अली और मीर रौशन अलीअपना अधिकांश समय बुद्धि-तीव्र करने में व्यतीत करते थे, तो किसी विचारशीलपुरुष को क्या आपत्ति हो सकती थी? दोनों के पास मौरूसी जागीरें थी, जीविकाकी कोई चिन्ता न थी। घर बैठे चखोतियाँ करते। आखिर और करते ही क्या? प्रातःकाल दोनों मित्र नाश्ता करके बिसात बिछा कर बैठ जाते, मुहरे सज जातेऔर लड़ाई के दाँवपेच होने लगते थे। फिर खबर न होती थी कि कब दोपहर हुई कबतीसरा पहल, कब शाम। घर के भीतर से बार-बार बुलावा आता था - 'खाना तैयारहै।' यहाँ से जबाव मिलता - 'चलो आते है, दस्तर ख्वान बिछाओ।' यहाँ तक किबावरची विवश होकर कमरे में ही खाना रख जाता था, और दोनो मित्र दोनो कामसाथ-साथ करते थे। मिर्जा सज्जाद अली के घर में कोई बड़ा-बूढा न था, इसलिएउन्हीं के दीवानखाने में बाजियाँ होती थी; मगर यह बात न थी कि मिर्जा के घरके और लोग उसके व्यवहार से खुश हो। घरवाली का तो कहना ही क्या, मुहल्लेवाले, घर के नौकर-चाकर तक नित्य द्वेषपूर्ण टिप्पणियाँ किया करते थे 'बड़ामनहूस खेल है। घर को तबाह कर देता है। खुदा न करे किसी को इसकी चाट पड़े।आदमी दीन दुनिया किसी के काम का नही रहता, न घर का न घाट का। बुरा रोग हैयहाँ तक कि मिर्जा की बेगम इससे इतना द्वेष था कि अवसर खोज-खोज कर पति कोलताड़ती थी। पर उन्हें इसका अवसर मुश्किल से मिलता था । वह सोचती रहती थी, तब तक उधर बाजी बिछ जाती था। और रात को जब सो जाती थी, तब कही मिर्जा जीभीतर आते थे। हाँ नौकरों पर वह अपना गुस्सा उतारती रहती थी - 'क्या पानमाँगे है? कह दो आकर ले जायँ। खाने की भी फुर्सत नही हैं? ले जाकर खाना सिरपटक दो, खायँ चाहे कुत्ते को खिलावें।' पर रूबरु वह कुछ न कह सकती थी।उनको अपने पति से उतना मलाल न था जितना मीर साहब से। उन्होंने उसका नाम मीरबिगाड़ू रख छोड़ा था। शायद मिर्जा जी अपनी सफाई देने के लिए सारा इल्जाममीर साहब ही के सिर थोप देते थे।

एकदिन बेगम साहिबा के सिर में दर्द होने लगा। उन्होंने लौड़ी से कहा - 'जाकरमिर्जा साहब को बुला लो। किसी हकीम के यहाँ से दवा लाये। दौड़, जल्दी कर।'

लौड़ी गयी तो मिर्जा ने कहा - 'चल, अभी आते है।'

बेगमका मिजाज गरम था। इतनी ताब कहाँ कि उनके सिर में दर्द हो, और पति शतरंजखेलता रहे। चेहरा सुर्ख हो गया। लौड़ी से कहा - 'जाकर कह, अभी चलिए नही तोवह आप ही हकीम के यहाँ चली जायँगी।'

मिर्जाजी बड़ी दिलचस्प बाजी खेल रहे थे, दो ही किश्तो में मीर साहब की मात हुईजाती थी, झँललाकर बोले - 'क्या ऐसा दम लबो पर है? जरा सब्र नही होता?'

मीर - अरे, तो जाकर सुन ही आइए न। औरते नाजुक-मिजाज होती है।

मिर्जा - जी हाँ, चला क्यों न जाऊँ। दो किश्तों में आपको मात होती है।

मीर - जनाब, इस भरोसे में न रहिएगा। वह चाल सोची है कि आपके मुहरे धरे रहें, औऱ मात हो जाए। पर जाइए, सुन आइए, क्यों ख्वामह-ख्वाह उनका दिल दुखाइएगा?

मिर्जा - इसी बात पर मात ही कर के जाऊँगा।

मीर - मै खेलूँगा ही नही। आप जाकर सुन आइए।

मिर्जा - अरे यार जाना, ही पड़ेगा हकीम के यहाँ। सिर-दर्द खाक नही है, मुझे परेशान करने का बहाना है।

मीर - कुछ भी हो, उनकी खातिर तो करनी ही पड़ेगी।

मिर्जा - अच्छा, एक चाल और चल लूँ।

मीर - हरगिज नही, जब तक आप सुन न आवेंगे, मै मुहरे में हाथ न लगाऊँगा।

मिर्जासाहब मजबूर होकर अन्दर गये तो बेगम साहबा ने त्योरियाँ बदल कर लेकिनकराहते हुए कहा - तुम्हें निगोड़ी शतरंज इतनी प्यारी है! चाहे कोई मर हीजाय, पर उठने का नाम नही लेते! नौज कोई तुम जैसा आदमी हो!

मिर्जा - क्या कहूँ, मीर साहब मानते ही न थे। बड़ी मुश्किल से पीछा छुड़ाकर आया हूँ।

बेगम - क्या जैसे वह खुद निखट्टू ही, वैसे ह सबको समझते है? उनके भी बाल बच्चे है, या सबका सफाया कर डाला है!

मिर्जा - बड़ा लती आदमी है। जब आ जाता है तब मजबूर होकर खेलना पड़ता है।

बेगम - दुत्कार क्यो नही देते?

मिर्जा - बराबर का आदमी है, उम्र में, दर्जें मे, मुझसे दो अंगुल ऊँचे। मुलाहिजा करना ही पड़ता है।

बेगम - तो मै ही दुत्कार देती हूँ। नाराज हो जायेंगे, हो जाएँ। कौन किसी कीरोटियोँ चला देता है। रानी रूठेगी, अपना सुहाग लेंगी। हिरिया, बाहर सेशतरंज उठा ला। मीर साहब से कहना, मियाँ अब न खेलेगे, आप तशरीफ ले जाइए।

मिर्जा - हाँ-हाँ, कहीं ऐसा गजब भी न कर ना! जलील करना चाहती हो क्या? ठहर हिरिया, कहाँ जाती है!

बेगम - जाने क्यों नही देते? मेरे ही खून पिए, जो उसे रोके। अच्छा, उसे रोका, मुझे रोको तो जानूँ।

यहकहकर बेगम साहिबा इल्लायी हुई दीवानखाने की तरफ चली। मिर्जा बेचारे का रंगउड़ गया। बीवी की मिन्नते करने लगे - खुदा के लिए, तुम्हे हजरत हुसेन कीकसम। मेरी ही मैयत देखे, जो उधर जाए।'

लेकिनबेगम ने एक न मानी। दीवानखाने के द्वार तक चली गयी। पर एकाएक पर पुरुष केसामने जाते हुए पाँव बँध गए। भीतर झाँका, संयोग से कमरा खाली था; मीर साहबने दो मुहरे इधर-उधर कर दिये थे और अपनी सफाई बताने के लिए बाहर टहल रहेथे। फिर क्या था, बेगम ने अन्दर पहुँच कर बाजी उलट दी; मुहरे कुछ तख्त केनीचे फेंक दिये, कुछ बाहर और किवाड़ अन्दर से बन्द करके कुंड़ी लगा दी। मीरसाहब दरवाजे पर तो थे ही, मुहरे बाहर फेंके जाते देखे, चूड़ियों की झनक भीकान में पड़ी। फिर दरवाजा बन्द हुआ, तो समझ गये बेगम बिगड़ गयी। घर की राहली।

मिर्जा ने कहा - तुमने गजब किया।

बेगम - अब, मीर साहब इधर आये तो खड़े-खड़े निकलवा दूँगी। इतनी लौ खुदा से लगातेतो क्या गरीब हो जाते? आप तो शतरंज खेले और मैं यहाँ चूल्हे चक्की कीफिक्र में सिर खपाऊँ। बोलो, जाते हो हकीम के यहाँ कि अब भी ताम्मुल है।

मिर्जाघर से निकले तो हकीम के घर जाने के बदले मीर साहब के घर पहुँचे, और सारावृतान्त कहा। मीर साहब बोले - मैने तो जब मुहरे बाहर आते देखे तभी ताजडगया। फौरन भागा। बड़ी गुस्सेवर मालूम होती हैं। मगर आपने उन्हे यो सिर परचढ़ा रखा है यह मुनासिब नही। उन्हें इससे क्या मतलब की आप बाहर क्या करतेहै। घर का इन्तजाम करना उनका काम है, दूसरी बातो से उन्हें क्या सरोकार?

मिर्जा - खैर, यह तो बताइए, अब कहाँ जमाव होगा?

मीर - इसका क्या गम? इतना बड़ा घर पड़ा हुआ है? बस यही जमे।

मिर्जा - लेकिन बेगम साहब को कैसे मनाऊँगा ? जब घर पर बैठा रहता था तब तो वह इतनाबिगड़ती थी, यहाँ बैठक होग तो शायद जिन्दा न छोड़ेगी।

मीर - अजी बकने भी दीजिए, दो-चार रोज में आप ही ठीक हो जायँगी। हाँ, आप इतना कीजिए कि आज से जरा तन जाइए!

मीरसाहब की बेग किसी अज्ञात कारण से उनका घर से दूर रहना ही उपयुक्त समझतीथी। इसलिए वह उनके शतरंज प्रेम की कभी आलोचना न करती बल्कि कभी-कभी मीरसाहब को देर हो जाती तो याद दिला देती थी। इन कारणों से मीर साहब को भ्रमहो गया था कि मेरी स्त्री अत्यन्त विनयशील और गम्भीर है। लेकिन जबदीवानखाने में बिसात बिछने लगी, और मीर साहब दिन भर घर में रहने लगे तोउन्हें बड़ा कष्ट होने लगा। उनकी स्वाधीनता में बाधा पड़ गयी। दिन भरदरवाजे पर झाँकने को तरस जाती।

उधरनौकरो में काना-फूसी होने लगी। अब तक दिन भर पड़े-पड़े मक्खियाँ मारा करतेथे। घर में चाहे कोई आवे, चाहे कोई जाय, इनसे कुछ मतलब न था। आठों पहर कीधौस हो गयी। कभी पान लाने का हुक्म होता, कभी मिठाई लाने का। और हु्क्का तोकिसी प्रेमी के हृदय की भाँति नित्य जलता ही रहता था। वे बेगम साहब सेजा-जाकर कहते - हुजूर, मियाँ की शतरंज तो हमारे जी का जंजाल हो गई! दिन भरदौड़ते-दौड़ते पैरौ में छाले पड़ गये। यह भी कोई खेल है कि सुबह को बैठे तोशाम ही कर दी। घड़ी आध घड़ी दिल-बहलाव के लिए खेल लेना बहुत है। खैर, हमेंतो कोई शिकायत नही, हुजूर के गुलाम हो, जो हुक्म होगा बजा ही लावेंगे, मगरयह खेल मनहूस है । इसका खेलने वाला कभी पनपता नही, घर पर कोई न कोई आफतजरूर आता है। यहाँ तक कि एक के पीछे मुहल्ले के मुहल्ले तबाह हो जाते देखेगये है। सारे मुहल्ले मे यही चर्चा होती रहती है । हुजूर का नमक खाते है।अपने आका की बुराई सुन-सुनकर रंज होता है। मगर क्या करे? इसपर बेगम साहिबाकहती - मै तो खुद इसको पसन्द नही करती, पर वह किसी की सुनते ही नही, क्याकिया जाय?

मुहल्ले में भीदो-चार पुराने जमाने के लोग थे। वे आपस में भाँति-भाँति के अमंगल कीकल्पनाएँ करने लगे - अब खैरियत नही है। जब हमारे रईसों का यह हाल है, तोमुल्क का खुदा ही हाफिज। यह बादशाहत शतरंज के हाथों तबाह होगी। आसार बुरेहै।

राज्य में हाहाकार मचाहुआ था। प्रजा दिन-दहाड़े लूटी जाती थी। कोई फरियाद सुनने वाला न था।देहातों की सारी दौलत लखनऊ में खिची चली आती थी, और वह वेश्याओ में, भाँड़ोमें और विलासता के अन्य अंगों की पूर्ति मे उड़ जाती थी। अँगरेजी कम्पनीका ऋण दिन-दिन बढ़ता जाता थी। कमली दिन-दिन भीग कर भारी होती जाती थी। देखमें सुव्यवस्था न होने के कारण वार्षिक कर भी न वसूल होता था। रेसिडेन्टबार-बार चेतावनी देता था, पर यहाँ लोग विलासिता के नशे में चूर थे। किसी केकान में जूँ न रेंगती थी।

खैर, मीर साहब के दीवानखाने में शतरंज होते महीने गुजर गये। नये-नये नक्शे हलकिये जाते, नये-नये बनाये जाते, नित नयी ब्यूह रचना होती; कभी-कभीखेलते-खेलते भिड़ हो जाती। तू-तू मै-मै तक की नौबत आ जाती। पर शीध्र हीदोनो में मेल हो जाता। कभी-कभी ऐसा भी होता कि बाजी उठा दी जाती. मिर्जा जीरूठ कर अपने घर में जा बैठते। पर रातभर की निद्रा के साथ सारा मनोमालिन्यशान्त हो जाता था। प्रातःकाल दोनो मित्र दीवानखाने में आ पहुँचते थे।

एकदिन दोनो मित्र बैठे शतरंज की दलदल में गोते लगा रहे थे कि इतने में घोड़ेपर सवार एक बादशाही फौज का अफसर मीर साहब का नाम पूछता हुआ आ पहुँचा। मीरसाहब के होश उड़ गये। यह क्या बला सिर पर आयी? यह तलबी किस लिये हुई ? अबखैरियत नही नजर आती! घर के दरवाजे बन्द कर लिये। नौकर से बोले - कह दो घरमें नही है।

सवार - घर में नही, तो कहाँ है?

नौकर - यह मैं नही जानता। क्या काम है?

सवार - काम तुझे क्या बतालाऊँ? हुजूर से तलबी है - शायद फौज के लिए कुछ सिपाहीमाँगे गये है। जागीरदार है कि दिल्लगी? मोरचे पर जाना पड़ेगा तो आटे-दाल काभाव मालूम हो जायेगा।

नौकर - अच्छा तो जाइए, कह दिया जायेगा।

सवार - कहने की बात नही। कल मै खुद आऊँगा। साथ ले जाने का हुक्म हुआ है।

सवार चला गया। मीर साहब की आत्मा काँप उठी। मिर्जा जी से बोले - कहिए, जनाब, अब क्या होगा?

मिर्जा - बड़ी मुसीबत बै। कहीं मेरी भी तलबी न हो।

मीर - कम्बख्त कल आने को कह गया है।

मिर्जा - आफत है, और क्या! कहीं मोरचे पर जाना पड़ा तो बेमौत मरे।

मीर - बस, यही एक तदबीर है कि घर पर मिलें ही नही। कल से गोमती पर कहीं वीरानेनें नक्शा जमें। वहाँ किसे खबर होगी? हजरत आकर लौट जायेंगे।

मिर्जा - वल्लाह, आपको खूब सूझी! इसके सिवा औऱ कोई तदबीर नही है।

इधरमीर साहब की बेगम उस सवार से कह रही थी - तुमने खूब ध्रता बतायी। उसनेजवाब दिया - ऐसे गावदियों को तो चुटकियों पर नचाता हूँ। इनकी सारी अकल औरहिम्मत तो शतरंजे चर ली। अब भूलकर भी घर न रहेंगे।

दूसरेदिन से दोनों मित्र मुँह अँधेरे घर से निकल खड़े होते। बगल में एक छोटी-सीदरी दबाये, डिब्बे में गिलोरियाँ भरे, गोमती पार कर एक पुरानी वीरानमस्जिद में चले जाते, जिसे शायद नवाब आसफउद्दौला ने बनवाया था। रास्ते मेंतम्बाकू, चिलम औऱ मदरिया ले लेते और मस्जिद में पहुँच, दरी बिछा, हुक्का भरशतरंज खेलने बैठ जाते थे। फिर उन्हें दीन-दुनिया की फिक्र न रहती थी। 'किस्त', 'शह' आदि दो-एक शब्दों के सिवा मुँह से और कोई वाक्य नही निकलताथा। कोई योगी भी समाधि में इतना एकाग्र न होता। दो पहर को जब भूख मालूमहोती तो दोनो मित्र किसी नानबाई की दूकान पर जाकर खाना खा आते और एक चिलमहुक्का पीकर फिर संग्राम क्षेत्र में डट जाते। कभी कभी तो उन्हें भोजन काभी ख्याल न रहता था।

इधर देशकी राजनीतिक दशा भयंकर हलचल मची हुई थी। लोग बाल-बच्चो को ले-ले कर देहातोमें भाग रहे थे। पर हमारे दोनो खिलाड़ियो को इसकी जरा भी फिक्र न थी। वे घरसे आते तो गलियो में होकर। डर था कि कही किसी बादशाही मुलाजिम की निगाह नपड़ जाय, नही तो बेगार में पकड़े जायँ हजारो रूपये सालाना की जागीर मुफ्तमें ही हजम करना चाहते थे।

एकदिन दोनो मित्र मस्जिद के खंडहर में बैठे हुए शतरंज खेल रहे थे। मिर्जा कीबाजी कुछ कमजोर थी। मीर साहब को किश्त पर किश्त दे रहे थे। इतने मेंकम्पनी के सैनिक आते हुए दिखाई दिये। यह गोरो की फौज थी जो लखनऊ पर अधिकारजमाने के लिए आ रही थी।

मीर साहब - अंगरेजी फौज आ रही है खुदा खैर करे!

मिर्जा - आने दीजिए, किश्त बचाइए। लो यह किश्त!

मीर - तोरखाना भी है। कोई पाँच हजार आदमी होगे, कैसे जवान है। लाल बंदरो से मुँह है। सूरत देखकर खौफ मालूम होता है।

मिर्जा - जनाब, हीले न कीजिए। ये चकमें किसी और को दीजिएगा - यह किश्त!

मीर - आप भी अजीब आदमी है। यहाँ तो शहर पर आफत आयी हुई है, और आपको किश्त की सूझी है। कुछ खबर है कि शहर घिर गया तो घर कैसे चलेंगे?

मिर्जा - जब घर चलने का वक्त आयेगा तो देखी जाएगी - यह किश्त, बस अब की शह में मात है।

फौज निकल गयी। दस बजे का समय था। फिर बाजी बिछ गयी। मिर्जा बोले - आज खाने की कैसी ठहरेगा?

मीर - अजी, आज तो रोजा है। क्या आपको भूख ज्यादा मालूम होती है?

मिर्जा - जी नही। शहर में जाने क्या हो रहा है?

मीर - शहर में कुछ न हो रहा होगा। लोग खाना खा-खाकर आराम से सो रहे होगे। हुजूर नवाब साहब भी ऐशगाह में होगे ।

दोनोसज्जन फिर जो खेलने बैठे तो तीन बज गए। अब की मिर्जा की बाजी कमजोर थी।चार का गजर बज रहा था कि फौज की वापसी की आहट मिली। नवाब वाजिदअली शाह पकड़लिए गये थे, और सेना उन्हें किसी अज्ञात स्थान को लिए जा रही थी। शहर में नकोई हलचल थी, न मार-काट। एक बूँद भी खून नही गिरा था। आज तक किसी स्वाधीनदेश के राजा की पराजय इतनी शान्ति से इस तरह खून बहे बिना न हुई होगी। यहअहिंसा न थी, जिस पर देवगण प्रसन्न होते है। यह कायरपन था जिस पर बड़े सेबड़े कायर आँसू बहाते है। अवध के विशाल देश का नवाब बन्दी बना चला जाता थाऔर लखनऊ ऐश की नींद में मस्त था। यह राजनीतिक अधःपतन की चरम सीमा थी।

मिर्जा ने कहा - हुजूर नवाब को जालिमों नें कैद कर लिया है।

मीर - होगा, यह लीजिए शह!

मिर्जा - जनाब, जरा ठहरिए। इस वक्त इधर तबीयत ठीक नही लगती। बेचारे नवाब साहब इस वक्त खून के आँसू रो रहे होंगे।

मीर - रोया ही चाहे, यह ऐश वहाँ कहाँ नसीब होगा? यह किश्त।

मिर्जा - किसी के दिन बराबर नही जाते। कितनी दर्दनाक हालत है।

मीर - हाँ, सो तो है ही, यह लो फिर किश्त! बस अब की किश्त में मात है। बच नहीं सकते।

मिर्जा - खुदा की कसम, आप बड़े बे दर्द है। इतना बड़ा हादसा देखकर भी आपको दुःख नही होता। हाय, गरीब वाजिदअली शाह!

मीर - पहले अपने बादशाह को तो बचाइए, फिर नवाब का मातम कीजिएगा। यह किश्त और मात! लाना हाथ!

बादशाहको लिए हुए सेना सामने से निकल गयी। उनके जाते ही मिर्जा ने फिर बाजी बिछाली। हार की चोट बुरी होती है। मीर ने कहा - आइए नवाब के मातम में मरसियाकह डाले। लेकिन मिर्जा की राजभक्ति अपनी हार के साथ लुप्त हो चुकी थी । वहहार का बदला चुकाने के लिए अधीर हो गए थे।

शामहो गयी। खंडहर मेमं चमगादड़ो ने चीखना शुरू किया। अबाबीले आ-आकर अपनेघोंसलों में चिपटी। पर दोनों खिलाड़ी डटे हुए थे। मानो दोनों खून के प्यासेसूरमा आपस में लड़ रहे हो। मिर्जा जी तीन बाजियाँ लगातार हार चुके थे; इसचौथी बाजी का भी रंग अच्छा न था। वह बार-बार जीतने का दृढ़निश्चय कर सँभलकरखेलते थे लेकिन एक न एक चाल ऐसी बेढ़ब आ पड़ती थी जिससे बाजी खराब हो जातीथी। हर बार हार के साथ प्रतिकार की भावना और उग्र होती जाती थी। उधर मीरसाहब मारे उमंग के गजले गाते थे, चुटकियाँ लेते थे, मानो कोई गुप्त धन पागये हो। मिर्जा सुन-सुनकर झुझलाते और हार की झेंप मिटाने कि लिए उनकी दाददेते थे। ज्यों-ज्यों बाजी कमजोर पड़ती थी, धैर्य हाथ से निकलता जाता था।यहाँ तक कि वह बात-बात पर झुँझलाने लगे। 'जनाब' आप चाल न बदला कीजिए।यहक्या कि चाल चले औऱ फिर उसे बदल दिया जाय। जो कुछ चलना है एक बार चल दीजिए।यह आप मुहरे पर ही क्यों हाथ रखे रहते है। मुहरे छोड़ दीजिए। जब तक आपकोचाल न सूझे, मुहरा छुइए ही नही। आप एक-एक चाल आध-आध घंटे में चलते है। इसकीसनद नही। जिसे एक चाल चलनें में पाँच मिनट से ज्यादा लगे उसकी मात समझीजाय। फिर आपने चाल बदली? चुपके से मुहर वही रख दीजिए।

मीर साहब की फरजी पिटता था। बोले - मैने चाल चली ही कब थी?

मिर्जा - आप चाल चल चुके है। मुहरा वही रख दीजिए - उसी घर में।

मीर - उसमें क्यो रखूँ? हाथ से मुहरा छोड़ा कब था?

मिर्जा - मुहरा आप कयामत तक न छोड़े, तो क्या चाल ही न होगी? फरजी पिटते देखा तो धाँधली करने लगे।

मीर - धाँधली आप करते है। हार-जीत तकदीर से होती है। धाँधली करने से कोई नही जीतता।

मिर्जा - तो इस बाजी में आपकी मात हो गयी।

मीर - मुझे क्यो मात होने लगी?

मिर्जा - तो आप मुहरा उसी घर में रख दीजिए, जहाँ पहले रखा था।

मीर - वहाँ क्यो रखूँ? नही रखता।

मिर्जा - क्यों न रखिएगा? आपको रखना होगा।

तकरारबढ़ने लगी। दोनों अपनी-अपनी टेक पर अड़े थे। न यह दबता था, न वह।अप्रासंगिक बाते होने लगी। मिर्जा बोले - किसी ने खानदान में शतरंज खेलीहोती तब तो इसके कायदे जानते। वो तो हमेशा घास छीला किए, आप शतरंज क्याखेलिएगा? रियासत और ही चीज है। जागीर मिल जाने ही से कोई रईस नही हो जाता।

मीर - क्या! घास आपके अब्बाजन छीलते होगे। यहाँ तो पीढ़ियों से शतरंज खेलते चले आते है?

मिर्जा - अजी जाइए भी, गाजीउद्दीन हैदर के यहाँ बावर्ची का काम करते-करते उम्रगुजर गयी। आज रईस बनने चले है। रईस बनना कुछ दिल्लगी नही।

मीर - क्यो अपने बुजुर्गो के मुँह पर कालिख लगाते हो - वे बावर्ची का काम करतेहोंगे। यहाँ तो बादशाह के दस्तर ख्वान पर खाना खाते चले आये है।

मिर्जा - अरे चल चरकटे, बहुत बढ़कर बातें न कर!

मीर - जबान सँभालिए, वर्ना बुरा होगा। मै ऐसी बातें सुनने का आदी नही। यहाँ तोकिसी ने आँखे दिखायी कि उसकी आँखें निकाली । है हौसला?

मिर्जा - आप मेरा हौसला देखना चाहते है, तो फिर आइए, आज दो-दो हाथ हो जायँ, इधर या उधर।

मीर - तो यहाँ तुमसे दबने वाला कौन है?

दोनोदोस्तों ने कमर से तलवारे निकाल ली। नवाबी जमाना था। सभी तलवार, पेशकब्जकटार वगैरह बाँधते थे। दोनो विलासी थे, पर कायर न थे। उनमें राजनीतिक भावोंका अधःपतन हो गया था। बादशाह के लिए क्यों मरे? पर व्यक्तिगत वीरता काअभाव न था। दोनो ने पैतरे बदले, तलवारे चमकी, छपाछप की आवाजे आयी। दोनोजख्मी होकर गिरे, दोनो न वहीं तड़प-तड़प कर जाने दी। अपने बादशाह के लिएउनकी आँखों से एक बूँद आँसू न निकला, उन्होने शतरंज के वजीर की रक्षा नेंप्राण दे दिए।

अँधेरा हो चलाथा। बाजी बिछी हुई थी। दोनो बादशाह अपने-अपने सिहांसन पर बैठे मानो इन वीरोकी मृत्यु पर रो रहे थे। चारो तरफ सन्नाटा छाया हुआ था। खँडहर की टूटीहुई, मेहराबे गिरी हुई दीवारे और धूल-धूसरितें मीनारे इन लाशों को देखती औरसिर धुनती थी।

 

ईदगाह - प्रेमचंद

                                              1

रमजान के पूरे तीस रोजों के बाद ईद आयी है। कितना मनोहर, कितना सुहावनाप्रभाव है। वृक्षों पर अजीब हरियाली है, खेतों में कुछ अजीब रौनक है, आसमानपर कुछ अजीब लालिमा है। आज का सूर्य देखो, कितना प्यारा, कितना शीतल है, यानी संसार को ईद की बधाई दे रहा है। गॉंव में कितनी हलचल है। ईदगाह जानेकी तैयारियॉँ हो रही हैं। किसी के कुरते में बटन नहीं है, पड़ोस के घर मेंसुई-धागा लेने दौड़ा जा रहा है। किसी के जूते कड़े हो गए हैं, उनमें तेलडालने के लिए तेली के घर पर भागा जाता है। जल्दी-जल्दी बैलों को सानी-पानीदे दें। ईदगाह से लौटते-लौटते दोपहर हो जाएगी। तीन कोस का पेदल रास्ता, फिरसैकड़ों आदमियों से मिलना-भेंटना, दोपहर के पहले लोटना असम्भव है। लड़केसबसे ज्यादा प्रसन्न हैं। किसी ने एक रोजा रखा है, वह भी दोपहर तक, किसी नेवह भी नहीं, लेकिन ईदगाह जाने की खुशी उनके हिस्से की चीज है। रोजेबड़े-बूढ़ो के लिए होंगे। इनके लिए तो ईद है। रोज ईद का नाम रटते थे, आज वहआ गई। अब जल्दी पड़ी है कि लोग ईदगाह क्यों नहीं चलते। इन्हें गृहस्थीचिंताओं से क्या प्रयोजन! सेवैयों के लिए दूध ओर शक्कर घर में है या नहीं, इनकी बला से, ये तो सेवेयां खाऍंगे। वह क्या जानें कि अब्बाजान क्योंबदहवास चौधरी कायमअली के घर दौड़े जा रहे हैं। उन्हें क्या खबर कि चौधरीऑंखें बदल लें, तो यह सारी ईद मुहर्रम हो जाए। उनकी अपनी जेबों में तोकुबेर काधन भरा हुआ है। बार-बार जेब से अपना खजाना निकालकर गिनते हैं औरखुश होकर फिर रख लेते हैं। महमूद गिनता है, एक-दो, दस,-बारह, उसके पास बारहपैसे हैं। मोहनसिन के पास एक, दो, तीन, आठ, नौ, पंद्रह पैसे हैं। इन्हींअनगिनती पैसों में अनगिनती चीजें लाऍंगें— खिलौने, मिठाइयां, बिगुल, गेंदऔर जाने क्या-क्या।

और सबसे ज्यादा प्रसन्न है हामिद। वह चार-पॉँच सालका गरीब सूरत, दुबला-पतला लड़का, जिसका बाप गत वर्ष हैजे की भेंट हो गया औरमॉँ न जाने क्यों पीली होती-होती एक दिन मर गई। किसी को पता क्या बीमारीहै। कहती तो कौन सुनने वाला था? दिल पर जो कुछ बीतती थी, वह दिल में हीसहती थी ओर जब न सहा गया,. तो संसार से विदा हो गई। अब हामिद अपनी बूढ़ीदादी अमीना की गोद में सोता है और उतना ही प्रसन्न है। उसके अब्बाजान रूपयेकमाने गए हैं। बहुत-सी थैलियॉँ लेकर आऍंगे। अम्मीजान अल्लहा मियॉँ के घरसे उसके लिए बड़ी अच्छी-अच्छी चीजें लाने गई हैं, इसलिए हामिद प्रसन्न है।आशा तो बड़ी चीज है, और फिर बच्चों की आशा! उनकी कल्पना तो राई का पर्वतबना लेती हे। हामिद के पॉंव में जूते नहीं हैं, सिर परएक पुरानी-धुरानीटोपी है, जिसका गोटा काला पड़ गया है, फिर भी वह प्रसन्न है। जब उसकेअब्बाजान थैलियॉँ और अम्मीजान नियमतें लेकर आऍंगी, तो वह दिल से अरमाननिकाल लेगा। तब देखेगा, मोहसिन, नूरे और सम्मी कहॉँ से उतने पैसेनिकालेंगे।
अभागिन अमीना अपनी कोठरी में बैठी रो रही है। आज ईद का दिन, उसके घर में दाना नहीं! आज आबिद होता, तो क्या इसी तरह ईद आती ओर चली जाती!इस अन्धकार और निराशा में वह डूबी जा रही है। किसने बुलाया था इस निगोड़ीईद को? इस घर में उसका काम नहीं, लेकिन हामिद! उसे किसी के मरने-जीने केक्या मतल? उसके अन्दर प्रकाश है, बाहर आशा। विपत्ति अपना सारा दलबल लेकरआये, हामिद की आनंद-भरी चितबन उसका विध्वसं कर देगी।
हामिद भीतर जाकर दादी से कहता है—तुम डरना नहीं अम्मॉँ, मै सबसे पहले आऊँगा। बिल्कुल न डरना।
अमीनाका दिल कचोट रहा है। गॉँव के बच्चे अपने-अपने बाप के साथ जा रहे हैं।हामिद का बाप अमीना के सिवा और कौन है! उसे केसे अकेले मेले जाने दे? उसभीड़-भाड़ से बच्चा कहीं खो जाए तो क्या हो? नहीं, अमीना उसे यों न जानेदेगी। नन्ही-सी जान! तीन कोस चलेगा कैसे? पैर में छाले पड़ जाऍंगे। जूते भीतो नहीं हैं। वह थोड़ी-थोड़ी दूर पर उसे गोद में ले लेती, लेकिन यहॉँसेवैयॉँ कोन पकाएगा? पैसे होते तो लौटते-लोटते सब सामग्री जमा करके चटपटबना लेती। यहॉँ तो घंटों चीजें जमा करते लगेंगे। मॉँगे का ही तो भरोसाठहरा। उस दिन फहीमन के कपड़े सिले थे। आठ आने पेसे मिले थे। उस उठन्नी कोईमान की तरह बचाती चली आती थी इसी ईद के लिए लेकिन कल ग्वालन सिर पर सवारहो गई तो क्या करती? हामिद के लिए कुछ नहीं हे, तो दो पैसे का दूध तो चाहिएही। अब तो कुल दो आने पैसे बच रहे हैं। तीन पैसे हामिद की जेब में, पांचअमीना के बटुवें में। यही तो बिसात है और ईद का त्यौहार, अल्ला ही बेड़ा परलगाए। धोबन और नाइन ओर मेहतरानी और चुड़िहारिन सभी तो आऍंगी। सभी कोसेवेयॉँ चाहिए और थोड़ा किसी को ऑंखों नहीं लगता। किस-किस सें मुँहचुरायेगी? और मुँह क्यों चुराए? साल-भर का त्योंहार हैं। जिन्दगी खैरियत सेरहें, उनकी तकदीर भी तो उसी के साथ है: बच्चे को खुदा सलामत रखे, यें दिनभी कट जाऍंगे।
गॉँव से मेला चला। ओर बच्चों के साथ हामिद भी जा रहा था।कभी सबके सब दौड़कर आगे निकल जाते। फिर किसी पेड़ के नींचे खड़े होकर साथवालों का इंतजार करते। यह लोग क्यों इतना धीरे-धीरे चल रहे हैं? हामिद केपैरो में तो जैसे पर लग गए हैं। वह कभी थक सकता है? शहर का दामन आ गया।सड़क के दोनों ओर अमीरों के बगीचे हैं। पक्की चारदीवारी बनी हुई है। पेड़ोमें आम और लीचियॉँ लगी हुई हैं। कभी-कभी कोई लड़का कंकड़ी उठाकर आम परनिशान लगाता हे। माली अंदर से गाली देता हुआ निंलता है। लड़के वहाँ से एकफलॉँग पर हैं। खूब हँस रहे हैं। माली को केसा उल्लू बनाया है।
बड़ी-बड़ीइमारतें आने लगीं। यह अदालत है, यह कालेज है, यह क्लब घर है। इतने बड़ेकालेज में कितने लड़के पढ़ते होंगे? सब लड़के नहीं हैं जी! बड़े-बड़े आदमीहैं, सच! उनकी बड़ी-बड़ी मूँछे हैं। इतने बड़े हो गए, अभी तक पढ़ते जातेहैं। न जाने कब तक पढ़ेंगे ओर क्या करेंगे इतना पढ़कर! हामिद के मदरसे मेंदो-तीन बड़े-बड़े लड़के हें, बिल्कुल तीन कौड़ी के। रोज मार खाते हैं, कामसे जी चुराने वाले। इस जगह भी उसी तरह के लोग होंगे ओर क्या। क्लब-घर मेंजादू होता है। सुना है, यहॉँ मुर्दो की खोपड़ियां दौड़ती हैं। और बड़े-बड़ेतमाशे होते हें, पर किसी कोअंदर नहीं जाने देते। और वहॉँ शाम को साहब लोगखेलते हैं। बड़े-बड़े आदमी खेलते हें, मूँछो-दाढ़ी वाले। और मेमें भी खेलतीहैं, सच! हमारी अम्मॉँ को यह दे दो, क्या नाम है, बैट, तो उसे पकड़ ही नसके। घुमाते ही लुढ़क जाऍं।
महमूद ने कहा—हमारी अम्मीजान का तो हाथ कॉँपने लगे, अल्ला कसम।
मोहसिनबोल—चलों, मनों आटा पीस डालती हैं। जरा-सा बैट पकड़ लेगी, तो हाथ कॉँपनेलगेंगे! सौकड़ों घड़े पानी रोज निकालती हैं। पॉँच घड़े तो तेरी भैंस पीजाती है। किसी मेम को एक घड़ा पानी भरना पड़े, तो ऑंखों तक अँधेरी आ जाए।
महमूद—लेकिन दौड़तीं तो नहीं, उछल-कूद तो नहीं सकतीं।
मोहसिन—हॉँ, उछल-कूद तो नहीं सकतीं; लेकिन उस दिन मेरी गाय खुल गई थी और चौधरी के खेतमें जा पड़ीथी, अम्मॉँ इतना तेज दौड़ी कि में उन्हें न पा सका, सच।
आगेचले। हलवाइयों की दुकानें शुरू हुई। आज खूब सजी हुई थीं। इतनी मिठाइयॉँकौन खाता? देखो न, एक-एक दूकान पर मनों होंगी। सुना है, रात को जिन्नात आकरखरीद ले जाते हैं। अब्बा कहते थें कि आधी रात को एक आदमी हर दूकान पर जाताहै और जितना माल बचा होता है, वह तुलवा लेता है और सचमुच के रूपये देताहै, बिल्कुल ऐसे ही रूपये।
हामिद को यकीन न आया—ऐसे रूपये जिन्नात को कहॉँ से मिल जाऍंगी?
मोहसिनने कहा—जिन्नात को रूपये की क्या कमी? जिस खजाने में चाहें चले जाऍं। लोहेके दरवाजे तक उन्हें नहीं रोक सकते जनाब, आप हैं किस फेर में!हीरे-जवाहरात तक उनके पास रहते हैं। जिससे खुश हो गए, उसे टोकरों जवाहरातदे दिए। अभी यहीं बैठे हें, पॉँच मिनट में कलकत्ता पहुँच जाऍं।
हामिद ने फिर पूछा—जिन्नात बहुत बड़े-बड़े होते हैं?
मोहसिन—एक-एक सिर आसमान के बराबर होता है जी! जमीन पर खड़ा हो जाए तो उसका सिर आसमान से जा लगे, मगर चाहे तो एक लोटे में घुस जाए।
हामिद—लोग उन्हें केसे खुश करते होंगे? कोई मुझे यह मंतर बता दे तो एक जिनन को खुश कर लूँ।
मोहसिन—अबयह तो न जानता, लेकिन चौधरी साहब के काबू में बहुत-से जिन्नात हैं। कोईचीज चोरी जाए चौधरी साहब उसका पता लगा देंगे ओर चोर का नाम बता देगें।जुमराती का बछवा उस दिन खो गया था। तीन दिन हैरान हुए, कहीं न मिला तब झखमारकर चौधरी के पास गए। चौधरी ने तुरन्त बता दिया, मवेशीखाने में है औरवहीं मिला। जिन्नात आकर उन्हें सारे जहान की खबर दे जाते हैं।
अब उसकी समझ में आ गया कि चौधरी के पास क्यों इतना धन है और क्यों उनका इतना सम्मान है।
आगेचले। यह पुलिस लाइन है। यहीं सब कानिसटिबिल कवायद करते हैं। रैटन! फाय फो!रात को बेचारे घूम-घूमकर पहरा देते हैं, नहीं चोरियॉँ हो जाऍं। मोहसिन नेप्रतिवाद किया—यह कानिसटिबिल पहरा देते हें? तभी तुम बहुत जानते हों अजीहजरत, यह चोरी करते हैं। शहर के जितने चोर-डाकू हें, सब इनसे मुहल्ले मेंजाकर ‘जागते रहो! जाते रहो!’ पुकारते हें। तभी इन लोगों के पास इतने रूपयेआते हें। मेरे मामू एक थाने में कानिसटिबिल हें। बरस रूपया महीना पाते हें, लेकिन पचास रूपये घर भेजते हें। अल्ला कसम! मैंने एक बार पूछा था कि मामू, आप इतने रूपये कहॉँ से पाते हैं? हँसकर कहने लगे—बेटा, अल्लाह देता है।फिर आप ही बोले—हम लोग चाहें तो एक दिन में लाखों मार लाऍं। हम तो इतना हीलेते हैं, जिसमें अपनी बदनामी न हो और नौकरी न चली जाए।
हामिद ने पूछा—यह लोग चोरी करवाते हैं, तो कोई इन्हें पकड़ता नहीं?
मोहसिनउसकी नादानी पर दया दिखाकर बोला..अरे, पागल! इन्हें कौन पकड़ेगा! पकड़नेवाले तो यह लोग खुद हैं, लेकिन अल्लाह, इन्हें सजा भी खूब देता है। हराम कामाल हराम में जाता है। थोड़े ही दिन हुए, मामू के घर में आग लग गई। सारीलेई-पूँजी जल गई। एक बरतन तक न बचा। कई दिन पेड़ के नीचे सोए, अल्ला कसम, पेड़ के नीचे! फिरन जाने कहॉँ से एक सौ कर्ज लाए तो बरतन-भॉँड़े आए।
हामिद—एक सौ तो पचार से ज्यादा होते है?
‘कहॉँ पचास, कहॉँ एक सौ। पचास एक थैली-भर होता है। सौ तो दो थैलियों में भी न आऍं?
अबबस्ती घनी होने लगी। ईइगाह जाने वालो की टोलियॉँ नजर आने लगी। एक से एकभड़कीले वस्त्र पहने हुए। कोई इक्के-तॉँगे पर सवार, कोई मोटर पर, सभी इत्रमें बसे, सभी के दिलों में उमंग। ग्रामीणों का यह छोटा-सा दल अपनी विपन्नतासे बेखबर, सन्तोष ओर धैर्य में मगन चला जा रहा था। बच्चों के लिए नगर कीसभी चीजें अनोखी थीं। जिस चीज की ओर ताकते, ताकते ही रह जाते और पीछे सेआर्न की आवाज होने पर भी न चेतते। हामिद तो मोटर के नीचे जाते-जाते बचा।
सहसाईदगाह नजर आई। ऊपर इमली के घने वृक्षों की छाया हे। नाचे पक्का फर्श है, जिस पर जाजम ढिछा हुआ है। और रोजेदारों की पंक्तियॉँ एक के पीछे एक न जानेकहॉँ वक चली गई हैं, पक्की जगत के नीचे तक, जहॉँ जाजम भी नहीं है। नए आनेवाले आकर पीछे की कतार में खड़े हो जाते हैं। आगे जगह नहीं हे। यहॉँ कोई धनऔर पद नहीं देखता। इस्लाम की निगाह में सब बराबर हें। इन ग्रामीणों ने भीवजू किया ओर पिछली पंक्ति में खड़े हो गए। कितना सुन्दर संचालन है, कितनीसुन्दर व्यवस्था! लाखों सिर एक साथ सिजदे में झुक जाते हैं, फिर सबके सब एकसाथ खड़े हो जाते हैं, एक साथ झुकते हें, और एक साथ खड़े हो जाते हैं, एकसाथ खड़े हो जाते हैं, एक साथ झुकते हें, और एक साथ खड़े हो जाते हैं, कईबार यही क्रिया होती हे, जैसे बिजली की लाखों बत्तियाँ एक साथ प्रदीप्त होंऔर एक साथ बुझ जाऍं, और यही ग्रम चलता, रहे। कितना अपूर्व दृश्य था, जिसकीसामूहिक क्रियाऍं, विस्तार और अनंतता हृदय को श्रद्धा, गर्व और आत्मानंदसे भर देती थीं, मानों भ्रातृत्व का एक सूत्र इन समस्त आत्माओं को एक लड़ीमें पिरोए हुए हैं।

                                              2

नमाज खत्म हो गई। लोग आपस में गले मिलरहे हैं। तब मिठाई और खिलौने की दूकान पर धावा होता है। ग्रामीणों का यह दलइस विषय में बालकों से कम उत्साही नहीं है। यह देखो, हिंडोला हें एक पैसादेकर चढ़ जाओ। कभी आसमान पर जाते हुए मालूम होगें, कभी जमीन पर गिरते हुए।यह चर्खी है, लकड़ी के हाथी, घोड़े, ऊँट, छड़ो में लटके हुए हैं। एक पेसादेकर बैठ जाओं और पच्चीस चक्करों का मजा लो। महमूद और मोहसिन ओर नूरे ओरसम्मी इन घोड़ों ओर ऊँटो पर बैठते हें। हामिद दूर खड़ा है। तीन ही पैसे तोउसके पास हैं। अपने कोष का एक तिहाई जरा-सा चक्कर खाने के लिए नहीं देसकता।
सब चर्खियों से उतरते हैं। अब खिलौने लेंगे। अधर दूकानों की कतारलगी हुई है। तरह-तरह के खिलौने हैं—सिपाही और गुजरिया, राज ओर वकी, भिश्तीऔर धोबिन और साधु। वह! कत्ते सुन्दर खिलोने हैं। अब बोला ही चाहते हैं।महमूद सिपाही लेता हे, खाकी वर्दी और लाल पगड़ीवाला, कंधें पर बंदूक रखेहुए, मालूम होता हे, अभी कवायद किए चला आ रहा है। मोहसिन को भिश्ती पसंदआया। कमर झुकी हुई है, ऊपर मशक रखे हुए हैं मशक का मुँह एक हाथ से पकड़ेहुए है। कितना प्रसन्न है! शायद कोई गीत गा रहा है। बस, मशक से पानी अड़ेलाही चाहता है। नूरे को वकील से प्रेम हे। कैसी विद्वत्ता हे उसके मुख पर!काला चोगा, नीचे सफेद अचकन, अचकन के सामने की जेब में घड़ी, सुनहरी जंजीर, एक हाथ में कानून का पौथा लिये हुए। मालूम होता है, अभी किसी अदालत से जिरहया बहस किए चले आ रहे है। यह सब दो-दो पैसे के खिलौने हैं। हामिद के पासकुल तीन पैसे हैं, इतने महँगे खिलौन वह केसे ले? खिलौना कहीं हाथ से छूटपड़े तो चूर-चूर हो जाए। जरा पानी पड़े तो सारा रंग घुल जाए। ऐसे खिलौनेलेकर वह क्या करेगा, किस काम के!
मोहसिन कहता है—मेरा भिश्तीरोज पानी दे जाएगा सॉँझ-सबेरे
महमूद—और मेरा सिपाही घर का पहरा देगा कोई चोर आएगा, तो फौरन बंदूक से फैर कर देगा।
नूरे—ओर मेरा वकील खूब मुकदमा लड़ेगा।
सम्मी—ओर मेरी धोबिन रोज कपड़े धोएगी।
हामिदखिलौनों की निंदा करता है—मिट्टी ही के तो हैं, गिरे तो चकनाचूर हो जाऍं, लेकिन ललचाई हुई ऑंखों से खिलौनों को देख रहा है और चाहता है कि जरा देर केलिए उन्हें हाथ में ले सकता। उसके हाथ अनायास ही लपकते हें, लेकिन लड़केइतने त्यागी नहीं होते हें, विशेषकर जब अभी नया शौक है। हामिद ललचता रहजाता है।
खिलौने के बाद मिठाइयाँ आती हैं। किसी ने रेवड़ियॉँ ली हें, किसी ने गुलाबजामुन किसी ने सोहन हलवा। मजे से खा रहे हैं। हामिद बिरादरीसे पृथक् है। अभागे के पास तीन पैसे हैं। क्यों नहीं कुछ लेकर खाता? ललचाईऑंखों से सबक ओर देखता है।
मोहसिन कहता है—हामिद रेवड़ी ले जा, कितनी खुशबूदार है!
हामिदको सदेंह हुआ, ये केवल क्रूर विनोद हें मोहसिन इतना उदार नहीं है, लेकिनयह जानकर भी वह उसके पास जाता है। मोहसिन दोने से एक रेवड़ी निकालकर हामिदकी ओर बढ़ाता है। हामिद हाथ फैलाता है। मोहसिन रेवड़ी अपने मुँह में रखलेता है। महमूद नूरे ओर सम्मी खूब तालियॉँ बजा-बजाकर हँसते हैं। हामिदखिसिया जाता है।
मोहसिन—अच्छा, अबकी जरूर देंगे हामिद, अल्लाह कसम, ले जा।
हामिद—रखे रहो। क्या मेरे पास पैसे नहीं है?
सम्मी—तीन ही पेसे तो हैं। तीन पैसे में क्या-क्या लोगें?
महमूद—हमसे गुलाबजामुन ले जाओ हामिद। मोहमिन बदमाश है।
हामिद—मिठाई कौन बड़ी नेमत है। किताब में इसकी कितनी बुराइयॉँ लिखी हैं।
मोहसिन—लेकिन दिन मे कह रहे होगे कि मिले तो खा लें। अपने पैसे क्यों नहीं निकालते?
महमूद—इस समझते हें, इसकी चालाकी। जब हमारे सारे पैसे खर्च हो जाऍंगे, तो हमें ललचा-ललचाकर खाएगा।
मिठाइयोंके बाद कुछ दूकानें लोहे की चीजों की, कुछ गिलट और कुछ नकली गहनों की।लड़कों के लिए यहॉँ कोई आकर्षण न था। वे सब आगे बढ़ जाते हैं, हामिद लोहेकी दुकान पररूक जात हे। कई चिमटे रखे हुए थे। उसे ख्याल आया, दादी के पासचिमटा नहीं है। तबे से रोटियॉँ उतारती हैं, तो हाथ जल जाता है। अगर वहचिमटा ले जाकर दादी को दे दे तो वह कितना प्रसन्न होगी! फिर उनकी ऊगलियॉँकभी न जलेंगी। घर में एक काम की चीज हो जाएगी। खिलौने से क्या फायदा? व्यर्थ में पैसे खराब होते हैं। जरा देर ही तो खुशी होती है। फिर तो खिलौनेको कोई ऑंख उठाकर नहीं देखता। यह तो घर पहुँचते-पहुँचते टूट-फूट बराबर होजाऍंगे। चिमटा कितने काम की चीज है। रोटियॉँ तवे से उतार लो, चूल्हें मेंसेंक लो। कोई आग मॉँगने आये तो चटपट चूल्हे से आग निकालकर उसे दे दो।अम्मॉँ बेचारी को कहॉँ फुरसत हे कि बाजार आऍं और इतने पैसे ही कहॉँ मिलतेहैं? रोज हाथ जला लेती हैं।
हामिद के साथी आगे बढ़ गए हैं। सबील पर सबकेसब शर्बत पी रहे हैं। देखो, सब कतने लालची हैं। इतनी मिठाइयॉँ लीं, मुझेकिसी ने एक भी न दी। उस पर कहते है, मेरे साथ खेलो। मेरा यह काम करों। अबअगर किसी ने कोई काम करने को कहा, तो पूछूँगा। खाऍं मिठाइयॉँ, आप मुँहसड़ेगा, फोड़े-फुन्सियॉं निकलेंगी, आप ही जबान चटोरी हो जाएगी। तब घर सेपैसे चुराऍंगे और मार खाऍंगे। किताब में झूठी बातें थोड़े ही लिखी हें।मेरी जबान क्यों खराब होगी? अम्मॉँ चिमटा देखते ही दौड़कर मेरे हाथ से लेलेंगी और कहेंगी—मेरा बच्चा अम्मॉँ के लिए चिमटा लाया है। कितना अच्छालड़का है। इन लोगों के खिलौने पर कौन इन्हें दुआऍं देगा? बड़ों का दुआऍंसीधे अल्लाह के दरबार में पहुँचती हैं, और तुरंत सुनी जाती हैं। में भीइनसे मिजाज क्यों सहूँ? मैं गरीब सही, किसी से कुछ मॉँगने तो नहीं जाते।आखिर अब्बाजान कभीं न कभी आऍंगे। अम्मा भी ऑंएगी ही। फिर इन लोगों सेपूछूँगा, कितने खिलौने लोगे? एक-एक को टोकरियों खिलौने दूँ और दिखा हूँ किदोस्तों के साथ इस तरह का सलूक किया जात है। यह नहीं कि एक पैसे कीरेवड़ियॉँ लीं, तो चिढ़ा-चिढ़ाकर खाने लगे। सबके सब हँसेंगे कि हामिद नेचिमटा लिया है। हंसें! मेरी बला से! उसने दुकानदार से पूछा—यह चिमटा कितनेका है?
दुकानदार ने उसकी ओर देखा और कोई आदमी साथ न देखकर कहा—तुम्हारे काम का नहीं है जी!
‘बिकाऊ है कि नहीं?’
‘बिकाऊ क्यों नहीं है? और यहॉँ क्यों लाद लाए हैं?’
तो बताते क्यों नहीं, कै पैसे का है?’
‘छ: पैसे लगेंगे।‘
हामिद का दिल बैठ गया।
‘ठीक-ठीक पॉँच पेसे लगेंगे, लेना हो लो, नहीं चलते बनो।‘
हामिद ने कलेजा मजबूत करके कहा तीन पैसे लोगे?
यहकहता हुआ व आगे बढ़ गया कि दुकानदार की घुड़कियॉँ न सुने। लेकिन दुकानदारने घुड़कियॉँ नहीं दी। बुलाकर चिमटा दे दिया। हामिद ने उसे इस तरह कंधे पररखा, मानों बंदूक है और शान से अकड़ता हुआ संगियों के पास आया। जरा सुनें, सबके सब क्या-क्या आलोचनाऍं करते हैं!
मोहसिन ने हँसकर कहा—यह चिमटा क्यों लाया पगले, इसे क्या करेगा?
हामिद ने चिमटे को जमीन पर पटकर कहा—जरा अपना भिश्ती जमीन पर गिरा दो। सारी पसलियॉँ चूर-चूर हो जाऍं बचा की।
महमूद बोला—तो यह चिमटा कोई खिलौना है?
हामिद—खिलौनाक्यों नही है! अभी कन्धे पर रखा, बंदूक हो गई। हाथ में ले लिया, फकीरों काचिमटा हो गया। चाहूँ तो इससे मजीरे काकाम ले सकता हूँ। एक चिमटा जमा दूँ, तो तुम लोगों के सारे खिलौनों की जान निकल जाए। तुम्हारे खिलौने कितना हीजोर लगाऍं, मेरे चिमटे का बाल भी बॉंका नही कर सकतें मेरा बहादुर शेर हैचिमटा।
सम्मी ने खँजरी ली थी। प्रभावित होकर बोला—मेरी खँजरी से बदलोगे? दो आने की है।
हामिदने खँजरी की ओर उपेक्षा से देखा-मेरा चिमटा चाहे तो तुम्हारी खॅजरी का पेटफाड़ डाले। बस, एक चमड़े की झिल्ली लगा दी, ढब-ढब बोलने लगी। जरा-सा पानीलग जाए तो खत्म हो जाए। मेरा बहादुर चिमटा आग में, पानी में, ऑंधी में, तूफान में बराबर डटा खड़ा रहेगा।
चिमटे ने सभी को मोहित कर लिया, अबपैसे किसके पास धरे हैं? फिर मेले से दूर निकल आए हें, नौ कब के बज गए, धूपतेज हो रही है। घर पहुंचने की जल्दी हो रही हे। बाप से जिद भी करें, तोचिमटा नहीं मिल सकता। हामिद है बड़ा चालाक। इसीलिए बदमाश ने अपने पैसे बचारखे थे।
अब बालकों के दो दल हो गए हैं। मोहसिन, महमद, सम्मी और नूरे एकतरफ हैं, हामिद अकेला दूसरी तरफ। शास्त्रर्थ हो रहा है। सम्मी तो विधर्मीहा गया! दूसरे पक्ष से जा मिला, लेकिन मोहनि, महमूद और नूरे भी हामिद सेएक-एक, दो-दो साल बड़े होने पर भी हामिद के आघातों से आतंकित हो उठे हैं।उसके पास न्याय का बल है और नीति की शक्ति। एक ओर मिट्टी है, दूसरी ओरलोहा, जो इस वक्त अपने को फौलाद कह रहा है। वह अजेय है, घातक है। अगर कोईशेर आ जाए मियॉँ भिश्ती के छक्के छूट जाऍं, जो मियॉँ सिपाही मिट्टी कीबंदूक छोड़कर भागे, वकील साहब की नानी मर जाए, चोगे में मुंह छिपाकर जमीनपर लेट जाऍं। मगर यह चिमटा, यह बहादुर, यह रूस्तमे-हिंद लपककर शेर की गरदनपर सवार हो जाएगा और उसकी ऑंखे निकाल लेगा।
मोहसिन ने एड़ी—चोटी का जारे लगाकर कहा—अच्छा, पानी तो नहीं भर सकता?
हामिद ने चिमटे को सीधा खड़ा करके कहा—भिश्ती को एक डांट बताएगा, तो दौड़ा हुआ पानी लाकर उसके द्वार पर छिड़कने लगेगा।
मोहसिनपरास्त हो गया, पर महमूद ने कुमुक पहुँचाई—अगर बचा पकड़ जाऍं तो अदालम मेंबॅधे-बँधे फिरेंगे। तब तो वकील साहब के पैरों पड़ेगे।
हामिद इस प्रबल तर्क का जवाब न दे सका। उसने पूछा—हमें पकड़ने कौने आएगा?
नूरे ने अकड़कर कहा—यह सिपाही बंदूकवाला।
हामिदने मुँह चिढ़ाकर कहा—यह बेचारे हम बहादुर रूस्तमे—हिंद को पकड़ेगें! अच्छालाओ, अभी जरा कुश्ती हो जाए। इसकी सूरत देखकर दूर से भागेंगे। पकड़ेगेंक्या बेचारे!
मोहसिन को एक नई चोट सूझ गई—तुम्हारे चिमटे का मुँह रोज आग में जलेगा।
उसनेसमझा था कि हामिद लाजवाब हो जाएगा, लेकिन यह बात न हुई। हामिद ने तुरंतजवाब दिया—आग में बहादुर ही कूदते हैं जनाब, तुम्हारे यह वकील, सिपाही औरभिश्ती लैडियों की तरह घर में घुस जाऍंगे। आग में वह काम है, जो यहरूस्तमे-हिन्द ही कर सकता है।
महमूद ने एक जोर लगाया—वकील साहबकुरसी—मेज पर बैठेगे, तुम्हारा चिमटा तो बाबरचीखाने में जमीन पर पड़ा रहनेके सिवा और क्या कर सकता है?
इस तर्क ने सम्मी औरनूरे को भी सजी करदिया! कितने ठिकाने की बात कही हे पट्ठे ने! चिमटा बावरचीखाने में पड़ारहने के सिवा और क्या कर सकता है?
हामिद को कोई फड़कता हुआ जवाब न सूझा, तो उसने धॉँधली शुरू की—मेरा चिमटा बावरचीखाने में नही रहेगा। वकील साहबकुर्सी पर बैठेगें, तो जाकर उन्हे जमीन पर पटक देगा और उनका कानून उनके पेटमें डाल देगा।
बात कुछ बनी नही। खाल गाली-गलौज थी, लेकिन कानून को पेटमें डालनेवाली बात छा गई। ऐसी छा गई कि तीनों सूरमा मुँह ताकते रह गए मानोकोई धेलचा कानकौआ किसी गंडेवाले कनकौए को काट गया हो। कानून मुँह से बाहरनिकलने वाली चीज हे। उसको पेट के अन्दर डाल दिया जाना बेतुकी-सी बात होनेपर भी कुछ नयापन रखती हे। हामिद ने मैदान मार लिया। उसका चिमटारूस्तमे-हिन्द हे। अब इसमें मोहसिन, महमूद नूरे, सम्मी किसी को भी आपत्तिनहीं हो सकती।
विजेता को हारनेवालों से जो सत्कार मिलना स्वाभविक है, वहहामिद को भी मिल। औरों ने तीन-तीन, चार-चार आने पैसे खर्च किए, पर कोई कामकी चीज न ले सके। हामिद ने तीन पैसे में रंग जमा लिया। सच ही तो है, खिलौनों का क्या भरोसा? टूट-फूट जाऍंगी। हामिद का चिमटा तो बना रहेगाबरसों?
संधि की शर्ते तय होने लगीं। मोहसिन ने कहा—जरा अपना चिमटा दो, हम भी देखें। तुम हमार भिश्ती लेकर देखो।
महमूद और नूरे ने भी अपने-अपने खिलौने पेश किए।
हामिदको इन शर्तो को मानने में कोई आपत्ति न थी। चिमटा बारी-बारी से सबके हाथमें गया, और उनके खिलौने बारी-बारी से हामिद के हाथ में आए। कितने खूबसूरतखिलौने हैं।
हामिद ने हारने वालों के ऑंसू पोंछे—मैं तुम्हे चिढ़ा रहाथा, सच! यह चिमटा भला, इन खिलौनों की क्या बराबर करेगा, मालूम होता है, अबबोले, अब बोले।
लेकिन मोहसनि की पार्टी को इस दिलासे से संतोष नहींहोता। चिमटे का सिल्का खूब बैठ गया है। चिपका हुआ टिकट अब पानी से नहीं छूटरहा है।
मोहसिन—लेकिन इन खिलौनों के लिए कोई हमें दुआ तो न देगा?
महमूद—दुआ को लिय फिरते हो। उल्टे मार न पड़े। अम्मां जरूर कहेंगी कि मेले में यही मिट्टी के खिलौने मिले?
हामिदको स्वीकार करना पड़ा कि खिलौनों को देखकर किसी की मां इतनी खुश न होगी, जितनी दादी चिमटे को देखकर होंगी। तीन पैसों ही में तो उसे सब-कुछ करना थाओर उन पैसों के इस उपयों पर पछतावे की बिल्कुल जरूरत न थी। फिर अब तो चिमटारूस्तमें—हिन्द हे ओर सभी खिलौनों का बादशाह।
रास्ते में महमूद को भूखलगी। उसके बाप ने केले खाने को दियें। महमून ने केवल हामिद को साझी बनाया।उसके अन्य मित्र मुंह ताकते रह गए। यह उस चिमटे का प्रसाद थां।

                                                   3

ग्यारहबजे गॉँव में हलचल मच गई। मेलेवाले आ गए। मोहसिन की छोटी बहन दौड़करभिश्ती उसके हाथ से छीन लिया और मारे खुशी के जा उछली, तो मियॉं भिश्तीनीचे आ रहे और सुरलोक सिधारे। इस पर भाई-बहन में मार-पीट हुई। दानों खुबरोए। उसकी अम्मॉँ यह शोर सुनकर बिगड़ी और दोनों को ऊपर से दो-दो चॉँटे औरलगाए।
मियॉँ नूरे के वकील का अंत उनके प्रतिष्ठानुकूल इससे ज्यादागौरवमय हुआ। वकील जमीन पर या ताक पर हो नहीं बैठ सकता। उसकी मर्यादा काविचार तो करना ही होगा। दीवार में खूँटियाँ गाड़ी गई। उन पर लकड़ी का एकपटरा रखा गया। पटरे पर कागज का कालीन बिदाया गया। वकील साहब राजा भोज कीभाँति सिंहासन पर विराजे। नूरे ने उन्हें पंखा झलना शुरू किया। आदालतों मेंखर की टट्टियॉँ और बिजली के पंखे रहते हें। क्या यहॉँ मामूली पंखा भी नहो! कानून की गर्मी दिमाग पर चढ़ जाएगी कि नहीं? बॉँस कापंखा आया ओर नूरेहवा करने लगें मालूम नहीं, पंखे की हवा से या पंखे की चोट से वकील साहबस्वर्गलोक से मृत्युलोक में आ रहे और उनका माटी का चोला माटी में मिल गया!फिर बड़े जोर-शोर से मातम हुआ और वकील साहब की अस्थि घूरे पर डाल दी गई।
अबरहा महमूद का सिपाही। उसे चटपट गॉँव का पहरा देने का चार्ज मिल गया, लेकिनपुलिस का सिपाही कोई साधारण व्यक्ति तो नहीं, जो अपने पैरों चलें वह पालकीपर चलेगा। एक टोकरी आई, उसमें कुछ लाल रंग के फटे-पुराने चिथड़े बिछाए गएजिसमें सिपाही साहब आराम से लेटे। नूरे ने यह टोकरी उठाई और अपने द्वार काचक्कर लगाने लगे। उनके दोनों छोटे भाई सिपाही की तरह ‘छोनेवाले, जागते लहो’ पुकारते चलते हें। मगर रात तो अँधेरी होनी चाहिए, नूरे को ठोकर लग जातीहै। टोकरी उसके हाथ से छूटकर गिर पड़ती है और मियॉँ सिपाही अपनी बन्दूकलिये जमीन पर आ जाते हैं और उनकी एक टॉँग में विकार आ जाता है।
महमूद कोआज ज्ञात हुआ कि वह अच्छा डाक्टर है। उसको ऐसा मरहम मिला गया है जिससे वहटूटी टॉँग को आनन-फानन जोड़ सकता हे। केवल गूलर का दूध चाहिए। गूलर का दूधआता है। टाँग जावब दे देती है। शल्य-क्रिया असफल हुई, तब उसकी दूसरी टाँगभी तोड़ दी जाती है। अब कम-से-कम एक जगह आराम से बैठ तो सकता है। एक टॉँगसे तो न चल सकता था, न बैठ सकता था। अब वह सिपाही संन्यासी हो गया है। अपनीजगह पर बैठा-बैठा पहरा देता है। कभी-कभी देवता भी बन जाता है। उसके सिर काझालरदार साफा खुरच दिया गया है। अब उसका जितना रूपांतर चाहों, कर सकते हो।कभी-कभी तो उससे बाट का काम भी लिया जाता है।
अब मियॉँ हामिद का हालसुनिए। अमीना उसकी आवाज सुनते ही दौड़ी और उसे गोद में उठाकर प्यार करनेलगी। सहसा उसके हाथ में चिमटा देखकर वह चौंकी।
‘यह चिमटा कहॉं था?’
‘मैंने मोल लिया है।‘
‘कै पैसे में?
‘तीन पैसे दिये।‘
अमीनाने छाती पीट ली। यह कैसा बेसमझ लड़का है कि दोपहर हुआ, कुछ खाया न पिया।लाया क्या, चिमटा!‘सारे मेले में तुझे और कोई चीज न मिली, जो यह लोहे काचिमटा उठा लाया?’
हामिद ने अपराधी-भाव से कहा—तुम्हारी उँगलियॉँ तवे से जल जाती थीं, इसलिए मैने इसे लिया।
बुढ़ियाका क्रोध तुरन्त स्नेह में बदल गया, और स्नेह भी वह नहीं, जो प्रगल्भ होताहे और अपनी सारी कसक शब्दों में बिखेर देता है। यह मूक स्नेह था, खूब ठोस, रस और स्वाद से भरा हुआ। बच्चे में कितना व्याग, कितना सदभाव और कितनाविवेक है! दूसरों को खिलौने लेते और मिठाई खाते देखकर इसका मन कितना ललचायाहोगा? इतना जब्त इससे हुआ कैसे? वहॉँ भी इसे अपनी बुढ़िया दादी की याद बनीरही। अमीना का मन गदगद हो गया।
और अब एक बड़ी विचित्र बात हुई। हामिदकें इस चिमटे से भी विचित्र। बच्चे हामिद ने बूढ़े हामिद का पार्ट खेला था।बुढ़िया अमीना बालिका अमीना बन गई। वह रोने लगी। दामन फैलाकर हामिद कोदुआऍं देती जाती थी और आँसूं की बड़ी-बड़ी बूंदे गिराती जाती थी। हामिदइसका रहस्य क्या समझता!

 

बड़े घर की बेटी - प्रेमचंद

                                              1

बेनीमाधव सिंह गौरीपुर गॉँव के जमींदार और नम्बरदार थे। उनके पितामहकिसी समय बड़े धन-धान्य संपन्न थे। गॉँव का पक्का तालाब और मंदिर जिनकी अबमरम्मत भी मुश्किल थी, उन्हीं के कीर्ति-स्तंभ थे। कहते हैं इस दरवाजे परहाथी झूमता था, अब उसकी जगह एक बूढ़ी भैंस थी, जिसके शरीर में अस्थि-पंजरके सिवा और कुछ शेष न रहा था; पर दूध शायद बहुत देती थी; क्योंकि एक न एकआदमी हॉँड़ी लिए उसके सिर पर सवार ही रहता था। बेनीमाधव सिंह अपनी आधी सेअधिक संपत्ति वकीलों को भेंट कर चुके थे। उनकी वर्तमान आय एक हजार रुपयेवार्षिक से अधिक न थी। ठाकुर साहब के दो बेटे थे। बड़े का नाम श्रीकंठ सिंहथा। उसने बहुत दिनों के परिश्रम और उद्योग के बाद बी.ए. की डिग्री प्राप्तकी थी। अब एक दफ्तर में नौकर था। छोटा लड़का लाल-बिहारी सिंह दोहरे बदनका, सजीला जवान था। भरा हुआ मुखड़ा,चौड़ी छाती। भैंस का दो सेर ताजा दूध वहउठ कर सबेरे पी जाता था। श्रीकंठ सिंह की दशा बिलकुल विपरीत थी। इननेत्रप्रिय गुणों को उन्होंने बी०ए०--इन्हीं दो अक्षरों पर न्योछावर करदिया था। इन दो अक्षरों ने उनके शरीर को निर्बल और चेहरे को कांतिहीन बनादिया था। इसी से वैद्यक ग्रंथों पर उनका विशेष प्रेम था। आयुर्वेदिकऔषधियों पर उनका अधिक विश्वास था। शाम-सबेरे उनके कमरे से प्राय: खरल कीसुरीली कर्णमधुर ध्वनि सुनायी दिया करती थी। लाहौर और कलकत्ते के वैद्योंसे बड़ी लिखा-पढ़ी रहती थी।

श्रीकंठ इस अँगरेजी डिग्री के अधिपति होनेपर भी अँगरेजी सामाजिक प्रथाओं के विशेष प्रेमी न थे; बल्कि वह बहुधा बड़ेजोर से उसकी निंदा और तिरस्कार किया करते थे। इसी से गॉँव में उनका बड़ासम्मान था। दशहरे के दिनों में वह बड़े उत्साह से रामलीला होते और स्वयंकिसी न किसी पात्र का पार्ट लेते थे। गौरीपुर में रामलीला के वही जन्मदाताथे। प्राचीन हिंदू सभ्यता का गुणगान उनकी धार्मिकता का प्रधान अंग था।सम्मिलित कुटुम्ब के तो वह एक-मात्र उपासक थे। आज-कल स्त्रियों को कुटुम्बको कुटुम्ब में मिल-जुल कर रहने की जो अरुचि होती है, उसे वह जाति और देशदोनों के लिए हानिकारक समझते थे। यही कारण था कि गॉँव की ललनाऍं उनकी निंदकथीं ! कोई-कोई तो उन्हें अपना शत्रु समझने में भी संकोच न करती थीं !स्वयं उनकी पत्नी को ही इस विषय में उनसे विरोध था। यह इसलिए नहीं कि उसेअपने सास-ससुर, देवर या जेठ आदि घृणा थी; बल्कि उसका विचार था कि यदि बहुतकुछ सहने और तरह देने पर भी परिवार के साथ निर्वाह न हो सके, तो आये-दिन कीकलह से जीवन को नष्ट करने की अपेक्षा यही उत्तम है कि अपनी खिचड़ी अलगपकायी जाय।
आनंदी एक बड़े उच्च कुल की लड़की थी। उसके बाप एक छोटी-सीरियासत के ताल्लुकेदार थे। विशाल भवन, एक हाथी, तीन कुत्ते, बाज, बहरी-शिकरे, झाड़-फानूस, आनरेरी मजिस्ट्रेट और ऋण, जो एक प्रतिष्ठितताल्लुकेदार के भोग्य पदार्थ हैं, सभी यहॉँ विद्यमान थे। नाम था भूपसिंह।बड़े उदार-चित्त और प्रतिभाशाली पुरुष थे; पर दुर्भाग्य से लड़का एक भी नथा। सात लड़कियॉँ हुईं और दैवयोग से सब की सब जीवित रहीं। पहली उमंग में तोउन्होंने तीन ब्याह दिल खोलकर किये; पर पंद्रह-बीस हजार रुपयों का कर्जसिर पर हो गया, तो ऑंखें खुलीं, हाथ समेट लिया। आनंदी चौथी लड़की थी। वहअपनी सब बहनों से अधिक रूपवती और गुणवती थी। इससे ठाकुर भूपसिंह उसे बहुतप्यार करते थे। सुन्दर संतान को कदाचित् उसके माता-पिता भी अधिक चाहते हैं।ठाकुर साहब बड़े धर्म-संकट में थे कि इसका विवाह कहॉँ करें? न तो यहीचाहते थे कि ऋण का बोझ बढ़े और न यही स्वीकार था कि उसे अपने को भाग्यहीनसमझना पड़े। एक दिन श्रीकंठ उनके पास किसी चंदे का रुपया मॉँगने आये। शायदनागरी-प्रचार का चंदा था। भूपसिंह उनके स्वभाव पर रीझ गये और धूमधाम सेश्रीकंठसिंह का आनंदी के साथ ब्याह हो गया।
आनंदी अपने नये घर में आयी, तो यहॉँ का रंग-ढंग कुछ और ही देखा। जिस टीम-टाम की उसे बचपन से ही आदतपड़ी हुई थी, वह यहां नाम-मात्र को भी न थी। हाथी-घोड़ों का तो कहना हीक्या, कोई सजी हुई सुंदर बहली तक न थी। रेशमी स्लीपर साथ लायी थी; पर यहॉँबाग कहॉँ। मकान में खिड़कियॉँ तक न थीं, न जमीन पर फर्श, न दीवार परतस्वीरें। यह एक सीधा-सादा देहाती गृहस्थी का मकान था; किन्तु आनंदी नेथोड़े ही दिनों में अपने को इस नयी अवस्था के ऐसा अनुकूल बना लिया, मानोंउसने विलास के सामान कभी देखे ही न थे।


                                                  २
एक दिन दोपहर के समयलालबिहारी सिंह दो चिड़िया लिये हुए आया और भावज से बोला--जल्दी से पका दो, मुझे भूख लगी है। आनंदी भोजन बनाकर उसकी राह देख रही थी। अब वह नया व्यंजनबनाने बैठी। हांड़ी में देखा, तो घी पाव-भर से अधिक न था। बड़े घर कीबेटी, किफायत क्या जाने। उसने सब घी मांस में डाल दिया। लालबिहारी खानेबैठा, तो दाल में घी न था, बोला-दाल में घी क्यों नहीं छोड़ा?
आनंदी ने कहा--घी सब मॉँस में पड़ गया। लालबिहारी जोर से बोला--अभी परसों घी आया है। इतना जल्द उठ गया?
आनंदी ने उत्तर दिया--आज तो कुल पाव--भर रहा होगा। वह सब मैंने मांस में डाल दिया।
जिसतरह सूखी लकड़ी जल्दी से जल उठती है, उसी तरह क्षुधा से बावला मनुष्यजरा-जरा सी बात पर तिनक जाता है। लालबिहारी को भावज की यह ढिठाई बहुत बुरीमालूम हुई, तिनक कर बोला--मैके में तो चाहे घी की नदी बहती हो !
स्त्रीगालियॉँ सह लेती हैं, मार भी सह लेती हैं; पर मैके की निंदा उनसे नहीं सहीजाती। आनंदी मुँह फेर कर बोली--हाथी मरा भी, तो नौ लाख का। वहॉँ इतना घीनित्य नाई-कहार खा जाते हैं।
लालबिहारी जल गया, थाली उठाकर पलट दी, और बोला--जी चाहता है, जीभ पकड़ कर खींच लूँ।
आनंद को भी क्रोध आ गया। मुँह लाल हो गया, बोली--वह होते तो आज इसका मजा चखाते।
अबअपढ़, उजड्ड ठाकुर से न रहा गया। उसकी स्त्री एक साधारण जमींदार की बेटीथी। जब जी चाहता, उस पर हाथ साफ कर लिया करता था। खड़ाऊँ उठाकर आनंदी की ओरजोर से फेंकी, और बोला--जिसके गुमान पर भूली हुई हो, उसे भी देखूँगा औरतुम्हें भी।
आनंदी ने हाथ से खड़ाऊँ रोकी, सिर बच गया; पर अँगली मेंबड़ी चोट आयी। क्रोध के मारे हवा से हिलते पत्ते की भॉँति कॉँपती हुई अपनेकमरे में आ कर खड़ी हो गयी। स्त्री का बल और साहस, मान और मर्यादा पति तकहै। उसे अपने पति के ही बल और पुरुषत्व का घमंड होता है। आनंदी खून का घूँटपी कर रह गयी।
                                               ३
श्रीकंठ सिंह शनिवार को घर आया करते थे। वृहस्पतिको यह घटना हुई थी। दो दिन तक आनंदी कोप-भवन में रही। न कुछ खाया न पिया, उनकी बाट देखती रही। अंत में शनिवार को वह नियमानुकूल संध्या समय घर आये औरबाहर बैठ कर कुछ इधर-उधर की बातें, कुछ देश-काल संबंधी समाचार तथा कुछ नयेमुकदमों आदि की चर्चा करने लगे। यह वार्तालाप दस बजे रात तक होता रहा।गॉँव के भद्र पुरुषों को इन बातों में ऐसा आनंद मिलता था कि खाने-पीने कीभी सुधि न रहती थी। श्रीकंठ को पिंड छुड़ाना मुश्किल हो जाता था। ये दो-तीनघंटे आनंदी ने बड़े कष्ट से काटे ! किसी तरह भोजन का समय आया। पंचायत उठी।एकांत हुआ, तो लालबिहारी ने कहा--भैया, आप जरा भाभी को समझा दीजिएगा किमुँह सँभाल कर बातचीत किया करें, नहीं तो एक दिन अनर्थ हो जायगा।
बेनीमाधव सिंह ने बेटे की ओर साक्षी दी--हॉँ, बहू-बेटियों का यह स्वभाव अच्छा नहीं कि मर्दों के मूँह लगें।
लालबिहारी--वह बड़े घर की बेटी हैं, तो हम भी कोई कुर्मी-कहार नहीं है। श्रीकंठ ने चिंतित स्वर से पूछा--आखिर बात क्या हुई?
लालबिहारी ने कहा--कुछ भी नहीं; यों ही आप ही आप उलझ पड़ीं। मैके के सामने हम लोगों को कुछ समझती ही नहीं।
श्रीकंठ खा-पीकर आनंदी के पास गये। वह भरी बैठी थी। यह हजरत भी कुछ तीखे थे। आनंदी ने पूछा--चित्त तो प्रसन्न है।
श्रीकंठ बोले--बहुत प्रसन्न है; पर तुमने आजकल घर में यह क्या उपद्रव मचा रखा है?
आनंदीकी त्योरियों पर बल पड़ गये, झुँझलाहट के मारे बदन में ज्वाला-सी दहक उठी।बोली--जिसने तुमसे यह आग लगायी है, उसे पाऊँ, मुँह झुलस दूँ।
श्रीकंठ--इतनी गरम क्यों होती हो, बात तो कहो।
आनंदी--क्याकहूँ, यह मेरे भाग्य का फेर है ! नहीं तो गँवार छोकरा, जिसको चपरासगिरीकरने का भी शऊर नहीं, मुझे खड़ाऊँ से मार कर यों न अकड़ता।
श्रीकंठ--सब हाल साफ-साफ कहा, तो मालूम हो। मुझे तो कुछ पता नहीं।
आनंदी--परसोंतुम्हारे लाड़ले भाई ने मुझसे मांस पकाने को कहा। घी हॉँडी में पाव-भर सेअधिक न था। वह सब मैंने मांस में डाल दिया। जब खाने बैठा तो कहने लगा--दलमें घी क्यों नहीं है? बस, इसी पर मेरे मैके को बुरा-भला कहने लगा--मुझसे नरहा गया। मैंने कहा कि वहॉँ इतना घी तो नाई-कहार खा जाते हैं, और किसी कोजान भी नहीं पड़ता। बस इतनी सी बात पर इस अन्यायी ने मुझ पर खड़ाऊँ फेंकमारी। यदि हाथ से न रोक लूँ, तो सिर फट जाय। उसी से पूछो, मैंने जो कुछ कहाहै, वह सच है या झूठ।
श्रीकंठ की ऑंखें लाल हो गयीं। बोले--यहॉँ तक होगया, इस छोकरे का यह साहस ! आनंदी स्त्रियों के स्वभावानुसार रोने लगी; क्योंकि ऑंसू उनकी पलकों पर रहते हैं। श्रीकंठ बड़े धैर्यवान् और शांतिपुरुष थे। उन्हें कदाचित् ही कभी क्रोध आता था; स्त्रियों के ऑंसू पुरुष कीक्रोधाग्नि भड़काने में तेल का काम देते हैं। रात भर करवटें बदलते रहे।उद्विग्नता के कारण पलक तक नहीं झपकी। प्रात:काल अपने बाप के पास जाकरबोले--दादा, अब इस घर में मेरा निबाह न होगा।
इस तरह की विद्रोह-पूर्णबातें कहने पर श्रीकंठ ने कितनी ही बार अपने कई मित्रों को आड़े हाथों लियाथा; परन्तु दुर्भाग्य, आज उन्हें स्वयं वे ही बातें अपने मुँह से कहनीपड़ी ! दूसरों को उपदेश देना भी कितना सहज है!
बेनीमाधव सिंह घबरा उठे और बोले--क्यों?
श्रीकंठ--इसलिएकि मुझे भी अपनी मान--प्रतिष्ठा का कुछ विचार है। आपके घर में अब अन्यायऔर हठ का प्रकोप हो रहा है। जिनको बड़ों का आदर--सम्मान करना चाहिए, वेउनके सिर चढ़ते हैं। मैं दूसरे का नौकर ठहरा घर पर रहता नहीं। यहॉँ मेरेपीछे स्त्रियों पर खड़ाऊँ और जूतों की बौछारें होती हैं। कड़ी बात तकचिन्ता नहीं। कोई एक की दो कह ले, वहॉँ तक मैं सह सकता हूँ किन्तु यह कदापिनहीं हो सकता कि मेरे ऊपर लात-घूँसे पड़ें और मैं दम न मारुँ।
बेनीमाधवसिंह कुछ जवाब न दे सके। श्रीकंठ सदैव उनका आदर करते थे। उनके ऐसे तेवरदेखकर बूढ़ा ठाकुर अवाक् रह गया। केवल इतना ही बोला--बेटा, तुम बुद्धिमानहोकर ऐसी बातें करते हो? स्त्रियॉं इस तरह घर का नाश कर देती है। उनको बहुतसिर चढ़ाना अच्छा नहीं।
श्रीकंठ--इतना मैं जानता हूँ, आपके आशीर्वाद सेऐसा मूर्ख नहीं हूँ। आप स्वयं जानते हैं कि मेरे ही समझाने-बुझाने से, इसीगॉँव में कई घर सँभल गये, पर जिस स्त्री की मान-प्रतिष्ठा का ईश्वर केदरबार में उत्तरदाता हूँ, उसके प्रति ऐसा घोर अन्याय और पशुवत् व्यवहारमुझे असह्य है। आप सच मानिए, मेरे लिए यही कुछ कम नहीं है कि लालबिहारी कोकुछ दंड नहीं होता।
अब बेनीमाधव सिंह भी गरमाये। ऐसी बातें और न सुनसके। बोले--लालबिहारी तुम्हारा भाई है। उससे जब कभी भूल--चूक हो, उसके कानपकड़ो लेकिन.
श्रीकंठ—लालबिहारी को मैं अब अपना भाई नहीं समझता।
बेनीमाधव सिंह--स्त्री के पीछे?
श्रीकंठ—जी नहीं, उसकी क्रूरता और अविवेक के कारण।
दोनोंकुछ देर चुप रहे। ठाकुर साहब लड़के का क्रोध शांत करना चाहते थे, लेकिन यहनहीं स्वीकार करना चाहते थे कि लालबिहारी ने कोई अनुचित काम किया है। इसीबीच में गॉँव के और कई सज्जन हुक्के-चिलम के बहाने वहॉँ आ बैठे। कईस्त्रियों ने जब यह सुना कि श्रीकंठ पत्नी के पीछे पिता से लड़ने की तैयारहैं, तो उन्हें बड़ा हर्ष हुआ। दोनों पक्षों की मधुर वाणियॉँ सुनने के लिएउनकी आत्माऍं तिलमिलाने लगीं। गॉँव में कुछ ऐसे कुटिल मनुष्य भी थे, जो इसकुल की नीतिपूर्ण गति पर मन ही मन जलते थे। वे कहा करते थे—श्रीकंठ अपनेबाप से दबता है, इसीलिए वह दब्बू है। उसने विद्या पढ़ी, इसलिए वह किताबोंका कीड़ा है। बेनीमाधव सिंह उसकी सलाह के बिना कोई काम नहीं करते, यह उनकीमूर्खता है। इन महानुभावों की शुभकामनाऍं आज पूरी होती दिखायी दीं। कोईहुक्का पीने के बहाने और कोई लगान की रसीद दिखाने आ कर बैठ गया। बेनीमाधवसिंह पुराने आदमी थे। इन भावों को ताड़ गये। उन्होंने निश्चय किया चाहे कुछही क्यों न हो, इन द्रोहियों को ताली बजाने का अवसर न दूँगा। तुरंत कोमलशब्दों में बोले--बेटा, मैं तुमसे बाहर नहीं हूँ। तम्हारा जो जी चाहे करो, अब तो लड़के से अपराध हो गया।
इलाहाबाद का अनुभव-रहित झल्लाया हुआग्रेजुएट इस बात को न समझ सका। उसे डिबेटिंग-क्लब में अपनी बात पर अड़ने कीआदत थी, इन हथकंडों की उसे क्या खबर? बाप ने जिस मतलब से बात पलटी थी, वहउसकी समझ में न आया। बोला—लालबिहारी के साथ अब इस घर में नहीं रह सकता।
बेनीमाधव—बेटा, बुद्धिमान लोग मूर्खों की बात पर ध्यान नहीं देते। वह बेसमझ लड़का है।उससे जो कुछ भूल हुई, उसे तुम बड़े होकर क्षमा करो।
श्रीकंठ—उसकी इसदुष्टता को मैं कदापि नहीं सह सकता। या तो वही घर में रहेगा, या मैं ही।आपको यदि वह अधिक प्यारा है, तो मुझे विदा कीजिए, मैं अपना भार आप सॅंभाललूँगा। यदि मुझे रखना चाहते हैं तो उससे कहिए, जहॉँ चाहे चला जाय। बस यहमेरा अंतिम निश्चय है।
लालबिहारी सिंह दरवाजे की चौखट पर चुपचाप खड़ाबड़े भाई की बातें सुन रहा था। वह उनका बहुत आदर करता था। उसे कभी इतनासाहस न हुआ था कि श्रीकंठ के सामने चारपाई पर बैठ जाय, हुक्का पी ले या पानखा ले। बाप का भी वह इतना मान न करता था। श्रीकंठ का भी उस पर हार्दिकस्नेह था। अपने होश में उन्होंने कभी उसे घुड़का तक न था। जब वह इलाहाबादसे आते, तो उसके लिए कोई न कोई वस्तु अवश्य लाते। मुगदर की जोड़ी उन्होंनेही बनवा दी थी। पिछले साल जब उसने अपने से ड्यौढ़े जवान को नागपंचमी के दिनदंगल में पछाड़ दिया, तो उन्होंने पुलकित होकर अखाड़े में ही जा कर उसेगले लगा लिया था, पॉँच रुपये के पैसे लुटाये थे। ऐसे भाई के मुँह से आज ऐसीहृदय-विदारक बात सुनकर लालबिहारी को बड़ी ग्लानि हुई। वह फूट-फूट कर रोनेलगा। इसमें संदेह नहीं कि अपने किये पर पछता रहा था। भाई के आने से एक दिनपहले से उसकी छाती धड़कती थी कि देखूँ भैया क्या कहते हैं। मैं उनके सम्मुखकैसे जाऊँगा, उनसे कैसे बोलूँगा, मेरी ऑंखें उनके सामने कैसे उठेगी। उसनेसमझा था कि भैया मुझे बुलाकर समझा देंगे। इस आशा के विपरीत आज उसने उन्हेंनिर्दयता की मूर्ति बने हुए पाया। वह मूर्ख था। परंतु उसका मन कहता था किभैया मेरे साथ अन्याय कर रहे हैं। यदि श्रीकंठ उसे अकेले में बुलाकर दो-चारबातें कह देते; इतना ही नहीं दो-चार तमाचे भी लगा देते तो कदाचित् उसेइतना दु:ख न होता; पर भाई का यह कहना कि अब मैं इसकी सूरत नहीं देखनाचाहता, लालबिहारी से सहा न गया ! वह रोता हुआ घर आया। कोठारी में जा करकपड़े पहने, ऑंखें पोंछी, जिसमें कोई यह न समझे कि रोता था। तब आनंदी केद्वार पर आकर बोला—भाभी, भैया ने निश्चय किया है कि वह मेरे साथ इस घर में नरहेंगे। अब वह मेरा मुँह नहीं देखना चाहते; इसलिए अब मैं जाता हूँ। उन्हेंफिर मुँह न दिखाऊँगा ! मुझसे जो कुछ अपराध हुआ, उसे क्षमा करना।
यह कहते-कहते लालबिहारी का गला भर आया।

                                                    ४
जिससमय लालबिहारी सिंह सिर झुकाये आनंदी के द्वार पर खड़ था, उसी समय श्रीकंठसिंह भी ऑंखें लाल किये बाहर से आये। भाई को खड़ा देखा, तो घृणा से ऑंखेंफेर लीं, और कतरा कर निकल गये। मानों उसकी परछाही से दूर भागते हों।
आनंदीने लालबिहारी की शिकायत तो की थी, लेकिन अब मन में पछता रही थी वह स्वभावसे ही दयावती थी। उसे इसका तनिक भी ध्यान न था कि बात इतनी बढ़ जायगी। वहमन में अपने पति पर झुँझला रही थी कि यह इतने गरम क्यों होते हैं। उस पर यहभय भी लगा हुआ था कि कहीं मुझसे इलाहाबाद चलने को कहें, तो कैसे क्याकरुँगी। इस बीच में जब उसने लालबिहारी को दरवाजे पर खड़े यह कहते सुना किअब मैं जाता हूँ, मुझसे जो कुछ अपराध हुआ, क्षमा करना, तो उसका रहा-सहाक्रोध भी पानी हो गया। वह रोने लगी। मन का मैल धोने के लिए नयन-जल सेउपयुक्त और कोई वस्तु नहीं है।
श्रीकंठ को देखकर आनंदी ने कहा—लाला बाहर खड़े बहुत रो रहे हैं।
श्रीकंठ--तो मैं क्या करूँ?
आनंदी—भीतर बुला लो। मेरी जीभ में आग लगे ! मैंने कहॉँ से यह झगड़ा उठाया।
श्रीकंठ--मैं न बुलाऊँगा।
आनंदी--पछताओगे। उन्हें बहुत ग्लानि हो गयी है, ऐसा न हो, कहीं चल दें।
श्रीकंठन उठे। इतने में लालबिहारीने फिर कहा--भाभी, भैया से मेरा प्रणाम कह दो।वह मेरा मुँह नहीं देखना चाहते; इसलिए मैं भी अपना मुँह उन्हें न दिखाऊँगा।
लालबिहारीइतना कह कर लौट पड़ा, और शीघ्रता से दरवाजे की ओर बढ़ा। अंत में आनंदीकमरे से निकली और उसका हाथ पकड़ लिया। लालबिहारी ने पीछे फिर कर देखा औरऑंखों में ऑंसू भरे बोला--मुझे जाने दो।
आनंदी कहॉँ जाते हो?
लालबिहारी--जहॉँ कोई मेरा मुँह न देखे।
आनंदी—मैं न जाने दूँगी?
लालबिहारी—मैं तुम लोगों के साथ रहने योग्य नहीं हूँ।
आनंदी—तुम्हें मेरी सौगंध अब एक पग भी आगे न बढ़ाना।
लालबिहारी—जब तक मुझे यह न मालूम हो जाय कि भैया का मन मेरी तरफ से साफ हो गया, तब तक मैं इस घर में कदापि न रहूँगा।
आनंदी—मैं ईश्वर को साक्षी दे कर कहती हूँ कि तुम्हारी ओर से मेरे मन में तनिक भी मैल नहीं है।
अबश्रीकंठ का हृदय भी पिघला। उन्होंने बाहर आकर लालबिहारी को गले लगा लिया।दोनों भाई खूब फूट-फूट कर रोये। लालबिहारी ने सिसकते हुए कहा—भैया, अब कभीमत कहना कि तुम्हारा मुँह न देखूँगा। इसके सिवा आप जो दंड देंगे, मैं सहर्षस्वीकार करूँगा।
श्रीकंठ ने कॉँपते हुए स्वर में कहा--लल्लू ! इन बातों को बिल्कुल भूल जाओ। ईश्वर चाहेगा, तो फिर ऐसा अवसर न आवेगा।
बेनीमाधवसिंह बाहर से आ रहे थे। दोनों भाइयों को गले मिलते देखकर आनंद से पुलकितहो गये। बोल उठे—बड़े घर की बेटियॉँ ऐसी ही होती हैं। बिगड़ता हुआ काम बनालेती हैं।
गॉँव में जिसने यह वृत्तांत सुना, उसी ने इन शब्दों में आनंदी की उदारता को सराहा—‘बड़े घर की बेटियॉँ ऐसी ही होती हैं।‘

 

नशा - प्रेमचंद

ईश्‍वरी एक बडे जमींदार का लड़का था और मैं गरीब क्‍लर्क था, जिसके पासमेहनत-मजूरी के सिवा और कोई जायदाद न थी। हम दोनों में परस्‍पर बहसें होतीरहती थीं। मैं जमींदारी की बुराई करता, उन्‍हें हिंसक पशु और खून चूसनेवाली जोंक और वृक्षों की चोटी पर फूलने वाला बंझा कहता। वह जमींदारों कापक्ष लेता, पर स्‍वभावत: उसका पहलू कुछ कमजोर होता था, क्‍योंकि उसके पासजमींदारों के अनुकूल कोई दलील न थी। वह कहता कि सभी मनुष्‍य बराबर नहींहाते, छोटे-बडे हमेशा होते रहेंगे। लचर दलील थी। किसी मानुषीय या नैतिकनियम से इस व्‍यवस्‍था का औचित्‍य सिद्ध करना कठिन था। मैं इस वाद-विवाद कीगर्मी-गर्मी में अक्‍सर तेज हो जाता और लगने वाली बात कह जाता, लेकिनईश्‍वरी हारकर भी मुस्‍कराता रहता था मैंने उसे कभी गर्म होते नहीं देखा।शायद इसका कारण यह था कि वह अपने पक्ष की कमजोरी समझता था।

नौकरों से वह सीधे मुंह बात नहीं करता था। अमीरों में जो एक बेदर्दी और उद्दण्ता होतीहै, इसमें उसे भी प्रचुर भाग मिला था। नौकर ने बिस्‍तर लगाने में जरा भीदेर की, दूध जरूरत से ज्‍यादा गर्म या ठंडा हुआ, साइकिल अच्‍छी तरह साफनहीं हुई, तो वह आपे से बाहर हो जाता। सुस्‍ती या बदतमीजी उसे जरा भीबरदाश्‍त न थी, पर दोस्‍तों से और विशेषकर मुझसे उसका व्‍यवहार सौहार्द औरनम्रता से भरा हुआ होता था। शायद उसकी जगह मैं होता, तो मुझसे भी वहींकठोरताएं पैदा हो जातीं, जो उसमें थीं, क्‍योंकि मेरा लोकप्रेम सिद्धांतोंपर नहीं, निजी दशाओं पर टिका हुआ था, लेकिन वह मेरी जगह होकर भी शायद अमीरही रहता, क्‍योंकि वह प्रकृति से ही विलासी और ऐश्‍वर्य-प्रिय था।
अबकीदशहरे की छुट्टियों में मैंने निश्‍चय किया कि घर न जाऊंगा। मेरे पास किराएके लिए रूपये न थे और न घरवालों को तकलीफ देना चाहता था। मैं जानता हूं, वे मुझे जो कुछ देते हैं, वह उनकी हैसियत से बहुत ज्‍यादा है, उसके साथ हीपरीक्षा का ख्‍याल था। अभी बहुत कुछ पढना है, बोर्डिग हाउस में भूत की तरहअकेले पड़े रहने को भी जी न चाहता था। इसलिए जब ईश्‍वरी ने मुझे अपने घर कानेवता दिया, तो मैं बिना आग्रह के राजी हो गया। ईश्‍वरी के साथ परीक्षा कीतैयारी खूब हो जाएगी। वह अमीर होकर भी मेहनती और जहीन है।
उसने उसकेसाथ ही कहा-लेकिन भाई, एक बात का ख्‍याल रखना। वहॉं अगर जमींदारों की निंदाकी, तो मुआमिला बिगड. जाएगा और मेरे घरवालों को बुरा लगेगा। वह लोग तोआसामियों पर इसी दावे से शासन करते हैं कि ईश्‍वर ने असामियों को उनकी सेवाके लिए ही पैदा किया है। असामी में कोई मौलिक भेद नहीं है, तो जमींदारोंका कहीं पता न लगे।
मैंने कहा-तो क्‍या तुम समझते हो कि मैं वहां जाकर कुछ और हो जाऊंगा?
‘हॉं, मैं तो यही समझता हूं।
‘तुम गलत समझते हो।‘
ईश्‍वरीने इसका कोई जवाब न दिया। कदाचित् उसने इस मुआमले को मरे विवेक पर छोड़दिया। और बहुत अच्‍छा किया। अगर वह अपनी बात पर अड़ता, तो मैं भी जिद पकड़लेता।

                                                    2

सेकंड क्‍लास तो क्‍या, मैंनें कभी इंटर क्‍लास मेंभी सफर न किया था। अब की सेकंड क्‍लास में सफर का सौभाग्‍य प्राइज़ हुआ।गाडी तो नौ बजे रात को आती थी, पर यात्रा के हर्ष में हम शाम को स्‍टेशन जापहुंचे। कुछ देर इधर-उधर सैर करने के बाद रिफ्रेशमेंट-रूम में जाकर हमलोगों ने भेजन किया। मेरी वेश-भूषा और रंग-ढंग से पारखी खानसामों को यहपहचानने में देर न लगी कि मालिक कौन है और पिछलग्‍गू कौन; लेकिन न जानेक्‍यों मुझे उनकी गुस्‍ताखी बुरी लग रही थी। पैसे ईश्‍वरी की जेब से गए।शायद मेरे पिता को जो वेतन मिलता है, उससे ज्‍यादा इन खानसामों कोइनाम-इकराम में मिल जाता हो। एक अठन्‍नी तो चलते समय ईश्‍वरी ही ने दी।‍फिर भी मैं उन सभों से उसी तत्‍परता और विनय की अपेक्षा करता था, जिससे वेईश्‍वरी की सेवा कर रहे थे। क्‍यों ईश्‍वरी के हुक्‍म पर सब-के-सब दौडतेहैं, लेकिन मैं कोई चीज मांगता हूं, तो उतना उत्‍साह नहीं दिखाते! मुझेभोजन में कुछ स्‍वाद न मिला। यह भेद मेरे ध्‍यान को सम्‍पूर्ण रूप से अपनीओर खींचे हुए था।
गाडी आयी, हम दोनो सवार हुए। खानसामों ने ईश्‍वरी को सलाम किया। मेरी ओर देखा भी नहीं।
ईश्‍वरी ने कहा—कितने तमीजदार हैं ये सब? एक हमारे नौकर हैं कि कोई काम करने का ढंग नहीं।
मैंने खट्टे मन से कहा—इसी तरह अगर तुम अपने नौकरों को भी आठ आने रोज इनाम दिया करो, तो शायद इनसे ज्‍यादा तमीजदार हो जाएं।
‘तो क्‍या तुम समझते हो, यह सब केवल इनाम के लालच से इतना अदब करते हैं।
‘जी नहीं, कदापित नहीं! तमीज और अदब तो इनके रक्‍त में मिल गया है।’
गाड़ीचली। डाक थी। प्रयास से चली तो प्रतापगढ जाकर रूकी। एक आदमी ने हमारा कमराखोला। मैं तुरंत चिल्‍ला उठा, दूसरा दरजा है-सेकंड क्‍लास है।
उसमुसाफिर ने डिब्‍बे के अन्‍दर आकर मेरी ओर एक विचित्र उपेक्षा की दृष्टि सेदेखकर कहा—जी हां, सेवक इतना समझता है, और बीच वाले बर्थडे पर बैठ गया।मुझे कितनी लज्‍जा आई, कह नहीं सकता।
भोर होते-होते हम लोग मुरादाबादपहुंचे। स्‍टेशन पर कई आदमी हमारा स्‍वागत करने के लिए खड़े थे। पांचबेगार। बेगारों ने हमारा लगेज उठाया। दोनों भद्र पुरूष पीछे-पीछे चले। एकमुसलमान था रियासत अली, दूसरा ब्राह्मण था रामहरख। दोनों ने मेरी ओर परिचितनेत्रों से देखा, मानो कह रहे हैं, तुम कौवे होकर हंस के साथ कैसे?
रियासत अली ने ईश्‍वरी से पूछा—यह बाबू साहब क्‍या आपके साथ पढ़ते हैं?
ईश्‍वरीने जवाब दिया—हॉँ, साथ पढ़ते भी हैं और साथ रहते भी हैं। यों कहिए कि आपही की बदौलत मैं इलाहाबाद पड़ा हुआ हूं, नहीं कब का लखनऊ चला आया होता। अबकी मैं इन्‍हें घसीट लाया। इनके घर से कई तार आ चुके थे, मगर मैंनेइनकारी-जवाब दिलवा दिए। आखिरी तार तो अर्जेंट था, जिसकी फीस चार आने प्रतिशब्‍द है, पर यहां से उनका भी जवाब इनकारी ही था।
दोनों सज्‍जनों ने मेरी ओर चकित नेत्रों से देखा। आतंकित हो जाने की चेष्‍टा करते जान पड़े।
रियासत अली ने अर्द्धशंका के स्‍वर में कहा—लेकिन आप बड़े सादे लिबास में रहते हैं।
ईश्‍वरीने शंका निवारण की—महात्‍मा गांधी के भक्‍त हैं साहब। खद्दर के सिवा कुछपहने ही नहीं। पुराने सारे कपड़े जला डाले। यों कहा कि राजा हैं। ढाई लाखसालाना की रियासत है, पर आपकी सूरत देखो तो मालूम होता है, अभी अनाथालय सेपकड़कर आये हैं।
रामहरख बोले—अमीरों का ऐसा स्‍वभाव बहुत कम देखने में आता है। कोई भॉंप ही नहीं सकता।
रियासतअली ने समर्थन किया—आपने महाराजा चॉँगली को देखा होता तो दॉंतों तले उंगलीदबाते। एक गाढ़े की मिर्जई और चमरौंधे जूते पहने बाजारों में घूमा करतेथे। सुनते हैं, एक बार बेगार में पकड़े गए थे और उन्‍हीं ने दस लाख सेकालेज खोल दिया।
मैं मन में कटा जा रहा था; पर न जाने क्‍या बात थी कियह सफेद झूठ उस वक्‍त मुझे हास्‍यास्‍पद न जान पड़ा। उसके प्रत्‍येक वाक्‍यकेसाथ मानों मैं उस कल्पित वैभव के समीपतर आता जाता था।
मैं शहसवारनहीं हूं। हॉँ, लड़कपन में कई बार लद्दू घोड़ों पर सवार हुआ हूं। यहां देखातो दो कलॉं-रास घोड़े हमारे लिए तैयार खड़े थे। मेरी तो जान ही निकल गई।सवार तो हुआ, पर बोटियॉं कॉंप रहीं थीं। मैंने चेहरे पर शिकन न पड़ने दिया।घोड़े को ईश्‍वरी के पीछे डाल दिया। खैरियत यह हुई कि ईश्‍वरी ने घोड़े कोतेज न किया, वरना शायद मैं हाथ-पॉँर तुड़वाकर लौटता। संभव है, ईश्‍वरी नेसमझ लिया हो कि यह कितने पानी में है।

                                               3

ईश्‍वरी का घर क्‍याथा, किला था। इमामबाड़े का—सा फाटक, द्वार पर पहरेदार टहलता हुआ, नौकरोंका कोई सिसाब नहीं, एक हाथी बॅंधा हुआ। ईश्‍वरी ने अपने पिता, चाचा, ताऊआदि सबसे मेरा परिचय कराया और उसी अतिश्‍योक्ति के साथ। ऐसी हवा बॉंधी ‍िककुछ न पूछिए। नौकर-चाकर ही नहीं, घर के लोग भी मेरा सम्‍मान करने लगे।देहात के जमींदार, लाखों का मुनाफा, मगर पुलिस कान्‍सटेबिल को अफसर समझनेवाले। कई महाशय तो मुझे हुजूर-हुजूर कहने लगे!
जब जरा एकान्‍त हुआ, तौ मैंने ईश्‍वरी से कहा—तुम बड़े शैतान हो यार, मेरी मिट्टी क्‍यों पलीद कर रहे हो?
ईश्‍वरी ने दृढ़ मुस्‍कान के साथ कहा—इन गधों के सामने यही चाल जरूरी थी, वरना सीधे मुँह बोलते भी नहीं।
जरादेर के बाद नाई हमारे पांव दबाने आया। कुंवर लोग स्‍टेशन से आये हैं, थकगए होंगे। ईश्‍वरी ने मेरी ओर इशारा करके कहा—पहले कुंवर साहब के पांव दबा।
मैंचारपाई पर लेटा हुआ था। मेरे जीवन में ऐसा शायद ही कभी हुआ हो कि किसी नेमेरे पांव दबाए हों। मैं इसे अमीरों के चोचले, रईसों का गधापन और बड़ेआदमियों की मुटमरदी और जाने क्‍या-क्‍या कहकर ईश्‍वरी का परिहास किया करताऔर आज मैं पोतड़ों का रईस बनने का स्‍वांग भर रहा था।
इतने में दस बजगए। पुरानी सभ्‍यता के लोग थे। नयी रोशनी अभी केवल पहाड़ की चोटी तक पहुंचपायी थी। अंदर से भोजन का बुलावा आया। हम स्‍नान करने चले। मैं हमेंशा अपनीधोती खुद छांट लिया करता हूँ; मगर यहॉँ मैंने ईश्‍वरी की ही भांति अपनीधोती भी छोड़ दी। अपने हाथों अपनी धोती छांटते शर्म आ रही थी। अंदर भोजनकरने चले। होस्‍टल में जूते पहले मेज पर जा डटते थे। यहॉं पॉंव धोनाआवश्‍यक था। कहार पानी लिये खड़ा था। ईश्‍वरी ने पॉंव बढ़ा दिए। कहार नेउसके पॉंव धोए। मैंने भी पॉंव बढ़ा दिए। कहार ने मेरे पॉंव भी धोए। मेरा वहविचार न जाने कहॉं चला गया था।

                                                      4

सोचा था, वहॉँ देहात मेंएकाग्र होकर खूब पढ़ेंगे, पर यहॉं सारा दिन सैर-सपाटे में कट जाता था। कहींनदी में बजरे पर सैर कर रहे हैं, कहीं मछ‍लियों या चिडियों का शिकार खेलरहे हैं, कहीं पहलवानों की कुश्‍ती देख रहे हैं, कहीं शतरंज पर जमें हैं।ईश्‍वरी खूब अंडे मँगवाता और कमरे में ‘स्‍टोव’ पर आमलेट बनते। नौकरों काएक जत्‍था हमेशा घेरे रहता। अपने हॉँथ-पॉँव हिलाने की कोई जरूरत नहीं। केवलजबान हिला देना काफी है। नहाने बैठो तो आदमी नहलाने को हाजिर, लेटो तोआदमी पंखा झलने को खड़े।
महात्‍मा गांधी का कुंवर चेला मशहूर था। भीतरसे बाहर तक मेरी धाक थी। नाश्‍ते में जरा भी देर न होने पाए, कहीं कुंवरसाहब नाराज न हो जाऍं; बिछावन ठीक समय पर लग जाए, कुंवर साहब के सोने कासमय आ गया। मैं ईश्‍वरी से भी ज्‍यादा नाजुक दिमाग बन गया था या बनने परमजबूर किया गया था। ईश्‍वरी अपने हाथ से बिस्‍तर बिछाले लेकिन कुंवर मेहमानअपने हाथों कैसेट अपना बिछावन बिछा सकते हैं! उनकी महानता में बट्टा लगजाएगा।
एक दिन सचमुच यही बात हो गई। ईश्‍वरी घर में था। शायद अपनी मातासे कुछ बातचीत करने में देर हो गई। यहॉं दस बज गए। मेरी ऑंखें नींद से झपकरही थीं, मगर बिस्‍तर कैसेट लगाऊं? कुंवर जो ठहरा। कोई साढ़े ग्‍यारह बजेमहरा आया। बड़ा मुंह लगा नौकर था। घर के धंधों में मेरा बिस्‍तर लगाने कीउसे सुधि ही न रही। अब जो याद आई, तो भागा हुआ आया। मैंने ऐसी डॉँट बताई किउसने भी याद किया होगा।
ईश्‍वरी मेरी डॉँट सुनकर बाहर निकल आया और बोला—तुमने बहुत अच्‍छा किया। यह सब हरामखोर इसी व्‍यवहार के योग्‍य हैं।
इसीतरह ईश्‍वरी एक दिन एक जगह दावत में गया हुआ था। शाम हो गई, मगर लैम्‍पमेज पर रखा हुआ था। दियासलाई भी थी, लेकिन ईश्‍वरी खुद कभी लैम्‍प नहींजलाता था। ‍‍फिर कुंवर साहब कैसे जलाऍं? मैं झुंझला रहा था। समाचार-पत्रआया रखा हुआ था। जी उधर लगा हुआ था, पर लैम्‍प नदारद। दैवयोग से उसी वक्‍तमुंशी रियासत अली आ निकले। मैं उन्‍हीं पर उबल पड़ा, ऐसी फटकार बताई किबेचारा उल्‍लू हो गया— तुम लोगों को इतनी फिक्र भी नहीं कि लैम्‍प तो जलवादो! मालूम नहीं, ऐसे कामचोर आदमियों का यहॉं कैसे गुजर होता है। मेरे यहॉंघंटे-भर निर्वाह न हो। रियासत अली ने कॉँपते हुए हाथों से लैम्‍प जला दिया।
वहाँएक ठाकुर अक्‍सर आया करता था। कुछ मनचला आदमी था, महात्‍मा गांधी का परमभक्‍त। मुझे महात्‍माजी का चेला समझकर मेरा बड़ा लिहाज करता था; पर मुझसेकुछ पूछते संकोच करता था। एक दिन मुझे अकेला देखकर आया और हाथ बांधकरबोला—सरकार तो गांधी बाबा के चेले हैं न? लोग कहते हैं कि यह सुराज होजाएगा तो जमींदार न रहेंगे।
मैंने शान जमाई—जमींदारों के रहने की जरूरत ही क्‍या है? यह लोग गरीबों का खून चूसने के सिवा और क्‍या करते है?
ठाकुरने ‍पिर पूछा—तो क्‍यों, सरकार, सब जमींदारों की जमीन छीन ली जाएगी।मैंनें कहा-बहुत-से लोग तो खुशी से दे देंगे। जो लोग खुशी से न देंगे, उनकीजमीन छीननी ही पड़ेगी। हम लोग तो तैयार बैठे हुए हैं। ज्‍यों हीस्‍वराज्‍य हुआ, अपने इलाके असामियों के नाम हिबा कर देंगे।
मैं कुरसीपर पॉँव लटकाए बैठा था। ठाकुर मेरे पॉँव दबाने लगा। फिर बोला—आजकल जमींदारलोग बड़ा जुलुम करते हैं सरकार! हमें भी हुजूर, अपने इलाके में थोड़ी-सीजमीन दे दें, तो चलकर वहीं आपकी सेवा में रहें।
मैंने कहा—अभी तो मेराकोई अख्तियार नहीं है भाई; लेकिन ज्‍यों ही अख्तियार मिला, मैं सबसे पहलेतुम्‍हें बुलाऊंगा। तुम्‍हें मोटर-ड़्राइवरी सिखा कर अपना ड्राइवर बनालूंगा।
सुना, उस दिन ठाकुर ने खूब भंग पी और अपनी स्‍त्री को खूब पीटा और गॉंव महाजन से लड़ने पर तैयार हो गया।

                                                 5

छुट्टीइस तरह तमाम हुई और हम फिर प्रयाग चले। गॉँव के बहुत-से लोग हम लोगों कोपहुंचाने आये। ठाकुर तो हमारे साथ स्‍टेशन तक आया। मैनें भी अपना पार्ट खूबसफाई से खेला और अपनी कुबेरोचित विनय और देवत्‍व की मुहर हरेक हृदय पर लगादी। जी तो चाहता था, हरेक नौकर को अच्छा इनाम दूँ, लेकिन वह सामर्थ्य कहॉँथी? वापसी टिकट था ही, केवल गाड़ी में बैठना था; पर गाड़ी गायी तो ठसाठसभरी हुई। दुर्गापूजा की छुट्टियॉं भोगकर सभी लोग लौट रहे थे। सेकंड क्‍लासमें तिल रखने की जगह नहीं। इंटरव्यू क्‍लास की हालत उससे भी बदतर। यह आखिरीगाड़ी थी। किसी तरह रूक न सकते थे। बड़ी मुश्किल से तीसरे दरजे में जगहमिली। हमारे ऐश्‍वर्य ने वहॉं अपना रंग जमा लिया, मगर मुझे उसमें बैठनाबुरा लग रहा था। आये थे आराम से लेटे-लेटे, जा रहे थे सिकुड़े हुए। पहलूबदलने की भी जगह न थी।
कई आदमी पढ़े-लिखे भी थे! वे आपस में अंगरेजीराज्‍य की तारीफ करते जा रहे थे। एक महाश्‍य बोले—ऐसा न्‍याय तो किसीराज्‍य में नहीं देखा। छोटे-बड़े सब बराबर। राजा भी किसी पर अन्‍याय करे, तो अदालत उसकी गर्दन दबा देती है।
दूसरे सज्‍जन ने समर्थन किया—अरे साहब, आप खुद बादशाह पर दावा कर सकते हैं। अदालत में बादशाह पर डिग्री हो जाती है।
एकआदमी, जिसकी पीठ पर बड़ा गट्ठर बँधा था, कलकत्‍ते जा रहा था। कहीं गठरीरखने की जगह न मिलती थी। पीठ पर बॉँधे हुए था। इससे बेचैन होकर बार-बारद्वार पर खड़ा हो जाता। मैं द्वार के पास ही बैठा हुआ था। उसका बार-बार आकरमेरे मुंह को अपनी गठरी से रगड़ना मुझे बहुत बुरा लग रहा था। एक तो हवायों ही कम थी, दूसरे उस गँवार का आकर मेरे मुंह पर खड़ा हो जाना, मानो मेरागला दबाना था। मैं कुछ देर तक जब्‍त किए बैठा रहा। एकाएक मुझे क्रोध आगया। मैंने उसे पकड़कर पीछे ठेल दिया और दो तमाचे जोर-जोर से लगाए।
उसनें ऑंखें निकालकर कहा—क्‍यों मारते हो बाबूजी, हमने भी किराया दिया है!
मैंने उठकर दो-तीन तमाचे और जड़ दिए।
गाड़ी में तूफान आ गया। चारों ओर से मुझ पर बौछार पड़ने लगी।
‘अगर इतने नाजुक मिजाज हो, तो अव्‍वल दर्जे में क्‍यों नहीं बैठे।‘
‘कोई बड़ा आदमी होगा, तो अपने घर का होगा। मुझे इस तरह मारते तो दिखा देता।’
‘क्‍याकसूर किया था बेचारे ने। गाड़ी में साँस लेने की जगह नहीं, खिड़की पर जरासॉँस लेने खड़ा हो गया, तो उस पर इतना क्रोध! अमीर होकर क्‍या आदमी अपनीइन्‍सानियत बिल्‍कुल खो देता है।
’यह भी अंगरेजी राज है, जिसका आप बखान कर रहे थे।‘
एक ग्रामीण बोला—दफ्तर मॉं घुस पावत नहीं, उस पै इत्‍ता मिजाज।
ईश्‍वरी ने अंगरेजी मे कहा- What an idiot you are, Bir!
और मेरा नशा अब कुछ-कुछ उतरता हुआ मालूम होता था।

 

अनाथ लड़की - प्रेमचंद

सेठ पुरुषोत्तमदास पूना की सरस्वती पाठशाला का मुआयना करने के बाद बाहरनिकले तो एक लड़की ने दौड़कर उनका दामन पकड़ लिया। सेठ जी रुक गये औरमुहब्बत से उसकी तरफ देखकर पूछा—क्या नाम है?

लड़की ने जवाब दिया—रोहिणी।
सेठ जी ने उसे गोद में उठा लिया और बोले—तुम्हें कुछ इनाम मिला?
लड़की ने उनकी तरफ बच्चों जैसी गंभीरता से देखकर कहा—तुम चले जाते हो, मुझे रोना आता है, मुझे भी साथ लेते चलो।
सेठजी ने हँसकर कहा—मुझे बड़ी दूर जाना है, तुम कैसे चालोगी?
रोहिणी ने प्यार से उनकी गर्दन में हाथ डाल दिये और बोली—जहॉँ तुम जाओगे वहीं मैं भी चलूँगी। मैं तुम्हारी बेटी हूँगी।
मदरसे के अफसर ने आगे बढ़कर कहा—इसका बाप साल भर हुआ नही रहा। मॉँ कपड़े सीती है, बड़ी मुश्किल से गुजर होती है।
सेठजी के स्वभाव में करुणा बहुत थी। यह सुनकर उनकी आँखें भर आयीं। उस भोलीप्रार्थना में वह दर्द था जो पत्थर-से दिल को पिघला सकता है। बेकसी औरयतीमी को इससे ज्यादा दर्दनाक ढंग से जाहिर कना नामुमकिन था। उन्होंनेसोचा—इस नन्हें-से दिल में न जाने क्या अरमान होंगे। और लड़कियॉँ अपनेखिलौने दिखाकर कहती होंगी, यह मेरे बाप ने दिया है। वह अपने बाप के साथमदरसे आती होंगी, उसके साथ मेलों में जाती होंगी और उनकी दिलचस्पियों काजिक्र करती होंगी। यह सब बातें सुन-सुनकर इस भोली लड़की को भी ख्वाहिश होतीहोगी कि मेरे बाप होता। मॉँ की मुहब्बत में गहराई और आत्मिकता होती हैजिसे बच्चे समझ नहीं सकते। बाप की मुहब्बत में खुशी और चाव होता है जिसेबच्चे खूब समझते हैं।
सेठ जी ने रोहिणी को प्यार से गले लगा लिया औरबोले—अच्छा, मैं तुम्हें अपनी बेटी बनाऊँगा। लेकिन खूब जी लगाकर पढ़ना। अबछुट्टी का वक्त आ गया है, मेरे साथ आओ, तुम्हारे घर पहुँचा दूँ।
यह कहकरउन्होंने रोहिणी को अपनी मोटरकार में बिठा लिया। रोहिणी ने बड़े इत्मीनानऔर गर्व से अपनी सहेलियों की तरफ देखा। उसकी बड़ी-बड़ी आँखें खुशी से चमकरही थीं और चेहरा चॉँदनी रात की तरह खिला हुआ था।

                                              २

सेठ नेरोहिणी को बाजार की खूब सैर करायी और कुछ उसकी पसन्द से, कुछ अपनी पसन्द सेबहुत-सी चीजें खरीदीं, यहॉँ तक कि रोहिणी बातें करते-करते कुछ थक-सी गयीऔर खामोश हो गई। उसने इतनी चीजें देखीं और इतनी बातें सुनीं कि उसका जी भरगया। शाम होते-होते रोहिणी के घर पहुँचे और मोटरकार से उतरकर रोहिणी को अबकुछ आराम मिला। दरवाजा बन्द था। उसकी मॉँ किसी ग्राहक के घर कपड़े देने गयीथी। रोहिणी ने अपने तोहफों को उलटना-पलटना शुरू किया—खूबसूरत रबड़ केखिलौने, चीनी की गुड़िया जरा दबाने से चूँ-चूँ करने लगतीं और रोहिणी यहप्यारा संगीत सुनकर फूली न समाती थी। रेशमी कपड़े और रंग-बिरंगी साड़ियोंकी कई बण्डल थे लेकिन मखमली बूटे की गुलकारियों ने उसे खूब लुभाया था। उसेउन चीजों के पाने की जितनी खुशी थी, उससे ज्यादा उन्हें अपनी सहेलियों कोदिखाने की बेचैनी थी। सुन्दरी के जूते अच्छे सही लेकिन उनमें ऐसे फूल कहॉँहैं। ऐसी गुड़िया उसने कभी देखी भी न होंगी। इन खयालों से उसके दिल मेंउमंग भर आयी और वह अपनी मोहिनी आवाज में एक गीत गाने लगी। सेठ जी दरवाजे परखड़े इन पवित्र दृश्य का हार्दिक आनन्द उठा रहे थे। इतने में रोहिणी कीमॉँ रुक्मिणी कपड़ों की एक पोटली लिये हुए आती दिखायी दी। रोहिणी ने खुशीसे पागल होकर एक छलॉँग भरी और उसके पैरों से लिपट गयी। रुक्मिणी का चेहरापीला था, आँखों में हसरत और बेकसी छिपी हुई थी, गुप्त चिंता का सजीव चित्रमालूम होती थी, जिसके लिए जिंदगी में कोई सहारा नहीं।
मगर रोहिणी को जबउसने गोद में उठाकर प्यार से चूमा मो जरा देर के लिए उसकी ऑंखों में उन्मीदऔर जिंदगी की झलक दिखायी दी। मुरझाया हुआ फूल खिल गया। बोली—आज तू इतनीदेर तक कहॉँ रही, मैं तुझे ढूँढ़ने पाठशाला गयी थी।
रोहिणी ने हुमककर कहा—मैं मोटरकार पर बैठकर बाजार गयी थी। वहॉँ से बहुत अच्छी-अच्छी चीजें लायी हूँ। वह देखो कौन खड़ा है?
मॉँ ने सेठ जी की तरफ ताका और लजाकर सिर झुका लिया।
बरामदेमें पहुँचते ही रोहिणी मॉँ की गोद से उतरकर सेठजी के पास गयी और अपनी मॉँको यकीन दिलाने के लिए भोलेपन से बोली—क्यों, तुम मेरे बाप हो न?
सेठ जी ने उसे प्यार करके कहा—हॉँ, तुम मेरी प्यारी बेटी हो।
रोहिणी ने उनसे मुंह की तरफ याचना-भरी आँखों से देखकर कहा—अब तुम रोज यहीं रहा करोगे?
सेठजी ने उसके बाल सुलझाकर जवाब दिया—मैं यहॉँ रहूँगा तो काम कौन करेगा? मैंकभी-कभी तुम्हें देखने आया करूँगा, लेकिन वहॉँ से तुम्हारे लिए अच्छी-अच्छीचीजें भेजूँगा।
रोहिणी कुछ उदास-सी हो गयी। इतने में उसकी मॉँ ने मकानका दरवाजा खोला ओर बड़ी फुर्ती से मैले बिछावन और फटे हुए कपड़े समेट करकोने में डाल दिये कि कहीं सेठ जी की निगाह उन पर न पड़ जाए। यह स्वाभिमानस्त्रियों की खास अपनी चीज है।
रुक्मिणी अब इस सोच में पड़ी थी कि मैंइनकी क्या खातिर-तवाजो करूँ। उसने सेठ जी का नाम सुना था, उसका पति हमेशाउनकी बड़ाई किया करता था। वह उनकी दया और उदारता की चर्चाएँ अनेकों बार सुनचुकी थी। वह उन्हें अपने मन का देवता समझा कतरी थी, उसे क्या उमीद थी किकभी उसका घर भी उसके कदमों से रोशन होगा। लेकिन आज जब वह शुभ दिन संयोग सेआया तो वह इस काबिल भी नहीं कि उन्हें बैठने के लिए एक मोढ़ा दे सके। घरमें पान और इलायची भी नहीं। वह अपने आँसुओं को किसी तरह न रोक सकी।
आखिरजब अंधेरा हो गया और पास के ठाकुरद्वारे से घण्टों और नगाड़ों की आवाजेंआने लगीं तो उन्होंने जरा ऊँची आवाज में कहा—बाईजी, अब मैं जाता हूँ। मुझेअभी यहॉँ बहुत काम करना है। मेरी रोहिणी को कोई तकलीफ न हो। मुझे जब मौकामिलेगा, उसे देखने आऊँगा। उसके पालने-पोसने का काम मेरा है और मैं उसे बहुतखुशी से पूरा करूँगा। उसके लिए अब तुम कोई फिक्र मत करो। मैंने उसका वजीफाबॉँध दिया है और यह उसकी पहली किस्त है।
यह कहकर उन्होंने अपना खूबसूरतबटुआ निकाला और रुक्मिणी के सामने रख दिया। गरीब औरत की आँखें में आँसूजारी थे। उसका जी बरबस चाहता था कि उसके पैरों को पकड़कर खूब रोये। आज बहुतदिनों के बाद एक सच्चे हमदर्द की आवाज उसके मन में आयी थी।
जब सेठ जीचले तो उसने दोनों हाथों से प्रणाम किया। उसके हृदय की गहराइयों सेप्रार्थना निकली—आपने एक बेबस पर दया की है, ईश्वर आपको इसका बदला दे।
दूसरेदिन रोहिणी पाठशाला गई तो उसकी बॉँकी सज-धज आँखों में खुबी जाती थी।उस्तानियों ने उसे बारी-बारी प्यार किया और उसकी सहेलियॉँ उसकी एक-एक चीजको आश्चर्य से देखती और ललचाती थी। अच्छे कपड़ों से कुछ स्वाभिमान का अनुभवहोता है। आज रोहिणी वह गरीब लड़की न रही जो दूसरों की तरफ विवश नेत्रों सेदेखा करती थी। आज उसकी एक-एक क्रिया से शैशवोचित गर्व और चंचलता टपकती थीऔर उसकी जबान एक दम के लिए भी न रुकती थी। कभी मोटर की तेजी का जिक्र थाकभी बाजार की दिलचस्पियों का बयान, कभी अपनी गुड़ियों के कुशल-मंगल कीचर्चा थी और कभी अपने बाप की मुहब्बत की दास्तान। दिल था कि उमंगों से भराहुआ था।
एक महीने बाद सेठ पुरुषोत्तमदास ने रोहिणी के लिए फिर तोहफे औररुपये रवाना किये। बेचारी विधवा को उनकी कृपा से जीविका की चिन्ता सेछुट्टी मिली। वह भी रोहिणी के साथ पाठशाला आती और दोनों मॉँ-बेटियॉँ एक हीदरजे के साथ-साथ पढ़तीं, लेकिन रोहिणी का नम्बर हमेशा मॉँ से अव्वल रहा सेठजी जब पूना की तरफ से निकलते तो रोहिणी को देखने जरूर आते और उनका आगमनउसकी प्रसन्नता और मनोरंजन के लिए महीनों का सामान इकट्ठा कर देता।
इसीतरह कई साल गुजर गये और रोहिणी ने जवानी के सुहाने हरे-भरे मैदान में पैररक्खा, जबकि बचपन की भोली-भाली अदाओं में एक खास मतलब और इरादों का दखल होजाता है।
रोहिणी अब आन्तरिक और बाह्य सौन्दर्य में अपनी पाठशाला की नाकथी। हाव-भाव में आकर्षक गम्भीरता, बातों में गीत का-सा खिंचाव और गीत का-साआत्मिक रस था। कपड़ों में रंगीन सादगी, आँखों में लाज-संकोच, विचारों मेंपवित्रता। जवानी थी मगर घमण्ड और बनावट और चंचलता से मुक्त। उसमें एकएकाग्रता थी ऊँचे इरादों से पैदा होती है। स्त्रियोचित उत्कर्ष की मंजिलेंवह धीरे-धीरे तय करती चली जाती थी।

                                                   ३

सेठ जी के बड़े बेटेनरोत्तमदास कई साल तक अमेरिका और जर्मनी की युनिवर्सिटियों की खाक छानने केबाद इंजीनियरिंग विभाग में कमाल हासिल करके वापस आए थे। अमेरिका के सबसेप्रतिष्ठित कालेज में उन्होंने सम्मान का पद प्राप्त किया था। अमेरिका केअखबार एक हिन्दोस्तानी नौजवान की इस शानदार कामयाबी पर चकित थे। उन्हीं कास्वागत करने के लिए बम्बई में एक बड़ा जलसा किया गया था। इस उत्सव में शरीकहोने के लिए लोग दूर-दूर से आए थे। सरस्वती पाठशाला को भी निमंत्रण मिलाऔर रोहिणी को सेठानी जी ने विशेष रूप से आमंत्रित किया। पाठशाला में हफ्तोंतैयारियॉँ हुई। रोहिणी को एक दम के लिए भी चैन न था। यह पहला मौका था किउसने अपने लिए बहुत अच्छे-अच्छे कपड़े बनवाये। रंगों के चुनाव में वह मिठासथी, काट-छॉँट में वह फबन जिससे उसकी सुन्दरता चमक उठी। सेठानी कौशल्यादेवी उसे लेने के लिए रेलवे स्टेशन पर मौजूद थीं। रोहिणी गाड़ी से उतरते हीउनके पैरों की तरफ झुकी लेकिन उन्होंने उसे छाती से लगा लिया और इस तरहप्यार किया कि जैसे वह उनकी बेटी है। वह उसे बार-बार देखती थीं और आँखों सेगर्व और प्रेम टपक पड़ता था।
इस जलसे के लिए ठीक समुन्दर के किनारे एकहरे-भरे सुहाने मैदान में एक लम्बा-चौड़ा शामियाना लगाया गया था। एक तरफआदमियों का समुद्र उमड़ा हुआ था दूसरी तरफ समुद्र की लहरें उमड़ रही थीं, गोया वह भी इस खुशी में शरीक थीं।
जब उपस्थित लोगों ने रोहिणी बाई केआने की खबर सुनी तो हजारों आदमी उसे देखने के लिए खड़े हो गए। यही तो वहलड़की है। जिसने अबकी शास्त्री की परीक्षा पास की है। जरा उसके दर्शन करनेचाहिये। अब भी इस देश की स्त्रियों में ऐसे रतन मौजूद हैं। भोले-भालेदेशप्रेमियों में इस तरह की बातें होने लगीं। शहर की कई प्रतिष्ठित महिलाओंने आकर रोहिणी को गले लगाया और आपस में उसके सौन्दर्य और उसके कपड़ों कीचर्चा होने लगी।
आखिर मिस्टर पुरुषोत्तमदास तशरीफ लाए। हालॉँकि वह बड़ाशिष्ट और गम्भीर उत्सव था लेकिन उस वक्त दर्शन की उत्कंठा पागलपन की हद तकजा पहुँची थी। एक भगदड़-सी मच गई। कुर्सियों की कतारे गड़बड़ हो गईं। कोईकुर्सी पर खड़ा हुआ, कोई उसके हत्थों पर। कुछ मनचले लोगों ने शामियाने कीरस्सियॉँ पकड़ीं और उन पर जा लटके कई मिनट तक यही तूफान मचा रहा। कहींकुर्सियां टूटीं, कहीं कुर्सियॉँ उलटीं, कोई किसी के ऊपर गिरा, कोई नीचे।ज्यादा तेज लोगों में धौल-धप्पा होने लगा।
तब बीन की सुहानी आवाजें आनेलगीं। रोहिणी ने अपनी मण्डली के साथ देशप्रेम में डूबा हुआ गीत शुरू किया।सारे उपस्थित लोग बिलकुल शान्त थे और उस समय वह सुरीला राग, उसकी कोमलता औरस्वच्छता, उसकी प्रभावशाली मधुरता, उसकी उत्साह भरी वाणी दिलों पर वह नशा-सा पैदा कर रही थी जिससे प्रेम की लहरें उठती हैं, जो दिल से बुराइयोंको मिटाता है और उससे जिन्दगी की हमेशा याद रहने वाली यादगारें पैदा होजाती हैं। गीत बन्द होने पर तारीफ की एक आवाज न आई। वहीं ताने कानों में अबतक गूँज रही थीं।
गाने के बाद विभिन्न संस्थाओं की तरफ से अभिनन्दन पेशहुए और तब नरोत्तमदास लोगों को धन्यवाद देने के लिए खड़े हुए। लेकिन उनकेभाषाण से लोगों को थोड़ी निराशा हुई। यों दोस्तो की मण्डली में उनकीवक्तृता के आवेग और प्रवाह की कोई सीमा न थी लेकिन सार्वजनिक सभा के सामनेखड़े होते ही शब्द और विचार दोनों ही उनसे बेवफाई कर जाते थे। उन्होंनेबड़ी-बड़ी मुश्किल से धन्यवाद के कुछ शब्द कहे और तब अपनी योग्यता कीलज्जित स्वीकृति के साथ अपनी जगह पर आ बैठे। कितने ही लोग उनकी योग्यता परज्ञानियों की तरह सिर हिलाने लगे।
अब जलसा खत्म होने का वक्त आया। वहरेशमी हार जो सरस्वती पाठशाला की ओर से भेजा गया था, मेज पर रखा हुआ था।उसे हीरो के गले में कौन डाले? प्रेसिडेण्ट ने महिलाओं की पंक्ति की ओर नजरदौड़ाई। चुनने वाली आँख रोहिणी पर पड़ी और ठहर गई। उसकी छाती धड़कने लगी।लेकिन उत्सव के सभापति के आदेश का पालन आवश्यक था। वह सर झुकाये हुए मेज केपास आयी और कॉँपते हाथों से हार को उठा लिया। एक क्षण के लिए दोनों कीआँखें मिलीं और रोहिणी ने नरोत्तमदास के गले में हार डाल दिया।
दूसरेदिन सरस्वती पाठशाला के मेहमान विदा हुए लेकिन कौशल्या देवी ने रोहिणी को नजाने दिया। बोली—अभी तुम्हें देखने से जी नहीं भरा, तुम्हें यहॉँ एक हफ्तारहना होगा। आखिर मैं भी तो तुम्हारी मॉँ हूँ। एक मॉँ से इतना प्यार औरदूसरी मॉँ से इतना अलगाव!
रोहिणी कुछ जवाब न दे सकी।
यह सारा हफ्ताकौशल्या देवी ने उसकी विदाई की तैयारियों में खर्च किया। सातवें दिन उसेविदा करने के लिए स्टेशन तक आयीं। चलते वक्त उससे गले मिलीं और बहुत कोशिशकरने पर भी आँसुओं को न रोक सकीं। नरोत्तमदास भी आये थे। उनका चेहरा उदासथा। कौशल्या ने उनकी तरफ सहानुभूतिपूर्ण आँखों से देखकर कहा—मुझे यह तोख्याल ही न रहा, रोहिणी क्या यहॉँ से पूना तक अकेली जायेगी? क्या हर्ज है, तुम्हीं चले जाओ, शाम की गाड़ी से लौट आना।
नरोत्तमदास के चेहरे पर खुशीकी लहर दौड़ गयी, जो इन शब्दों में न छिप सकी—अच्छा, मैं ही चला जाऊँगा।वह इस फिक्र में थे कि देखें बिदाई की बातचीत का मौका भी मिलता है या नहीं।अब वह खूब जी भरकर अपना दर्दे दिल सुनायेंगे और मुमकिन हुआ तो उसलाज-संकोच को, जो उदासीनता के परदे में छिपी हुई है, मिटा देंगे।

                                               ४

रुक्मिणीको अब रोहिणी की शादी की फिक्र पैदा हुई। पड़ोस की औरतों में इसकी चर्चाहोने लगी थी। लड़की इतनी सयानी हो गयी है, अब क्या बुढ़ापे में ब्याह होगा? कई जगह से बात आयी, उनमें कुछ बड़े प्रतिष्ठित घराने थे। लेकिन जबरुक्मिणी उन पैमानों को सेठजी के पास भेजती तो वे यही जवाब देते कि मैं खुदफिक्र में हूँ। रुक्मिणी को उनकी यह टाल-मटोल बुरी मालूम होती थी।
रोहिणीको बम्बई से लौटे महीना भर हो चुका था। एक दिन वह पाठशाला से लौटी तो उसेअम्मा की चारपाई पर एक खत पड़ा हुआ मिला। रोहिणी पढ़ने लगी, लिखा था—बहन, जब से मैंने तुम्हारी लड़की को बम्बई में देखा है, मैं उस पर रीझ गई हूँ।अब उसके बगैर मुझे चैन नहीं है। क्या मेरा ऐसा भाग्य होगा कि वह मेरी बहूबन सके? मैं गरीब हूँ लेकिन मैंने सेठ जी को राजी कर लिया है। तुम भी मेरीयह विनती कबूल करो। मैं तुम्हारी लड़की को चाहे फूलों की सेज पर न सुलासकूँ, लेकिन इस घर का एक-एक आदमी उसे आँखों की पुतली बनाकर रखेगा। अब रहालड़का। मॉँ के मुँह से लड़के का बखान कुछ अच्छा नहीं मालूम होता। लेकिन यहकह सकती हूँ कि परमात्मा ने यह जोड़ी अपनी हाथों बनायी है। सूरत में, स्वभाव में, विद्या में, हर दृष्टि से वह रोहिणी के योग्य है। तुम जैसेचाहे अपना इत्मीनान कर सकती हो। जवाब जल्द देना और ज्यादा क्या लिखूँ। नीचेथोड़े-से शब्दों में सेठजी ने उस पैगाम की सिफारिश की थी।
रोहिणी गालोंपर हाथ रखकर सोचने लगी। नरोत्तमदास की तस्वीर उसकी आँखों के सामने आ खड़ीहुई। उनकी वह प्रेम की बातें, जिनका सिलसिला बम्बई से पूना तक नहीं टूटाथा, कानों में गूंजने लगीं। उसने एक ठण्डी सॉँस ली और उदास होकर चारपाई परलेट गई।

                                              5

सरस्वती पाठशाला में एक बार फिर सजावट और सफाई केदृश्य दिखाई दे रहे हैं। आज रोहिणी की शादी का शुभ दिन। शाम का वक्त, बसन्तका सुहाना मौसम। पाठशाला के दारो-दीवार मुस्करा रहे हैं और हरा-भरा बगीचाफूला नहीं समाता।
चन्द्रमा अपनी बारात लेकर पूरब की तरफ से निकला। उसीवक्त मंगलाचरण का सुहाना राग उस रूपहली चॉँदनी और हल्के-हल्के हवा के झोकोंमें लहरें मारने लगा। दूल्हा आया, उसे देखते ही लोग हैरत में आ गए। यहनरोत्तमदास थे।
दूल्हा मण्डप के नीचे गया। रोहिणी की मॉँ अपने को रोक नसकी, उसी वक्त जाकर सेठ जी के पैर पर गिर पड़ी। रोहिणी की आँखों से प्रेमऔर आन्दद के आँसू बहने लगे।
मण्डप के नीचे हवन-कुण्ड बना था। हवन शुरूहुआ, खुशबू की लपेटें हवा में उठीं और सारा मैदान महक गया। लोगों केदिलो-दिमाग में ताजगी की उमंग पैदा हुई।
फिर संस्कार की बारी आई। दूल्हाऔर दुल्हन ने आपस में हमदर्दी; जिम्मेदारी और वफादारी के पवित्र शब्द अपनीजबानों से कहे। विवाह की वह मुबारक जंजीर गले में पड़ी जिसमें वजन है, सख्ती है, पाबन्दियॉँ हैं लेकिन वजन के साथ सुख और पाबन्दियों के साथविश्वास है। दोनों दिलों में उस वक्त एक नयी, बलवान, आत्मिक शक्ति कीअनुभूति हो रही थी।
जब शादी की रस्में खत्म हो गयीं तो नाच-गाने कीमजलिस का दौर आया। मोहक गीत गूँजने लगे। सेठ जी थककर चूर हो गए थे। जरा दमलेने के लिए बागीचे में जाकर एक बेंच पर बैठ गये। ठण्डी-ठण्डी हवा आ रही आरही थी। एक नशा-सा पैदा करने वाली शान्ति चारों तरफ छायी हुई थी। उसी वक्तरोहिणी उनके पास आयी और उनके पैरों से लिपट गयी। सेठ जी ने उसे उठाकर गलेसे लगा लिया और हँसकर बोले—क्यों, अब तो तुम मेरी अपनी बेटी हो गयीं?

 

आत्माराम - प्रेमचंद

वेदों-ग्राम में महादेव सोनार एक सुविख्यात आदमी था। वह अपने सायबान मेंप्रात: से संध्या तक अँगीठी के सामने बैठा हुआ खटखट किया करता था। यहलगातार ध्वनि सुनने के लोग इतने अभ्यस्त हो गये थे कि जब किसी कारण से वहबंद हो जाती, तो जान पड़ता था, कोई चीज गायब हो गयी। वह नित्य-प्रति एक बारप्रात:काल अपने तोते का पिंजड़ा लिए कोई भजन गाता हुआ तालाब की ओर जाताथा। उस धँधले प्रकाश में उसका जर्जर शरीर, पोपला मुँह और झुकी हुई कमरदेखकर किसी अपरिचित मनुष्य को उसके पिशाच होने का भ्रम हो सकता था। ज्योंही लोगों के कानों में आवाज आती—‘सत्त गुरुदत्त शिवदत्त दाता,’ लोग समझजाते कि भोर हो गयी।

महादेव का पारिवारिक जीवन सूखमय न था। उसके तीन पुत्र थे, तीन बहुऍं थीं, दर्जनों नाती-पाते थे, लेकिन उसके बोझ को हल्का करने-वाला कोई न था। लड़केकहते—‘तब तक दादा जीते हैं, हम जीवन का आनंद भोग ले, फिर तो यह ढोल गलेपड़ेगी ही।’ बेचारे महादेव को कभी-कभी निराहार ही रहना पड़ता। भोजन के समयउसके घर में साम्यवाद का ऐसा गगनभेदी निर्घोष होता कि वह भूखा ही उठ आता, और नारियल का हुक्का पीता हुआ सो जाता। उनका व्यापसायिक जीवन और भीआशांतिकारक था। यद्यपि वह अपने काम में निपुण था, उसकी खटाई औरों से कहींज्यादा शुद्धिकारक और उसकी रासयनिक क्रियाऍं कहीं ज्यादा कष्टसाध्य थीं, तथापि उसे आये दिन शक्की और धैर्य-शून्य प्राणियों के अपशब्द सुनने पड़तेथे, पर महादेव अविचिलित गाम्भीर्य से सिर झुकाये सब कुछ सुना करता था।ज्यों ही यह कलह शांत होता, वह अपने तोते की ओर देखकर पुकार उठता—‘सत्तगुरुदत्त शिवदत्तदाता।’ इस मंत्र को जपते ही उसके चित्त को पूर्ण शांतिप्राप्त हो जाती थी।


                                                २
एक दिन संयोगवश किसी लड़के ने पिंजड़े का द्वार खोल दिया। तोता उड़ गया।महादेव ने सिह उठाकर जो पिंजड़े की ओर देखा, तो उसका कलेजा सन्न-से हो गया।तोता कहॉँ गया। उसने फिर पिंजड़े को देखा, तोता गायब था। महादेव घबड़ा करउठा और इधर-उधर खपरैलों पर निगाह दौड़ाने लगा। उसे संसार में कोई वस्तु अगरप्यारी थी, तो वह यही तोता। लड़के-बालों, नाती-पोतों से उसका जी भर गयाथा। लड़को की चुलबुल से उसके काम में विघ्न पड़ता था। बेटों से उसे प्रेम नथा; इसलिए नहीं कि वे निकम्मे थे; बल्कि इसलिए कि उनके कारण वह अपनेआनंददायी कुल्हड़ों की नियमित संख्या से वंचित रह जाता था। पड़ोसियों सेउसे चिढ़ थी, इसलिए कि वे अँगीठी से आग निकाल ले जाते थे। इन समस्तविघ्न-बाधाओं से उसके लिए कोई पनाह थी, तो यही तोता था। इससे उसे किसीप्रकार का कष्ट न होता था। वह अब उस अवस्था में था जब मनुष्य को शांति भोगके सिवा और कोई इच्छा नहीं रहती।
तोता एक खपरैल पर बैठा था। महादेव ने पिंजरा उतार लिया और उसे दिखाकर कहनेलगा—‘आ आ’ सत्त गुरुदत्त शिवदाता।’ लेकिन गॉँव और घर के लड़के एकत्र हो करचिल्लाने और तालियॉँ बजाने लगे। ऊपर से कौओं ने कॉँव-कॉँव की रट लगायी? तोता उड़ा और गॉँव से बाहर निकल कर एक पेड़ पर जा बैठा। महादेव खाली पिंजडालिये उसके पीछे दौड़ा, सो दौड़ा। लोगो को उसकी द्रुतिगामिता पर अचम्भा होरहा था। मोह की इससे सुन्दर, इससे सजीव, इससे भावमय कल्पना नहीं की जासकती।
दोपहर हो गयी थी। किसान लोग खेतों से चले आ रहे थे। उन्हें विनोद का अच्छाअवसर मिला। महादेव को चिढ़ाने में सभी को मजा आता था। किसी ने कंकड़ फेंके, किसी ने तालियॉँ बजायीं। तोता फिर उड़ा और वहाँ से दूर आम के बाग में एकपेड़ की फुनगी पर जा बैठा । महादेव फिर खाली पिंजड़ा लिये मेंढक की भॉँतिउचकता चला। बाग में पहुँचा तो पैर के तलुओं से आग निकल रही थी, सिर चक्करखा रहा था। जब जरा सावधान हुआ, तो फिर पिंजड़ा उठा कर कहने लगे—‘सत्तगुरुदत्त शिवदत्त दाता’ तोता फुनगी से उतर कर नीचे की एक डाल पी आ बैठा, किन्तु महादेव की ओर सशंक नेत्रों से ताक रहा था। महादेव ने समझा, डर रहाहै। वह पिंजड़े को छोड़ कर आप एक दूसरे पेड़ की आड़ में छिप गया। तोते नेचारों ओर गौर से देखा, निश्शंक हो गया, अतरा और आ कर पिंजड़े के ऊपर बैठगया। महादेव का हृदय उछलने लगा। ‘सत्त गुरुदत्त शिवदत्त दाता’ का मंत्रजपता हुआ धीरे-धीरे तोते के समीप आया और लपका कि तोते को पकड़ लें, किन्तुतोता हाथ न आया, फिर पेड़ पर आ बैठा।
शाम तक यही हाल रहा। तोता कभी इस डाल पर जाता, कभी उस डाल पर। कभी पिंजड़ेपर आ बैठता, कभी पिंजड़े के द्वार पर बैठे अपने दाना-पानी की प्यालियों कोदेखता, और फिर उड़ जाता। बुड्ढा अगर मूर्तिमान मोह था, तो तोता मूर्तिमयीमाया। यहॉँ तक कि शाम हो गयी। माया और मोह का यह संग्राम अंधकार में विलीनहो गया।


                                              ३
रात हो गयी ! चारों ओर निबिड़ अंधकार छा गया। तोता न जाने पत्तों में कहॉँछिपा बैठा था। महादेव जानता था कि रात को तोता कही उड़कर नहीं जा सकता, और नपिंजड़े ही में आ सकता हैं, फिर भी वह उस जगह से हिलने का नाम न लेता था।आज उसने दिन भर कुछ नहीं खाया। रात के भोजन का समय भी निकल गया, पानी कीबूँद भी उसके कंठ में न गयी, लेकिन उसे न भूख थी, न प्यास ! तोते के बिनाउसे अपना जीवन निस्सार, शुष्क और सूना जान पड़ता था। वह दिन-रात काम करताथा; इसलिए कि यह उसकी अंत:प्रेरणा थी; जीवन के और काम इसलिए करता था कि आदतथी। इन कामों मे उसे अपनी सजीवता का लेश-मात्र भी ज्ञान न होता था। तोताही वह वस्तु था, जो उसे चेतना की याद दिलाता था। उसका हाथ से जाना जीव कादेह-त्याग करना था।
महादेव दिन-भर का भूख-प्यासा, थका-मॉँदा, रह-रह कर झपकियॉँ ले लेता था; किन्तु एक क्षण में फिर चौंक कर ऑंखे खोल देता और उस विस्तृत अंधकार मेंउसकी आवाज सुनायी देती—‘सत्त गुरुदत्त शिवदत्त दाता।’
आधी रात गुजर गयी थी। सहसा वह कोई आहट पा कर चौका। देखा, एक दूसरे वृक्ष केनीचे एक धुँधला दीपक जल रहा है, और कई आदमी बैंठे हुए आपस में कुछ बातेंकर रहे हैं। वे सब चिलम पी रहे थे। तमाखू की महक ने उसे अधीर कर दिया। उच्चस्वर से बोला—‘सत्त गुरुदत्त शिवदत्त दाता’ और उन आदमियों की ओर चिलम पीनेचला गया; किन्तु जिस प्रकार बंदूक की आवाज सुनते ही हिरन भाग जाते हैं उसीप्रकार उसे आते देख सब-के-सब उठ कर भागे। कोई इधर गया, कोई उधर। महादेवचिल्लाने लगा—‘ठहरो-ठहरो !’ एकाएक उसे ध्यान आ गया, ये सब चोर हैं। वह जारेसे चिल्ला उठा—‘चोर-चोर, पकड़ो-पकड़ो !’ चोरों ने पीछे फिर कर न देखा।
महादेव दीपक के पास गया, तो उसे एक मलसा रखा हुआ मिला जो मोर्चे से काला होरहा था। महादेव का हृदय उछलने लगा। उसने कलसे मे हाथ डाला, तो मोहरें थीं।उसने एक मोहरे बाहर निकाली और दीपक के उजाले में देखा। हॉँ मोहर थी। उसनेतुरंत कलसा उठा लिया, और दीपक बुझा दिया और पेड़ के नीचे छिप कर बैठ रहा।साह से चोर बन गया।
उसे फिर शंका हुई, ऐसा न हो, चोर लौट आवें, और मुझे अकेला देख कर मोहरेंछीन लें। उसने कुछ मोहर कमर में बॉँधी, फिर एक सूखी लकड़ी से जमीन की कीमिटटी हटा कर कई गड्ढे बनाये, उन्हें माहरों से भर कर मिटटी से ढँक दिया।


                                            ४
महादेव के अतर्नेत्रों के सामने अब एक दूसरा जगत् था, चिंताओं और कल्पना सेपरिपूर्ण। यद्यपि अभी कोष के हाथ से निकल जाने का भय था; पर अभिलाषाओं नेअपना काम शुरु कर दिया। एक पक्का मकान बन गया, सराफे की एक भारी दूकान खुलगयी, निज सम्बन्धियों से फिर नाता जुड़ गया, विलास की सामग्रियॉँ एकत्रितहो गयीं। तब तीर्थ-यात्रा करने चले, और वहॉँ से लौट कर बड़े समारोह सेयज्ञ, ब्रह्मभोज हुआ। इसके पश्चात एक शिवालय और कुऑं बन गया, एक बाग भी लगगया और वह नित्यप्रति कथा-पुराण सुनने लगा। साधु-सन्तों का आदर-सत्कार होनेलगा।
अकस्मात उसे ध्यान आया, कहीं चोर आ जायँ , तो मैं भागूँगा क्यों-कर? उसनेपरीक्षा करने के लिए कलसा उठाया। और दो सौ पग तक बेतहाशा भागा हुआ चला गया।जान पड़ता था, उसके पैरो में पर लग गये हैं। चिंता शांत हो गयी। इन्हींकल्पनाओं में रात व्यतीत हो गयी। उषा का आगमन हुआ, हवा जागी, चिड़ियॉँ गानेलगीं। सहसा महादेव के कानों में आवाज आयी—
‘सत्त गुरुदत्त शिवदत्त दाता,
राम के चरण में चित्त लगा।’
यह बोल सदैव महादेव की जिह्वा पर रहता था। दिन में सहस्रों ही बार ये शब्दउसके मुँह से निकलते थे, पर उनका धार्मिक भाव कभी भी उसके अन्त:कारण कोस्पर्श न करता था। जैसे किसी बाजे से राग निकलता हैं, उसी प्रकार उसके मुँहसे यह बोल निकलता था। निरर्थक और प्रभाव-शून्य। तब उसका हृदय-रुपी वृक्षपत्र-पल्लव विहीन था। यह निर्मल वायु उसे गुंजरित न कर सकती थी; पर अब उसवृक्ष में कोपलें और शाखाऍं निकल आयी थीं। इन वायु-प्रवाह से झूम उठा, गुंजित हो गया।
अरुणोदय का समय था। प्रकृति एक अनुरागमय प्रकाश में डूबी हुई थी। उसी समयतोता पैरों को जोड़े हुए ऊँची डाल से उतरा, जैसे आकाश से कोई तारा टूटे और आकर पिंजड़े में बैठ गया। महादेव प्रफुल्लित हो कर दौड़ा और पिंजड़े को उठाकर बोला—आओ आत्माराम तुमने कष्ट तो बहुत दिया, पर मेरा जीवन भी सफल करदिया। अब तुम्हें चॉँदी के पिंजड़े में रखूंगा और सोने से मढ़ दूँगा।’ उसकेरोम-रोम के परमात्मा के गुणानुवाद की ध्वनि निकलने लगी। प्रभु तुम कितनेदयावान् हो ! यह तुम्हारा असीम वात्सल्य है, नहीं तो मुझ पापी, पतित प्राणीकब इस कृपा के योग्य था ! इस पवित्र भावों से आत्मा विन्हल हो गयी ! वहअनुरक्त हो कर कह उठा—
‘सत्त गुरुदत्त शिवदत्त दाता,
राम के चरण में चित्त लागा।’

उसने एक हाथ में पिंजड़ा लटकाया, बगल में कलसा दबाया और घर चला।


                                                 ५
महादेव घर पहुँचा, तो अभी कुछ अँधेरा था। रास्ते में एक कुत्ते के सिवा औरकिसी से भेंट न हुई, और कुत्ते को मोहरों से विशेष प्रेम नहीं होता। उसनेकलसे को एक नाद में छिपा दिया, और कोयले से अच्छी तरह ढँक कर अपनी कोठरीमें रख आया। जब दिन निकल आया तो वह सीधे पुराहित के घर पहुँचा। पुरोहितपूजा पर बैठे सोच रहे थे—कल ही मुकदमें की पेशी हैं और अभी तक हाथ मेंकौड़ी भी नहीं—यजमानो में कोई सॉँस भी लेता। इतने में महादेव ने पालागन की।पंड़ित जी ने मुँह फेर लिया। यह अमंगलमूर्ति कहॉँ से आ पहुँची, मालमूनहीं, दाना भी मयस्सर होगा या नहीं। रुष्ट हो कर पूछा—क्या है जी, क्याकहते हो। जानते नहीं, हम इस समय पूजा पर रहते हैं।
महादेव ने कहा—महाराज, आज मेरे यहॉँ सत्यनाराण की कथा है।
पुरोहित जी विस्मित हो गये। कानों पर विश्वास न हुआ। महादेव
के घर कथा का होना उतनी ही असाधारण घटना थी, जितनी अपने घर से किसी भिखारी के लिए भीख निकालना। पूछा—आज क्या है?
महादेव बोला—कुछ नहीं, ऐसा इच्छा हुई कि आज भगवान की कथा सुन लूँ।
प्रभात ही से तैयारी होने लगी। वेदों के निकटवर्ती गॉँवो में सूपारी फिरी।कथा के उपरांत भोज का भी नेवता था। जो सुनता आश्चर्य करता आज रेत में दूबकैसे जमी।
संध्या समय जब सब लोग जमा हो, और पंडित जी अपने सिंहासन पर विराजमान हुए, तो महादेव खड़ा होकर उच्च स्वर में बोला—भाइयों मेरी सारी उम्र छल-कपट मेंकट गयी। मैंने न जाने कितने आदमियों को दगा दी, कितने खरे को खोटा किया; परअब भगवान ने मुझ पर दया की है, वह मेरे मुँह की कालिख को मिटाना चाहतेहैं। मैं आप सब भाइयों से ललकार कर कहता हूँ कि जिसका मेरे जिम्मे जो कुछनिकलता हो, जिसकी जमा मैंने मार ली हो, जिसके चोखे माल का खोटा कर दिया हो, वह आकर अपनी एक-एक कौड़ी चुका ले, अगर कोई यहॉँ न आ सका हो, तो आप लोगउससे जाकर कह दीजिए, कल से एक महीने तक, जब जी चाहे, आये और अपना हिसाबचुकता कर ले। गवाही-साखी का काम नहीं।
सब लोग सन्नाटे में आ गये। कोई मार्मिक भाव से सिर हिला कर बोला—हम कहते नथे। किसी ने अविश्वास से कहा—क्या खा कर भरेगा, हजारों को टोटल हो जायगा।
एक ठाकुर ने ठठोली की—और जो लोग सुरधाम चले गये।
महादेव ने उत्तर दिया—उसके घर वाले तो होंगे।
किन्तु इस समय लोगों को वसूली की इतनी इच्छा न थी, जितनी यह जानने की किइसे इतना धन मिल कहॉँ से गया। किसी को महादेव के पास आने का साहस न हुआ।देहात के आदमी थे, गड़े मुर्दे उखाड़ना क्या जानें। फिर प्राय: लोगों कोयाद भी न था कि उन्हें महादेव से क्या पाना हैं, और ऐसे पवित्र अवसर परभूल-चूक हो जाने का भय उनका मुँह बन्द किये हुए था। सबसे बड़ी बात यह थी किमहादेव की साधुता ने उन्हीं वशीभूत कर लिया था।
अचानक पुरोहित जी बोले—तुम्हें याद हैं, मैंने एक कंठा बनाने के लिए सोना दिया था, तुमने कई माशे तौल में उड़ा दिये थे।
महादेव—हॉँ, याद हैं, आपका कितना नुकसान हुआ होग।
पुरोहित—पचास रुपये से कम न होगा।
महादेव ने कमर से दो मोहरें निकालीं और पुरोहित जी के सामने रख दीं।
पुरोहितजी की लोलुपता पर टीकाऍं होने लगीं। यह बेईमानी हैं, बहुत हो, तोदो-चार रुपये का नुकसान हुआ होगा। बेचारे से पचास रुपये ऐंठ लिए। नारायण काभी डर नहीं। बनने को पंड़ित, पर नियत ऐसी खराब राम-राम !
लोगों को महादेव पर एक श्रद्धा-सी हो गई। एक घंटा बीत गया पर उन सहस्रोंमनुष्यों में से एक भी खड़ा न हुआ। तब महादेव ने फिर कहॉँ—मालूम होता है, आप लोग अपना-अपना हिसाब भूल गये हैं, इसलिए आज कथा होने दीजिए। मैं एकमहीने तक आपकी राह देखूँगा। इसके पीछे तीर्थ यात्रा करने चला जाऊँगा। आप सबभाइयों से मेरी विनती है कि आप मेरा उद्धार करें।
एक महीने तक महादेव लेनदारों की राह देखता रहा। रात को चोंरो के भय से नींदन आती। अब वह कोई काम न करता। शराब का चसका भी छूटा। साधु-अभ्यागत जोद्वार पर आ जाते, उनका यथायोग्य सत्कार करता। दूर-दूर उसका सुयश फैल गया।यहॉँ तक कि महीना पूरा हो गया और एक आदमी भी हिसाब लेने न आया। अब महादेवको ज्ञान हुआ कि संसार में कितना धर्म, कितना सद्व्यवहार हैं। अब उसे मालूमहुआ कि संसार बुरों के लिए बुरा हैं और अच्छे के लिए अच्छा।


                                                ६
इस घटना को हुए पचास वर्ष बीत चुके हैं। आप वेदों जाइये, तो दूर ही से एकसुनहला कलस दिखायी देता है। वह ठाकुरद्वारे का कलस है। उससे मिला हुआ एकपक्का तालाब हैं, जिसमें खूब कमल खिले रहते हैं। उसकी मछलियॉँ कोई नहींपकड़ता; तालाब के किनारे एक विशाल समाधि है। यही आत्माराम का स्मृति-चिन्हहै, उसके सम्बन्ध में विभिन्न किंवदंतियॉँ प्रचलित है। कोई कहता हैं, वहरत्नजटित पिंजड़ा स्वर्ग को चला गया, कोई कहता, वह ‘सत्त गुरुदत्त’ कहताहुआ अंतर्ध्यान हो गया, पर यर्थाथ यह हैं कि उस पक्षी-रुपी चंद्र को किसीबिल्ली-रुपी राहु ने ग्रस लिया। लोग कहते हैं, आधी रात को अभी तक तालाब केकिनारे आवाज आती है—
‘सत्त गुरुदत्त शिवदत्त दाता,
राम के चरण में चित्त लागा।’
महादेव के विषय में भी कितनी ही जन-श्रुतियॉँ है। उनमें सबसे मान्य यह हैकि आत्माराम के समाधिस्थ होने के बाद वह कई संन्यासियों के साथ हिमालय चलागया, और वहॉँ से लौट कर न आया। उसका नाम आत्माराम प्रसिद्ध हो गया।

 

ईश्वरीय न्याय - प्रेमचंद

कानपुर जिले में पंडित भृगुदत्त नामक एक बड़े जमींदार थे। मुंशीसत्यनारायण उनके कारिंदा थे। वह बड़े स्वामिभक्त और सच्चरित्र मनुष्य थे।लाखों रुपये की तहसील और हजारों मन अनाज का लेन-देन उनके हाथ में था; परकभी उनकी नियत डावॉँडोल न होती। उनके सुप्रबंध से रियासत दिनोंदिन उन्नतिकरती जाती थी। ऐसे कत्तर्व्यपरायण सेवक का जितना सम्मान होना चाहिए, उससेअधिक ही होता था। दु:ख-सुख के प्रत्येक अवसर पर पंडित जी उनके साथ बड़ीउदारता से पेश आते। धीरे-धीरे मुंशी जी का विश्वास इतना बढ़ा कि पंडित जीने हिसाब-किताब का समझना भी छोड़ दिया। सम्भव है, उनसे आजीवन इसी तरह निभजाती, पर भावी प्रबल है। प्रयाग में कुम्भ लगा, तो पंडित जी भी स्नान करनेगये। वहॉँ से लौटकर फिर वे घर न आये। मालूम नहीं, किसी गढ़े में फिसल पड़ेया कोई जल-जंतु उन्हें खींच ले गया, उनका फिर कुछ पता ही न चला। अब मुंशीसत्यनाराण के अधिकार और भी बढ़े। एक हतभागिनी विधवा और दो छोटे-छोटे बच्चोंके सिवा पंडित जी के घर में और कोई न था। अंत्येष्टि-क्रिया से निवृत्तहोकर एक दिन शोकातुर पंडिताइन ने उन्हें बुलाया और रोकर कहा—लाला, पंडित जीहमें मँझधार में छोड़कर सुरपुर को सिधर गये, अब यह नैया तुम्ही पार लगाओगेतो लग सकती है। यह सब खेती तुम्हारी लगायी हुई है, इसे तुम्हारे ही ऊपरछोड़ती हूँ। ये तुम्हारे बच्चे हैं, इन्हें अपनाओ। जब तक मालिक जिये, तुम्हें अपना भाई समझते रहे। मुझे विश्वास है कि तुम उसी तरह इस भार कोसँभाले रहोगे।

सत्यनाराण ने रोते हुए जवाब दिया—भाभी, भैया क्या उठ गये, मेरे तो भाग्य ही फूट गये, नहीं तो मुझे आदमी बना देते। मैं उन्हीं का नमकखाकर जिया हूँ और उन्हीं की चाकरी में मरुँगा भी। आप धीरज रखें। किसीप्रकार की चिंता न करें। मैं जीते-जी आपकी सेवा से मुँह न मोडूँगा। आप केवलइतना कीजिएगा कि मैं जिस किसी की शिकायत करुँ, उसे डॉँट दीजिएगा; नहीं तोये लोग सिर चढ़ जायेंगे।


                                               2

इस घटना के बाद कई वर्षो तकमुंशीजी ने रियासत को सँभाला। वह अपने काम में बड़े कुशल थे। कभी एक कौड़ीका भी बल नहीं पड़ा। सारे जिले में उनका सम्मान होने लगा। लोग पंडित जी कोभूल-सा गये। दरबारों और कमेटियों में वे सम्मिलित होते, जिले के अधिकारीउन्हीं को जमींदार समझते। अन्य रईसों में उनका आदर था; पर मान-वृद्वि कीमहँगी वस्तु है। और भानुकुँवरि, अन्य स्त्रियों के सदृश पैसे को खूबपकड़ती। वह मनुष्य की मनोवृत्तियों से परिचित न थी। पंडित जी हमेशा लाला जीको इनाम इकराम देते रहते थे। वे जानते थे कि ज्ञान के बाद ईमान का दूसरास्तम्भ अपनी सुदशा है। इसके सिवा वे खुद भी कभी कागजों की जॉँच कर लियाकरते थे। नाममात्र ही को सही, पर इस निगरानी का डर जरुर बना रहता था; क्योंकि ईमान का सबसे बड़ा शत्रु अवसर है। भानुकुँवरि इन बातों को जानती नथी। अतएव अवसर तथा धनाभाव-जैसे प्रबल शत्रुओं के पंजे में पड़ कर मुंशीजीका ईमान कैसे बेदाग बचता?
कानपुर शहर से मिला हुआ, ठीक गंगा के किनारे, एक बहुत आजाद और उपजाऊ गॉँव था। पंडित जी इस गॉँव को लेकर नदी-किनारे पक्काघाट, मंदिर, बाग, मकान आदि बनवाना चाहते थे; पर उनकी यह कामना सफल न होसकी। संयोग से अब यह गॉँव बिकने लगा। उनके जमींदार एक ठाकुर साहब थे। किसीफौजदारी के मामले में फँसे हुए थे। मुकदमा लड़ने के लिए रुपये की चाह थी।मुंशीजी ने कचहरी में यह समाचार सुना। चटपट मोल-तोल हुआ। दोनों तरफ गरज थी।सौदा पटने में देर न लगी, बैनामा लिखा गया। रजिस्ट्री हुई। रुपये मौजूद नथे, पर शहर में साख थी। एक महाजन के यहॉँ से तीस हजार रुपये मँगवाये गये औरठाकुर साहब को नजर किये गये। हॉँ, काम-काज की आसानी के खयाल से यह सबलिखा-पढ़ी मुंशीजी ने अपने ही नाम की; क्योंकि मालिक के लड़के अभी नाबालिगथे। उनके नाम से लेने में बहुत झंझट होती और विलम्ब होने से शिकार हाथ सेनिकल जाता। मुंशीजी बैनामा लिये असीम आनंद में मग्न
भानुकुँवरि के पासआये। पर्दा कराया और यह शुभ-समाचार सुनाया। भानुकुँवरि ने सजल नेत्रों सेउनको धन्यवाद दिया। पंडित जी के नाम पर मन्दिर और घाट बनवाने का इरादापक्का हो गया।
मुँशी जी दूसरे ही दिन उस गॉँव में आये। आसामी नजरानेलेकर नये स्वामी के स्वागत को हाजिर हुए। शहर के रईसों की दावत हुई। लोगोंके नावों पर बैठ कर गंगा की खूब सैर की। मन्दिर आदि बनवाने के लिए आबादी सेहट कर रमणीक स्थान चुना गया।

                                                 3

यद्यपि इस गॉँव को अपने नामलेते समय मुंशी जी के मन में कपट का भाव न था, तथापि दो-चार दिन में हीउनका अंकुर जम गया और धीरे-धीरे बढ़ने लगा। मुंशी जी इस गॉँव के आय-व्यय काहिसाब अलग रखते और अपने स्वामिनों को उसका ब्योरो समझाने की जरुरत नसमझते। भानुकुँवरि इन बातों में दखल देना उचित न समझती थी; पर दूसरेकारिंदों से बातें सुन-सुन कर उसे शंका होती थी कि कहीं मुंशी जी दगा तो नदेंगे। अपने मन का भाव मुंशी से छिपाती थी, इस खयाल से कि कहीं कारिंदों नेउन्हें हानि पहुँचाने के लिए यह षड़यंत्र न रचा हो।
इस तरह कई साल गुजरगये। अब उस कपट के अंकुर ने वृक्ष का रुप धारण किया। भानुकुँवरि को मुंशीजी के उस मार्ग के लक्षण दिखायी देने लगे। उधर मुंशी जी के मन ने कानून सेनीति पर विजय पायी, उन्होंने अपने मन में फैसला किया कि गॉँव मेरा है। हॉँ, मैं भानुकुँवरि का तीस हजार का ऋणी अवश्य हूँ। वे बहुत करेंगी तो अपनेरुपये ले लेंगी और क्या कर सकती हैं? मगर दोनों तरफ यह आग अन्दर ही अन्दरसुलगती रही। मुंशी जी अस्त्रसज्जित होकर आक्रमण के इंतजार में थे औरभानुकुँवरि इसके लिए अवसर ढूँढ़ रही थी। एक दिन उसने साहस करके मुंशी जी कोअन्दर बुलाया और कहा—लाला जी ‘बरगदा’ के मन्दिर का काम कब से लगवाइएगा? उसे लिये आठ साल हो गये, अब काम लग जाय तो अच्छा हो। जिंदगी का कौन ठिकानाहै, जो काम करना है; उसे कर ही डालना चाहिए।
इस ढंग से इस विषय को उठाकर भानुकुँवरि ने अपनी चतुराई का अच्छा परिचय दिया। मुंशी जी भी दिल मेंइसके कायल हो गये। जरा सोच कर बोले—इरादा तो मेरा कई बार हुआ, पर मौके कीजमीन नहीं मिलती। गंगातट की जमीन असामियों के जोत में है और वे किसी तरहछोड़ने पर राजी नहीं।
भानुकुँवरि—यह बात तो आज मुझे मालूम हुई। आठ सालहुए, इस गॉँव के विषय में आपने कभी भूल कर भी दी तो चर्चा नहीं की। मालूमनहीं, कितनी तहसील है, क्या मुनाफा है, कैसा गॉँव है, कुछ सीर होती है यानहीं। जो कुछ करते हैं, आप ही करते हैं और करेंगे। पर मुझे भी तो मालूमहोना चाहिए?
मुंशी जी सँभल उठे। उन्हें मालूम हो गया कि इस चतुर स्त्रीसे बाजी ले जाना मुश्किल है। गॉँव लेना ही है तो अब क्या डर। खुल करबोले—आपको इससे कोई सरोकार न था, इसलिए मैंने व्यर्थ कष्ट देना मुनासिब नसमझा।
भानुकुँवरि के हृदय में कुठार-सा लगा। पर्दे से निकल आयी और मुंशीजी की तरफ तेज ऑंखों से देख कर बोली—आप क्या कहते हैं! आपने गॉँव मेरेलिये लिया था या अपने लिए! रुपये मैंने दिये या आपने? उस पर जो खर्च पड़ा, वह मेरा था या आपका? मेरी समझ में नहीं आता कि आप कैसी बातें करते हैं।
मुंशीजी ने सावधानी से जवाब दिया—यह तो आप जानती हैं कि गॉँव हमारे नाम से बसाहुआ है। रुपया जरुर आपका लगा, पर मैं उसका देनदार हूँ। रहा तहसील-वसूल काखर्च, यह सब मैंने अपने पास से दिया है। उसका हिसाब-किताब, आय-व्यय सब रखतागया हूँ।
भानुकुँवरि ने क्रोध से कॉँपते हुए कहा—इस कपट का फल आपकोअवश्य मिलेगा। आप इस निर्दयता से मेरे बच्चों का गला नहीं काट सकते। मुझेनहीं मालूम था कि आपने हृदय में छुरी छिपा रखी है, नहीं तो यह नौबत हीक्यों आती। खैर, अब से मेरी रोकड़ और बही खाता आप कुछ न छुऍं। मेरा जो कुछहोगा, ले लूँगी। जाइए, एकांत में बैठ कर सोचिए। पाप से किसी का भला नहींहोता। तुम समझते होगे कि बालक अनाथ हैं, इनकी सम्पत्ति हजम कर लूँगा। इसभूल में न रहना, मैं तुम्हारे घर की ईट तक बिकवा लूँगी।
यह कहकरभानुकुँवरि फिर पर्दे की आड़ में आ बैठी और रोने लगी। स्त्रियॉँ क्रोध केबाद किसी न किसी बहाने रोया करती हैं। लाला साहब को कोई जवाब न सूझा। यहॉँसे उठ आये और दफ्तर जाकर कागज उलट-पलट करने लगे, पर भानुकुँवरि भी उनकेपीछे-पीछे दफ्तर में पहुँची और डॉँट कर बोली—मेरा कोई कागज मत छूना। नहींतो बुरा होगा। तुम विषैले साँप हो, मैं तुम्हारा मुँह नहीं देखना चाहती।
मुंशीजी कागजों में कुछ काट-छॉँट करना चाहते थे, पर विवश हो गये। खजाने कीकुन्जी निकाल कर फेंक दी, बही-खाते पटक दिये, किवाड़ धड़ाके-से बंद किये औरहवा की तरह सन्न-से निकल गये। कपट में हाथ तो डाला, पर कपट मन्त्र न जाना।
दूसरेंकारिंदों ने यह कैफियत सुनी, तो फूले न समाये। मुंशी जी के सामने उनकी दालन गलने पाती। भानुकुँवरि के पास आकर वे आग पर तेल छिड़कने लगे। सब लोग इसविषय में सहमत थे कि मुंशी सत्यनारायण ने विश्वासघात किया है। मालिक का नमकउनकी हड्डियों से फूट-फूट कर निकलेगा।
दोनों ओर से मुकदमेबाजी कीतैयारियॉँ होने लगीं! एक तरफ न्याय का शरीर था, दूसरी ओर न्याय की आत्मा।प्रकृति का पुरुष से लड़ने का साहस हुआ।
भानकुँवरि ने लाला छक्कन लाल सेपूछा—हमारा वकील कौन है? छक्कन लाल ने इधर-उधर झॉँक कर कहा—वकील तो सेठ जीहैं, पर सत्यनारायण ने उन्हें पहले गॉँठ रखा होगा। इस मुकदमें के लिए बड़ेहोशियार वकील की जरुरत है। मेहरा बाबू की आजकल खूब चल रही है। हाकिम कीकलम पकड़ लेते हैं। बोलते हैं तो जैसे मोटरकार छूट जाती है सरकार! और क्याकहें, कई आदमियों को फॉँसी से उतार लिया है, उनके सामने कोई वकील जबान तोखोल नहीं सकता। सरकार कहें तो वही कर लिये जायँ।
छक्कन लाल की अत्युक्तिसे संदेह पैदा कर लिया। भानुकुँवरि ने कहा—नहीं, पहले सेठ जी से पूछ लियाजाय। उसके बाद देखा जायगा। आप जाइए, उन्हें बुला लाइए।
छक्कनलाल अपनीतकदीर को ठोंकते हुए सेठ जी के पास गये। सेठ जी पंडित भृगुदत्त के जीवन-कालसे ही उनका कानून-सम्बन्धी सब काम किया करते थे। मुकदमे का हाल सुना तोसन्नाटे में आ गये। सत्यनाराण को यह बड़ा नेकनीयत आदमी समझते थे। उनके पतनसे बड़ा खेद हुआ। उसी वक्त आये। भानुकुँवरि ने रो-रो कर उनसे अपनी विपत्तिकी कथा कही और अपने दोनों लड़कों को उनके सामने खड़ा करके बोली—आप इनअनाथों की रक्षा कीजिए। इन्हें मैं आपको सौंपती हूँ।
सेठ जी ने समझौते की बात छेड़ी। बोले—आपस की लड़ाई अच्छी नहीं।
भानुकुँवरि—अन्यायी के साथ लड़ना ही अच्छा है।
सेठ जी—पर हमारा पक्ष निर्बल है।
भानुकुँवरिफिर पर्दे से निकल आयी और विस्मित होकर बोली—क्या हमारा पक्ष निर्बल है? दुनिया जानती है कि गॉँव हमारा है। उसे हमसे कौन ले सकता है? नहीं, मैंसुलह कभी न करुँगी, आप कागजों को देखें। मेरे बच्चों की खातिर यह कष्टउठायें। आपका परिश्रम निष्फल न जायगा। सत्यनारायण की नीयत पहले खराब न थी।देखिए जिस मिती में गॉँव लिया गया है, उस मिती में तीस हजार का क्या खर्चदिखाया गया है। अगर उसने अपने नाम उधार लिखा हो, तो देखिए, वार्षिक सूदचुकाया गया या नहीं। ऐसे नरपिशाच से मैं कभी सुलह न करुँगी।
सेठ जी ने समझ लिया कि इस समय समझाने-बुझाने से कुछ काम न चलेगा। कागजात देखें, अभियोग चलाने की तैयारियॉँ होने लगीं।

                                            4

मुंशीसत्यनारायणलाल खिसियाये हुए मकान पहुँचे। लड़के ने मिठाई मॉँगी। उसे पीटा।स्त्री पर इसलिए बरस पड़े कि उसने क्यों लड़के को उनके पास जाने दिया।अपनी वृद्धा माता को डॉँट कर कहा—तुमसे इतना भी नहीं हो सकता कि जरा लड़केको बहलाओ? एक तो मैं दिन-भर का थका-मॉँदा घर आऊँ और फिर लड़के को खेलाऊँ? मुझे दुनिया में न और कोई काम है, न धंधा। इस तरह घर में बावैला मचा करबाहर आये, सोचने लगे—मुझसे बड़ी भूल हुई। मैं कैसा मूर्ख हूँ। और इतने दिनतक सारे कागज-पत्र अपने हाथ में थे। चाहता, कर सकता था, पर हाथ पर हाथ धरेबैठे रहा। आज सिर पर आ पड़ी, तो सूझी। मैं चाहता तो बही-खाते सब नये बनासकता था, जिसमें इस गॉँव का और रुपये का जिक्र ही न होता, पर मेरी मूर्खताके कारण घर में आयी हुई लक्ष्मी रुठी जाती हैं। मुझे क्या मालूम था कि वहचुड़ैल मुझसे इस तरह पेश आयेगी, कागजों में हाथ तक न लगाने देगी।
इसीउधेड़बुन में मुंशी जी एकाएक उछल पड़े। एक उपाय सूझ गया—क्यों नकार्यकर्त्ताओं को मिला लूँ? यद्यपि मेरी सख्ती के कारण वे सब मुझसे नाराजथे और इस समय सीधे बात भी न करेंगे, तथापि उनमें ऐसा कोई भी नहीं, जोप्रलोभन से मुठ्ठी में न आ जाय। हॉँ, इसमें रुपये पानी की तरह बहानापड़ेगा, पर इतना रुपया आयेगा कहॉँ से? हाय दुर्भाग्य? दो-चार दिन पहले चेतगया होता, तो कोई कठिनाई न पड़ती। क्या जानता था कि वह डाइन इस तरहवज्र-प्रहार करेगी। बस, अब एक ही उपाय है। किसी तरह कागजात गुम कर दूँ।बड़ी जोखिम का काम है, पर करना ही पड़ेगा।
दुष्कामनाओं के सामने एक बारसिर झुकाने पर फिर सँभलना कठिन हो जाता है। पाप के अथाह दलदल में जहॉँ एकबार पड़े कि फिर प्रतिक्षण नीचे ही चले जाते हैं। मुंशी सत्यनारायण-साविचारशील मनुष्य इस समय इस फिक्र में था कि कैसे सेंध लगा पाऊँ!
मुंशीजी ने सोचा—क्या सेंध लगाना आसान है? इसके वास्ते कितनी चतुरता, कितनासाहब, कितनी बुद्वि, कितनी वीरता चाहिए! कौन कहता है कि चोरी करना आसान कामहै? मैं जो कहीं पकड़ा गया, तो मरने के सिवा और कोई मार्ग न रहेगा।
बहुतसोचने-विचारने पर भी मुंशी जी को अपने ऊपर ऐसा दुस्साहस कर सकने काविश्वास न हो सका। हॉँ, इसमें सुगम एक दूसरी तदबीर नजर आयी—क्यों न दफ्तरमें आग लगा दूँ? एक बोतल मिट्टी का तेल और दियासलाई की जरुरत हैं किसीबदमाश को मिला लूँ, मगर यह क्या मालूम कि वही उसी कमरे में रखी है या नहीं।चुड़ैल ने उसे जरुर अपने पास रख लिया होगा। नहीं; आग लगाना गुनाह बेलज्जतहोगा।
बहुत देर मुंशी जी करवटें बदलते रहे। नये-नये मनसूबे सोचते; परफिर अपने ही तर्को से काट देते। वर्षाकाल में बादलों की नयी-नयी सूरतेंबनती और फिर हवा के वेग से बिगड़ जाती हैं; वही दशा इस समय उनके मनसूबों कीहो रही थी।
पर इस मानसिक अशांति में भी एक विचार पूर्णरुप से स्थिरथा—किसी तरह इन कागजात को अपने हाथ में लाना चाहिए। काम कठिन है—माना! परहिम्मत न थी, तो रार क्यों मोल ली? क्या तीस हजार की जायदाद दाल-भात का कौरहै?—चाहे जिस तरह हो, चोर बने बिना काम नहीं चल सकता। आखिर जो लोग चोरियॉँकरते हैं, वे भी तो मनुष्य ही होते हैं। बस, एक छलॉँग का काम है। अगर पारहो गये, तो राज करेंगे, गिर पड़े, तो जान से हाथ धोयेंगे।

                                               5

रातके दस बज गये। मुंशी सत्यनाराण कुंजियों का एक गुच्छा कमर में दबाये घर सेबाहर निकले। द्वार पर थोड़ा-सा पुआल रखा हुआ था। उसे देखते ही वे चौंकपड़े। मारे डर के छाती धड़कने लगी। जान पड़ा कि कोई छिपा बैठा है। कदम रुकगये। पुआल की तरफ ध्यान से देखा। उसमें बिलकुल हरकत न हुई! तब हिम्मतबॉँधी, आगे बड़े और मन को समझाने लगे—मैं कैसा बौखल हूँ
अपने द्वार परकिसका डर और सड़क पर भी मुझे किसका डर है? मैं अपनी राह जाता हूँ। कोई मेरीतरफ तिरछी ऑंख से नहीं देख सकता। हॉँ, जब मुझे सेंध लगाते देख ले—नहीं, पकड़ ले तब अलबत्ते डरने की बात है। तिस पर भी बचाव की युक्ति निकल सकतीहै।
अकस्मात उन्होंने भानुकुँवरि के एक चपरासी को आते हुए देखा। कलेजाधड़क उठा। लपक कर एक अँधेरी गली में घुस गये। बड़ी देर तक वहॉँ खड़े रहे।जब वह सिपाही ऑंखों से ओझल हो गया, तब फिर सड़क पर आये। वह सिपाही आज सुबहतक इनका गुलाम था, उसे उन्होंने कितनी ही बार गालियॉँ दी थीं, लातें मारीथीं, पर आज उसे देखकर उनके प्राण सूख गये।
उन्होंने फिर तर्क की शरण ली।मैं मानों भंग खाकर आया हूँ। इस चपरासी से इतना डरा मानो कि वह मुझे देखलेता, पर मेरा कर क्या सकता था? हजारों आदमी रास्ता चल रहे हैं। उन्हीं मेंमैं भी एक हूँ। क्या वह अंतर्यामी है? सबके हृदय का हाल जानता है? मुझेदेखकर वह अदब से सलाम करता और वहॉँ का कुछ हाल भी कहता; पर मैं उससे ऐसाडरा कि सूरत तक न दिखायी। इस तरह मन को समझा कर वे आगे बढ़े। सच है, पाप केपंजों में फँसा हुआ मन पतझड़ का पत्ता है, जो हवा के जरा-से झोंके से गिरपड़ता है।
मुंशी जी बाजार पहुँचे। अधिकतर दूकानें बंद हो चुकी थीं।उनमें सॉँड़ और गायें बैठी हुई जुगाली कर रही थी। केवलहलवाइयों की दूकानेंखुली थी और कहीं-कहीं गजरेवाले हार की हॉँक लगाते फिरते थे। सब हलवाईमुंशी जी को पहचानते थे, अतएव मुंशी जी ने सिर झुका लिया। कुछ चाल बदली औरलपकते हुए चले। एकाएक उन्हें एक बग्घी आती दिखायी दी। यह सेठ बल्लभदाससवकील की बग्घी थी। इसमें बैठकर हजारों बार सेठ जी के साथ कचहरी गये थे, परआज वह बग्घी कालदेव के समान भयंकर मालूम हुई। फौरन एक खाली दूकान पर चढ़गये। वहॉँ विश्राम करने वाले सॉँड़ ने समझा, वे मुझे पदच्युत करने आये हैं!माथा झुकाये फुंकारता हुआ उठ बैठा; पर इसी बीच में बग्घी निकल गयी औरमुंशी जी की जान में जान आयी। अबकी उन्होंने तर्क का आश्रय न लिया। समझ गयेकि इस समय इससे कोई लाभ नहीं, खैरियत यह हुई कि वकील ने देखा नहीं। यह एकघाघ हैं। मेरे चेहरे से ताड़ जाता।
कुछ विद्वानों का कथन है कि मनुष्यकी स्वाभाविक प्रवृत्ति पाप की ओर होती है, पर यह कोरा अनुमान ही अनुमानहै, अनुभव-सिद्ध बात नहीं। सच बात तो यह है कि मनुष्य स्वभावत: पाप-भीरुहोता है और हम प्रत्यक्ष देख रहे हैं कि पाप से उसे कैसी घृणा होती है।
एकफर्लांग आगे चल कर मुंशी जी को एक गली मिली। वह भानुकुँवरि के घर का एकरास्ता था। धुँधली-सी लालटेन जल रही थी। जैसा मुंशी जी ने अनुमान किया था, पहरेदार का पता न था। अस्तबल में चमारों के यहॉँ नाच हो रहा था। कईचमारिनें बनाव-सिंगार करके नाच रही थीं। चमार मृदंग बजा-बजा कर गाते थे—
‘नाहीं घरे श्याम, घेरि आये बदरा।
सोवत रहेउँ, सपन एक देखेउँ, रामा।
खुलि गयी नींद, ढरक गये कजरा।
नाहीं घरे श्याम, घेरि आये बदरा।’
दोनोंपहरेदार वही तमाशा देख रहे थे। मुंशी जी दबे-पॉँव लालटेन के पास गए और जिसतरह बिल्ली चूहे पर झपटती है, उसी तरह उन्होंने झपट कर लालटेन को बुझादिया। एक पड़ाव पूरा हो गया, पर वे उस कार्य को जितना दुष्कर समझते थे, उतना न जान पड़ा। हृदय कुछ मजबूत हुआ। दफ्तर के बरामदे में पहुँचे और खूबकान लगाकर आहट ली। चारों ओर सन्नाटा छाया हुआ था। केवल चमारों का कोलाहलसुनायी देता था। इस समय मुंशी जी के दिल में धड़कन थी, पर सिर धमधम कर रहाथा; हाथ-पॉँव कॉँप रहे थे, सॉँस बड़े वेग से चल रही थी। शरीर का एक-एक रोमऑंख और कान बना हुआ था। वे सजीवता की मूर्ति हो रहे थे। उनमें जितना पौरुष, जितनी चपलता, जितना-साहस, जितनी चेतना, जितनी बुद्वि, जितना औसान था, वेसब इस वक्त सजग और सचेत होकर इच्छा-शक्ति की सहायता कर रहे थे।
दफ्तर केदरवाजे पर वही पुराना ताला लगा हुआ था। इसकी कुंजी आज बहुत तलाश करके वेबाजार से लाये थे। ताला खुल गया, किवाड़ो ने बहुत दबी जबान से प्रतिरोधकिया। इस पर किसी ने ध्यान न दिया। मुंशी जी दफ्तर में दाखिल हुए। भीतरचिराग जल रहा था। मुंशी जी को देख कर उसने एक दफे सिर हिलाया, मानो उन्हेंभीतर आने से रोका।
मुंशी जी के पैर थर-थर कॉँप रहे थे। एड़ियॉँ जमीन से उछली पड़तीथीं। पाप का बोझ उन्हें असह्य था।
पल-भरमें मुंशी जी ने बहियों को उलटा-पलटा। लिखावट उनकी ऑंखों में तैर रही थी।इतना अवकाश कहॉँ था कि जरुरी कागजात छॉँट लेते। उन्होंनें सारी बहियों कोसमेट कर एक गट्ठर बनाया और सिर पर रख कर तीर के समान कमरे के बाहर निकलआये। उस पाप की गठरी को लादे हुए वह अँधेरी गली से गायब हो गए।
तंग, अँधेरी, दुर्गन्धपूर्ण कीचड़ से भरी हुई गलियों में वे नंगे पॉँव, स्वार्थ, लोभ और कपट का बोझ लिए चले जाते थे। मानो पापमय आत्मा नरक की नालियों मेंबही चली जाती थी।
बहुत दूर तक भटकने के बाद वे गंगा किनारे पहुँचे। जिसतरह कलुषित हृदयों में कहीं-कहीं धर्म का धुँधला प्रकाश रहता है, उसी तरहनदी की काली सतह पर तारे झिलमिला रहे थे। तट पर कई साधु धूनी जमाये पड़ेथे। ज्ञान की ज्वाला मन की जगह बाहर दहक रही थी। मुंशी जी ने अपना गट्ठरउतारा और चादर से खूब मजबूत बॉँध कर बलपूर्वक नदी में फेंक दिया। सोती हुईलहरों में कुछ हलचल हुई और फिर सन्नाटा हो गया।

                                                6

मुंशीसतयनाराणलाल के घर में दो स्त्रियॉँ थीं—माता और पत्नी। वे दोनोंअशिक्षिता थीं। तिस पर भी मुंशी जी को गंगा में डूब मरने या कहीं भाग जानेकी जरुरत न होती थी ! न वे बॉडी पहनती थी, न मोजे-जूते, न हारमोनियम पर गासकती थी। यहॉँ तक कि उन्हें साबुन लगाना भी न आता था। हेयरपिन, ब्रुचेज, जाकेट आदि परमावश्यक चीजों का तो नाम ही नहीं सुना था। बहू में आत्म-सम्मानजरा भी नहीं था; न सास में आत्म-गौरव का जोश। बहू अब तक सास की घुड़कियॉँभीगी बिल्ली की तरह सह लेती थी—हा मूर्खे ! सास को बच्चे के नहलाने-धुलाने, यहॉँ तक कि घर में झाड़ू देने से भी घृणा न थी, हा ज्ञानांधे! बहू स्त्रीक्या थी, मिट्टी का लोंदा थी। एक पैसे की जरुरत होती तो सास से मॉँगती।सारांश यह कि दोनों स्त्रियॉँ अपने अधिकारों से बेखबर, अंधकार में पड़ी हुईपशुवत् जीवन व्यतीत करती थीं। ऐसी फूहड़ थी कि रोटियां भी अपने हाथों सेबना लेती थी। कंजूसी के मारे दालमोट, समोसे कभी बाजार से न मँगातीं। आगरेवाले की दूकान की चीजें खायी होती तो उनका मजा जानतीं। बुढ़िया खूसटदवा-दरपन भी जानती थी। बैठी-बैठी घास-पात कूटा करती।
मुंशी जी ने मॉँ के पास जाकर कहा—अम्मॉँ ! अब क्या होगा? भानुकुँवरि ने मुझे जवाब दे दिया।
माता ने घबरा कर पूछा—जवाब दे दिया?
मुंशी—हॉँ, बिलकुल बेकसूर!
माता—क्या बात हुई? भानुकुँवरि का मिजाज तो ऐसा न था।
मुंशी—बातकुछ न थी। मैंने अपने नाम से जो गॉँव लिया था, उसे मैंने अपने अधिकार मेंकर लिया। कल मुझसे और उनसे साफ-साफ बातें हुई। मैंने कह दिया कि गॉँव मेराहै। मैंने अपने नाम से लिया है, उसमें तुम्हारा कोई इजारा नहीं। बस, बिगड़गयीं, जो मुँह में आया, बकती रहीं। उसी वक्त मुझे निकाल दिया और धमका करकहा—मैं तुमसे लड़ कर अपना गॉँव ले लूँगी। अब आज ही उनकी तरफ से मेरे ऊपरमुकदमा दायर होगा; मगर इससे होता क्या है? गॉँव मेरा है। उस पर मेरा कब्जाहै। एक नहीं, हजार मुकदमें चलाएं, डिगरी मेरी होगी?
माता ने बहू की तरफ मर्मांतक दृष्टि से देखा और बोली—क्यों भैया? वह गॉँव लिया तो था तुमने उन्हीं के रुपये से और उन्हीं के वास्ते?
मुंशी—लियाथा, तब लिया था। अब मुझसे ऐसा आबाद और मालदार गॉँव नहीं छोड़ा जाता। वहमेरा कुछ नहीं कर सकती। मुझसे अपना रुपया भी नहीं ले सकती। डेढ़ सौ गॉँव तोहैं। तब भी हवस नहीं मानती।
माना—बेटा, किसी के धन ज्यादा होता है, तोवह उसे फेंक थोड़े ही देता है? तुमने अपनी नीयत बिगाड़ी, यह अच्छा काम नहींकिया। दुनिया तुम्हें क्या कहेगी? और दुनिया चाहे कहे या न कहे, तुमको भलाऐसा करना चाहिए कि जिसकी गोद में इतने दिन पले, जिसका इतने दिनों तक नमकखाया, अब उसी से दगा करो? नारायण ने तुम्हें क्या नहीं दिया? मजे से खातेहो, पहनते हो, घर में नारायण का दिया चार पैसा है, बाल-बच्चे हैं, और क्याचाहिए? मेरा कहना मानो, इस कलंक का टीका अपने माथे न लगाओ। यह अपजस मत लो।बरक्कत अपनी कमाई में होती है; हराम की कौड़ी कभी नहीं फलती।
मुंशी—ऊँह!ऐसी बातें बहुत सुन चुका हूँ। दुनिया उन पर चलने लगे, तो सारे काम बन्द होजायँ। मैंने इतने दिनों इनकी सेवा की, मेरी ही बदौलत ऐसे-ऐसे चार-पॉँचगॉँव बढ़ गए। जब तक पंडित जी थे, मेरी नीयत का मान था। मुझे ऑंख में धूलडालने की जरुरत न थी, वे आप ही मेरी खातिर कर दिया करते थे। उन्हें मरे आठसाल हो गए; मगर मुसम्मात के एक बीड़े पान की कसम खाता हूँ; मेरी जात सेउनको हजारों रुपये-मासिक की बचत होती थी। क्या उनको इतनी भी समझ न थी कि यहबेचारा, जो इतनी ईमानदारी से मेरा काम करता है, इस नफे में कुछ उसे भीमिलना चाहिए? यह कह कर न दो, इनाम कह कर दो, किसी तरह दो तो, मगर वे तोसमझती थी कि मैंने इसे बीस रुपये महीने पर मोल ले लिया है। मैंने आठ साल तकसब किया, अब क्या इसी बीस रुपये में गुलामी करता रहूँ और अपने बच्चों कोदूसरों का मुँह ताकने के लिए छोड़ जाऊँ? अब मुझे यह अवसर मिला है। इसेक्यों छोडूँ? जमींदारी की लालसा लिये हुए क्यों मरुँ? जब तक जीऊँगा, खुदखाऊँगा। मेरे पीछे मेरे बच्चे चैन उड़ायेंगे।
माता की ऑंखों में ऑंसू भरआये। बोली—बेटा, मैंने तुम्हारे मुँह से ऐसी बातें कभी नहीं सुनी थीं, तुम्हें क्या हो गया है? तुम्हारे आगे बाल-बच्चे हैं। आग में हाथ न डालो।
बहू ने सास की ओर देख कर कहा—हमको ऐसा धन न चाहिए, हम अपनी दाल-रोटी में मगन हैं।
मुंशी—अच्छी बात है, तुम लोग रोटी-दाल खाना, गाढ़ा पहनना, मुझे अब हल्वे-पूरी की इच्छा है।
माता—यह अधर्म मुझसे न देखा जायगा। मैं गंगा में डूब मरुँगी।
पत्नी—तुम्हें यह सब कॉँटा बोना है, तो मुझे मायके पहुँचा दो, मैं अपने बच्चों को लेकर इस घर में न रहूँगी!
मुंशीने झुँझला कर कहा—तुम लोगों की बुद्वि तो भॉँग खा गयी है। लाखों सरकारीनौकर रात-दिन दूसरों का गला दबा-दबा कर रिश्वतें लेते हैं और चैन करते हैं।न उनके बाल-बच्चों ही को कुछ होता है, न उन्हीं को हैजा पकड़ता है। अधर्मउनको क्यों नहीं खा जाता, जो मुझी को खा जायगा। मैंने तो सत्यवादियों कोसदा दु:ख झेलते ही देखा है। मैंने जो कुछ किया है, सुख लूटूँगा। तुम्हारेमन में जो आये, करो।
प्रात:काल दफ्तर खुला तो कागजात सब गायब थे। मुंशी छक्कनलाल बौखलाये से घर में गये और मालकिन से पूछा—कागजात आपने उठवा लिए हैं।
भानुकुँवरि ने कहा—मुझे क्या खबर, जहॉँ आपने रखे होंगे, वहीं होंगे।
फिरसारे घर में खलबली पड़ गयी। पहरेदारों पर मार पड़ने लगी। भानुकुँवरि कोतुरन्त मुंशी सत्यनारायण पर संदेह हुआ, मगर उनकी समझ में छक्कनलाल कीसहायता के बिना यह काम होना असम्भव था। पुलिस में रपट हुई। एक ओझा नामनिकालने के लिए बुलाया गया। मौलवी साहब ने कुर्रा फेंका। ओझा ने बताया, यहकिसी पुराने बैरी का काम है। मौलवी साहब ने फरमाया, किसी घर के भेदिये नेयह हरकत की है। शाम तक यह दौड़-धूप रही। फिर यह सलाह होने लगी कि इनकागजातों के बगैर मुकदमा कैसे चले। पक्ष तो पहले से ही निर्बल था। जो कुछबल था, वह इसी बही-खाते का था। अब तो सबूत भी हाथ से गये। दावे में कुछ जानही न रही, मगर भानकुँवरि ने कहा—बला से हार जाऍंगे। हमारी चीज कोई छीन ले, तो हमारा धर्म है कि उससे यथाशक्ति लड़ें, हार कर बैठना कायरों का काम है।सेठ जी (वकील) को इस दुर्घटना का समाचार मिला तो उन्होंने भी यही कहा किअब दावे में जरा भी जान नहीं है। केवल अनुमान और तर्क का भरोसा है। अदालतने माना तो माना, नहीं तो हार माननी पड़ेगी। पर भानुकुँवरि ने एक न मानी।लखनऊ और इलाहाबाद से दो होशियार बैरिस्टिर बुलाये। मुकदमा शुरु हो गया।
सारेशहर में इस मुकदमें की धूम थी। कितने ही रईसों को भानुकुँवरि ने साथीबनाया था। मुकदमा शुरु होने के समय हजारों आदमियों की भीड़ हो जाती थी।लोगों के इस खिंचाव का मुख्य कारण यह था कि भानुकुँवरि एक पर्दे की आड़ मेंबैठी हुई अदालत की कारवाई देखा करती थी, क्योंकि उसे अब अपने नौकरों परजरा भी विश्वास न था।
वादी बैरिस्टर ने एक बड़ी मार्मिक वक्तृता दी।उसने सत्यनाराण की पूर्वावस्था का खूब अच्छा चित्र खींचा। उसने दिखलाया किवे कैसे स्वामिभक्त, कैसे कार्य-कुशल, कैसे कर्म-शील थे; और स्वर्गवासीपंडित भृगुदत्त का उस पर पूर्ण विश्वास हो जाना, किस तरह स्वाभाविक था।इसके बाद उसने सिद्ध किया कि मुंशी सत्यनारायण की आर्थिक व्यवस्था कभी ऐसी नथी कि वे इतना धन-संचय करते। अंत में उसने मुंशी जी की स्वार्थपरता, कूटनीति, निर्दयता और विश्वास-घातकता का ऐसा घृणोत्पादक चित्र खींचा कि लोगमुंशी जी को गोलियॉँ देने लगे। इसके साथ ही उसने पंडित जी के अनाथ बालकोंकी दशा का बड़ा करूणोत्पादक वर्णन किया—कैसे शोक और लज्जा की बात है कि ऐसाचरित्रवान, ऐसा नीति-कुशल मनुष्य इतना गिर जाय कि अपने स्वामी के अनाथबालकों की गर्दन पर छुरी चलाने पर संकोच न करे। मानव-पतन का ऐसा करुण, ऐसाहृदय-विदारक उदाहरण मिलना कठिन है। इस कुटिल कार्य के परिणाम की दृष्टि सेइस मनुष्य के पूर्व परिचित सदगुणों का गौरव लुप्त हो जाता है। क्योंकि वेअसली मोती नहीं, नकली कॉँच के दाने थे, जो केवल विश्वास जमाने के निमित्तदर्शाये गये थे। वह केवल सुंदर जाल था, जो एक सरल हृदय और छल-छंद से दूररहने वाले रईस को फँसाने के लिए फैलाया गया था। इस नर-पशु का अंत:करण कितनाअंधकारमय, कितना कपटपूर्ण, कितना कठोर है; और इसकी दुष्टता कितनी घोर, कितनी अपावन है। अपने शत्रु के साथ दया करना एक बार तो क्षम्य है, मगर इसमलिन हृदय मनुष्य ने उन बेकसों के साथ दगा दिया है, जिन पर मानव-स्वभाव केअनुसार दया करना उचित है! यदि आज हमारे पास बही-खाते मौजूद होते, अदालत परसत्यनारायण की सत्यता स्पष्ट रुप से प्रकट हो जाती, पर मुंशी जी के बरखास्तहोते ही दफ्तर से उनका लुप्त हो जाना भी अदालत के लिए एक बड़ा सबूत है।
शहर में कई रईसों ने गवाही दी, पर सुनी-सुनायी बातें जिरह में उखड़ गयीं। दूसरे दिन फिर मुकदमा पेश हुआ।
प्रतिवादीके वकील ने अपनी वक्तृता शुरु की। उसमें गंभीर विचारों की अपेक्षा हास्यका आधिक्य था—यह एक विलक्षण न्याय-सिद्धांत है कि किसी धनाढ़य मनुष्य कानौकर जो कुछ खरीदे, वह उसके स्वामी की चीज समझी जाय। इस सिद्धांत के अनुसारहमारी गवर्नमेंट को अपने कर्मचारियों की सारी सम्पत्ति पर कब्जा कर लेनाचाहिए। यह स्वीकार करने में हमको कोई आपत्ति नहीं कि हम इतने रुपयों काप्रबंध न कर सकते थे और यह धन हमने स्वामी ही से ऋण लिया; पर हमसे ऋणचुकाने का कोई तकाजा न करके वह जायदाद ही मॉँगी जाती है। यदि हिसाब केकागजात दिखलाये जायँ, तो वे साफ बता देंगे कि मैं सारा ऋण दे चुका। हमारेमित्र ने कहा कि ऐसी अवस्था में बहियों का गुम हो जाना भी अदालत के लिये एकसबूत होना चाहिए। मैं भी उनकी युक्ति का समर्थन करता हूँ। यदि मैं आपसे ऋणले कर अपना विवाह करुँ तो क्या मुझसे मेरी नव-विवाहित वधू को छीन लेंगे?
‘हमारेसुयोग मित्र ने हमारे ऊपर अनाथों के साथ दगा करने का दोष लगाया है। अगरमुंशी सत्यनाराण की नीयत खराब होती, तो उनके लिए सबसे अच्छा अवसर वह था जबपंडित भृगुदत्त का स्वर्गवास हुआ था। इतने विलम्ब की क्या जरुरत थी? यदि आपशेर को फँसा कर उसके बच्चे को उसी वक्त नहीं पकड़ लेते, उसे बढ़ने और सबलहोने का अवसर देते हैं, तो मैं आपको बुद्विमान न कहूँगा। यथार्थ बात यह हैकि मुंशी सत्यनाराण ने नमक का जो कुछ हक था, वह पूरा कर दिया। आठ वर्ष तकतन-मन से स्वामी के संतान की सेवा की। आज उन्हें अपनी साधुता का जो फल मिलरहा है, वह बहुत ही दु:खजनक और हृदय-विदारक है। इसमें भानुकुँवरि का दोषनहीं। वे एक गुण-सम्पन्न महिला हैं; मगर अपनी जाति के अवगुण उनमें भीविद्यमान हैं! ईमानदार मनुष्य स्वभावत: स्पष्टभाषी होता है; उसे अपनी बातोंमें नमक-मिर्च लगाने की जरुरत नहीं होती। यही कारण है कि मुंशी जी केमृदुभाषी मातहतों को उन पर आक्षेप करने का मौका मिल गया। इस दावे की जड़केवल इतनी ही है, और कुछ नहीं। भानुकुँवरि यहॉँ उपस्थित हैं। क्या वे कहसकती हैं कि इस आठ वर्ष की मुद्दत में कभी इस गॉँव का जिक्र उनके सामनेआया? कभी उसके हानि-लाभ, आय-व्यय, लेन-देन की चर्चा उनसे की गयी? मान लीजिएकि मैं गवर्नमेंट का मुलाजिम हूँ। यदि मैं आज दफ्तर में आकर अपनी पत्नी केआय-व्यय और अपने टहलुओं के टैक्सों का पचड़ा गाने लगूँ, तो शायद मुझेशीघ्र ही अपने पद से पृथक होना पड़े, और सम्भव है, कुछ दिनों तक बरेली कीअतिथिशाला में भी रखा जाऊँ। जिस गॉँव से भानुकुँवरि का सरोवार न था, उसकीचर्चा उनसे क्यों की जाती?’
इसके बाद बहुत से गवाह पेश हुए; जिनमेंअधिकांश आस-पास के देहातों के जमींदार थे। उन्होंने बयान किया कि हमनेमुंशी सत्यनारायण असामियों को अपनी दस्तखती रसीदें और अपने नाम से खजानेमें रुपया दाखिल करते देखा है।
इतने में संध्या हो गयी। अदालत ने एक सप्ताह में फैसला सुनाने का हुक्म दिया।

                                                  7

सत्यनाराणको अब अपनी जीत में कोई सन्देह न था। वादी पक्ष के गवाह भी उखड़ गये थे औरबहस भी सबूत से खाली थी। अब इनकी गिनती भी जमींदारों में होगी और सम्भवहै, यह कुछ दिनों में रईस कहलाने लगेंगे। पर किसी न किसी कारण से अब शहर केगणमान्य पुरुषों से ऑंखें मिलाते शर्माते थे। उन्हें देखते ही उनका सिरनीचा हो जाता था। वह मन में डरते थे कि वे लोग कहीं इस विषय पर कुछ पूछ-ताछन कर बैठें। वह बाजार में निकलते तो दूकानदारों में कुछ कानाफूसी होनेलगती और लोग उन्हें तिरछी दृष्टि से देखने लगते। अब तक लोग उन्हें विवेकशीलऔर सच्चरित्र मनुष्य समझते, शहर के धनी-मानी उन्हें इज्जत की निगाह सेदेखते और उनका बड़ा आदर करते थे। यद्यपि मुंशी जी को अब तक इनसेटेढ़ी-तिरछी सुनने का संयोग न पड़ा था, तथापि उनका मन कहता था कि सच्ची बातकिसी से छिपी नहीं है। चाहे अदालत से उनकी जीत हो जाय, पर उनकी साख अबजाती रही। अब उन्हें लोग स्वार्थी, कपटी और दगाबाज समझेंगे। दूसरों की बाततो अलग रही, स्वयं उनके घरवाले उनकी उपेक्षा करते थे। बूढ़ी माता ने तीनदिन से मुँह में पानी नहीं डाला! स्त्री बार-बार हाथ जोड़ कर कहती थी किअपने प्यारे बालकों पर दया करो। बुरे काम का फल कभी अच्छा नहीं होता! नहींतो पहले मुझी को विष खिला दो।
जिस दिन फैसला सुनाया जानेवाला था, प्रात:काल एक कुंजड़िन तरकारियॉँ लेकर आयी और मुंशियाइन से बोली—
‘बहूजी! हमने बाजार में एक बात सुनी है। बुरा न मानों तो कहूँ? जिसको देखो, उसके मुँह से यही बात निकलती है कि लाला बाबू ने जालसाजी से पंडिताइन काकोई हलका ले लिया। हमें तो इस पर यकीन नहीं आता। लाला बाबू ने न सँभालाहोता, तो अब तक पंडिताइन का कहीं पता न लगता। एक अंगुल जमीन न बचती। इन्हींमें एक सरदार था कि सबको सँभाल लिया। तो क्या अब उन्हीं के साथ बदीकरेंगे? अरे बहू! कोई कुछ साथ लाया है कि ले जायगा? यही नेक-बदी रह जातीहै। बुरे का फल बुरा होता है। आदमी न देखे, पर अल्लाह सब कुछ देखता है।’
बहूजी पर घड़ों पानी पड़ गया। जी चाहता था कि धरती फट जाती, तो उसमें समाजाती। स्त्रियॉँ स्वभावत: लज्जावती होती हैं। उनमें आत्माभिमान की मात्राअधिक होती है। निन्दा-अपमान उनसे सहन नहीं हो सकता है। सिर झुकाये हुएबोली—बुआ! मैं इन बातों को क्या जानूँ? मैंने तो आज ही तुम्हारे मुँह सेसुनी है। कौन-सी तरकारियॉँ हैं?
मुंशी सत्यनारायण अपने कमरे में लेटेहुए कुंजड़िन की बातें सुन रहे थे, उसके चले जाने के बाद आकर स्त्री सेपूछने लगे—यह शैतान की खाला क्या कह रही थी।
स्त्री ने पति की ओर सेमुंह फेर लिया और जमीन की ओर ताकते हुए बोली—क्या तुमने नहीं सुना? तुम्हारा गुन-गान कर रही थी। तुम्हारे पीछे देखो, किस-किसके मुँह से येबातें सुननी पड़ती हैं और किस-किससे मुँह छिपाना पड़ता है।
मुंशी जीअपने कमरे में लौट आये। स्त्री को कुछ उत्तर नहीं दिया। आत्मा लज्जा सेपरास्त हो गयी। जो मनुष्य सदैव सर्व-सम्मानित रहा हो; जो सदा आत्माभिमान सेसिर उठा कर चलता रहा हो, जिसकी सुकृति की सारे शहर में चर्चा होती हो, वहकभी सर्वथा लज्जाशून्य नहीं हो सकता; लज्जा कुपथ की सबसे बड़ी शत्रु है।कुवासनाओं के भ्रम में पड़ कर मुंशी जी ने समझा था, मैं इस काम को ऐसीगुप्त-रीति से पूरा कर ले जाऊँगा कि किसी को कानों-कान खबर न होगी, पर उनकायह मनोरथ सिद्ध न हुआ। बाधाऍं आ खड़ी हुई। उनके हटाने में उन्हें बड़ेदुस्साहस से काम लेना पड़ा; पर यह भी उन्होंने लज्जा से बचने के निमित्तकिया। जिसमें यह कोई न कहे कि अपनी स्वामिनी को धोखा दिया। इतना यत्न करनेपर भी निंदा से न बच सके। बाजार का सौदा बेचनेवालियॉँ भी अब अपमान करतींहैं। कुवासनाओं से दबी हुई लज्जा-शक्ति इस कड़ी चोट को सहन न कर सकी। मुंशीजी सोचने लगे, अब मुझे धन-सम्पत्ति मिल जायगी, ऐश्वर्यवान् हो जाऊँगा, परन्तु निन्दा से मेरा पीछा न छूटेगा। अदालत का फैसला मुझे लोक-निन्दा से नबचा सकेगा। ऐश्वर्य का फल क्या है?—मान और मर्यादा। उससे हाथ धो बैठा, तोऐश्वर्य को लेकर क्या करुँगा? चित्त की शक्ति खोकर, लोक-लज्जा सहकर, जनसमुदाय में नीच बन कर और अपने घर में कलह का बीज बोकर यह सम्पत्ति मेरेकिस काम आयेगी? और यदि वास्तव में कोई न्याय-शक्ति हो और वह मुझे इसकुकृत्य का दंड दे, तो मेरे लिए सिवा मुख में कालिख लगा कर निकल जाने के औरकोई मार्ग न रहेगा। सत्यवादी मनुष्य पर कोई विपत्त पड़ती हैं, तो लोग उनकेसाथ सहानुभूति करते हैं। दुष्टों की विपत्ति लोगों के लिए व्यंग्य कीसामग्री बन जाती है। उस अवस्था में ईश्वर अन्यायी ठहराया जाता है; मगरदुष्टों की विपत्ति ईश्वर के न्याय को सिद्ध करती है। परमात्मन! इस दुर्दशासे किसी तरह मेरा उद्धार करो! क्यों न जाकर मैं भानुकुँवरि के पैरों परगिर पड़ूँ और विनय करुँ कि यह मुकदमा उठा लो? शोक! पहले यह बात मुझे क्यों नसूझी? अगर कल तक में उनके पास चला गया होता, तो बात बन जाती; पर अब क्याहो सकता है। आज तो फैसला सुनाया जायगा।
मुंशी जी देर तक इसी विचार में पड़े रहे, पर कुछ निश्चय न कर सके कि क्या करें।
भानुकुँवरिको भी विश्वास हो गया कि अब गॉँव हाथ से गया। बेचारी हाथ मल कर रह गयी।रात-भर उसे नींद न आयी, रह-रह कर मुंशी सत्यनारायण पर क्रोध आता था। हायपापी! ढोल बजा कर मेरा पचास हजार का माल लिए जाता है और मैं कुछ नहीं करसकती। आजकल के न्याय करने वाले बिलकुल ऑंख के अँधे हैं। जिस बात को सारीदुनिया जानती है, उसमें भी उनकी दृष्टि नहीं पहुँचती। बस, दूसरों को ऑंखोंसे देखते हैं। कोरे कागजों के गुलाम हैं। न्याय वह है जो दूध का दूध, पानीका पानी कर दे; यह नहीं कि खुद ही कागजों के धोखे में आ जाय, खुद हीपाखंडियों के जाल में फँस जाय। इसी से तो ऐसी छली, कपटी, दगाबाज, औरदुरात्माओं का साहस बढ़ गया है। खैर, गॉँव जाता है तो जाय; लेकिनसत्यनारायण, तुम शहर में कहीं मुँह दिखाने के लायक भी न रहे।
इस खयाल सेभानुकुँवरि को कुछ शान्ति हुई। शत्रु की हानि मनुष्य को अपने लाभ से भीअधिक प्रिय होती है, मानव-स्वभाव ही कुछ ऐसा है। तुम हमारा एक गॉँव ले गये, नारायण चाहेंगे तो तुम भी इससे सुख न पाओगे। तुम आप नरक की आग में जलोगे, तुम्हारे घर में कोई दिया जलाने वाला न रह जायगा।
फैसले का दिन आ गया।आज इजलास में बड़ी भीड़ थी। ऐसे-ऐसे महानुभाव उपस्थित थे, जो बगुलों की तरहअफसरों की बधाई और बिदाई के अवसरों ही में नजर आया करते हैं। वकीलों औरमुख्तारों की पलटन भी जमा थी। नियत समय पर जज साहब ने इजलास सुशोभित किया।विस्तृत न्याय भवन में सन्नाटा छा गया। अहलमद ने संदूक से तजबीज निकाली।लोग उत्सुक होकर एक-एक कदम और आगे खिसक गए।
जज ने फैसला सुनाया—मुद्दई का दावा खारिज। दोनों पक्ष अपना-अपना खर्च सह लें।
यद्यपिफैसला लोगों के अनुमान के अनुसार ही था, तथापि जज के मुँह से उसे सुन करलोगों में हलचल-सी मच गयी। उदासीन भाव से फैसले पर आलोचनाऍं करते हुए लोगधीरे-धीरे कमरे से निकलने लगे।
एकाएक भानुकुँवरि घूँघट निकाले इजलास पर आकर खड़ी हो गयी। जानेवाले लौट पड़े। जो बाहर निकल गये थे, दौड़ कर आ गये।और कौतूहलपूर्वक भानुकुँवरि की तरफ ताकने लगे।
भानुकुँवरि ने कंपित स्वर में जज से कहा—सरकार, यदि हुक्म दें, तो मैं मुंशी जी से कुछ पूछूँ।
यद्यपि यह बात नियम के विरुद्ध थी, तथापि जज ने दयापूर्वक आज्ञा दे दी।
तबभानुकुँवरि ने सत्यनारायण की तरफ देख कर कहा—लाला जी, सरकार ने तुम्हारीडिग्री तो कर ही दी। गॉँव तुम्हें मुबारक रहे; मगर ईमान आदमी का सब कुछ है।ईमान से कह दो, गॉँव किसका है?
हजारों आदमी यह प्रश्न सुन कर कौतूहल सेसत्यनारायण की तरफ देखने लगे। मुंशी जी विचार-सागर में डूब गये। हृदय मेंसंकल्प और विकल्प में घोर संग्राम होने लगा। हजारों मनुष्यों की ऑंखें उनकीतरफ जमी हुई थीं। यथार्थ बात अब किसी से छिपी न थी। इतने आदमियों के सामनेअसत्य बात मुँह से निकल न सकी। लज्जा से जबान बंद कर ली—‘मेरा’ कहने मेंकाम बनता था। कोई बात न थी; किंतु घोरतम पाप का दंड समाज दे सकता है, उसकेमिलने का पूरा भय था। ‘आपका’ कहने से काम बिगड़ता था। जीती-जितायी बाजी हाथसे निकली जाती थी, सर्वोत्कृष्ट काम के लिए समाज से जो इनाम मिल सकता है, उसके मिलने की पूरी आशा थी। आशा के भय को जीत लिया। उन्हें ऐसा प्रतीत हुआ, जैसे ईश्वर ने मुझे अपना मुख उज्जवल करने का यह अंतिम अवसर दिया है। मैंअब भी मानव-सम्मान का पात्र बन सकता हूँ। अब अपनी आत्मा की रक्षा कर सकताहूँ। उन्होंने आगे बढ़ कर भानुकुँवरि को प्रणाम किया और कॉँपते हुए स्वर सेबोले—आपका!
हजारों मनुष्यों के मुँह से एक गगनस्पर्शी ध्वनि निकली—सत्य की जय!
जजने खड़े होकर कहा—यह कानून का न्याय नहीं, ईश्वरीय न्याय है! इसे कथा नसमझिएगा; यह सच्ची घटना है। भानुकुँवरि और सत्य नारायण अब भी जीवित हैं।मुंशी जी के इस नैतिक साहस पर लोग मुगध हो गए। मानवीय न्याय पर ईश्वरीयन्याय ने जो विलक्षण विजय पायी, उसकी चर्चा शहर भर में महीनों रही।भानुकुँवरि मुंशी जी के घर गयी, उन्हें मना कर लायीं। फिर अपना साराकारोबार उन्हें सौंपा और कुछ दिनों उपरांत यह गॉँव उन्हीं के नाम हिब्बा करदिया। मुंशी जी ने भी उसे अपने अधिकार में रखना उचित न समझा, कृष्णार्पणकर दिया। अब इसकी आमदनी दीन-दुखियों और विद्यार्थियों की सहायता में खर्चहोती है।

 

गुल्ली-डंडा - प्रेमचंद

हमारे अँग्रेजी दोस्त मानें या न मानें मैं तो यही कहूँगा किगुल्ली-डंडा सब खेलों का राजा है। अब भी कभी लड़कों को गुल्ली-डंडा खेलतेदेखता हूँ, तो जी लोट-पोट हो जाता है कि इनके साथ जाकर खेलने लगूँ। न लानकी जरूरत, न कोर्ट की, न नेट की, न थापी की। मजे से किसी पेड़ से एक टहनीकाट ली, गुल्ली बना ली, और दो आदमी भी आ जाए, तो खेल शुरू हो गया।

विलायती खेलों में सबसे बड़ा ऐब है कि उसके सामान महँगे होते हैं। जब तककम-से-कम एक सैंकड़ा न खर्च कीजिए, खिलाड़ियों में शुमार ही नहीं हो पाता।यहॉँ गुल्ली-डंडा है कि बना हर्र-फिटकरी के चोखा रंग देता है; पर हमअँगरेजी चीजों के पीछे ऐसे दीवाने हो रहे हैं कि अपनी सभी चीजों से अरूचिहो गई। स्कूलों में हरेक लड़के से तीन-चार रूपये सालाना केवल खेलने की फीसली जाती है। किसी को यह नहीं सूझता कि भारतीय खेल खिलाऍं, जो बिनादाम-कौड़ी के खेले जाते हैं। अँगरेजी खेल उनके लिए हैं, जिनके पास धन है।गरीब लड़कों के सिर क्यों यह व्यसन मढ़ते हो? ठीक है, गुल्ली से ऑंख फूटजाने का भय रहता है, तो क्या क्रिकेट से सिर फूट जाने, तिल्ली फट जाने, टॉँग टूट जाने का भय नहीं रहता! अगर हमारे माथे में गुल्ली का दाग आज तकबना हुआ है, तो हमारे कई दोस्त ऐसे भी हैं, जो थापी को बैसाखी से बदल बैठे।यह अपनी-अपनी रूचि है। मुझे गुल्ली की सब खेलों से अच्छी लगती है और बचपनकी मीठी स्मृतियों में गुल्ली ही सबसे मीठी है।
वह प्रात:काल घर से निकल जाना, वह पेड़ पर चढ़कर टहनियॉँ काटना औरगुल्ली-डंडे बनाना, वह उत्साह, वह खिलाड़ियों के जमघटे, वह पदना और पदाना, वह लड़ाई-झगड़े, वह सरल स्वभाव, जिससे छूत्-अछूत, अमीर-गरीब का बिल्कुल भेदन रहता था, जिसमें अमीराना चोचलों की, प्रदर्शन की, अभिमान की गुंजाइश ही नथी, यह उसी वक्त भूलेगा जब .... जब ...। घरवाले बिगड़ रहे हैं, पिताजीचौके पर बैठे वेग से रोटियों पर अपना क्रोध उतार रहे हैं, अम्माँ की दौड़केवल द्वार तक है, लेकिन उनकी विचार-धारा में मेरा अंधकारमय भविष्य टूटीहुई नौका की तरह डगमगा रहा है; और मैं हूँ कि पदाने में मस्त हूँ, न नहानेकी सुधि है, न खाने की। गुल्ली है तो जरा-सी, पर उसमें दुनिया-भर कीमिठाइयों की मिठास और तमाशों का आनंद भरा हुआ है।
मेरे हमजोलियों में एक लड़का गया नाम का था। मुझसे दो-तीन साल बड़ा होगा।दुबला, बंदरों की-सी लम्बी-लम्बी, पतली-पतली उँगलियॉँ, बंदरों की-सी चपलता, वही झल्लाहट। गुल्ली कैसी ही हो, पर इस तरह लपकता था, जैसे छिपकली कीड़ोंपर लपकती है। मालूम नहीं, उसके मॉँ-बाप थे या नहीं, कहॉँ रहता था, क्याखाता था; पर था हमारे गुल्ली-कल्ब का चैम्पियन। जिसकी तरफ वह आ जाए, उसकीजीत निश्चित थी। हम सब उसे दूर से आते देख, उसका दौड़कर स्वागत करते थे औरअपना गोइयॉँ बना लेते थे।
एक दिन मैं और गया दो ही खेल रहे थे। वह पदा रहा था। मैं पद रहा था, मगरकुछ विचित्र बात है कि पदाने में हम दिन-भर मस्त रह सकते है; पदना एक मिनटका भी अखरता है। मैंने गला छुड़ाने के लिए सब चालें चलीं, जो ऐसे अवसर परशास्त्र-विहित न होने पर भी क्षम्य हैं, लेकिन गया अपना दॉँव लिए बगैर मेरापिंड न छोड़ता था।
मैं घर की ओर भागा। अननुय-विनय का कोई असर न हुआ था।
गया ने मुझे दौड़कर पकड़ लिया और डंडा तानकर बोला-मेरा दॉँव देकर जाओ। पदाया तो बड़े बहादुर बनके, पदने के बेर क्यों भागे जाते हो।
‘तुम दिन-भर पदाओ तो मैं दिन-भर पदता रहँ?’
‘हॉँ, तुम्हें दिन-भर पदना पड़ेगा।‘
‘न खाने जाऊँ, न पीने जाऊँ?’
‘हॉँ! मेरा दॉँव दिये बिना कहीं नहीं जा सकते।‘
‘मैं तुम्हारा गुलाब हूँ?’
‘हॉँ, मेरे गुलाम हो।‘
‘मैं घर जाता हूँ, देखूँ मेरा क्या कर लेते हो!’
‘घर कैसे जाओगे; कोई दिल्लगी है। दॉँव दिया है, दॉँव लेंगे।‘
‘अच्छा, कल मैंने अमरूद खिलाया था। वह लौटा दो।
‘वह तो पेट में चला गया।‘
‘निकालो पेट से। तुमने क्यों खाया मेरा अमरूद?’
‘अमरूद तुमने दिया, तब मैंने खाया। मैं तुमसे मॉँगने न गया था।‘
‘जब तक मेरा अमरूद न दोगे, मैं दॉँव न दूँगा।‘
मैं समझता था, न्याय मेरी ओर है। आखिर मैंने किसी स्वार्थ से ही उसे अमरूदखिलाया होगा। कौन नि:स्वार्थ किसी के साथ सलूक करता है। भिक्षा तक तोस्वार्थ के लिए देते हैं। जब गया ने अमरूद खाया, तो फिर उसे मुझसे दॉँवलेने का क्या अधिकार है? रिश्वत देकर तो लोग खून पचा जाते हैं, यह मेराअमरूद यों ही हजम कर जाएगा? अमरूद पैसे के पॉँचवाले थे, जो गया के बाप कोभी नसीब न होंगे। यह सरासर अन्याय था।
गया ने मुझे अपनी ओर खींचते हुए कहा-मेरा दॉँव देकर जाओ, अमरूद-समरूद मैं नहीं जानता।
मुझे न्याय का बल था। वह अन्याय पर डटा हुआ था। मैं हाथ छुड़ाकर भागनाचाहता था। वह मुझे जाने न देता! मैंने उसे गाली दी, उसने उससे कड़ी गालीदी, और गाली-ही नहीं, एक चॉँटा जमा दिया। मैंने उसे दॉँत काट लिया। उसनेमेरी पीठ पर डंडा जमा दिया। मैं रोने लगा! गया मेरे इस अस्त्र का मुकाबला नकर सका। मैंने तुरन्त ऑंसू पोंछ डाले, डंडे की चोट भूल गया और हँसता हुआघर जा पहुँचा! मैं थानेदार का लड़का एक नीच जात के लौंडे के हाथों पिट गया, यह मुझे उस समय भी अपमानजनक मालूम हआ; लेकिन घर में किसी से शिकायत न की।

                                                  2

उन्हीं दिनों पिताजी का वहॉँ से तबादला हो गया। नई दुनिया देखने की खुशीमें ऐसा फूला कि अपने हमजोलियों से बिछुड़ जाने का बिलकुल दु:ख न हुआ।पिताजी दु:खी थे। वह बड़ी आमदनी की जगह थी। अम्मॉँजी भी दु:खी थीं यहॉँ सबचीज सस्ती थीं, और मुहल्ले की स्त्रियों से घराव-सा हो गया था, लेकिन मैंसारे खुशी के फूला न समाता था। लड़कों में जीट उड़ा रहा था, वहॉँ ऐसे घरथोड़े ही होते हैं। ऐसे-ऐसे ऊँचे घर हैं कि आसमान से बातें करते हैं। वहॉँके अँगरेजी स्कूल में कोई मास्टर लड़कों को पीटे, तो उसे जेहल हो जाए। मेरेमित्रों की फैली हुई ऑंखे और चकित मुद्रा बतला रही थी कि मैं उनकी निगाहमें कितना स्पर्द्घा हो रही थी! मानो कह रहे थे-तु भागवान हो भाई, जाओ।हमें तो इसी ऊजड़ ग्राम में जीना भी है और मरना भी।
बीस साल गुजर गए। मैंने इंजीनियरी पास की और उसी जिले का दौरा करता हुआ उसीकस्बे में पहँचा और डाकबँगले में ठहरा। उस स्थान को देखते ही इतनी मधुरबाल-स्मृतियॉँ हृदय में जाग उठीं कि मैंने छड़ी उठाई और क्स्बे की सैर करनेनिकला। ऑंखें किसी प्यासे पथिक की भॉँति बचपन के उन क्रीड़ा-स्थलों कोदेखने के लिए व्याकुल हो रही थीं; पर उस परिचित नाम के सिवा वहॉँ और कुछपरिचित न था। जहॉँ खँडहर था, वहॉँ पक्के मकान खड़े थे। जहॉँ बरगद का पुरानापेड़ था, वहॉँ अब एक सुन्दर बगीचा था। स्थान की काया पलट हो गई थी। अगरउसके नाम और स्थिति का ज्ञान न होता, तो मैं उसे पहचान भी न सकता। बचपन कीसंचित और अमर स्मृतियॉँ बॉँहे खोले अपने उन पुराने मित्रों से गले मिलने कोअधीर हो रही थीं; मगर वह दुनिया बदल गई थी। ऐसा जी होता था कि उस धरती सेलिपटकर रोऊँ और कहूँ, तुम मुझे भूल गईं! मैं तो अब भी तुम्हारा वही रूपदेखना चाहता हूँ।
सहसा एक खुली जगह में मैंने दो-तीन लड़कों को गुल्ली-डंडा खेलते देखा। एकक्षण के लिए मैं अपने का बिल्कुल भूल गया। भूल गया कि मैं एक ऊँचा अफसरहूँ, साहबी ठाठ में, रौब और अधिकार के आवरण में।
जाकर एक लड़के से पूछा-क्यों बेटे, यहॉँ कोई गया नाम का आदमी रहता है?
एक लड़के ने गुल्ली-डंडा समेटकर सहमे हुए स्वर में कहा-कौन गया? गया चमार?
मैंने यों ही कहा-हॉँ-हॉँ वही। गया नाम का कोई आदमी है तो? शायद वही हो।
‘हॉँ, है तो।‘
‘जरा उसे बुला सकते हो?’
लड़का दौड़ता हुआ गया और एक क्षण में एक पॉँच हाथ काले देव को साथ लिए आतादिखाई दिया। मैं दूर से ही पहचान गया। उसकी ओर लपकना चाहता था कि उसके गलेलिपट जाऊँ, पर कुछ सोचकर रह गया। बोला-कहो गया, मुझे पहचानते हो?
गया ने झुककर सलाम किया-हॉँ मालिक, भला पहचानूँगा क्यों नहीं! आप मजे में हो?
‘बहुत मजे में। तुम अपनी कहा।‘
‘डिप्टी साहब का साईस हूँ।‘
‘मतई, मोहन, दुर्गा सब कहॉँ हैं?कुछ खबर है?
‘मतई तो मर गया, दुर्गा और मोहन दोनों डाकिया हो गए हैं। आप?’
‘मैं तो जिले का इंजीनिया हूँ।‘
‘सरकार तो पहले ही बड़े जहीन थे?
‘अब कभी गुल्ली-डंडा खेलते हो?’
गया ने मेरी ओर प्रश्न-भरी ऑंखों से देखा-अब गुल्ली-डंडा क्या खेलूँगा सरकार, अब तो धंधे से छुट्टी नहीं मिलती।
‘आओ, आज हम-तुम खेलें। तुम पदाना, हम पदेंगे। तुम्हारा एक दॉँव हमारे ऊपर है। वह आज ले लो।‘
गया बड़ी मुश्किल से राजी हुआ। वह ठहरा टके का मजदूर, मैं एक बड़ा अफसर।हमारा और उसका क्या जोड़? बेचारा झेंप रहा था। लेकिन मुझे भी कुछ कम झेंप नथी; इसलिए नहीं कि मैं गया के साथ खेलने जा रहा था, बल्कि इसलिए कि लोग इसखेल को अजूबा समझकर इसका तमाशा बना लेंगे और अच्छी-खासी भीड़ लग जाएगी। उसभीड़ में वह आनंद कहॉँ रहेगा, पर खेले बगैर तो रहा नहीं जाता। आखिर निश्चयहुआ कि दोनों जने बस्ती से बहुत दूर खेलेंगे और बचपन की उस मिठाई को खूबरस ले-लेकर खाऍंगे। मैं गया को लेकर डाकबँगले पर आया और मोटर में बैठकरदोनों मैदान की ओर चले। साथ में एक कुल्हाड़ी ले ली। मैं गंभीर भाव धारणकिए हुए था, लेकिन गया इसे अभी तक मजाक ही समझ रहा था। फिर भी उसके मुख परउत्सुकता या आनंद का कोई चिह्न न था। शायद वह हम दोनों में जो अंतर हो गयाथा, यही सोचने में मगन था।
मैंने पूछा-तुम्हें कभी हमारी याद आती थी गया? सच कहना।
गया झेंपता हुआ बोला-मैं आपको याद करता हजूर, किस लायक हूँ। भाग में आपके साथ कुछ दिन खेलना बदा था; नहीं मेरी क्या गिनती?
मैंने कुछ उदास होकर कहा-लेकिन मुझे तो बराबर, तुम्हारी याद आती थी। तुम्हारा वह डंडा, जो तुमने तानकर जमाया था, याद है न?
गया ने पछताते हुए कहा-वह लड़कपन था सरकार, उसकी याद न दिलाओ।
‘वाह! वह मेरे बाल-जीवन की सबसे रसीली याद है। तुम्हारे उस डंडे में जो रस था, वह तो अब न आदर-सम्मान में पाता हूँ, न धन में।‘
इतनी देर में हम बस्ती से कोई तीन मील निकल आये। चारों तरफ सन्नाटा है।पश्चिम ओर कोसों तक भीमताल फैला हुआ है, जहॉँ आकर हम किसी समय कमल पुष्पतोड़ ले जाते थे और उसके झूमक बनाकर कानों में डाल लेते थे। जेठ की संध्याकेसर में डूबी चली आ रही है। मैं लपककर एक पेड़ पर चढ़ गया और एक टहनी काटलाया। चटपट गुल्ली-डंडा बन गया। खेल शुरू हो गया। मैंने गुच्ची में गुल्लीरखकर उछाली। गुल्ली गया के सामने से निकल गई। उसने हाथ लपकाया, जैसे मछलीपकड़ रहा हो। गुल्ली उसके पीछे जाकर गिरी। यह वही गया है, जिसके हथों मेंगुल्ली जैसे आप ही आकर बैठ जाती थी। वह दाहने-बाऍं कहीं हो, गुल्ली उसकीहथेली में ही पहूँचती थी। जैसे गुल्लियों पर वशीकरण डाल देता हो। नयीगुल्ली, पुरानी गुल्ली, छोटी गुल्ली, बड़ी गुल्ली, नोकदार गुल्ली, सपाटगुल्ली सभी उससे मिल जाती थी। जैसे उसके हाथों में कोई चुम्बक हो, गुल्लियों को खींच लेता हो; लेकिन आज गुल्ली को उससे वह प्रेम नहीं रहा।फिर तो मैंने पदाना शुरू किया। मैं तरह-तरह की धॉँधलियॉँ कर रहा था। अभ्यासकी कसर बेईमानी से पूरी कर रहा था। हुच जाने पर भी डंडा खुले जाता था।हालॉँकि शास्त्र के अनुसार गया की बारी आनी चाहिए थी। गुल्ली पर ओछी चोटपड़ती और वह जरा दूर पर गिर पड़ती, तो मैं झपटकर उसे खुद उठा लेता औरदोबारा टॉँड़ लगाता। गया यह सारी बे-कायदगियॉँ देख रहा था; पर कुछ न बोलताथा, जैसे उसे वह सब कायदे-कानून भूल गए। उसका निशाना कितना अचूक था। गुल्लीउसके हाथ से निकलकर टन से डंडे से आकर लगती थी। उसके हाथ से छूटकर उसकाकाम था डंडे से टकरा जाना, लेकिन आज वह गुल्ली डंडे में लगती ही नहीं! कभीदाहिने जाती है, कभी बाऍं, कभी आगे, कभी पीछे।
आध घंटे पदाने के बाद एक गुल्ली डंडे में आ लगी। मैंने धॉँधली की-गुल्ली डंडे में नहीं लगी। बिल्कुल पास से गई; लेकिन लगी नहीं।
गया ने किसी प्रकार का असंतोष प्रकट नहीं किया।
‘न लगी होगी।‘
‘डंडे में लगती तो क्या मैं बेईमानी करता?’
‘नहीं भैया, तुम भला बेईमानी करोगे?’
बचपन में मजाल था कि मैं ऐसा घपला करके जीता बचता! यही गया गर्दन पर चढ़बैठता, लेकिन आज मैं उसे कितनी आसानी से धोखा दिए चला जाता था। गधा है!सारी बातें भूल गया।
सहसा गुल्ली फिर डंडे से लगी और इतनी जोर से लगी, जैसे बन्दूक छूटी हो। इसप्रमाण के सामने अब किसी तरह की धांधली करने का साहस मुझे इस वक्त भी न होसका, लेकिन क्यों न एक बार सबको झूठ बताने की चेष्टा करूँ? मेरा हरज कीक्या है। मान गया तो वाह-वाह, नहीं दो-चार हाथ पदना ही तो पड़ेगा। अँधेराका बहाना करके जल्दी से छुड़ा लूँगा। फिर कौन दॉँव देने आता है।
गया ने विजय के उल्लास में कहा-लग गई, लग गई। टन से बोली।
मैंने अनजान बनने की चेष्टा करके कहा-तुमने लगते देखा? मैंने तो नहीं देखा।
‘टन से बोली है सरकार!’
‘और जो किसी ईंट से टकरा गई हो?
मेरे मुख से यह वाक्य उस समय कैसे निकला, इसका मुझे खुद आश्चर्य है। इससत्य को झुठलाना वैसा ही था, जैसे दिन को रात बताना। हम दोनों ने गुल्ली कोडंडे में जोर से लगते देखा था; लेकिन गया ने मेरा कथन स्वीकार कर लिया।
‘हॉँ, किसी ईंट में ही लगी होगी। डंडे में लगती तो इतनी आवाज न आती।‘
मैंने फिर पदाना शुरू कर दिया; लेकिन इतनी प्रत्यक्ष धॉँधली कर लेने के बादगया की सरलता पर मुझे दया आने लगी; इसीलिए जब तीसरी बार गुल्ली डंडे मेंलगी, तो मैंने बड़ी उदारता से दॉँव देना तय कर लिया।
गया ने कहा-अब तो अँधेरा हो गया है भैया, कल पर रखो।
मैंने सोचा, कल बहुत-सा समय होगा, यह न जाने कितनी देर पदाए, इसलिए इसी वक्त मुआमला साफ कर लेना अच्छा होगा।
‘नहीं, नहीं। अभी बहुत उजाला है। तुम अपना दॉँव ले लो।‘
‘गुल्ली सूझेगी नहीं।‘
‘कुछ परवाह नहीं।‘
गया ने पदाना शुरू किया; पर उसे अब बिलकुल अभ्यास न था। उसने दो बार टॉँडलगाने का इरादा किया; पर दोनों ही बार हुच गया। एक मिनिट से कम में वह दॉँवखो बैठा। मैंने अपनी हृदय की विशालता का परिश्च दिया।
‘एक दॉँव और खेल लो। तुम तो पहले ही हाथ में हुच गए।‘
‘नहीं भैया, अब अँधेरा हो गया।‘
‘तुम्हारा अभ्यास छूट गया। कभी खेलते नहीं?’
‘खेलने का समय कहॉँ मिलता है भैया!’
हम दोनों मोटर पर जा बैठे और चिराग जलते-जलते पड़ाव पर पहुँच गए। गयाचलते-चलते बोला-कल यहॉँ गुल्ली-डंडा होगा। सभी पुराने खिलाड़ी खेलेंगे। तुमभी आओगे? जब तुम्हें फुरसत हो, तभी खिलाड़ियों को बुलाऊँ।
मैंने शाम का समय दिया और दूसरे दिन मैच देखने गया। कोई दस-दस आदमियों कीमंडली थी। कई मेरे लड़कपन के साथी निकले! अधिकांश युवक थे, जिन्हें मैंपहचान न सका। खेल शुरू हुआ। मैं मोटर पर बैठा-बैठा तमाशा देखने लगा। आज गयाका खेल, उसका नैपुण्य देखकर मैं चकित हो गया। टॉँड़ लगाता, तो गुल्लीआसमान से बातें करती। कल की-सी वह झिझक, वह हिचकिचाहट, वह बेदिली आज न थी।लड़कपन में जो बात थी, आज उसेन प्रौढ़ता प्राप्त कर ली थी। कहीं कल इसनेमुझे इस तरह पदाया होता, तो मैं जरूर रोने लगता। उसके डंडे की चोट खाकरगुल्ली दो सौ गज की खबर लाती थी।
पदने वालों में एक युवक ने कुछ धॉँधली की। उसने अपने विचार में गुल्ली लपकली थी। गया का कहना था-गुल्ली जमीन मे लगकर उछली थी। इस पर दोनों में तालठोकने की नौबत आई है। युवक दब गया। गया का तमतमाया हुआ चेहरा देखकर डर गया।अगर वह दब न जाता, तो जरूर मार-पीट हो जाती।
मैं खेल में न था; पर दूसरों के इस खेल में मुझे वही लड़कपन का आनन्द आ रहाथा, जब हम सब कुछ भूलकर खेल में मस्त हो जाते थे। अब मुझे मालूम हुआ कि कलगया ने मेरे साथ खेला नहीं, केवल खेलने का बहाना किया। उसने मुझे दया कापात्र समझा। मैंने धॉँधली की, बेईमानी की, पर उसे जरा भी क्रोध न आया।इसलिए कि वह खेल न रहा था, मुझे खेला रहा था, मेरा मन रख रहा था। वह मुझेपदाकर मेरा कचूमर नहीं निकालना चाहता था। मैं अब अफसर हूँ। यह अफसरी मेरेऔर उसके बीच में दीवार बन गई है। मैं अब उसका लिहाज पा सकता हूँ, अदब पासकता हूँ, साहचर्य नहीं पा सकता। लड़कपन था, तब मैं उसका समकक्ष था। यह पदपाकर अब मैं केवल उसकी दया योग्य हूँ। वह मुझे अपना जोड़ नहीं समझता। वहबड़ा हो गया है, मैं छोटा हो गया हूँ।

 

ठाकुर का कुआँ - प्रेमचंद

जोखू ने लोटा मुंह से लगाया तो पानी में सख्त बदबू आई । गंगी से बोला-यहकैसा पानी है ? मारे बास के पिया नहीं जाता । गला सूखा जा रहा है और तूसडा पानी पिलाए देती है !

गंगी प्रतिदिन शाम पानी भर लिया करती थी ।कुआं दूर था, बार-बार जाना मुश्किल था । कल वह पानी लायी, तो उसमें बूबिलकुल न थी, आज पानी में बदबू कैसी ! लोटा नाक से लगाया, तो सचमुच बदबू थी। जरुर कोई जानवर कुएं में गिरकर मर गया होगा, मगर दूसरा पानी आवे कहांसे?
ठाकुर के कुंए पर कौन चढ़नें देगा ? दूर से लोग डॉँट बताऍगे । साहूका कुऑं गॉँव के उस सिरे पर है, परन्तु वहॉं कौन पानी भरने देगा ? कोई कुऑंगॉँव में नहीं है।
जोखू कई दिन से बीमार हैं । कुछ देर तक तो प्यासरोके चुप पड़ा रहा, फिर बोला-अब तो मारे प्यास के रहा नहीं जाता । ला, थोड़ा पानी नाक बंद करके पी लूं ।
गंगी ने पानी न दिया । खराब पानी सेबीमारी बढ़ जाएगी इतना जानती थी, परंतु यह न जानती थी कि पानी को उबाल देनेसे उसकी खराबी जाती रहती हैं । बोली-यह पानी कैसे पियोंगे ? न जाने कौनजानवर मरा हैं। कुऍ से मै दूसरा पानी लाए देती हूँ।
जोखू ने आश्चर्य से उसकी ओर देखा-पानी कहॉ से लाएगी ?
ठाकुर और साहू के दो कुऍं तो हैं। क्यो एक लोटा पानी न भरन देंगे?
‘हाथ-पांवतुड़वा आएगी और कुछ न होगा । बैठ चुपके से । ब्राहम्ण देवता आशीर्वाददेंगे, ठाकुर लाठी मारेगें, साहूजी एक पांच लेगें । गराबी का दर्द कौनसमझता हैं ! हम तो मर भी जाते है, तो कोई दुआर पर झॉँकनें नहीं आता, कंधादेना तो बड़ी बात है। ऐसे लोग कुएँ से पानी भरने देंगें ?’
इन शब्दों में कड़वा सत्य था । गंगी क्या जवाब देती, किन्तु उसने वह बदबूदार पानी पीने को न दिया ।

                                                  2

रातके नौ बजे थे । थके-मॉँदे मजदूर तो सो चुके थें, ठाकुर के दरवाजे परदस-पॉँच बेफिक्रे जमा थें मैदान में । बहादुरी का तो न जमाना रहा है, नमौका। कानूनी बहादुरी की बातें हो रही थीं । कितनी होशियारी से ठाकुर नेथानेदार को एक खास मुकदमे की नकल ले आए । नाजिर और मोहतिमिम, सभी कहते थें, नकल नहीं मिल सकती । कोई पचास मॉँगता, कोई सौ। यहॉ बे-पैसे-कौड़ी नकल उड़ादी । काम करने ढ़ग चाहिए ।
इसी समय गंगी कुऍ से पानी लेने पहुँची।
कुप्पीकी धुँधली रोशनी कुऍं पर आ रही थी । गंगी जगत की आड़ मे बैठी मौके काइंतजार करने लगी । इस कुँए का पानी सारा गॉंव पीता हैं । किसी के लिए रोकानहीं, सिर्फ ये बदनसीब नहीं भर सकते ।
गंगी का विद्रोही दिल रिवाजीपाबंदियों और मजबूरियों पर चोटें करने लगा-हम क्यों नीच हैं और ये लोगक्यों ऊचें हैं ? इसलिए किये लोग गले में तागा डाल लेते हैं ? यहॉ तो जितनेहै, एक-से-एक छॅटे हैं । चोरी ये करें, जाल-फरेब ये करें, झूठे मुकदमे येकरें । अभी इस ठाकुर ने तो उस दिन बेचारे गड़रिए की भेड़ चुरा ली थी और बादमे मारकर खा गया । इन्हीं पंडित के घर में तो बारहों मास जुआ होता है। यहीसाहू जी तो घी में तेल मिलाकर बेचते है । काम करा लेते हैं, मजूरी देतेनानी मरती है । किस-किस बात मे हमसे ऊँचे हैं, हम गली-गली चिल्लाते नहीं किहम ऊँचे है, हम ऊँचे । कभी गॉँव में आ जाती हूँ, तो रस-भरी आँख से देखनेलगते हैं। जैसे सबकी छाती पर सॉँप लोटने लगता है, परंतु घमंड यह कि हम ऊँचेहैं!
कुऍं पर किसी के आने की आहट हुई । गंगी की छाती धक-धक करने लगी ।कहीं देख ले तो गजब हो जाए । एक लात भी तो नीचे न पड़े । उसाने घड़ा औररस्सी उठा ली और झुककर चलती हुई एक वृक्ष के अँधरे साए मे जा खड़ी हुई । कबइन लोगों को दया आती है किसी पर ! बेचारे महगू को इतना मारा कि महीनो लहूथूकता रहा। इसीलिए तो कि उसने बेगार न दी थी । इस पर ये लोग ऊँचे बनते हैं ?
कुऍं पर स्त्रियाँ पानी भरने आयी थी । इनमें बात हो रही थीं ।
‘खान खाने चले और हुक्म हुआ कि ताजा पानी भर लाओं । घड़े के लिए पैसे नहीं है।’
हम लोगों को आराम से बैठे देखकर जैसे मरदों को जलन होती हैं ।’
‘हाँ, यह तो न हुआ कि कलसिया उठाकर भर लाते। बस, हुकुम चला दिया कि ताजा पानी लाओ, जैसे हम लौंडियाँ ही तो हैं।’
‘लौडिंयॉँ नहीं तो और क्या हो तुम? रोटी-कपड़ा नहीं पातीं ? दस-पाँच रुपये भी छीन-झपटकर ले ही लेती हो। और लौडियॉं कैसी होती हैं!’
‘मतलजाओं, दीदी! छिन-भर आराम करने को ती तरसकर रह जाता है। इतना काम किसीदूसरे के घर कर देती, तो इससे कहीं आराम से रहती। ऊपर से वह एहसान मानता !यहॉं काम करते-करते मर जाओं, पर किसी का मुँह ही सीधा नहीं होता ।’
दानोंपानी भरकर चली गई, तो गंगी वृक्ष की छाया से निकली और कुऍं की जगत के पासआयी । बेफिक्रे चले गऐ थें । ठाकुर भी दरवाजा बंदर कर अंदर ऑंगन में सोनेजा रहे थें । गंगी ने क्षणिक सुख की सॉस ली। किसी तरह मैदान तो साफ हुआ।अमृत चुरा लाने के लिए जो राजकुमार किसी जमाने में गया था, वह भी शायद इतनीसावधानी के साथ और समझ्-बूझकर न गया हो । गंगी दबे पॉँव कुऍं की जगत परचढ़ी, विजय का ऐसा अनुभव उसे पहले कभी न हुआ ।
उसने रस्सी का फंदा घड़ेमें डाला । दाऍं-बाऍं चौकनी दृष्टी से देखा जैसे कोई सिपाही रात को शत्रुके किले में सूराख कर रहा हो । अगर इस समय वह पकड़ ली गई, तो फिर उसके लिएमाफी या रियायत की रत्ती-भर उम्मीद नहीं । अंत मे देवताओं को याद करके उसनेकलेजा मजबूत किया और घड़ा कुऍं में डाल दिया ।
घड़े ने पानी में गोतालगाया, बहुत ही आहिस्ता । जरा-सी आवाज न हुई । गंगी ने दो-चार हाथजल्दी-जल्दी मारे ।घड़ा कुऍं के मुँह तक आ पहुँचा । कोई बड़ा शहजोर पहलवानभी इतनी तेजी से न खींसच सकता था।
गंगी झुकी कि घड़े को पकड़कर जगत पर रखें कि एकाएक ठाकुर साहब का दरवाजा खुल गया । शेर का मुँह इससे अधिक भयानक न होगा।
गंगी के हाथ रस्सी छूट गई । रस्सी के साथ घड़ा धड़ाम से पानी में गिरा और कई क्षण तक पानी में हिलकोरे की आवाजें सुनाई देती रहीं ।
ठाकुर कौन है, कौन है ? पुकारते हुए कुऍं की तरफ जा रहे थें और गंगी जगत से कूदकर भागी जा रही थी ।
घर पहुँचकर देखा कि लोटा मुंह से लगाए वही मैला गंदा पानी रहा है।

 

दो बैलों की कथा - प्रेमचंद

जानवरों में गधा सबसे ज्यादा बुद्धिमान समझा जाता है। हम जब किसी आदमीको पहले दर्जे का बेवकूफ कहना चाहते हैं, तो उसे गधा कहते हैं। गधा सचमुचबेवकूफ है या उसके सीधेपन, उसकी निरापद सहिष्णुता ने उसे यह पदवी दे दी है, इसका निश्चय नहीं किया जा सकता। गायें सींग मारती हैं, ब्याही हुई गाय तोअनायास ही सिंहनी का रूप धारण कर लेती है। कुत्ता भी बहुत गरीब जानवर है, लेकिन कभी-कभी उसे भी क्रोध आ ही जाता है, किन्तु गधे को कभी क्रोध करतेनहीं सुना, न देखा। जितना चाहो गरीब को मारो, चाहे जैसी खराब, सड़ी हुई घाससामने डाल दो, उसके चेहरे पर कभी असंतोष की छाया भी नहीं दिखाई देगी।वैशाख में चाहे एकाध बार कुलेल कर लेता है, पर हमने तो उसे कभी खुश होतेनहीं देखा। उसके चेहरे पर स्थाई विषाद स्थायी रूप से छाया रहता है।सुख-दुःख, हानि-लाभ किसी भी दशा में उसे बदलते नहीं देखा। ऋषियों-मुनियोंके जितने गुण हैं, वे सभी उसमें पराकाष्ठा को पहुँच गए हैं, पर आदमी उसेबेवकूफ कहता है। सद्गुणों का इतना अनादर!


कदाचित सीधापन संसार केलिए उपयुक्त नहीं है। देखिए न, भारतवासियों की अफ्रीका में क्या दुर्दशा होरही है ? क्यों अमरीका में उन्हें घुसने नहीं दिया जाता? बेचारे शराब नहींपीते, चार पैसे कुसमय के लिए बचाकर रखते हैं, जी तोड़कर काम करते हैं, किसी से लड़ाई-झगड़ा नहीं करते, चार बातें सुनकर गम खा जाते हैं फिर भीबदनाम हैं। कहा जाता है, वे जीवन के आदर्श को नीचा करते हैं। अगर वे ईंट काजवाब पत्थर से देना सीख जाते तो शायद सभ्य कहलाने लगते। जापान की मिसालसामने है। एक ही विजय ने उसे संसार की सभ्य जातियों में गण्य बना दिया।लेकिन गधे का एक छोटा भाई और भी है, जो उससे कम ही गधा है। और वह है ‘बैल’।जिस अर्थ में हम 'गधा' का प्रयोग करते हैं, कुछ उसी से मिलते-जुलते अर्थमें ‘बछिया के ताऊ’ का भी प्रयोग करते हैं। कुछ लोग बैल को शायद बेवकूफीमें सर्वश्रेष्ठ कहेंगे, मगर हमारा विचार ऐसा नहीं है। बैल कभी-कभी मारताभी है, कभी-कभी अड़ियल बैल भी देखने में आता है। और भी कई रीतियों से अपनाअसंतोष प्रकट कर देता है, अतएवं उसका स्थान गधे से नीचा है।

झूरी कपास दो बैल थे- हीरा और मोती। देखने में सुंदर, काम में चौकस, डील मेंऊंचे। बहुत दिनों साथ रहते-रहते दोनों में भाईचारा हो गया था। दोनोंआमने-सामने या आस-पास बैठे हुए एक-दूसरे से मूक भाषा में विचार-विनिमय कियाकरते थे। एक-दूसरे के मन की बात को कैसे समझा जाता है, हम कह नहीं सकते।अवश्य ही उनमें कोई ऐसी गुप्त शक्ति थी, जिससे जीवों में श्रेष्ठता का दावाकरने वाला मनुष्य वंचित है। दोनों एक-दूसरे को चाटकर सूँघकर अपना प्रेमप्रकट करते, कभी-कभी दोनों सींग भी मिला लिया करते थे, विग्रह के नाते सेनहीं, केवल विनोद के भाव से, आत्मीयता के भाव से, जैसे दोनों में घनिष्ठताहोते ही धौल-धप्पा होने लगता है। इसके बिना दोस्ती कुछ फुसफसी, कुछहल्की-सी रहती है, फिर ज्यादा विश्वास नहीं किया जा सकता। जिस वक्त येदोनों बैल हल या गाड़ी में जोत दिए जाते और गरदन हिला-हिलाकर चलते, उस समयहर एक की चेष्टा होती कि ज्यादा-से-ज्यादा बोझ मेरी ही गर्दन पर रहे।

दिन-भरके बाद दोपहर या संध्या को दोनों खुलते तो एक-दूसरे को चाट-चूट कर अपनीथकान मिटा लिया करते, नांद में खली-भूसा पड़ जाने के बाद दोनों साथ उठते, साथ नांद में मुँह डालते और साथ ही बैठते थे। एक मुँह हटा लेता तो दूसरा भीहटा लेता था।

संयोग की बात, झूरी ने एक बार गोईं को ससुराल भेजदिया। बैलों को क्या मालूम, वे कहाँ भेजे जा रहे हैं। समझे, मालिक ने हमेंबेच दिया। अपना यों बेचा जाना उन्हें अच्छा लगा या बुरा, कौन जाने, पर झूरीके साले गया को घर तक गोईं ले जाने में दांतों पसीना आ गया। पीछे सेहांकता तो दोनों दाएँ-बाँए भागते, पगहिया पकड़कर आगे से खींचता तो दोनोंपीछे की ओर जोर लगाते। मारता तो दोनों सींगे नीची करके हुंकारते। अगर ईश्वरने उन्हें वाणी दी होती तो झूरी से पूछते-तुम हम गरीबों को क्यों निकालरहे हो ?

हमने तो तुम्हारी सेवा करने में कोई कसर नहीं उठा रखी। अगरइतनी मेहनत से काम न चलता था, और काम ले लेते। हमें तो तुम्हारी चाकरी मेंमर जाना कबूल था। हमने कभी दाने-चारे की शिकायत नहीं की। तुमने जो कुछखिलाया, वह सिर झुकाकर खा लिया, फिर तुमने हमें इस जालिम के हाथ क्यों बेंचदिया ?

संध्या समय दोनों बैल अपने नए स्थान पर पहुँचे। दिन-भर केभूखे थे, लेकिन जब नांद में लगाए गए तो एक ने भी उसमें मुंह नहीं डाला। दिलभारी हो रहा था। जिसे उन्होंने अपना घर समझ रखा था, वह आज उनसे छूट गया।यह नया घर, नया गांव, नए आदमी उन्हें बेगाने-से लगते थे।

दोनों नेअपनी मूक भाषा में सलाह की, एक-दूसरे को कनखियों से देखा और लेट गये। जबगांव में सोता पड़ गया तो दोनों ने जोर मारकर पगहा तुड़ा डाले और घर की तरफचले। पगहे बहुत मजबूत थे। अनुमान न हो सकता था कि कोई बैल उन्हें तोड़सकेगा, पर इन दोनों में इस समय दूनी शक्ति आ गई थी। एक-एक झटके मेंरस्सियाँ टूट गईं।

झूरी प्रातः काल सो कर उठा तो देखा कि दोनों बैलचरनी पर खड़े हैं। दोनों की गरदनों में आधा-आधा गरांव लटक रहा था। घुटने तकपांव कीचड़ से भरे हैं और दोनों की आंखों में विद्रोहमय स्नेह झलक रहा है।

झूरी बैलों को देखकर स्नेह से गद्गद हो गया। दौड़कर उन्हें गले लगा लिया। प्रेमालिंगन और चुम्बन का वह दृश्य बड़ा ही मनोहर था।

घरऔर गाँव के लड़के जमा हो गए। और तालियाँ बजा-बजाकर उनका स्वागत करने लगे।गांव के इतिहास में यह घटना अभूतपूर्व न होने पर भी महत्त्वपूर्ण थी, बाल-सभा ने निश्चय किया, दोनों पशु-वीरों का अभिनन्दन पत्र देना चाहिए। कोईअपने घर से रोटियां लाया, कोई गुड़, कोई चोकर, कोई भूसी।

एक बालक ने कहा- ‘‘ऐसे बैल किसी के पास न होंगे।’’

दूसरे ने समर्थन किया- ‘‘इतनी दूर से दोनों अकेले चले आए।’

तीसरा बोला- ‘बैल नहीं हैं वे, उस जन्म के आदमी हैं।’

इसकाप्रतिवाद करने का किसी को साहस नहीं हुआ। झूरी की स्त्री ने बैलों कोद्वार पर देखा तो जल उठी। बोली -‘कैसे नमक-हराम बैल हैं कि एक दिन वहां कामन किया, भाग खड़े हुए।’
झूरी अपने बैलों पर यह आक्षेप न सुन सका-‘नमक हराम क्यों हैं ? चारा-दाना न दिया होगा तो क्या करते ?’

स्त्री ने रोब के साथ कहा-‘बस, तुम्हीं तो बैलों को खिलाना जानते हो, और तो सभी पानी पिला-पिलाकर रखते हैं।’

झूरी ने चिढ़ाया-‘चारा मिलता तो क्यों भागते ?’

स्त्रीचिढ़ गयी-‘भागे इसलिए कि वे लोग तुम जैसे बुद्धुओं की तरह बैल को सहलातेनहीं, खिलाते हैं तो रगड़कर जोतते भी हैं। ये दोनों ठहरे कामचोर, भागनिकले। अब देखूं कहां से खली और चोकर मिलता है। सूखे भूसे के सिवा कुछ नदूंगी, खाएं चाहें मरें।’

वही हुआ। मजूर की बड़ी ताकीद की गई कि बैलों को खाली सूखाभूसा दिया जाए।

बैलों ने नांद में मुंह डाला तो फीका-फीका, न कोई चिकनाहट, न कोई रस !

क्या खाएं ? आशा-भरी आंखों से द्वार की ओर ताकने लगे। झूरी ने मजूर से कहा-‘थोड़ी–सी खली क्यों नहीं डाल देता बे ?’

‘मालकिन मुझे मार ही डालेंगी।’

‘चुराकर डाल आ।’

‘ना दादा, पीछे से तुम भी उन्हीं की-सी कहोगे।’

दूसरे दिन झूरी का साला फिर आया और बैलों को ले चला। अबकी उसने दोनों को गाड़ी में जोता।

दो-चार बार मोती ने गाड़ी को खाई में गिराना चाहा, पर हीरा ने संभाल लिया। वह ज्यादा सहनशील था।

संध्या-समयघर पहुंचकर उसने दोनों को मोटी रस्सियों से बांधा और कल की शरारत का मजाचखाया फिर वही सूखा भूसा डाल दिया। अपने दोनों बालों को खली चूनी सब कुछदी।

दोनों बैलों का ऐसा अपमान कभी न हुआ था। झूरी ने इन्हें फूल कीछड़ी से भी छूता था। उसकी टिटकार पर दोनों उड़ने लगते थे। यहां मार पड़ी।आहत सम्मान की व्यथा तो थी ही, उस पर मिला सूखा भूसा !
नांद की तरफ आंखें तक न उठाईं।

दूसरेदिन गया ने बैलों को हल में जोता, पर इन दोनों ने जैसे पांव न उठाने कीकसम खा ली थी। वह मारते-मारते थक गया, पर दोनों ने पांव न उठाया। एक बार जबउस निर्दयी ने हीरा की नाक पर खूब डंडे जमाये तो मोती को गुस्सा काबू सेबाहर हो गया। हल लेकर भागा। हल, रस्सी, जुआ, जोत, सब टूट-टाटकर बराबर होगया। गले में बड़ी-बड़ी रस्सियाँ न होतीं तो दोनों पकड़ाई में न आते।

हीरा ने मूक-भाषा में कहा-भागना व्यर्थ है।’

मोती ने उत्तर दिया-‘तुम्हारी तो इसने जान ही ले ली थी।’

‘अबकी बड़ी मार पड़ेगी।’

‘पड़ने दो, बैल का जन्म लिया है तो मार से कहां तक बचेंगे ?’

‘गया दो आदमियों के साथ दौड़ा आ रहा है, दोनों के हाथों में लाठियां हैं।’

मोती बोला-‘कहो तो दिखा दूं मजा मैं भी, लाठी लेकर आ रहा है।’

हीरा ने समझाया-‘नहीं भाई ! खड़े हो जाओ।’

‘मुझे मारेगा तो मैं एक-दो को गिरा दूंगा।’

‘नहीं हमारी जाति का यह धर्म नहीं है।’

मोतीदिल में ऐंठकर रह गया। गया आ पहुंचा और दोनों को पकड़ कर ले चला। कुशल हुईकि उसने इस वक्त मारपीट न की, नहीं तो मोती पलट पड़ता। उसके तेवर देख गयाऔर उसके सहायक समझ गए कि इस वक्त टाल जाना ही भलमनसाहत है।

आज दोनों के सामने फिर वही सूखा भूसा लाया गया, दोनों चुपचाप खड़े रहे।

घरमें लोग भोजन करने लगे। उस वक्त छोटी-सी लड़की दो रोटियां लिए निकली औरदोनों के मुंह में देकर चली गई। उस एक रोटी से इनकी भूख तो क्या शान्तहोती, पर दोनों के हृदय को मानो भोजन मिल गया। यहां भी किसी सज्जन का वासहै। लड़की भैरो की थी। उसकी मां मर चुकी थी। सौतेली मां उसे मारती रहती थी, इसलिए इन बैलों से एक प्रकार की आत्मीयता हो गई थी।

दोनों दिन-भरजाते, डंडे खाते, अड़ते, शाम को थान पर बांध दिए जाते और रात को वही बालिकाउन्हें दो रोटियां खिला जाती। प्रेम के इस प्रसाद की यह बरकत थी कि दो-दोगाल सूखा भूसा खाकर भी दोनों दुर्बल न होते थे, मगर दोनों की आंखों मेंरोम-रोम में विद्रोह भरा हुआ था।

एक दिन मोती ने मूक-भाषा में कहा-‘अब तो नहीं सहा जाता हीरा !

‘क्या करना चाहते हो ?’

‘एकाध को सींगों पर उठाकर फेंक दूंगा।’

‘लेकिन जानते हो, वह प्यारी लड़की, जो हमें रोटियां खिलाती है, उसी की लड़की है, जो इस घर का मालिक है, यह बेचारी अनाथ हो जाएगी।’

‘तो मालकिन को फेंक दूं, वही तो इस लड़की को मारती है।

‘लेकिन औरत जात पर सींग चलाना मना है, यह भूल जाते हो।’

‘तुम तो किसी तरह निकलने ही नहीं देते, बताओ, तुड़ाकर भाग चलें।’

‘हां, यह मैं स्वीकार करता, लेकिन इतनी मोटी रस्सी टूटेगी कैसे।’

इसका एक उपाय है, पहले रस्सी को थोड़ा चबा लो। फिर एक झटके में जाती है।’

रातको जब बालिका रोटियां खिला कर चली गई तो दोनों रस्सियां चबने लगे, पर मोटीरस्सी मुंह में न आती थी। बेचारे बार-बार जोर लगाकर रह जाते थे।

साहसाघर का द्वार खुला और वह लड़की निकली। दोनों सिर झुकाकर उसका हाथ चाटनेलगे। दोनों की पूंछें खड़ी हो गईं। उसने उनके माथे सहलाए और बोली-‘खोल देतीहूँ, चुपके से भाग जाओ, नहीं तो ये लोग मार डालेंगे। आज घर में सलाह होरही है कि इनकी नाकों में नाथ डाल दी जाएं।’

उसने गरांव खोल दिया, पर दोनों चुप खड़े रहे।

मोती ने अपनी भाषा में पूंछा-‘अब चलते क्यों नहीं ?’

हीरा ने कहा-‘चलें तो, लेकिन कल इस अनाथ पर आफत आएगी, सब इसी पर संदेह करेंगे।

साहसाबालिका चिल्लाई-‘दोनों फूफा वाले बैल भागे जे रहे हैं, ओ दादा! दादा!दोनों बैल भागे जा रहे हैं, ओ दादा! दादा! दोनों बैल भागे जा रहे हैं, जल्दी दौड़ो।

गया हड़बड़ाकर भीतर से निकला और बैलों को पकड़ने चला।वे दोनों भागे। गया ने पीछा किया, और भी तेज हुए, गया ने शोर मचाया। फिरगांव के कुछ आदमियों को भी साथ लेने के लिए लौटा। दोनों मित्रों को भागनेका मौका मिल गया। सीधे दौड़ते चले गए। यहां तक कि मार्ग का ज्ञान रहा। जिसपरिचित मार्ग से आए थे, उसका यहां पता न था। नए-नए गांव मिलने लगे। तबदोनों एक खेत के किनारे खड़े होकर सोचने लगे, अब क्या करना चाहिए।

हीरा ने कहा-‘मुझे मालूम होता है, राह भूल गए।’

‘तुम भी बेतहाशा भागे, वहीं उसे मार गिराना था।’

‘उसे मार गिराते तो दुनिया क्या कहती ? वह अपने धर्म छोड़ दे, लेकिन हम अपना धर्म क्यों छोडें ?’

दोनों भूख से व्याकुल हो रहे थे। खेत में मटर खड़ी थी। चरने लगे। रह-रहकर आहट लेते रहे थे। कोई आता तो नहीं है।

जबपेट भर गया, दोनों ने आजादी का अनुभव किया तो मस्त होकर उछलने-कूदने लगे।पहले दोनों ने डकार ली। फिर सींग मिलाए और एक-दूसरे को ठेकने लगे। मोती नेहीरा को कई कदम पीछे हटा दिया, यहां तक कि वह खाई में गिर गया। तब उसे भीक्रोध आ गया। संभलकर उठा और मोती से भिड़ गया। मोती ने देखा कि खेल मेंझगड़ा हुआ चाहता है तो किनारे हट गया।

अरे ! यह क्या ? कोई सांड़डौंकता चला आ रहा है। हां, सांड़ ही है। वह सामने आ पहुंचा। दोनों मित्रबगलें झांक रहे थे। सांड़ पूरा हाथी था। उससे भिड़ना जान से हाथ धोना है, लेकिन न भिड़ने पर भी जान बचती नजर नहीं आती। इन्हीं की तरफ आ भी रहा है।कितनी भयंकर सूरत है !

मोती ने मूक-भाषा में कहा-‘बुरे फंसे, जान बचेगी ? कोई उपाय सोचो।’

हीरा ने चिंतित स्वर में कहा-‘अपने घमंड में फूला हुआ है, आरजू-विनती न सुनेगा।’

‘भाग क्यों न चलें?’

‘भागना कायरता है।’

‘तो फिर यहीं मरो। बंदा तो नौ दो ग्यारह होता है।’

‘और जो दौड़ाए?’

‘ तो फिर कोई उपाए सोचो जल्द!’

‘उपाययह है कि उस पर दोनों जने एक साथ चोट करें। मैं आगे से रगेदता हूँ, तुमपीछे से रगेदो, दोहरी मार पड़ेगी तो भाग खड़ा होगा। मेरी ओर झपटे, तुम बगलसे उसके पेट में सींग घुसेड़ देना। जान जोखिम है, पर दूसरा उपाय नहीं है।

दोनों मित्र जान हथेली पर लेकर लपके। सांड़ को भी संगठित शत्रुओं से लड़ने का तजुरबा न था।

वहतो एक शत्रु से मल्लयुद्ध करने का आदी था। ज्यों-ही हीरा पर झपटा, मोती नेपीछे से दौड़ाया। सांड़ उसकी तरफ मुड़ा तो हीरा ने रगेदा। सांड़ चाहता था, कि एक-एक करके दोनों को गिरा ले, पर ये दोनों भी उस्ताद थे। उसे वह अवसर नदेते थे। एक बार सांड़ झल्लाकर हीरा का अन्त कर देने के लिए चला कि मोतीने बगल से आकर उसके पेट में सींग भोंक दिया। सांड़ क्रोध में आकर पीछे फिरातो हीरा ने दूसरे पहलू में सींगे चुभा दिया।

आखिर बेचारा जख्मीहोकर भागा और दोनों मित्रों ने दूर तक उसका पीछा किया। यहां तक कि सांड़बेदम होकर गिर पड़ा। तब दोनों ने उसे छोड़ दिया। दोनों मित्र जीत के नशेमें झूमते चले जाते थे।

मोती ने सांकेतिक भाषा में कहा-‘मेरा जी चाहता था कि बचा को मार ही डालूं।’

हीरा ने तिरस्कार किया-‘गिरे हुए बैरी पर सींग न चलाना चाहिए।’

‘यह सब ढोंग है, बैरी को ऐसा मारना चाहिए कि फिर न उठे।’
‘अब घर कैसे पहुंचोगे वह सोचो।’

‘पहले कुछ खा लें, तो सोचें।’

सामनेमटर का खेत था ही, मोती उसमें घुस गया। हीरा मना करता रहा, पर उसने एक नसुनी। अभी दो ही चार ग्रास खाये थे कि आदमी लाठियां लिए दौड़ पड़े और दोनोंमित्र को घेर लिया, हीरा तो मेड़ पर था निकल गया। मोती सींचे हुए खेत मेंथा। उसके खुर कीचड़ में धंसने लगे। न भाग सका। पकड़ लिया। हीरा ने देखा, संगी संकट में है तो लौट पड़ा। फंसेंगे तो दोनों फंसेंगे। रखवालों ने उसेभी पकड़ लिया।

प्रातःकाल दोनों मित्र कांजी हौस में बंद कर दिए गए।

दोनोंमित्रों को जीवन में पहली बार ऐसा साबिका पड़ा था कि सारा दिन बीत गया औरखाने को एक तिनका भी न मिला। समझ में न आता था, यह कैसा स्वामी है। इससे तोगया फिर भी अच्छा था। यहां कई भैंसे थीं, कई बकरियां, कई घोड़े, कई गधे, पर किसी के सामने चारा न था, सब जमीन पर मुर्दों की तरह पड़े थे।

कईतो इतने कमजोर हो गये थे कि खड़े भी न हो सकते थे। सारा दिन मित्र फाटक कीओर टकटकी लगाए रहते, पर कोई चारा न लेकर आता दिखाई दिया। तब दोनों नेदीवार की नमकीन मिट्टी चाटनी शुरू की, पर इससे क्या तृप्ति होती।

रात को भी जब कुछ भोजन न मिला तो हीरा के दिल में विद्रोह की ज्वाला दहक उठी। मोती से बोला-‘अब नहीं रहा जाता मोती !

मोती ने सिर लटकाए हुए जवाब दिया-‘मुझे तो मालूम होता है कि प्राण निकल रहे हैं।’

‘आओ दीवार तोड़डालें।’

‘मुझसे तो अब कुछ नहीं होगा।’

‘बस इसी बूत पर अकड़ते थे !’

‘सारी अकड़ निकल गई।’

बाड़ेकी दीवार कच्ची थी। हीरा मजबूत तो था ही, अपने नुकीले सींग दीवार में गड़ादिए और जोर मारा तो मिट्टी का एक चिप्पड़ निकल आया। फिर तो उसका साहस बढ़ाउसने दौड़-दौड़कर दीवार पर चोटें कीं और हर चोट में थोड़ी-थोड़ी मिट्टीगिराने लगा।

उसी समय कांजी हौस का चौकीदार लालटेन लेकर जानवरों कीहाजिरी लेने आ निकला। हीरा का उद्दंड्डपन्न देखकर उसे कई डंडे रसीद किए औरमोटी-सी रस्सी से बांध दिया।

मोती ने पड़े-पड़े कहा-‘आखिर मार खाई, क्या मिला?’

‘अपने बूते-भर जोर तो मार दिया।’

‘ऐसा जोर मारना किस काम का कि और बंधन में पड़ गए।’

‘जोर तो मारता ही जाऊंगा, चाहे कितने ही बंधन पड़ते जाएं।’

‘जान से हाथ धोना पड़ेगा।’

‘कुछपरवाह नहीं। यों भी तो मरना ही है। सोचो, दीवार खुद जाती तो कितनी जाने बचजातीं। इतने भाई यहां बंद हैं। किसी की देह में जान नहीं है। दो-चार दिनयही हाल रहा तो मर जाएंगे।’
‘हां, यह बात तो है। अच्छा, तो ला फिर मैं भी जोर लगाता हूँ।’

मोतीने भी दीवार में सींग मारा, थोड़ी-सी मिट्टी गिरी और फिर हिम्मत बढ़ी, फिरतो वह दीवार में सींग लगाकर इस तरह जोर करने लगा, मानो किसी प्रतिद्वंदीसे लड़ रहा है। आखिर कोई दो घंटे की जोर-आजमाई के बाद दीवार ऊपर से लगभग एकहाथ गिर गई, उसने दूनी शक्ति से दूसरा धक्का मारा तो आधी दीवार गिर पड़ी।

दीवारका गिरना था कि अधमरे-से पड़े हुए सभी जानवर चेत उठे, तीनों घोड़ियां सरपटभाग निकलीं। फिर बकरियां निकलीं, इसके बाद भैंस भी खसक गई, पर गधे अभी तकज्यों के त्यों खड़े थे।

हीरा ने पूछा-‘तुम दोनों क्यों नहीं भाग जाते?’

एक गधे ने कहा-‘जो कहीं फिर पकड़ लिए जाएं।’

‘तो क्या हरज है, अभी तो भागने का अवसर है।’

‘हमें तो डर लगता है। हम यहीं पड़े रहेंगे।’

आधीरात से ऊपर जा चुकी थी। दोनों गधे अभी तक खड़े सोच रहे थे कि भागें, या नभागें, और मोती अपने मित्र की रस्सी तोड़ने में लगा हुआ था। जब वह हार गयातो हीरा ने कहा-‘तुम जाओ, मुझे यहीं पड़ा रहने दो, शायद कहीं भेंट हो जाए।’

मोतीने आंखों में आंसू लाकर कहा-‘तुम मुझे इतना स्वार्थी समझते हो, हीरा हम औरतुम इतने दिनों एक साथ रहे हैं। आज तुम विपत्ति में पड़ गए हो तो मैंतुम्हें छोड़कर अलग हो जाऊं ?’
हीरा ने कहा-‘बहुत मार पड़ेगी, लोग समझ जाएंगे, यह तुम्हारी शरारत है।’

मोतीने गर्व से बोला-‘जिस अपराध के लिए तुम्हारे गले में बंधना पड़ा, उसके लिएअगर मुझे मार पड़े, तो क्या चिंता। इतना तो हो ही गया कि नौ-दस प्राणियोंकी जान बच गई, वे सब तो आशीर्वाद देंगे।’
यह कहते हुए मोती ने दोनों गधों को सींगों से मार-मार कर बाड़े से बाहर निकाला और तब अपने बंधु के पास आकर सो रहा।

भोरहोते ही मुंशी और चौकीदार तथा अन्य कर्मचारियों में कैसी खलबली मची, इसकेलिखने की जरूरत नहीं। बस, इतना ही काफी है कि मोती की खूब मरम्मत हुई औरउसे भी मोटी रस्सी से बांध दिया गया।

एक सप्ताह तक दोनों मित्र वहांबंधे पड़े रहे। किसी ने चारे का एक तृण भी न डाला। हां, एक बार पानी दिखादिया जाता था। यही उनका आधार था। दोनों इतने दुर्बल हो गए थे कि उठा तकनहीं जाता था, ठठरियां निकल आईं थीं। एक दिन बाड़े के सामने डुग्गी बजनेलगी और दोपहर होते-होते वहां पचास-साठ आदमी जमा हो गए। तब दोनों मित्रनिकाले गए और लोग आकर उनकी सूरत देखते और मन फीका करके चले जाते।

ऐसेमृतक बैलों का कौन खरीददार होता ? सहसा एक दढ़ियल आदमी, जिसकी आंखें लालथीं और मुद्रा अत्यन्त कठोर, आया और दोनों मित्र के कूल्हों में उंगलीगोदकर मुंशीजी से बातें करने लगा। चेहरा देखकर अंतर्ज्ञान से दोनों मित्रोंका दिल कांप उठे। वह क्यों है और क्यों टटोल रहा है, इस विषय में उन्हेंकोई संदेह न हुआ। दोनों ने एक-दूसरे को भीत नेत्रों से देखा और सिर झुकालिया।

हीरा ने कहा-‘गया के घर से नाहक भागे, अब तो जान न बचेगी।’ मोती ने अश्रद्धा के भाव से उत्तर दिया-‘कहते हैं, भगवान सबके ऊपर दया करतेहैं, उन्हें हमारे ऊपर दया क्यों नहीं आती ?’

‘भगवान के लिए हमाराजीना मरना दोनों बराबर है। चलो, अच्छा ही है, कुछ दिन उसके पास तो रहेंगे।एक बार उस भगवान ने उस लड़की के रूप में हमें बचाया था। क्या अब न बचाएंगे ?’
‘यह आदमी छुरी चलाएगा, देख लेना।’

‘तो क्या चिंता है ? मांस, खाल, सींग, हड्डी सब किसी के काम आ जाएगा।’

नीलामहो जाने के बाद दोनों मित्र उस दढ़ियल के साथ चले। दोनों की बोटी-बोटीकांप रही थी। बेचारे पांव तक न उठा सकते थे, पर भय के मारे गिरते-प़डतेभागे जाते थे, क्योंकि वह जरा भी चाल धीमी हो जाने पर डंडा जमा देता था।

राहमें गाय-बैलों का एक रेवड़ हरे-भरे हार में चरता नजर आया। सभी जानवरप्रसन्न थे, चिकने, चपल। कोई उछलता था, कोई आनंद से बैठा पागुर करता थाकितना सुखी जीवन था इनका, पर कितने स्वार्थी हैं सब। किसी को चिंता नहीं किउनके दो बाई बधिक के हाथ पड़े कैसे दुःखी हैं।

सहसा दोनों को ऐसामालूम हुआ कि परिचित राह है। हां, इसी रास्ते से गया उन्हें ले गया था। वहीखेत, वही बाग, वही गांव मिलने लगे, प्रतिक्षण उनकी चाल तेज होने लगी। सारीथकान, सारी दुर्बलता गायब हो गई। आह ! यह लो ! अपना ही हार आ गया। इसीकुएं पर हम पुर चलाने आया करते थे, यही कुआं है।

मोती ने कहा-‘हमारा घर नजदीक आ गया है।’

हीरा बोला -‘भगवान की दया है।’

‘मैं तो अब घर भागता हूँ।’

‘यह जाने देगा ?’

इसे मैं मार गिराता हूँ।

‘नहीं-नहीं, दौड़कर थान पर चलो। वहां से आगे हम न जाएंगे।’

दोनोंउन्मत्त होकर बछड़ों की भांति कुलेलें करते हुए घर की ओर दौड़े। वह हमाराथान है। दोनों दौड़कर अपने थान पर आए और खड़े हो गए। दढ़ियल भी पीछे-पीछेदौड़ा चला आता था।
झूरी द्वार पर बैठा धूप खा रहा था। बैलों को देखते हीदौड़ा और उन्हें बारी-बारी से गले लगाने लगा। मित्रों की आंखों से आनन्दके आंसू बहने लगे। एक झूरी का हाथ चाट रहा था।

दढ़ियल ने जाकर बैलों की रस्सियां पकड़ लीं। झूरी ने कहा-‘मेरे बैल हैं।’

‘तुम्हारे बैल कैसे हैं ? मैं मवेसीखाने से नीलाम लिए आता हूँ।’

‘‘मैंतो समझता हूँ, चुराए लिए जाते हो! चुपके से चले जाओ, मेरे बैल हैं। मैंबेचूंगा तो बिकेंगे। किसी को मेरे बैल नीलाम करने का क्या अख्तियार हैं ?’

'जाकर थाने में रपट कर दूँगा।’

‘मेरे बैल हैं। इसका सबूत यह है कि मेरे द्वार पर खड़े हैं।

दढ़ियलझल्लाकर बैलों को जबरदस्ती पकड़ ले जाने के लिए बढ़ा। उसी वक्त मोती नेसींग चलाया। दढ़ियल पीछे हटा। मोती ने पीछा किया। दढ़ियल भागा। मोती पीछेदौड़ा, गांव के बाहर निकल जाने पर वह रुका, पर खड़ा दढ़ियल का रास्ता वहदेख रहा था, दढ़ियल दूर खड़ा धमकियां दे रहा था, गालियां निकाल रहा था, पत्थर फेंक रहा था, और मोती विजयी शूर की भांति उसका रास्ता रोके खड़ा था।गांव के लोग यह तमाशा देखते थे और हँसते थे। जब दढ़ियल हारकर चला गया तोमोती अकड़ता हुआ लौटा। हीरा ने कहा-‘मैं तो डर गया था कि कहीं तुम गुस्सेमें आकर मार न बैठो।’

‘अब न आएगा।’

‘आएगा तो दूर से ही खबर लूंगा। देखूं, कैसे ले जाता है।’

‘जो गोली मरवा दे ?’

‘मर जाऊंगा, पर उसके काम न आऊंगा।’

‘हमारी जान को कोई जान ही नहीं समझता।’

‘इसलिए कि हम इतने सीधे हैं।’

जरादेर में नाँदों में खली भूसा, चोकर और दाना भर दिया गया और दोनों मित्रखाने लगे। झूरी खड़ा दोनों को सहला रहा था। वह उनसे लिपट गया।

झूरी की पत्नी भी भीतर से दौड़ी-दौड़ी आई। उसने ने आकर दोनों बैलों के माथे चूम लिए।

 

नरक का मार्ग - प्रेमचंद

रात “भक्तमाल” पढ़ते-पढ़ते न जाने कब नींद आ गयी। कैसे-कैसे महात्मा थेजिनके लिए भगवत्-प्रेम ही सब कुछ था, इसी में मग्न रहते थे। ऐसी भक्ति बड़ीतपस्या से मिलती है। क्या मैं वह तपस्या नहीं कर सकती? इस जीवन में औरकौन-सा सुख रखा है? आभूषणों से जिसे प्रेम हो जाने , यहां तो इनको देखकरआंखे फूटती है;धन-दौलत पर जो प्राण देता हो वह जाने, यहां तो इसका नामसुनकर ज्वर-सा चढ़ आता हैं। कल पगली सुशीला ने कितनी उमंगों से मेराश्रृंगार किया था, कितने प्रेम से बालों में फूल गूंथे। कितना मना करतीरही, न मानी। आखिर वही हुआ जिसका मुझे भय था। जितनी देर उसके साथ हंसी थी, उससे कहीं ज्यादा रोयी। संसार में ऐसी भी कोई स्त्री है, जिसका पति उसकाश्रृंगार देखकर सिर से पांव तक जल उठे? कौन ऐसी स्त्री है जो अपने पति केमुंह से ये शब्द सुने—तुम मेरा परलोग बिगाड़ोगी, और कुछ नहीं, तुम्हारेरंग-ढंग कहे देते हैं---और मनुष्य उसका दिल विष खा लेने को चाहे। भगवान्!संसार में ऐसे भी मनुष्य हैं। आखिर मैं नीचे चली गयी और ‘भक्तिमाल’ पढ़नेलगी। अब वृंदावन बिहारी ही की सेवा करुंगी उन्हीं को अपना श्रृंगारदिखाऊंगी, वह तो देखकर न जलेगे। वह तो हमारे मन का हाल जानते हैं।


                                              २

भगवान!मैं अपने मन को कैसे समझाऊं! तुम अंतर्यामी हो, तुम मेरे रोम-रोम का हालजानते हो। मैं चाहती हुं कि उन्हें अपना इष्ट समझूं, उनके चरणों की सेवाकरुं, उनके इशारे पर चलूं, उन्हें मेरी किसी बात से, किसी व्यवहार सेनाममात्र, भी दु:ख न हो। वह निर्दोष हैं, जो कुछ मेरे भाग्य में था वह हुआ, न उनका दोष है, न माता-पिता का, सारा दोष मेरे नसीबों ही का है। लेकिन यहसब जानते हुए भी जब उन्हें आते देखती हूं, तो मेरा दिल बैठ जाता है, मुह परमुरदनी सी-छा जाती है, सिर भारी हो जाता है, जी चाहता है इनकी सूरत नदेखूं, बात तक करने को जी नही चाहता;कदाचित् शत्रु को भी देखकर किसी का मनइतना क्लांत नहीं होता होगा। उनके आने के समय दिल में धड़कन सी होने लगतीहै। दो-एक दिन के लिए कहीं चले जाते हैं तो दिल पर से बोझ उठ जाता है।हंसती भी हूं, बोलती भी हूं, जीवन में कुछ आनंद आने लगता है लेकिन उनके आनेका समाचार पाते ही फिर चारों ओर अंधकार! चित्त की ऐसी दशा क्यों है, यहमैं नहीं कह सकती। मुझे तो ऐसा जान पड़ता है कि पूर्वजन्म में हम दोनों मेंबैर था, उसी बैर का बदला लेने के लिए उन्होंने मुझेसे विवाह किया है, वहीपुराने संस्कार हमारे मन में बने हुए हैं। नहीं तो वह मुझे देख-देख करक्यों जलते और मैं उनकी सूरत से क्यों घृणा करती? विवाह करने का तो यह मतलबनहीं हुआ करता! मैं अपने घर कहीं इससे सुखी थी। कदाचित् मैं जीवन-पर्यन्तअपने घर आनंद से रह सकती थी। लेकिन इस लोक-प्रथा का बुरा हो, जो अभागिनकनयाओं को किसी-न-किसी पुरुष के गलें में बांध देना अनिवार्य समझती है। वहक्या जानता है कि कितनी युवतियां उसके नाम को रो रही है, कितने अभिलाषाओंसे लहराते हुए, कोमल हृदय उसके पैरो तल रौंदे जा रहे है? युवति के लिए पतिकैसी-कैसी मधुर कल्पनाओं का स्रोत्र होता है, पुरुष में जो उत्तम है, श्रेष्ठ है, दर्शनीय है, उसकी सजीव मूर्ति इस शब्द के ध्यान में आते हीउसकी नजरों के सामने आकर खड़ी हो जाती है।लेकिन मेरे लिए यह शब्द क्या है।हृदय में उठने वाला शूल, कलेजे में खटकनेवाला कांटा, आंखो में गड़ने वालीकिरकिरी, अंत:करण को बेधने वाला व्यंग बाण! सुशीला को हमेशा हंसते देखतीहूं। वह कभी अपनी दरिद्रता का गिला नहीं करती; गहने नहीं हैं, कपड़े नहींहैं, भाड़े के नन्हेंसे मकान में रहती है, अपने हाथों घर का सारा काम-काजकरती है , फिर भी उसे रोतेनहीे देखती अगर अपने बस की बात होती तो आज अपनेधन को उसकी दरिद्रता से बदल लेती। अपने पतिदेव को मुस्कराते हुए घर में आतेदेखकर उसका सारा दु:ख दारिद्रय छूमंतर हो जाता है, छाती गज-भर की हो जातीहै। उसके प्रेमालिंगन में वह सुख है, जिस पर तीनों लोक का धन न्योछावर करदूं।

                                                 ३

आज मुझसे जब्त न हो सका। मैंनेपूछा—तुमने मुझसे किसलिए विवाह किया था? यह प्रश्न महीनों से मेरे मन मेंउठता था, पर मन को रोकती चली आती थी। आज प्याला छलक पड़ा। यह प्रश्न सुनकरकुछ बौखला-से गये, बगलें झाकने लगे, खीसें निकालकर बोले—घर संभालने के लिए, गृहस्थी का भार उठाने के लिए, और नहीं क्या भोग-विलास के लिए? घरनी केबिना यह आपको भूत का डेरा-सा मालूम होता था। नौकर-चाकर घर की सम्पति उडायेदेते थे। जो चीज जहां पड़ी रहती थी, कोई उसको देखने वाला न था। तो अब मालूमहुआ कि मैं इस घर की चौकसी के लिए लाई गई हूं। मुझे इस घर की रक्षा करनीचाहिए और अपने को धन्य समझना चाहिए कि यह सारी सम्पति मेरी है। मुख्य वस्तुसम्पत्ति है, मै तो केवल चौकी दारिन हूं। ऐसे घर में आज ही आग लग जाये! अबतक तो मैं अनजान में घर की चौकसी करती थी, जितना वह चाहते हैं उतना न सही, पर अपनी बुद्धि के अनुसार अवश्य करती थी। आज से किसी चीज को भूलकर भी छूनेकी कसम खाती हूं। यह मैं जानती हूं। कोई पुरुष घर की चौकसी के लिए विवाहनहीं करता और इन महाशय ने चिढ़ कर यह बात मुझसे कही। लेकिन सुशीला ठीक कहतीहै, इन्हें स्त्री के बिना घर सुना लगता होगा, उसी तरह जैसे पिंजरे मेंचिड़िया को न देखकर पिंजरा सूना लगता है। यह हम स्त्रियों का भाग्य!

                                                ४

मालूमनहीं, इन्हें मुझ पर इतना संदेह क्यो होता है। जब से नसीब इस घर में लायाहैं, इन्हें बराबर संदेह-मूलक कटाक्ष करते देखती हूं। क्या कारण है? जराबाल गुथवाकर बैठी और यह होठ चबाने लगे। कहीं जाती नहीं, कहीं आती नहीं, किसी से बोलती नहीं, फिर भी इतना संदेह! यह अपमान असह्य है। क्या मुझे अपनीआबरु प्यारी नहीं? यह मुझे इतनी छिछोरी क्यों समझते हैं, इन्हें मुझपरसंदेह करते लज्जा भी नहीं आती? काना आदमी किसी को हंसते देखता है तो समझताहै लोग मुझी पर हंस रहे है। शायद इन्हें भी यही बहम हो गया है कि मैंइन्हें चिढ़ाती हूं। अपने अधिकार के बाहर से बाहर कोई काम कर बैठने सेकदाचित् हमारे चित्त की यही वृत्ति हो जाती है। भिक्षुक राजा की गद्दी परबैठकर चैन की नींद नहीं सो सकता। उसे अपने चारों तरफ शुत्र दिखायी देंगें।मै समझती हूं, सभी शादी करने वाले बुड्ढ़ो का यही हाल है।
आज सुशीला केकहने से मैं ठाकुर जी की झांकी देखने जा रही थी। अब यह साधारण बुद्धि काआदमी भी समझ सकता हैकि फूहड़ बहू बनकर बाहर निकलना अपनी हंसी उड़ाना है, लेकिन आप उसी वक्त न जाने किधर से टपक पड़े और मेरी ओर तिरस्कापूर्णनेत्रों से देखकर बोले—कहां की तैयारी है?
मैंने कह दिया, जरा ठाकुर जीकी झांकी देखने जाती हूं।इतना सुनते ही त्योरियां चढ़ाकर बोले—तुम्हारेजाने की कुछ जरुरत नहीं। जो अपने पति की सेवा नहीं कर सकती, उसे देवताओं केदर्शन से पुण्य के बदले पाप होता। मुझसे उड़ने चली हो। मैं औरतों कीनस-नस पहचानता हूं।
ऐसा क्रोध आया कि बस अब क्या कहूं। उसी दम कपड़े बदलडाले और प्रण कर लिया कि अब कभ दर्शन करने जाऊंगी। इस अविश्वास का भी कुछठिकाना है! न जाने क्या सोचकर रुक गयी। उनकी बात का जवाब तो यही था कि उसीक्षण घरसे चल खड़ी हुई होती, फिर देखती मेरा क्या कर लेते।
इन्हें मेराउदास और विमन रहने पर आश्चर्य होता है। मुझे मन-में कृतघ्न समझते है। अपनीसमणमें इन्होने मरे से विवाह करके शायद मुझ पर एहसान किया है। इतनी बड़ीजायदाद और विशाल सम्पत्ति की स्वामिनी होकर मुझे फूले न समाना चाहिए था, आठो पहरइनका यशगान करते रहना चाहिये था। मैं यह सब कुछ न करके उलटे और मुंहलटकाए रहती हूं। कभी-कभी बेचारे पर दया आती है। यह नहीं समझते किनारी-जीवन में कोई ऐसी वस्तु भी है जिसे देखकर उसकी आंखों में स्वर्ग भीनरकतुल्य हो जाता है।

                                                ५

तीन दिनसे बीमान हैं। डाक्टर कहते हैं, बचने की कोई आशा नहीं, निमोनिया हो गया है।पर मुझे न जाने क्यों इनका गम नहीं है। मैं इनती वज्र-हृदय कभी न थी।नजाने वह मेरी कोमलता कहां चली गयी। किसी बीमार की सूरत देखकर मेरा हृदयकरुणा से चंचल हो जाता था, मैं किसी का रोना नहीं सुन सकती थी। वही मैं हूंकि आज तीन दिन से उन्हें बगल के कमरे में पड़े कराहते सुनती हूं और एक बारभी उन्हें देखने न गयी, आंखो में आंसू का जिक्र ही क्या। मुझे ऐसा मालूमहोता है, इनसे मेरा कोई नाता ही नहीं मुझे चाहे कोई पिशाचनी कहे, चाहेकुलटा, पर मुझे तो यह कहने में लेशमात्र भी संकोच नहीं है कि इनकी बीमारीसे मुझे एक प्रकार का ईर्ष्यामय आनंद आ रहा है। इन्होने मुझे यहां कारावासदे रखा था—मैं इसे विवाह का पवित्र नाम नहींदेना चाहती---यह कारावास ही है।मैं इतनी उदार नहीं हूं कि जिसने मुझे कैद मे डाल रखा हो उसकी पूजा करुं, जो मुझे लात से मारे उसक पैरो का चूंमू। मुझे तो मालूम हो रहा था। ईश्वरइन्हें इस पाप का दण्ड दे रहे है। मै निस्सकोंच होकर कहती हूं कि मेरा इनसेविवाह नहीं हुआ है। स्त्री किसी के गले बांध दिये जाने से ही उसकीविवाहिता नहीं हो जाती। वही संयोग विवाह का पद पा सकता है। जिंसमे कम-से-कमएक बार तो हृदय प्रेम से पुलकित हो जाय! सुनती हूं, महाशय अपने कमरे मेंपड़े-पड़े मुझे कोसा करते हैं, अपनी बीमारी का सारा बुखार मुझ पर निकालतेहैं, लेकिन यहां इसकी परवाह नहीं। जिसकाह जी चाहे जायदाद ले, धन ले, मुझेइसकी जरुरत नहीं!

                                                   ६

आज तीन दिन हुए, मैं विधवा हो गयी, कम-से-कम लोग यही कहते हैं। जिसका जो जी चाहे कहे, परमैं अपने को जो कुछ समझती हूं वह समझती हूं। मैंने चूड़िया नहीं तोड़ी, क्यों तोड़ू? क्यों तोड़ू? मांग में सेंदुर पहले भी न डालती थी, अब भी नहींडालती। बूढ़े बाबा का क्रिया-कर्म उनके सुपुत्र ने किया, मैं पास न फटकी।घर में मुझ पर मनमानी आलोचनाएं होती हैं, कोई मेरे गुंथे हुए बालों कोदेखकर नाक सिंकोड़ता हैं, कोई मेरे आभूषणों पर आंख मटकाता है, यहां इसकीचिंता नहीं। उन्हें चिढ़ाने को मैं भी रंग=-बिरंगी साड़िया पहनती हूं, औरभी बनती-संवरती हूं, मुझे जरा भी दु:ख नहीं हैं। मैं तो कैद से छूट गयी।इधर कई दिन सुशीला के घर गयी। छोटा-सा मकान है, कोई सजावट न सामान, चारपाइयां तक नहीं, पर सुशीला कितने आनंद से रहती है। उसका उल्लास देखकरमेरे मन में भी भांति-भांति की कल्पनाएं उठने लगती हैं---उन्हें कुत्सितक्यों कहुं, जब मेरा मन उन्हें कुत्सित नहीं समझता ।इनके जीवन में कितनाउत्साह है।आंखे मुस्कराती रहती हैं, ओठों पर मधुर हास्य खेलता रहता है, बातों में प्रेम का स्रोत बहताहुआजान पड़ता है। इस आनंद से, चाहे वह कितनाही क्षणिक हो, जीवन सफल हो जाता है, फिर उसे कोई भूल नहीं सकता, उसी स्मृतिअंत तक के लिए काफी हो जाती है, इस मिजराब की चोट हृदय के तारों को अंतकालतक मधुर स्वरों में कंपित रखसकती है।
एक दिन मैने सुशीला से कहा---अगर तेरे पतिदेव कहीं परदेश चले जाए तो रोत-रोते मर जाएगी!
सुशीला गंभीर भाव से बोली—नहीं बहन, मरुगीं नहीं , उनकी याद सदैव प्रफुल्लित करती रहेगी, चाहे उन्हें परदेश में बरसों लग जाएं।
मैंयही प्रेम चाहती हूं, इसी चोट के लिए मेरा मन तड़पता रहता है, मै भी ऐसीही स्मृति चाहती हूं जिससे दिल के तार सदैव बजते रहें, जिसका नशा नित्यछाया रहे।

                                              ७

रात रोते-रोते हिचकियांबंध गयी। न-जाने क्यो दिल भर आता था। अपना जीवन सामने एक बीहड़ मैदान कीभांति फैला हुआ मालूम होता था, जहां बगूलों के सिवा हरियाली का नाम नहीं।घर फाड़े खाता था, चित्त ऐसा चंचल हो रहा था कि कहीं उड़ जाऊं। आजकल भक्तिके ग्रंथो की ओर ताकने को जी नहीं चाहता, कही सैर करने जाने की भी इच्छानहीं होती, क्या चाहती हूं वह मैं स्वयं भी नहीं जानती। लेकिन मै जो जानतीवह मेरा एक-एक रोम-रोम जानता है, मैं अपनी भावनाओं को संजीव मूर्ति हैं, मेरा एक-एक अंग मेरी आंतरिक वेदना का आर्तनाद हो रहा है।
मेरे चित्त कीचंचलता उस अंतिम दशा को पहंच गयी है, जब मनुष्य को निंदा की न लज्जा रहतीहै और न भय। जिन लोभी, स्वार्थी माता-पिता ने मुझे कुएं में ढकेला, जिसपाषाण-हृदय प्राणी ने मेरी मांग में सेंदुर डालने का स्वांग किया, उनकेप्रति मेरे मन में बार-बार दुष्कामनाएं उठती हैं। मैं उन्हे लज्जित करनाचाहती हूं। मैं अपने मुंह में कालिख लगा कर उनके मुख में कालिख लगाना चाहतीहूं मैअपने प्राणदेकर उन्हे प्राणदण्ड दिलाना चाहती हूं।मेरा नारीत्वलुप्त हो गया है,। मेरे हृदय में प्रचंड ज्वाला उठी हुई है।
घर के सारेआदमी सो रहे है थे। मैं चुपके से नीचे उतरी , द्वार खोला और घर से निकली, जैसे कोई प्राणी गर्मी से व्याकुल होकर घर से निकले और किसी खुली हुई जगहकी ओर दौड़े।उस मकान में मेरा दम घुट रहा था।
सड़क पर सन्नाटा था, दुकानें बंद हो चुकी थी। सहसा एक बुढियां आती हुई दिखायी दी। मैं डरी कहींयह चुड़ैल न हो। बुढिया ने मेरे समीप आकर मुझे सिर से पांव तक देखा और बोली ---किसकी राह देखरही हो
मैंने चिढ़ कर कहा---मौत की!
बुढ़िया---तुम्हारेनसीबों में तो अभी जिन्दगी के बड़े-बड़े सुख भोगने लिखे हैं। अंधेरी रातगुजर गयी, आसमान पर सुबह की रोशनी नजर आ रही हैं।
मैने हंसकर कहा---अंधेरे में भी तुम्हारी आंखे इतनी तेज हैंकि नसीबों की लिखावट पढ़ लेती हैं?
बुढ़िया---आंखोसे नहीं पढती बेटी, अक्ल से पढ़ती हूं, धूप में चूड़े नही सुफेद कियेहैं।। तुम्हारे दिन गये और अच्छे दिन आ रहे है। हंसो मत बेटी, यही काम करतेइतनी उम्र गुजर गयी। इसी बुढ़िया की बदौलत जो नदी में कूदने जा रही थीं, वे आज फूलों की सेज पर सो रही है, जो जहर का प्याल पीने को तैयार थीं, वेआज दूध की कुल्लियां कर रही हैं। इसीलिए इतनी रात गये निकलती हू कि अपनेहाथों किसी अभागिन का उद्धार हो सके तो करुं। किसी से कुछ नहीं मांगती, भगवान् का दिया सब कुछ घर में है, केवल यही इच्छा है उन्हे धन, जिन्हेसंतान की इच्छा है उन्हें संतान, बस औरक्या कहूं, वह मंत्र बता देती हूं किजिसकी जो इच्छा जो वह पूरी हो जाये।
मैंने कहा---मुझे न धन चाहिए न संतान। मेरी मनोकामना तुम्हारे बस की बात नहीं है।
बुढ़ियाहंसी—बेटी, जो तुम चाहती हो वह मै जानती हूं; तुम वह चीज चाहती हो जोसंसार में होते हुए स्वर्ग की है, जो देवताओं के वरदान से भी ज्यादाआनंदप्रद है, जो आकाश कुसुम है,गुलर का फूल है और अमावसा का चांद है। लेकिनमेरे मंत्र में वह शंक्ति है जो भाग्य को भी संवार सकती है। तुम प्रेम कीप्यासी हो, मैं तुम्हे उस नाव पर बैठा सकती हूं जो प्रेम के सागर में, प्रेम की तंरगों पर क्रीड़ा करती हुई तुम्हे पार उतार दे।
मैने उत्कंठित होकर पूछा—माता, तुम्हारा घर कहां है।
बुढिया---बहुत नजदीक है बेटी, तुम चलों तो मैं अपनी आंखो पर बैठा कर ले चलूं।
मुझे ऐसा मालूम हुआ कि यह कोई आकाश की देवी है। उसेक पीछ-पीछे चल पड़ी।

                                                   ८

आह!वह बुढिया, जिसे मैं आकाश की देवी समझती थी, नरक की डाइन निकली। मेरासर्वनाश हो गया। मैं अमृत खोजती थी, विष मिला, निर्मल स्वच्छ प्रेम कीप्यासी थी, गंदे विषाक्त नाले में गिर पड़ी वह वस्तु न मिलनी थी, न मिली।मैं सुशीला का –सा सुख चाहती थी, कुलटाओं की विषय-वासना नहीं। लेकिनजीवन-पथ में एक बार उलटी राह चलकर फिर सीधे मार्ग पर आना कठिन है?
लेकिनमेरे अध:पतन का अपराध मेरे सिर नहीं, मेरे माता-पिता और उस बूढ़े पर है जोमेरा स्वामी बनना चाहता था। मैं यह पंक्तियां न लिखतीं, लेकिन इस विचार सेलिख रही हूं कि मेरी आत्म-कथा पढ़कर लोगों की आंखे खुलें; मैं फिर कहतीहूं कि अब भी अपनी बालिकाओ के लिए मत देखों धन, मत देखों जायदाद, मत देखोंकुलीनता, केवल वर देखों। अगर उसके लिए जोड़ा का वर नहीं पा सकते तो लड़कीको क्वारी रख छोड़ो, जहर दे कर मार डालो, गला घोंट डालो, पर किसी बूढ़ेखूसट से मत ब्याहो। स्त्री सब-कुछ सह सकती है। दारुण से दारुण दु:ख, बड़ेसे बड़ा संकट, अगर नहीं सह सकती तो अपने यौवन-काल की उंमगो का कुचला जाना।
रही मैं, मेरे लिए अब इस जीवन में कोई आशा नहीं । इसअधम दशा को भी उस दशा से न बदलूंगी, जिससे निकल कर आयी हूं।

 

मैकू - प्रेमचंद

कादिर और मैकू ताड़ीखाने के सामने पहूँचे; तो वहॉँ कॉँग्रेस के वालंटियरझंडा लिए खड़े नजर आये। दरवाजे के इधर-उधर हजारों दर्शक खड़े थे। शाम कावक्त था। इस वक्त गली में पियक्कड़ों के सिवा और कोई न आता था। भले आदमीइधर से निकलते झिझकते। पियक्कड़ों की छोटी-छोटी टोलियॉँ आती-जाती रहती थीं।दो-चार वेश्याऍं दूकान के सामने खड़ी नजर आती थीं। आज यह भीड़-भाड़ देख करमैकू ने कहा—बड़ी भीड़ है बे, कोई दो-तीन सौ आदमी होंगे।

कादिर नेमुस्करा कर कहा—भीड़ देख कर डर गये क्या? यह सब हुर्र हो जायँगे, एक भी नटिकेगा। यह लोग तमाशा देखने आये हैं, लाठियॉँ खाने नहीं आये हैं।
मैकू ने संदेह के स्वर में कहा—पुलिस के सिपाही भी बैठे हैं। ठीकेदार ने तो कहा थ, पुलिस न बोलेगी।
कादिर—हॉँबे , पुलिस न बोलेगी, तेरी नानी क्यों मरी जा रही है । पुलिस वहॉँ बोलतीहै, जहॉँ चार पैसे मिलते है या जहॉँ कोई औरत का मामला होता है। ऐसी बेफजूलबातों में पुलिस नहीं पड़ती। पुलिस तो और शह दे रही है। ठीकेदार से साल मेंसैकड़ों रुपये मिलते हैं। पुलिस इस वक्त उसकी मदद न करेगी तो कब करेगी?
मैकू—चलो, आज दस हमारे भी सीधे हुए। मुफ्त में पियेंगे वह अलग, मगर हम सुनते हैं, कॉँग्रेसवालों में बड़े-बड़े मालदार लोग शरीक है। वह कहीं हम लोगों से कसरनिकालें तो बुरा होगा।
कादिर—अबे, कोई कसर-वसर नहीं निकालेगा, तेरी जानक्यों निकल रही है? कॉँग्रेसवाले किसी पर हाथ नहीं उठाते, चाहे कोई उन्हेंमार ही डाले। नहीं तो उस दिन जुलूस में दस-बारह चौकीदारों की मजाल थी कि दसहजार आदमियों को पीट कर रख देते। चार तो वही ठंडे हो गये थे, मगर एक नेहाथ नहीं उठाया। इनके जो महात्मा हैं, वह बड़े भारी फकीर है ! उनका हुक्महै कि चुपके से मार खा लो, लड़ाई मत करो।
यों बातें करते-करते दोनोंताड़ीखाने के द्वार पर पहुँच गये। एक स्वयंसेवक हाथ जोड़कर सामने आ गया औरबोला –भाई साहब, आपके मजहब में ताड़ी हराम है।
मैकू ने बात का जवाबचॉँटे से दिया । ऐसा तमाचा मारा कि स्वयंसेवक की ऑंखों में खून आ गया। ऐसामालूम होता था, गिरा चाहता है। दूसरे स्वयंसेवक ने दौड़कर उसे सँभाला।पॉँचों उँगलियो का रक्तमय प्रतिबिम्ब झलक रहा था।
मगर वालंटियर तमाचा खा कर भी अपने स्थान पर खड़ा रहा। मैकू ने कहा—अब हटता है कि और लेगा?
स्वयंसेवक ने नम्रता से कहा—अगर आपकी यही इच्छा है, तो सिर सामने किये हुए हूँ। जितना चाहिए, मार लीजिए। मगर अंदर न जाइए।
यह कहता हुआ वह मैकू के सामने बैठ गया ।
मैकूने स्वयंसेवक के चेहरे पर निगाह डाली। उसकी पॉचों उँगलियों के निशान झलकरहे थे। मैकू ने इसके पहले अपनी लाठी से टूटे हुए कितने ही सिर देखे थे, परआज की-सी ग्लानी उसे कभी न हुई थी। वह पाँचों उँगलियों के निशान किसीपंचशूल की भॉति उसके ह्रदय में चुभ रहे थे।
कादिर चौकीदारों के पास खड़ा सिगरेट पीने लगा। वहीं खड़े-खड़े बोला—अब, खड़ा क्या देखता है, लगा कसके एक हाथ।
मैकू ने स्वयंसेवक से कहा—तुम उठ जाओ, मुझे अन्दर जाने दो।
‘आप मेरी छाती पर पॉँव रख कर चले जा सकते हैं।’
‘मैं कहता हूँ, उठ जाओ, मै अन्दर ताड़ी न पीउँगा , एक दूसरा ही काम है।’
उसनेयह बात कुछ इस दृढ़ता से कही कि स्वयंसेवक उठकर रास्ते से हट गया। मैकू नेमुस्करा कर उसकी ओर ताका । स्वयंसेवक ने फिर हाथ जोड़कर कहा—अपना वादा भूलन जाना।
एक चौकीदार बोला—लात के आगे भूत भागता है, एक ही तमाचे में ठीक हो गया !
कादिर ने कहा—यह तमाचा बच्चा को जन्म-भर याद रहेगा। मैकू के तमाचे सह लेना मामूली काम नहीं है।
चौकीदार—आज ऐसा ठोंको इन सबों को कि फिर इधर आने को नाम न लें ।
कादिर—खुदा ने चाहा, तो फिर इधर आयेंगे भी नहीं। मगर हैं सब बड़े हिम्मती। जान को हथेली पर लिए फिरते हैं।


                                                2
मैकूभीतर पहुँचा, तो ठीकेदार ने स्वागत किया –आओ मैकू मियॉँ ! एक ही तमाचा लगाकर क्यो रह गये? एक तमाचे का भला इन पर क्या असर होगा? बड़े लतखोर हैं सब।कितना ही पीटो, असर ही नहीं होता। बस आज सबों के हाथ-पॉँव तोड़ दो; फिरइधर न आयें ।
मैकू—तो क्या और न आयेंगें?
ठीकेदार—फिर आते सबों की नानी मरेगी।
मैकू—और जो कहीं इन तमाशा देखनेवालों ने मेरे ऊपर डंडे चलाये तो!
ठीकेदार—तो पुलिस उनको मार भगायेगी। एक झड़प में मैदान साफ हो जाएगा। लो, जब तक एकाध बोतल पी लो। मैं तो आज मुफ्त की पिला रहा हूँ।
मैकू—क्या इन ग्राहकों को भी मुफ्त ?
ठीकेदार –क्या करता , कोई आता ही न था। सुना कि मुफ्त मिलेगी तो सब धँस पड़े।
मैकू—मैं तो आज न पीऊँगा।
ठीकेदार—क्यों? तुम्हारे लिए तो आज ताजी ताड़ी मँगवायी है।
मैकू—यों ही , आज पीने की इच्छा नहीं है। लाओ, कोई लकड़ी निकालो, हाथ से मारते नहीं बनता ।
ठीकेदार ने लपक कर एक मोटा सोंटा मैकू के हाथ में दे दिया, और डंडेबाजी का तमाशा देखने के लिए द्वार पर खड़ा हो गया ।
मैकूने एक क्षण डंडे को तौला, तब उछलकर ठीकेदार को ऐसा डंडा रसीद किया कि वहींदोहरा होकर द्वार में गिर पड़ा। इसके बाद मैकू ने पियक्कड़ों की ओर रुखकिया और लगा डंडों की वर्षा करने। न आगे देखता था, न पीछे, बस डंडे चलायेजाता था।
ताड़ीबाजों के नशे हिरन हुए । घबड़ा-घबड़ा कर भागने लगे, परकिवाड़ों के बीच में ठीकेदार की देह बिंधी पड़ी थी। उधर से फिर भीतर की ओरलपके। मैकू ने फिर डंडों से आवाहन किया । आखिर सब ठीकेदार की देह कोरौद-रौद कर भागे। किसी का हाथ टूटा, किसी का सिर फूटा, किसी की कमर टूटी।ऐसी भगदड़ मची कि एक मिनट के अन्दर ताड़ीखाने में एक चिड़िये का पूत भी नरह गया।
एकाएक मटकों के टूटने की आवाज आयी। स्वयंसेवक ने भीतर झाँक करदेखा, तो मैकू मटकों को विध्वंस करने में जुटा हुआ था। बोला—भाई साहब, अजीभाई साहब, यह आप गजब कर रहे हैं। इससे तो कहीं अच्छा कि आपने हमारे ही ऊपरअपना गुस्सा उतारा होता।
मैंकू ने दो-तीन हाथ चलाकर बाकी बची हुई बोतलों और मटकों का सफाया कर दिया और तब चलते-चलते ठीकेदार को एक लात जमा कर बाहर निकल आया।
कादिर ने उसको रोक कर पूछा –तू पागल तो नहीं हो गया है बे?
क्या करने आया था, और क्या कर रहा है।
मैकूने लाल-लाल ऑंखों से उसकी ओर देख कर कह—हॉँ अल्लाह का शुक्र है कि मैं जोकरने आया था, वह न करके कुछ और ही कर बैठा। तुममें कूवत हो, तो वालंटरों कोमारो, मुझमें कूवत नहीं है। मैंने तो जो एक थप्पड़ लगाया। उसका रंज अभी तकहै और हमेशा रहेगा ! तमाचे के निशान मेरे कलेजे पर बन गये हैं। जो लोगदूसरों को गुनाह से बचाने के लिए अपनी जान देने को खड़े हैं, उन पर वही हाथउठायेगा, जो पाजी है, कमीना है, नामर्द है। मैकू फिसादी है, लठैत ,गुंडाहै, पर कमीना और नामर्द नहीं हैं। कह दो पुलिसवालों से , चाहें तो मुझेगिरफ्तार कर लें।
कई ताड़ीबाज खड़े सिर सहलाते हुए, उसकी ओर सहमी हुईऑंखो से ताक रहै थे। कुछ बोलने की हिम्मत न पड़ती थी। मैकू ने उनकी ओर देखकर कहा –मैं कल फिर आऊँगा। अगर तुममें से किसी को यहॉँ देखा तो खून ही पीजाऊँगा ! जेल और फॉँसी से नहीं डरता। तुम्हारी भलमनसी इसी में है कि अब भूलकर भी इधर न आना । यह कॉँग्रेसवाले तुम्हारे दुश्मन नहीं है। तुम्हारे औरतुम्हारे बाल-बच्चों की भलाई के लिए ही तुम्हें पीने से रोकते हैं। इनपैसों से अपने बाल-बच्चो की परवरिश करो, घी-दूध खाओ। घर में तो फाके हो रहैहैं, घरवाली तुम्हारे नाम को रो रही है, और तुम यहॉँ बैठे पी रहै हो? लानतहै इस नशेबाजी पर ।
मैकू ने वहीं डंडा फेंक दिया और कदम बढ़ाता हुआ घरचला। इस वक्त तक हजारों आदमियों का हुजूम हो गया था। सभी श्रद्धा, प्रेम औरगर्व की ऑंखो से मैकू को देख रहे थे।

 

बड़े बाबू - प्रेमचंद

तीन सौ पैंसठ दिन, कई घण्टे और कई मिनट की लगातार और अनथक दौड़-धूप केबाद मैं आखिर अपनी मंजिल पर धड़ से पहुँच गया। बड़े बाबू के दर्शन हो गए।मिट्टी के गोले ने आग के गोले का चक्कर पूरा कर लिया। अब तो आप भी मेरीभूगोल की लियाकत के कायल हो गए। इसे रुपक न समझिएगा। बड़े बाबू में दोपहरके सूरज की गर्मी और रोशनी थी और मैं क्या और मेरी बिसात क्या, एक मुठ्ठीखाक। बड़े बाबू मुझे देखकर मुस्कराये। हाय, यह बड़े लोगों की मुस्कराहट, मेरा अधमरा-सा शरीर कांपते लगा। जी में आया बड़े बाबू के कदमों पर बिछजाऊँ। मैं काफिर नहीं, गालिब का मुरीद नहीं, जन्नत के होने पर मुझे पूरायकीन है, उतरा ही पूरा जितना अपने अंधेरे घर पर। लेकिन फरिश्ते मुझे जन्नतले जाने के लिए आए तो भी यकीनन मुझे वह जबरदस्त खुशी न होती जो इस चमकतीहुई मुस्कराहट से हुई। आंखों में सरसों फूल गई। सारा दिल और दिमाग एक बगीचाबन गया। कल्पना ने मिस्र के ऊंचे महल बनाने शुरु कर दिय। सामने कुर्सियों, पर्दो और खस की टट्टियों से सजा-सजाया कमरा था। दरवाजे पर उम्मीदवारों कीभीड़ लगी हुई थी और ईजानिब एक कुर्सी पर शान से बैठे हुए सबको उसका हिस्सादेने वाले खुदा के दुनियाबी फ़र्ज अदा कर रहे थे। नजर-मियाज़ का तूफ़ानबरपा था और मैं किसी तरफ़ आंख उठाकर न देखता था कि जैसे मुझे किसी से कुछलेना-देना नहीं।

अचानक एक शेर जैसी गरज ने मेरे बनते हुए महल में एकभूचाल-सा ला दिया—क्या काम है? हाय रे, ये भोलापन ! इस पर सारी दुनिया केहसीनों का भोलापन और बेपरवाही निसार है। इस ड्याढ़ी पर माथा रगड़ते-रगड़तेतीने सौ पैंसठ दिन, कई घण्टे और कई मिनट गुजर गए। चौखट का पत्थर घिसकर जमीनसे मिल गया। ईदू बिसाती की दुकान के आधे खिलौने और गोवर्द्धन हलवाई की आधीदुकान इसी ड्यौढ़ी की भेंट चढ़ गयी और मुझसे आज सवाल होता है, क्या काम
है !
मगरनहीं, यह मेरी ज्यादती हैं सरासर जुल्म। जो दिमाग़ बड़े-बड़े मुल्की औरमाली तमद्दुनी मसलों में दिन-रात लगा रहता है, जो दिमाग़ डाकूमेंटों, सरकुलरों, परवानों, हुक्मनामों, नक्शों वग़ैरह के बोझ से दबा जा रहा हो, उसके नजदीक मुझ जैसे खाक के पुतले की हस्ती ही क्या। मच्छर अपने को चाहेहाथी समझ ले पर बैल के सींग को उसकी क्या खबर। मैंने दबी जबान मेंकहा—हुजूर की क़दमबोसी के लिए हाजिर हुआ।
बड़े बाबू गरजे—क्या काम है?
अबकीबार मेरे रोएं खड़े हो गए। खुदा के फ़जल से लहीम-शहीम आदमी हूँ, जिन दिनोंकालेज में था, मेरे डील-डौल और मेरी बहादुरी और दिलेरी की धूम थी। हाकीटीम का कप्तान, फुटवाल टीम का नायब कप्तान और क्रिकेट का जनरल था। कितने हीगोरों के जिस्म पर अब भी मेरी बहादुरी के दाग़ बाकी होंगे। मुमकिन है, दो-चार अब भी बैसाखियां लिए चलते या रेंगते हों। ‘बम्बई क्रानिकल’ और ‘टाइम्स’ में मेरे गेंदों की धूम थी। मगर इस वक्त बाबू साहब की गरज सुनकरमेरा शरीर कांपने लगा। कांपते हुए बोला—हुजूर की कदमबोसी के लिए हाजिर हुआ।
बड़ेबाबू ने अपना स्लीपरदार पैर मेरी तरफ़ बढ़ाकर कहा—शौक से लीजिए, यह कदमहाजिर है, जितने बोसे चाहे लीजिए, बेहिसाब मामले हैं, मुझसे कसम ले लीजिएजो मैं गिनूँ, जब तक आपका मुंह न थक जाए, लिए जाइए ! मेरे लिए इससे बढ़करखुशनसीबी का क्या मौका होगा ? औरों को जो बात बड़े जप-तप, बड़े संयम-व्रतसे मिलती है, वह मुझे बैठे-बिठाये बग़ैर हड़-फिटकरी लगाए हासिल हो गयी।वल्लाह, हूं मैं भी खुशनसीब । आप अपने दोस्त-अहबाब, आत्मीय-स्वजन जो हों, उन सबको लायें तो और भी अच्छा, मेरे यहां सबको छूट है !
हंसी के पर्देमें यह जो जुल्म बड़े बाबू कर रहे थे उस पर शायद अपने दिल में उनको नाज हो।इस मनहूस तकदीर का बुरा हो, जो इस दरवाज़े का भिखारी बनाए हुए है। जी मेंतो आया कि हज़रत के बढ़े हुए पैर को खींच लूं और आपको जिन्दगी-भर के लिएसबक दे दूँ कि बदनसीबों से दिल्लगी करने का यह मजा हैं मगर बदनसीबी अगर दिलपर जब्र न कराये, जिल्लत का अहसास न पैदा करे तो वह बदनसीबी क्यों कहलाए।मैं भी एक जमाने में इसी तरह लोगों को तकलीफ पहुँचाकर हंसता था। उस वक्त इनबड़े बाबुओं की मेरी निगाह में कोई हस्ती न थी। कितने ही बड़े बाबुओं कोरुलाकर छोड़ दिया। कोई ऐसा प्रोफेसर न था, जिसका चेहरा मेरी सूरत देखते हीपीला न पड़ जाता हो। हजार-हजार रुपया पाने वाले प्रोफेसरों की मुझसे कोरदबकी थी। ऐसे क्लर्को को मैं समझता ही क्या था। लेकिन अब वह जमाना कहां।दिल में पछताया कि नाहक कदमबोसी का लफ़्ज जबान पर लाया। मगर अपनी बात कहनाजरुरी था। मैं पक्का इरादा करके अया था कि उस ड्यौढ़ी से आज कुछ लेकर हीउठूंगा। मेरे धीरज और बड़े बाबू के इस तरह जान-बूझकर अनजान बनने मेंरस्साकशी थी। दबी ज़बान से बोला—हुजूर, ग्रेजुएट हूँ।
शुक्र है, हज़ारशुक्र हैं, बड़े बाबू हंसे। जैसे हांडी उबल पड़ी हो। वह गरज और वह करख्तआवाज न थी। मेरा माथा रगड़ना आखिर कहां तक असर न करता। शायद असर को मेरीदुआ से दुश्मनी नहीं। मेरे कान बड़ी बेक़रारी से वे लफ़्ज सुनने के लिएबेचैन हो रहे थे जिनसे मेरी रुह को खुशी होगी। मगर आह, जितनी मायूसी इनकानों को हुई है उतनी शायद पहाड़ खोदने वाले फ़रहाद को भी न हुई होगी। वहमुस्कराहट न थी, मेरी तक़दीर की हंसी थी। हुजूर ने फ़रमाया—बड़ी खुशी कीबात है, मुल्क और क़ौम के लिए इससे ज्यादा खुशी की बात और क्या हो सकती है।मेरी दिली तमन्ना है, मुल्क का हर एक नौजवान ग्रेजुएट हो जाए। ये ग्रेजुएटज़िन्दगी के जिस मैदान में जाय, उस मैदान को तरक्की ही देगा—मुल्की, माली, तमद्दुनी (मजहबी) ग़रज कि हर एक किस्म की तहरीक का जन्म और तरक्कीग्रेजुएटों ही पर मुनहसर है। अगर मुल्क में ग्रेजुएटों का यह अफ़सोसनाकअकाल न होता तो असहयोग की तहरीक क्यों इतनी जल्दी मुर्दा हो जाती ! क्योंबने हुए रंगे सियार, दग़ाबाज जरपस्त लीडरों को डाकेजनी के ऐसे मौके मिलते!तबलीग क्यों मुबल्लिगे अले हुस्सलाम की इल्लत बनती! ग्रेजुएट में सच और झूठकी परख, निगाह का फैलाव और जांचने-तोलने की क़ाबलियत होना जरुरी बात है।मेरी आंखें तो ग्रेजुएटों को देखकर नशे के दर्जे तक खुशी से भर उठती हैं।आप भी खुदा के फ़जल से अपनी क़िस्म की बहुत अच्छी मिसाल हैं, बिल्कुलआप-टू-डेट। यह शेरवानी तो बरकत एण्ड को की दुकान की सिली हुई होगी। जूते भीडासन के हैं। क्यों न हो। आप लोंगों ने कौम की जिन्दगी के मैयार को बहुतऊंचा बना दिया है और अब वह बहुत जल्द अपनी मंजिल पर पहुँचेगी। ब्लैकबर्डपेन भी है, वेस्ट एण्ड की रिस्टवाच भी है। बेशक अब कौमी बेड़े को ख्वाजाखिज़र की जरुरत भी नहीं। वह उनकी मिन्नत न करेगा।
हाय तक़दीर और वायतक़दीर ! अगर जानता कि यह शेरवानी और फ़ाउंटेनपेन और रिस्टवाज यों मज़ाक कानिशाना बनेगी, तो दोस्तों का एहसान क्यों लेता। नमाज़ बख्शवाने आया था, रोज़े गले पड़े। किताबों में पढ़ा था, ग़रीबी की हुलिया ऐलान है अपनीनाकामी का, न्यौता देना है अपनी जिल्लत कों। तजुर्बा भी यही कहता था।चीथड़े लगाये हुए भिखमंगों को कितनी बेदर्दी से दुतकारता हूँ लेकिन जब कोईहजरत सूफी-साफ़ी बने हुए, लम्बे-लम्बे बाल कंधों पर बिखेरे, सुनहरा अमामासर पर बांका-तिरछा शान से बांधे, संदली रंग का नीचा कुर्ता पहने, कमरे में आपहुँचते हैं तो मजबूर होकर उनकी इज्जत करनी पड़ती है और उनकी पाकीज़गी केबारे में हजारों शुबहे पैदा होने पर भी छोटी-छोटी रक़म जो उनकी नज़र कीजाती हे, वह एक दर्जन भिखारियों को अच्छा खाना खिलाने के सामान इकट्ठा करदेती। पुरानी मसल है—भेस से ही भीख मिलती है। पर आज यह बात ग़लत साबित होगयी । अब बीवी साहिबा की वह तम्बीह याद आयी जो उसने चलते वक्त दी थी—क्योंबेकार अपनी बइज्जती कराने जा रहे हो। वह साफ़ समझेंगे कि यह मांगे-जांचे काठाठ है। ऐसे रईस होते तो मेरे दरवाजे पर आते क्यों। उस वक्त मैंने इसतम्बीह को बीवी की कमनिगाह और उसका गंवारपन समझा था। पर अब मालूम हुआ किगंवारिनें भी कभी-कभी सूझ की बातें कहते हैं। मगर अब पछताना बेकार है।मैंने आज़िज़ी से कहा—हुजूर, कहीं मेरी भी परवरिश फ़रमायें।
बड़े बाबूने मेरी तरफ़ इस अन्दाज से देखा जैसे मैं किसी दूसरी दुनिया का कोई जानवरहूँ और बहुत दिलासा देने के लहजे में बोले—आपकी परवरिश खुदा करेगा। वहीसबका रज्ज़ाक है, दुनिया जब से शुरु हुई तब से तमाम शायर, हकीम और औलियायही सिखाते आये हैं कि खुदा पर भरोसा रख और हम हैं कि उनकी हिदायत को भूलजाते हैं। लकिन खैर, मैं आपको नेक सलाह देने में कंजूसी न करुँगा। आप एकअखबार निकाल लीजिए। यकीन मानिए इसके लिए बहुत ज्यादा पढ़े-लिखे होने कीजरुरत नहीं और आप तो खुदा के फ़ज़ल से ग्रेजुएट है।, स्वादिष्ट तिलाओं औरस्तम्भन-बटियों के नुस्खें लिखिए। तिब्बे अकबर में आपको हज़ारों नुस्खेमिलेंगे। लाइब्रेरी जाकर नकल कर लाइए और अखबार में नये नाम से छापिए।कोकशास्त्र तो आपने पढ़ा ही होगा अगर न पढ़ा हो तो एक बार पढ़ जाइए और अपनेअखबार में शादी के मर्जो के तरीके लिखिए। कामेन्द्रिय के नाम जिंतनेज्यादा आ सकें, बेहतर है फिर देखिए कैसे डाक्टर और प्रोफेसर और डिप्टीकलेक्टर आपके भक्त हो जाते हैं। इसका खयाल रहे कि यह काम हकीमाना अन्दाज़से किया जाए। ब्योपारी और हकीमाना अन्दाज में थोड़ा फ़र्क़ है, ब्योपारीसिर्फ़ अपनी दवाओं की तारीफ़ करता है, हकीम परिभाषाओं और सूक्तियों कोखोलकर अपने लेखों को इल्मी रंग देता है। ब्योपारी की तारीफ से लोग चिढ़तेहैं, हकीम की तारीफ़ भरोसा दिलाने वाली होती है। अगर इस मामले में कुछसमझने-बूझने की जरुरत हो तो रिसाला ‘दरवेश’ हाज़िर हैं अगर इस काम में आपकोकुछ दिक्कत मालूम होती हो, तो स्वामी श्रद्धानन्द की खिदमत में जाकरशुद्धि पर आमादगी जाहिर कीजिए—फिर देखिए आपकी कितनी खातिर-तवाजों होती है।इतना समझाये देता हूँ कि शुद्धि के लिए फौरन तैयार न हो जाइएगा। पहले दिनतो दो-चार हिन्दू धर्म की किताबें मांग लाइयेगा। एक हफ्ते के बाद जाकर कुछएतराज कीजिएगा। मगर एतराज ऐसे हो जिनका जवाब आसानी से दिया जा सके इससेस्वामीजी को आपकी छान-बीन और जानने की ख्वाहिश का यकीन हो जायेगा। बस, आपकीचांदी है। आप इसके बाद इसलाम की मुखालिफत पर दो-एक मजमून या मजमूनों कासिलसिला किसी हिन्दू रिसाले में लिख देंगे तो आपकी जिन्दगी और रोटी का मसलाहल हो जाएगा। इससे भी सरल एक नुस्खा है—तबलीग़ी मिशन में शरीक हो जाइए, किसी हिन्दू औरत, खासकर नौजवान बेवा, पर डोरे डालिए। आपको यह देखकर हैरतहोगी कि वह कितनी आसानी से आपसे मुहब्बत करने लग जाती है। आप उसकी अंधेरीजिन्दगी के लिए एक मशाल साबित होंगे। वह उज़ नहीं करती, शौक से इसलाम कबूलकर लेगी। बस, अब आप शहीदों में दाखिल हो गए। अगर जरा एहतियात से काम करतेरहें तो आपकी जिन्दगी बड़े चैन से गुजरेगी। एक ही खेवे में दीनो-दुनियादोनों ही पार हैं। जनाब लीडर बन जाएंगे वल्लाह, एक हफ्ते में आपका शुमारनामी-गरामी लोगों में होने लगेगा, दीन के सच्चे पैरोकार। हजारों सीधे-सादेमुसलमान आपकों दीन की डूबती हुई किश्ती का मल्लाह समझेंगे। फिर खुदा केसिवा और किसी को खबर न होगी कि आपके हाथ क्या आता है और वह कहां जाता है औरखुदा कभी राज नहीं खोला करता, यह आप जानते ही हैं। ताज्जुब है कि इन मौकोंपर आपकी निगाह क्यों नहीं जाती ! मैं तो बुड्ढा हो गया और अब कोई नया कामनहीं सीख सकता, वर्ना इस वक्त लीडरों का लीडर होता।
इस आग की लपट जैसेमज़ाक ने जिस्म में शोले पैदा कर दिये। आंखों से चिनगारियां निकलने लगीं।धीरज हाथ से छूटा जा रहा था। मगर कहरे दरवेश बर जाने दरवेश(भिखारी कागुस्सा अपनी जान पर) के मुताबिक सर झुकाकर खड़ा रहा। जितनी दलीलें दिमागमें कई दिनों से चुन-चुनकर रखी थीं, सब धरी रह गयीं। बहुत सोचने पर भी कोईनया पहलू ध्यान में न आया। यों खुदा के फ़ज़ल से बेवकूफ़ या कुन्दजेहन नहींहूँ, अच्छा दिमाग पाया है। इतने सोच-विचार से कोई अच्छी-सी गजल हो जाती।पर तबीयत ही तो है, न लड़ी। इत्तफाक से जेब में हाथ डाला तो अचानक याद आगया कि सिफारिशी खतों का एक पोथा भी साथ लाया हूँ। रोब का दिमाग पर क्याअसर पड़ता है इसका आज तजुर्बा हो गया। उम्मीद से चेहरा फूल की तरह खिल उठा।खतों का पुलिन्दा हाथ में लेकर बोला—हुजूर, यह चन्द खत हैं इन्हेंमुलाहिजा फरमा लें।
बड़े बाबू ने बण्डल लेकर मेज़ पर रख दिया और उस पर एक उड़ती हुई नज़र डालकर बोले—आपने अब तक इन मोतियों को क्यों छिपा रक्खा था ?
मेरेदिल में उम्मीद की खुशी का एक हंगामा बरपा हो गया। जबान जो बन्द थी, खुलगयी। उमंग से बोला—हुजूर की शान-शौकत ने मुझ पर इतना रोब डाल दिया और कुछऐसा जादू कर दिया कि मुझे इन खतों की याद न रही। हुजूर से मैं बिनानमक-मिर्च लगाये सच-सच कहता हूँ कि मैंने इनके लिए किसी तरह की कोशिश यासिफारिश नहीं पहुँचायी। किसी तरह की दौड़-भाग नहीं की।
बड़े बाबू नेमुस्कराकर कहा—अगर आप इनके लिए ज्यादा से ज्यादा दौड़-भाग करने में भी अपनीताक़त खर्च करते तो भी मैं आपको इसके लिए बुरा-भला न कहता। आप बेशक बड़ेखुशनसीब हैं कि यह नायाब चीज़ आपकों बेमांग मिल गई, इसे जिन्दगी के सफ़र कापासपोर्ट समझिए। वाह, आपकों खुदा के फ़ज़ल से एक एक़ से एक कद्रदान नसीबहुए। आप जहीन हैं, सीधे-सच्चे हैं, बेलौस हैं, फर्माबरदार है। ओफ्फोह, आपकेगुणों की तो कोई इन्तहा ही नहीं है। कसम खुदा की, आपमें तो तमाम भीतरी औरबाहरी कमाल भरे हुए हैं। आपमें सूझ-बूझ गम्भीरता, सच्चाई, चौकसी, कुलीनता, शराफत, बहादुरी, सभी गुण मौजूद हैं। आप तो नुमाइश में रखे जाने के क़ाबिलमालूम होते हैं कि दुनिया आपकों हैरत की निगाह से देखे तो दांतों तले उंगलीदबाये। आज किसी भले का मुंह देखकर उठा था कि आप जैसे पाकीजा आदमी के दर्शनहुए। यह वे गुण हैं जो जिन्दगी के हर एक मैदान में आपको शोहरत की चोटी तकपहुँचा सकते हैं। सरकारी नौकरी आप जैसे गुणियों की शान के क़ाबिल नहीं।आपकों यह कब गवारा होगा। इस दायरे में आते ही आदमी बिलकुल जानवर बन जाताहै। बोलिए, आप इसे मंजूर कर सकते हैं ? हरगिज़ नहीं।
मैंने डरते-डरते कहा—जनाब, जरा इन लफ्जों को खोलकर समझा दीजिए। आदमी के जानवर बनजाने से आपकी क्या मंशा है?
बड़ेबाबू ने त्योरी चढ़ाते हुए कहा—या तो कोई पेचीदा बात न थी जिसका मतलबखोलकर बतलाने की जरुरत हो। तब तो मुझे बात करने के अपने ढंग में कुछ तरमीमकरनी पड़ेगी। इस दायरे के उम्मीदवारों के लिए सबसे जरुरी और लाज़िमी सिफ़तसूझ-बूझ है। मैं नहीं कह सकता कि मैं जो कुछ कहना चाहता हूँ, वह इस लफ्ज सेअदा होता है या नहीं। इसका अंग्रेजी लफ्ज है इनटुइशन—इशारे के असली मतलबको समझना। मसलन अगर सरकार बहादुर यानी हाकिम जिला को शिकायत हो कि आपकेइलाके में इनकमटैक्स कम वसूल होता है तो आपका फ़र्ज है कि उसमें अंधाधुन्धइजाफ़ा करें। आमदनी की परवाह न करें। आमदनी का बढ़ना आपकी सूझबूझ पर मुनहसरहै! एक हल्की-सी धमकी काम कर जाएगी और इनकमटैक्स दुगुना-तिगुना हो जाएगा।यकीनन आपकों इस तरह अपना ज़मीर (अन्त:करण) बेचना गवारा न होगा।
मैंनेसमझ लिया कि मेरा इम्तहान हो रहा है, आशिकों जैसे जोश और सरगर्मी सेबोला—मैं तो इसे जमीर बेचना नहीं समझता, यह तो नमक का हक़ है। मेरा ज़मीरइतना नाज़ुक नहीं है।
बड़े बाबू ने मेरी तरफ़ क़द्रदानी की निगाह सेदेखकर कहा—शाबाश, मुझे तुमसे ऐसे ही जवाब की उम्मीद थी। आप मुझे होनहारमालूम होते हैं। लेकिन शायद यह दूसरी शर्त आपको मंजूर न हो। इस दायरे केमुरीदों के लिए दूसरी शर्त यह है कि वह अपने को भूल जाएं। कुछ आया आपकी समझमें ?
मैंने दबी जबान में कहा—जनाब को तकलीफ़ तो होगी मगर जरा फिर इसको खोलकर बतला दीजिए।
बड़ेबाबू ने त्योरियों पर बल देते हुए कहा—जनाब, यह बार-बार का समझाना मुझेबुरा मालूम होता है। मैं इससे ज्यादा आसान तरीक़े पर खयालों को ज़ाहिर नहींकर सकता। अपने को भूल जाना बहुत ही आम मुहावरा हैं। अपनी खुदी को मिटादेना, अपनी शख्सियत को फ़ना कर देना, अपनी पर्सनालिटी को खत्म कर देना।आपकी वज़ा-कज़ा से आपके बोलने, बात करने के ढंग से, आपके तौर-तरीकों सेआपकी हिन्दियत मिट जानी चाहिए। आपके मज़हबी, अखलाकी और तमद्दुनी असरों काबिलकुल ग़ायब हो जाना ज़रुर हैं। मुझे आपके चेहरे से मालूम हो रहा है कि इससमझाने पर भी आप मेरा मतलब नहीं समझ सके। सुनिए, आप ग़ालिबन मुसलमान हैं।शायद आप अपने अक़ीदों में बहुत पक्के भी हों। आप नमाज़ और रोज़े के पाबन्दहैं?
मैंने फ़ख से कहा—मैं इन चीजों का उतना ही पाबन्द हूँ जितना कोईमौलवी हो सकता हैं। मेरी कोई नमाज़ क़ज़ा नहीं हुई। सिवाय उन वक्तों के जबमैं बीमार था।
बड़े बाबू ने मुस्कराकर कहा—यह तो आपके अच्छे अखलाक ही कहदेते हैं। मगर इस दायरे में आकर आपकों अपने अक़ीदे और अमल में बहुत कुछकाट-छांत करनी पड़ेगी। यहां आपका मज़हब मज़हबियत का जामा अख्तियार करेगा।आप भूलकर भी अपनी पेशानी को किसी सिजदे में न झुकाएं, कोई बात नहीं। आपभूलकर भी ज़कात के झगड़े में न फूसें, कोई बात नहीं। लेकिन आपको अपने मजहबके नाम पर फ़रियाद करने के लिए हमेशा आगे रहना और दूसरों को आमादा करनाहोगा। अगर आपके ज़िले में दो डिप्टी कलक्टर हिन्दू हैं और मुसलमान सिर्फ़एक, तो आपका फ़र्ज होगा कि हिज एक्सेलेंसी गवर्नर की खिदमत में एक डेपुटेशनभेजने के लिए कौम के रईसों में आमादा करें। अगर आपको मालूम हो कि किसीम्युनिसिपैलिटी ने क़साइयों को शहर से बाहर दूकान रखने की तजवीज़ पास कर दीहै तो आपका फ़र्ज होगा कि कौम के चौधरियों को उस म्युनिसिपैलिटी का सिरतोड़ने के लिए तहरीक करें। आपको सोते-जागते, उठते-बैठते जात-पॉँत का रागअलापना चाहिए। मसलन इम्तहान के नतीजों में अगर आपको मुसलमान विद्यार्थियोंकी संख्या मुनासिब से कम नज़र आये तो आपको फौरन चांसकर के पास एक गुमनामख़त लिख भेजना होगा कि इस मामले में जरुर ही सख्ती से काम लिया गया है। यहसारी बातें उसी इनटुइशनवाली शर्त के भीतर आ जाती हैं। आपको साफ़-साफ़शब्दों में या इशारों से यह काम करने से लिए हिदायत न की जाएगी। सब कुछआपकी सूझ-सूझ पर मुनहसर होगा। आपमें यह जौहर होगा तो आप एक दिन जरुर ऊंचेओहदे पर पहुँचेंगे। आपको जहां तक मुमकिन हो, अंग्रेजी में लिखना और बोलनापड़ेगा। इसके बग़ैर हुक्काम आपसे खुश न होंगे। लेकिन क़ौमी ज़बान की हिमायतऔर प्रचार की सदा आपकी ज़बान से बराबर निकलती रहनी चाहिए। आप शौक़ सेअखबारों का चन्दा हज़म करें, मंगनी की किताबें पढ़ें चाहे वापसी के वक्तकिताब के फट-चिंथ जाने के कारण आपको माफ़ी ही क्यों न मांगनी पड़े, लेकिनजबान की हिमायत बराबर जोरदार तरीकें से करते रहिए। खुलासा यह कि आपको जिसकाखाना उसका गाना होगा। आपकों बातों से, काम से और दिल से अपने मालिक कीभलाई में और मजबूती से उसको जमाये रखने में लगे रहना पड़ेगा। अगर आप यहखयाल करते हों कि मालिक की खिदमत के ज़रिये कौम की खिदमत की करुंगा तो यहझूठ बात है, पागलपन है, हिमाक़त है। आप मेरा मतलब समझ गये होंगे। फ़रमाइए, आप इस हद तक अपने को भूल सकते हैं?
मुझे जवाब देने में जरा देर हुई। सचयह है कि मैं भी आदमी हूँ और बीसवीं सदी का आदमी हूँ। मैं बहुत जागा हुआ नसही, मगर बिलकुल सोया हुआ भी नहीं हूँ, मैं भी अपने मुल्क और क़ौम कोबुलन्दी पर देखना चाहता हूँ। मैंने तारीख पढ़ी है और उससे इसी नतीजे परपहुँचा हूँ कि मज़हब दुनिया में सिर्फ एक है और उसका नाम है—दर्द। मज़हब कीमौजूदा सूरत धड़ेबंदी के सिवाय और कोई हैसियत नहीं रखती। खतने या चोटी सेकोई बदल नहीं जाता। पूजा के लिए कलिसा, मसजिद, मन्दिर की मैं बिलकुल जरुरतनहीं समझता। हॉँ, यह मानता हूँ कि घमण्ड और खुदगरजी को दबाये रखने के लिएकुछ करना जरुरी है। इसलिए नहीं कि उससे मुझे जन्नत मिलेगी या मेरी मुक्तिहोगी, बल्कि सिर्फ़ इसलिए कि मुझे दूसरों के हक़ छीनने से नफ़रत होगी।मुझमें खुदी का खासा जुज़ मौजूद है। यों अपनी खुशी से कहिए तो आपकी जूतियॉँसीधी करुँ लकिन हुकूमत की बरदाश्त नहीं। महकूम बनना शर्मनाक समझता हूँ।किसी ग़रीब को जुल्म का शिकार होते देखकर मेरे खून में गर्मी पैदा हो जातीहै। किसी से दबकर रहने से मर जाना बेहतर समझता हूँ। लेकिन खयाल हालतों परतो फ़तह नहीं पा सकता। रोज़ी फ़िक्र तो सबसे बड़ी। इतने दिनों के बाद बड़ेबाबू की निगाहे करम को अपनी ओर मुड़ता देखकर मैं इसके सिवा कि अपना सिरझुका दूँ, दूसरा कर ही क्या सकता था। बोला- जनाब, मेरी तरफ़ से भरोसारक्खें। मालिक की खिदमत में अपनी तरफ़ से कुछ उठा न रक्खूँगा।
‘ग़ैरत को फ़ना कर देना होगा।’
‘मंजूर।’
‘शराफत के जज्बों को उठाकर ताक़ पर रख देना होगा।’
‘मंजूर।’
‘मुखबिरी करनी पड़ेगी?’
‘मंजूर।’
‘तो बिस्मिल्लाह, कल से आपका नाम उम्मीदवारों की फ़ेहरिस्त में लिख दिया जायेगा ।’
मैंनेसोचा था कल से कोई जगह मिल जायेगी। इतनी जिल्लत क़बूल करने के बाद रोजी कीफ़िक से तो आज़ाद हो जाऊँगा। अब यह हक़ीकत खुली। बरबस मुंह से निकला—औरजगह कब तक मिलेगी?
बड़े बाबू हंसे, वही दिल दुखानेवाली हंसी जिसमेंतौहीन का पहलू खास था—जनाब, मैं कोई ज्योतिषी नहीं, कोई फ़कीर-दरवेश नहीं, बेहतर है इस सवाल का जवाब आप किसी औलिया से पूछें। दस्तरखान बिछा देना मेराकाम है। खाना आयेगा और वह आपके हलक में जायेगा, यह पेशीनगोई मैं नहीं करसकता।
मैंने मायूसी के साथ कहा—मैं तो इससे बड़ी इनायत का मुन्तज़िर था।
बड़ेबाबू कुर्सी से उठकर बोले—क़सम खुदा की, आप परले दर्जे के कूड़मग्ज़ आदमीहैं। आपके दिमाग में भूसा भरा है। दस्तरखान का आ जाना आप कोई छोटी बातसमझते हैं? इन्तज़ार का मज़ा आपकी निगाह में कोई चीज़ ही नहीं? हालांकिइन्तजार में इन्सान उमरें गुज़ार सकता है। अमलों से आपका परिचय हो जाएगा।मामले बिठाने, सौदे पटाने के सुनहरे मौके हाथ आयेंगे। हुक्काम के लड़केपढ़ाइये। अगर गंडे-तावीज का फ़न सीख लीजिए तो आपके हक़ में बहुत मुफ़ीद हो।कुछ हकीमी भी सीख लीजिए। अच्छे होशियार सुनारों से दोस्ती पैदाकिजिए,क्योंकि आपको उनसे अक्सर काम पड़ेगा। हुक्काम की औरतें आप ही केमार्फ़त अपनी जरुरतें पूरी करायेंगी। मगर इन सब लटकों से ज्यादा कारगर एकऔर लटका है, अगर वह हुनर आप में है, तो यक़ीनन आपके इन्तजार की मुद्दत बहुतकुछ कम हो सकती है। आप बड़े-बड़े हाकिमों के लिए तफ़रीह का सामान जुटासकते हैं !
बड़े बाबू मेरी तरफ़ कनखियों से देखकर मुस्कराये। तफ़रीह केसामान से उनका क्या मतलब है, यह मैं न समझ सका। मगर पूछते हुए भी डर लगताथा कि कहीं बड़े बाबू बिगड़ न जाएं और फिर मामला खराब हो जाए। एक बेचैनीकी-सी हालत में जमीन की तरफ ताकने लगा।
बड़े बाबू ताड़ तो गये कि इसकीसमझ में मेरी बात न आयी लेकिन अबकी उनकी त्योरियों पर बल नहीं पड़े। न हीउनके लहजे में हमदर्दी की झलक फ़रमायी—यह तो ग़ैर-मुमकिन है किक आपनेबाज़ार की सैर न की हो।
मैंने शर्माते हुए कहा—नहीं हुजूर, बन्दा इस कूचे को बिलकुल नहीं जानता।
बड़ेबाबू—तो आपको इस कूचे की खाक छाननी पड़ेगी। हाकिम भी आंख-कान रखते हैं।दिन-भर की दिमागी थकन के बाद स्वभावत: रात को उनकी तबियत तफ़रीह की तरफ़झुकती हैं। अगर आप उनके लिए ऑंखों को अच्छा लगनेवाले रुप और कानों कोभानेवाले संगीत का इन्तज़ाम सस्ते दामों कर सकते हैं या कर सकें तो...
मैंने किसी क़दर तेज़ होकर कहा—आपका कहने का मतलब यह है कि मुझे रुप की मंड़ी की दलाली करनी पड़ेगी ?
बड़े बाबू—तो आप तेज़ क्यों होते हैं, अगर अब तक इतनी छोटी-सी बात आप नहीं समझे तो यह मेरा क़सूर है या आपकी अक्ल का !
मेरेजिस्म में आग लग गयी। जी में आया कि बड़े बाबू को जुजुत्सू के दो-चार हाथदिखाऊँ, मगर घर की बेसरोसामानी का खयाल आ गया। बीवी की इन्तजार करती हुईआंखें और बच्चों की भूखी सूरतें याद आ गयीं। जिल्लत का एक दरिया हलक़ सेनीचे ढकेलते हुए बोला—जी नहीं, मैं तेज़ नहीं हुआ था। ऐसी बेअदबी मुझसेनहीं हो सकती। (आंखों में आंसू भरकर) जरुरत ने मेरी ग़ैरत को मिटा दिया है।आप मेरा नाम उम्मीदवारों में दर्ज कर दें। हालात मुझसे जो कुछ करायेंगे वहसब करुँगा और मरते दम तक आपका एहसानमन्द रहूँगा।
-‘खाके परवाना’से

 

बड़े भाई साहब - प्रेमचंद

मेरे भाई साहब मुझसे पॉँच साल बडे थे, लेकिन तीन दरजे आगे। उन्‍होने भीउसी उम्र में पढना शुरू किया था जब मैने शुरू किया; लेकिन तालीम जैसेमहत्‍व के मामले में वह जल्‍दीबाजी से काम लेना पसंद न करते थे। इस भवन किबुनियाद खूब मजबूत डालना चाहते थे जिस पर आलीशान महल बन सके। एक साल का कामदो साल में करते थे। कभी-कभी तीन साल भी लग जाते थे। बुनियाद ही पुख्‍ता नहो, तो मकान कैसे पाएदार बने।

मैं छोटा था, वह बडे थे। मेरी उम्र नौ साल कि,वह चौदह साल ‍के थे। उन्‍हेंमेरी तम्‍बीह और निगरानी का पूरा जन्‍मसिद्ध अधिकार था। और मेरी शालीनताइसी में थी कि उनके हुक्‍म को कानून समझूँ।
वह स्‍वभाव से बडे अघ्‍ययनशील थे। हरदम किताब खोले बैठे रहते और शायद दिमागको आराम देने के लिए कभी कापी पर, कभी किताब के हाशियों पर चिडियों, कुत्‍तों, बल्लियो की तस्‍वीरें बनाया करते थें। कभी-कभी एक ही नाम याशब्‍द या वाक्‍य दस-बीस बार लिख डालते। कभी एक शेर को बार-बार सुन्‍दरअक्षर से नकल करते। कभी ऐसी शब्‍द-रचना करते, जिसमें न कोई अर्थ होता, नकोई सामंजस्‍य! मसलन एक बार उनकी कापी पर मैने यह इबारत देखी-स्‍पेशल, अमीना, भाइयों-भाइयों, दर-असल, भाई-भाई, राघेश्‍याम, श्रीयुत राघेश्‍याम, एक घंटे तक—इसके बाद एक आदमी का चेहरा बना हुआ था। मैंने चेष्‍टा की‍ कि इसपहेली का कोई अर्थ निकालूँ; लेकिन असफल रहा और उसने पूछने का साहस न हुआ।वह नवी जमात में थे, मैं पाँचवी में। उनकि रचनाओ को समझना मेरे लिए छोटामुंह बडी बात थी।
मेरा जी पढने में बिलकुल न लगता था। एक घंटा भी किताब लेकर बैठना पहाड़ था।मौका पाते ही होस्‍टल से निकलकर मैदान में आ जाता और कभी कंकरियां उछालता, कभी कागज कि तितलियाँ उडाता, और कहीं कोई साथी ‍मिल गया तो पूछना ही क्‍याकभी चारदीवारी पर चढकर नीचे कूद रहे है, कभी फाटक पर वार, उसे आगे-पीछेचलाते हुए मोटरकार का आनंद उठा रहे है। लेकिन कमरे में आते ही भाई साहब कारौद्र रूप देखकर प्राण सूख जाते। उनका पहला सवाल होता-‘कहां थें?‘ हमेशायही सवाल, इसी घ्‍वनि में पूछा जाता था और इसका जवाब मेरे पास केवल मौन था।न जाने मुंह से यह बात क्‍यों न निकलती कि जरा बाहर खेल रहा था। मेरा मौनकह देता था कि मुझे अपना अपराध स्‍वीकार है और भाई साहब के लिए इसके सिवाऔर कोई इलाज न था कि रोष से मिले हुए शब्‍दों में मेरा सत्‍कार करें।
‘इस तरह अंग्रेजी पढोगे, तो जिन्‍दगी-भर पढते रहोगे और एक हर्फ न आएगा।अँगरेजी पढना कोई हंसी-खेल नही है कि जो चाहे पढ ले, नही, ऐरा-गैरानत्‍थू-खैरा सभी अंगरेजी कि विद्धान हो जाते। यहां रात-दिन आंखे फोडनी पडतीहै और खून जलाना पडता है, जब कही यह विधा आती है। और आती क्‍या है, हां, कहने को आ जाती है। बडे-बडे विद्धान भी शुद्ध अंगरेजी नही लिख सकते, बोलनातो दुर रहा। और मैं कहता हूं, तुम कितने घोंघा हो कि मुझे देखकर भी सबक नहीलेते। मैं कितनी मेहनत करता हूं, तुम अपनी आंखो देखते हो, अगर नही देखते, जो यह तुम्‍हारी आंखो का कसूर है, तुम्‍हारी बुद्धि का कसूर है। इतनेमेले-तमाशे होते है, मुझे तुमने कभी देखने जाते देखा है, रोज ही क्रिकेट औरहाकी मैच होते हैं। मैं पास नही फटकता। हमेशा पढता रहा हूं, उस पर भीएक-एक दरजे में दो-दो, तीन-तीन साल पडा रहता हूं फिर तुम कैसे आशा करते होकि तुम यों खेल-कुद में वक्‍त गंवाकर पास हो जाओगे? मुझे तो दो-ही-तीन साललगते हैं, तुम उम्र-भर इसी दरजे में पडे सडते रहोगे। अगर तुम्‍हे इस तरहउम्र गंवानी है, तो बंहतर है, घर चले जाओ और मजे से गुल्‍ली-डंडा खेलो।दादा की गाढी कमाई के रूपये क्‍यो बरबाद करते हो?’
मैं यह लताड़ सुनकर आंसू बहाने लगता। जवाब ही क्‍या था। अपराध तो मैंनेकिया, लताड कौन सहे? भाई साहब उपदेश कि कला में निपुण थे। ऐसी-ऐसी लगतीबातें कहते, ऐसे-ऐसे सूक्‍ति-बाण चलाते कि मेरे जिगर के टुकडे-टुकडे होजाते और हिम्‍मत छूट जाती। इस तरह जान तोडकर मेहनत करने कि शक्‍ति मैं अपनेमें न पाता था और उस निराशा मे जरा देर के लिए मैं सोचने लगता-क्‍यों न घरचला जाऊँ। जो काम मेरे बूते के बाहर है, उसमे हाथ डालकर क्‍यो अपनीजिन्‍दगी खराब करूं। मुझे अपना मूर्ख रहना मंजूर था; लेकिन उतनी मेहनत सेमुझे तो चक्‍कर आ जाता था। लेकिन घंटे–दो घंटे बाद निराशा के बादल फट जातेऔर मैं इरादा करता कि आगे से खूब जी लगाकर पढूंगा। चटपट एक टाइम-टेबिल बनाडालता। बिना पहले से नक्‍शा बनाए, बिना कोई स्‍किम तैयार किए काम कैसेशुरूं करूं? टाइम-टेबिल में, खेल-कूद कि मद बिलकुल उड जाती। प्रात:कालउठना, छ: बजे मुंह-हाथ धो, नाश्‍ता कर पढने बैठ जाना। छ: से आठ तकअंग्रेजी, आठ से नौ तक हिसाब, नौ से साढे नौ तक इतिहास, ‍फिर भोजन औरस्‍कूल। साढे तीन बजे स्‍कूल से वापस होकर आधा घंण्‍टा आराम, चार से पांचतक भूगोल, पांच से छ: तक ग्रामर, आघा घंटा होस्‍टल के सामने टहलना, साढे छ:से सात तक अंग्रेजी कम्‍पोजीशन, फिर भोजन करके आठ से नौ तक अनुवाद, नौ सेदस तक हिन्‍दी, दस से ग्‍यारह तक विविध विषय, फिर विश्राम।
मगर टाइम-टेबिल बना लेना एक बात है, उस पर अमल करना दूसरी बात। पहले ही दिनसे उसकी अवहेलना शुरू हो जाती। मैदान की वह सुखद हरियाली, हवा के वहहलके-हलके झोके, फुटबाल की उछल-कूद, कबड्डी के वह दांव-घात, वाली-बाल की वहतेजी और फुरती मुझे अज्ञात और अनिर्वाय रूप से खीच ले जाती और वहां जातेही मैं सब कुछ भूल जाता। वह जान-लेवा टाइम-टेबिल, वह आंखफोड पुस्‍तके किसीकि याद न रहती, और फिर भाई साहब को नसीहत और फजीहत का अवसर मिल जाता। मैंउनके साये से भागता, उनकी आंखो से दूर रहने कि चेष्‍टा करता। कमरे मे इसतरह दबे पांव आता कि उन्‍हे खबर न हो। उनकि नजर मेरी ओर उठी और मेरे प्राणनिकले। हमेशा सिर पर नंगी तलवार-सी लटकती मालूम होती। फिर भी जैसे मौत औरविपत्‍ति के बीच मे भी आदमी मोह और माया के बंधन में जकडा रहता है, मैंफटकार और घुडकियां खाकर भी खेल-कूद का तिरस्‍कार न कर सकता।

                                              2

सालाना इम्‍तहान हुआ। भाई साहब फेल हो गए, मैं पास हो गया और दरजे मेंप्रथम आया। मेरे और उनके बीच केवल दो साल का अन्‍तर रह गया। जी में आया, भाई साहब को आडें हाथो लूँ—आपकी वह घोर तपस्‍या कहाँ गई? मुझे देखिए, मजेसे खेलता भी रहा और दरजे में अव्‍वल भी हूं। लेकिन वह इतने दु:खी और उदासथे कि मुझे उनसे दिल्‍ली हमदर्दी हुई और उनके घाव पर नमक छिडकने का विचारही लज्‍जास्‍पद जान पडा। हां, अब मुझे अपने ऊपर कुछ अभिमान हुआ औरआत्‍माभिमान भी बढा भाई साहब का वहरोब मुझ पर न रहा। आजादी से खेल–कूद मेंशरीक होने लगा। दिल मजबूत था। अगर उन्‍होने फिर मेरी फजीहत की, तो साफ कहदूँगा—आपने अपना खून जलाकर कौन-सा तीर मार लिया। मैं तो खेलते-कूदते दरजेमें अव्‍वल आ गया। जबावसेयह हेकडी जताने कासाहस न होने पर भी मेरे रंग-ढंगसे साफ जाहिर होता था कि भाई साहब का वह आतंक अब मुझ पर नहीं है। भाई साहबने इसे भाँप लिया-उनकी ससहसत बुद्धि बडी तीव्र थी और एक दिन जब मै भोर कासारा समय गुल्‍ली-डंडे कि भेंट करके ठीक भोजन के समय लौटा, तो भाई साइब नेमानो तलवार खीच ली और मुझ पर टूट पडे-देखता हूं, इस साल पास हो गए और दरजेमें अव्‍वल आ गए, तो तुम्‍हे दिमाग हो गया है; मगर भाईजान, घमंड तो बडे-बडेका नही रहा, तुम्‍हारी क्‍या हस्‍ती है, इतिहास में रावण का हाल तो पढ़ाही होगा। उसके चरित्र से तुमने कौन-सा उपदेश लिया? या यो ही पढ गए? महजइम्‍तहान पास कर लेना कोई चीज नही, असल चीज है बुद्धि का विकास। जो कुछपढो, उसका अभिप्राय समझो। रावण भूमंडल का स्‍वामी था। ऐसे राजो कोचक्रवर्ती कहते है। आजकल अंगरेजो के राज्‍य का विस्‍तार बहुत बढा हुआ है, पर इन्‍हे चक्रवर्ती नहीं कह सकते। संसार में अनेको राष्‍ट़्र अँगरेजों काआधिपत्‍य स्‍वीकार नहीं करते। बिलकुल स्‍वाधीन हैं। रावण चक्रवर्ती राजाथा। संसार के सभी महीप उसे कर देते थे। बडे-बडे देवता उसकी गुलामी करते थे।आग और पानी के देवता भी उसके दास थे; मगर उसका अंत क्‍या हुआ, घमंड नेउसका नाम-निशान तक मिटा दिया, कोई उसे एक चिल्‍लू पानी देनेवाला भी न बचा।आदमी जो कुकर्म चाहे करें; पर अभिमान न करे, इतराए नही। अभिमान किया औरदीन-दुनिया से गया।
शैतान का हाल भी पढा ही होगा। उसे यह अनुमान हुआ था कि ईश्‍वर का उससे बढकरसच्‍चा भक्‍त कोई है ही नहीं। अन्‍त में यह हुआ कि स्‍वर्ग से नरक मेंढकेल दिया गया। शाहेरूम ने भी एक बार अहंकार किया था। भीख मांग-मांगकर मरगया। तुमने तो अभी केवल एक दरजा पास किया है और अभी से तुम्‍हारा सिर फिर‍गया, तब तो तुम आगे बढ चुके। यह समझ लो कि तुम अपनी मेहनत से नही पास हुए, अन्‍धे के हाथ बटेर लग गई। मगर बटेर केवल एक बार हाथ लग सकती है, बार-बारनहीं। कभी-कभी गुल्‍ली-डंडे में भी अंधा चोट निशाना पड़ जाता है। उससे कोईसफल खिलाड़ी नहीं हो जाता। सफल खिलाड़ी वह है, जिसका कोई निशान खाली न जाए।
मेरे फेल होने पर न जाओ। मेरे दरजे में आओगे, तो दाँतो पसीना आयगा। जबअलजबरा और जामेंट्री के लोहे के चने चबाने पड़ेंगे और इंगलिस्‍तान काइतिहास पढ़ना पड़ेंगा! बादशाहों के नाम याद रखना आसान नहीं। आठ-आठ हेनरी कोगुजरे है कौन-सा कांड किस हेनरी के समय हुआ, क्‍या यह याद कर लेना आसानसमझते हो? हेनरी सातवें की जगह हेनरी आठवां लिखा और सब नम्‍बर गायब! सफाचट।सिर्फ भी न मिलगा, सिफर भी! हो किस ख्‍याल में! दरजनो तो जेम्‍स हुए हैं, दरजनो विलियम, कोडियों चार्ल्‍स दिमाग चक्‍कर खाने लगता है। आंधी रोग होजाता है। इन अभागो को नाम भी न जुडते थे। एक ही नाम के पीछे दोयम, तेयम, चहारम, पंचम नगाते चले गए। मुछसे पूछते, तो दस लाख नाम बता देता।
और जामेट्री तो बस खुदा की पनाह! अ ब ज की जगह अ ज ब लिख दिया और सारेनम्‍बर कट गए। कोई इन निर्दयी मुमतहिनों से नहीं पूछता कि आखिर अ ब ज और अ जब में क्‍या फर्क है और व्‍यर्थकी बात के लिए क्‍यो छात्रो का खून करते होदाल-भात-रोटी खायी या भात-दाल-रोटी खायी, इसमें क्‍या रखा है; मगर इनपरीक्षको को क्‍या परवाह! वह तो वही देखते है, जो पुस्‍तक में लिखा है।चाहते हैं कि लडके अक्षर-अक्षर रट डाले। और इसी रटंत का नाम शिक्षा रख छोडाहै और आखिर इन बे-सिर-पैर की बातो के पढ़ने से क्‍या फायदा?
इस रेखा पर वह लम्‍ब गिरा दो, तो आधार लम्‍ब से दुगना होगा। पूछिए, इससेप्रयोजन? दुगना नही, चौगुना हो जाए, या आधा ही रहे, मेरी बला से, लेकिनपरीक्षा में पास होना है, तो यह सब खुराफात याद करनी पड़ेगी। कह दिया-‘समयकी पाबंदी’ पर एक निबन्‍ध लिखो, जो चार पन्‍नो से कम न हो। अब आप कापीसामने खोले, कलम हाथ में लिये, उसके नाम को रोइए।
कौन नहीं जानता कि समय की पाबन्‍दी बहुत अच्‍छी बात है। इससे आदमी के जीवनमें संयम आ जाता है, दूसरो का उस पर स्‍नेह होने लगता है और उसके करोबारमें उन्‍नति होती है; जरा-सी बात पर चार पन्‍ने कैसे लिखें? जो बात एकवाक्‍य में कही जा सके, उसे चार पन्‍ने में लिखने की जरूरत? मैं तो इसेहिमाकत समझता हूं। यह तो समय की किफायत नही, बल्‍कि उसका दुरूपयोग है किव्‍यर्थ में किसी बात को ठूंस दिया। हम चाहते है, आदमी को जो कुछ कहना हो, चटपट कह दे और अपनी राह ले। मगर नही, आपको चार पन्‍ने रंगने पडेंगे, चाहेजैसे लिखिए और पन्‍ने भी पूरे फुल्‍सकेप आकार के। यह छात्रो पर अत्‍याचारनहीं तो और क्‍या है? अनर्थ तो यह है कि कहा जाता है, संक्षेप में लिखो।समय की पाबन्‍दी पर संक्षेप में एक निबन्‍ध लिखो, जो चार पन्‍नो से कम नहो। ठीक! संक्षेप में चार पन्‍ने हुए, नही शायद सौ-दो सौ पन्‍ने लिखवाते।तेज भी दौडिए और धीरे-धीरे भी। है उल्‍टी बात या नही? बालक भी इतनी-सी बातसमझ सकता है, लेकिन इन अध्‍यापको को इतनी तमीज भी नहीं। उस पर दावा है किहम अध्‍यापक है। मेरे दरजे में आओगे लाला, तो ये सारे पापड बेलने पड़ेंगेऔर तब आटे-दाल का भाव मालूम होगा। इस दरजे में अव्‍वल आ गए हो, वो जमीन परपांव नहीं रखते इसलिए मेरा कहना मानिए। लाख फेल हो गया हूँ, लेकिन तुमसेबड़ा हूं, संसार का मुझे तुमसे ज्‍यादा अनुभव है। जो कुछ कहता हूं, उसे ‍गिरह बांधिए नही पछताएँगे।
स्‍कूल का समय निकट था, नहीं इश्‍वर जाने, यह उपदेश-माला कब समाप्‍त होती।भोजन आज मुझे निस्‍स्‍वाद-सा लग रहा था। जब पास होने पर यह तिरस्‍कार होरहा है, तो फेल हो जाने पर तो शायद प्राण ही ले लिए जाएं। भाई साहब ने अपनेदरजे की पढाई का जो भयंकर चित्र खीचा था; उसने मुझे भयभीत कर दिया। कैसेस्‍कूल छोडकर घर नही भागा, यही ताज्‍जुब है; लेकिन इतने तिरस्‍कार पर भीपुस्‍तकों में मेरी अरूचि ज्‍यो-कि-त्‍यों बनी रही। खेल-कूद का कोई अवसरहाथ से न जाने देता। पढ़ता भी था, मगर बहुत कम। बस, इतना कि रोज का टास्‍कपूरा हो जाए और दरजे में जलील न होना पडें। अपने ऊपर जो विश्‍वास पैदा हुआथा, वह फिर लुप्‍त हो गया और ‍‍फिर चोरो का-सा जीवन कटने लगा।

                                             3

फिर सालाना इम्‍तहान हुआ, और कुछ ऐसा संयोग हुआ कि मै ‍‍‍‍‍‍िफ‍र पास हुआऔर भाई साहब फिर ‍फेल हो गए। मैंने बहुत मेहनत न की पर न जाने, कैसे दरजेमें अव्‍वल आ गया। मुझे खुद अचरज हुआ। भाई साहब ने प्राणांतक परिश्रम कियाथा। कोर्स का एक-एक शब्‍द चाट गये थे; दस बजे रात तक इधर, चार बजे भोर सेउभर, छ: से साढे नौ तक स्‍कूल जाने के पहले। मुद्रा कांतिहीन हो गई थी, मगरबेचारे फेल हो गए। मुझे उन पर दया आ‍ती‍‍ थी। नतीजा सुनाया गया, तो वह रोपड़े और मैं भी रोने लगा। अपने पास होने वाली खुशी आधी हो गई। मैं भी फेलहो गया होता, तो भाई साहब को इतना दु:ख न होता, लेकिन विधि की बात कौनटाले?
मेरे और भाई साहब के बीच में अब केवल एक दरजे का अन्‍तर और रह गया। मेरे मनमें एक कुटिल भावना उदय हुई कि कही भाई साहब एक साल और फेल हो जाएँ, तो मैउनके बराबर हो जाऊं, ‍िफर वह किस आधार पर मेरी फजीहत कर सकेगे, लेकिनमैंने इस कमीने विचार को दिल‍ से बलपूर्वक निकाल डाला। आखिर वह मुझे मेरेहित के विचार से ही तो डांटते हैं। मुझे उस वक्‍त अप्रिय लगता है अवश्‍य, मगर यह शायद उनके उपदेशों का ही असर हो कि मैं दनानद पास होता जाता हूं औरइतने अच्‍छे नम्‍बरों से।
अबकी भाई साहब बहुत-कुछ नर्म पड़ गए थे। कई बार मुझे डांटने का अवसर पाकरभी उन्‍होंने धीरज से काम लिया। शायद अब वह खुद समझने लगे थे कि मुझेडांटने का अधिकार उन्‍हे नही रहा; या रहा तो बहुत कम। मेरी स्‍वच्‍छंदता भीबढी। मैं उनकि सहिष्‍णुता का अनुचित लाभ उठाने लगा। मुझे कुछ ऐसी धारणाहुई कि मैं तो पास ही हो जाऊंगा, पढू या न पढूं मेरी तकदीर बलवान् है, इसलिए भाई साहब के डर से जो थोडा-बहुत बढ लिया करता था, वह भी बंद हुआ।मुझे कनकौए उडाने का नया शौक पैदा हो गया था और अब सारा समय पतंगबाजी ही कीभेंट होता था, ‍िफर भी मैं भाई साहब का अदब करता था, और उनकी नजर बचाकरकनकौए उड़ाता था। मांझा देना, कन्‍ने बांधना, पतंग टूर्नामेंट की तैयारियांआदि समस्‍याएँ अब गुप्‍त रूप से हल की जाती थीं। भाई साहब को यह संदेह नकरने देना चाहता था कि उनका सम्‍मान और लिहाज मेरी नजरो से कम हो गया है।
एक दिन संध्‍या समय होस्‍टल से दूर मै एक कनकौआ लूटने बंतहाशा दौडा जा रहाथा। आंखे आसमान की ओर थीं और मन उस आकाशगामी पथिक की ओर, जो मंद गति सेझूमता पतन की ओर चला जा रहा था, मानो कोई आत्‍मा स्‍वर्ग से निकलकर विरक्‍तमन से नए संस्‍कार ग्रहण करने जा रही हो। बालकों की एक पूरी सेना लग्‍गेऔर झड़दार बांस लिये उनका स्‍वागत करने को दौड़ी आ रही थी। किसी को अपनेआगे-पीछे की खबर न थी। सभी मानो उस पतंग के साथ ही आकाश में उड़ रहे थे, जहॉं सब कुछ समतल है, न मोटरकारे है, न ट्राम, न गाडियाँ।
सहसा भाई साहब से मेरी मुठभेड हो गई, जो शायद बाजार से लौट रहे थे।उन्‍होने वही मेरा हाथ पकड लिया और उग्रभाव से बोले-इन बाजारी लौंडो के साथधेले के कनकौए के लिए दौड़ते तुम्‍हें शर्म नही आती? तुम्‍हें इसका भी कुछलिहाज नहीं कि अब नीची जमात में नहीं हो, बल्कि आठवीं जमात में आ गये होऔर मुझसे केवल एक दरजा नीचे हो। आखिर आदमी को कुछ तो अपनी पोजीशन का ख्यालकरना चाहिए। एक जमाना था कि कि लोग आठवां दरजा पास करके नायब तहसीलदार होजाते थे। मैं कितने ही मिडलचियों को जानता हूं, जो आज अव्‍वल दरजे केडिप्‍टी मजिस्‍ट्रेट या सुपरिटेंडेंट है। कितने ही आठवी जमाअत वाले हमारेलीडर और समाचार-पत्रो के सम्‍पादक है। बडें-बडें विद्धान उनकी मातहती मेंकाम करते है और तुम उसी आठवें दरजे में आकर बाजारी लौंडों के साथ कनकौए केलिए दौड़ रहे हो। मुझे तुम्‍हारी इस कमअकली पर दु:ख होता है। तुम जहीन हो, इसमें शक नही: लेकिन वह जेहन किस काम का, जो हमारे आत्‍मगौरव की हत्‍या करडाले? तुम अपने दिन में समझते होगे, मैं भाई साहब से महज एक दर्जा नीचे हूंऔर अब उन्‍हे मुझको कुछ कहने का हक नही है; लेकिन यह तुम्‍हारी गलती है।मैं तुमसे पांच साल बडा हूं और चाहे आज तुम मेरी ही जमाअत में आ जाओ–औरपरीक्षकों का यही हाल है, तो निस्‍संदेह अगले साल तुम मेरे समकक्ष हो जाओगेऔर शायद एक साल बाद तुम मुझसे आगे निकल जाओ-लेकिन मुझमें और जो पांच सालका अन्‍तर है, उसे तुम क्‍या, खुदा भी नही मिटा सकता। मैं तुमसे पांच सालबडा हूं और हमेशा रहूंगा। मुझे दुनिया का और जिन्‍दगी का जो तजरबा है, तुमउसकी बराबरी नहीं कर सकते, चाहे तुम एम. ए., डी. फिल. और डी. लिट. ही क्‍योन हो जाओ। समझ किताबें पढने से नहीं आती है। हमारी अम्‍मा ने कोई दरजा पासनही किया, और दादा भी शायद पांचवी जमाअत के आगे नही गये, लेकिन हम दोनोचाहे सारी दुनिया की विधा पढ ले, अम्‍मा और दादा को हमें समझाने और सुधारनेका अधिकार हमेशा रहेगा। केवल इसलिए नही कि वे हमारे जन्‍मदाता है, ब‍ल्किइसलिए कि उन्‍हे दुनिया का हमसे ज्‍यादा जतरबा है और रहेगा। अमेरिका मेंकिस जरह कि राज्‍य-व्‍यवस्‍था है और आठवे हेनरी ने कितने विवाह किये औरआकाश में कितने नक्षत्र है, यह बाते चाहे उन्‍हे न मालूम हो, लेकिन हजारोंऐसी आते है, जिनका ज्ञान उन्‍हे हमसे और तुमसे ज्‍यादा है।
दैव न करें, आज मैं बीमार हो आऊं, तो तुम्‍हारे हाथ-पांव फूल जाएगें। दादाको तार देने के सिवा तुम्‍हे और कुछ न सूझेंगा; लेकिन तुम्‍हारी जगह परदादा हो, तो किसी को तार न दें, न घबराएं, न बदहवास हों। पहले खुद मरजपहचानकर इलाज करेंगे, उसमें सफल न हुए, तो किसी डांक्‍टर को बुलायेगें।बीमारी तो खैर बडी चीज है। हम-तुम तो इतना भी नही जानते कि महीने-भर कामहीने-भर कैसे चले। जो कुछ दादा भेजते है, उसे हम बीस-बाईस तक र्खच करडालते है और पैसे-पैसे को मोहताज हो जाते है। नाश्‍ता बंद हो जाता है, धोबीऔर नाई से मुंह चुराने लगते है; लेकिन जितना आज हम और तुम र्खच कर रहे है, उसके आधे में दादा ने अपनी उम्र का बडा भाग इज्‍जत और नेकनामी के साथनिभाया है और एक कुटुम्‍ब का पालन किया है, जिसमे सब मिलाकर नौ आदमी थे।अपने हेडमास्‍टर साहब ही को देखो। एम. ए. हैं कि नही, और यहा के एम. ए.नही, आक्‍यफोर्ड के। एक हजार रूपये पाते है, लेकिन उनके घर इंतजाम कौन करताहै? उनकी बूढी मां। हेडमास्‍टर साहब की डिग्री यहां बेकार हो गई। पहले खुदघर का इंतजाम करते थे। खर्च पूरा न पड़ता था। करजदार रहते थे। जब से उनकीमाताजी ने प्रबंध अपने हाथ मे ले लिया है, जैसे घर में लक्ष्‍मी आ गई है।तो भाईजान, यह जरूर दिल से निकाल डालो कि तुम मेरे समीप आ गये हो और अबस्‍वतंत्र हो। मेरे देखते तुम बेराह नही चल पाओगे। अगर तुम यों न मानोगे, तो मैं (थप्‍पड दिखाकर) इसका प्रयोग भी कर सकता हूं। मैं जानता हूं, तुम्‍हें मेरी बातें जहर लग रही है।
मैं उनकी इस नई युक्‍ति से नतमस्‍तक हो गया। मुझे आज सचमुच अपनी लघुता काअनुभव हुआ और भाई साहब के प्रति मेरे तम में श्रद्धा उत्‍पन्‍न हुईं। मैंनेसजल आंखों से कहा-हरगिज नही। आप जो कुछ फरमा रहे है, वह बिलकुल सच है औरआपको कहने का अधिकार है।
भाई साहब ने मुझे गले लगा लिया और बाल-कनकाए उड़ान को मना नहीं करता। मेराजी भी ललचाता है, लेकिन क्या करूँ, खुद बेराह चलूं तो तुम्हारी रक्षा कैसेकरूँ? यह कर्त्तव्य भी तो मेरे सिर पर है।
संयोग से उसी वक्त एक कटा हुआ कनकौआ हमारे ऊपर से गुजरा। उसकी डोर लटक रहीथी। लड़कों का एक गोल पीछे-पीछे दौड़ा चला आता था। भाई साहब लंबे हैं ही, उछलकर उसकी डोर पकड़ ली और बेतहाशा होटल की तरफ दौड़े। मैं पीछे-पीछे दौड़रहा था।

बूढ़ी काकी - प्रेमचंद

बुढ़ापाबहुधा बचपनका पुनरागमन हुआ करता है। बूढ़ी काकी मेंजिह्वा-स्वाद के सिवा और कोईचेष्टा शेष न थी और न अपने कष्टों कीओर आकर्षित करने का, रोने के अतिरिक्तकोई दूसरा सहारा ही। समस्तइन्द्रियाँ, नेत्र, हाथ और पैर जवाब दे चुके थे।पृथ्वी पर पड़ीरहतीं और घर वाले कोई बात उनकी इच्छा के प्रतिकूल करते, भोजन कासमय टल जाता या उसका परिणाम पूर्ण न होता अथवा बाज़ार से कोई वस्तुआती और न मिलती तो ये रोने लगती थीं। उनका रोना-सिसकना साधारण रोना न था, वे गला फाड़-फाड़कर रोती थीं।

उनके पतिदेव को स्वर्गसिधारे कालांतर हो चुका था। बेटे तरुण हो-होकर चलबसे थे। अब एकभतीजे के अलावा और कोई न था। उसी भतीजे के नाम उन्होंने अपनीसारीसम्पत्ति लिख दी। भतीजे ने सारी सम्पत्ति लिखाते समय ख़ूब लम्बे-चौड़ेवादे किए, किन्तु वे सब वादे केवल कुली-डिपो के दलालों के दिखाए हुएसब्ज़बाग थे। यद्यपि उस सम्पत्ति की वार्षिक आय डेढ़-दो सौ रुपएसे कम न थीतथापि बूढ़ी काकी को पेट भर भोजन भी कठिनाई से मिलताथा। इसमें उनके भतीजेपंडित बुद्धिराम का अपराध था अथवा उनकीअर्धांगिनी श्रीमती रूपा का, इसकानिर्णय करना सहज नहीं।बुद्धिराम स्वभाव के सज्जन थे, किंतु उसी समय तक जबकि उनके कोषपर आँच न आए। रूपा स्वभाव से तीव्र थी सही, पर ईश्वर से डरतीथी।अतएव बूढ़ी काकी को उसकी तीव्रता उतनी न खलती थी जितनी बुद्धिराम कीभलमनसाहत।
बुद्धिराम को कभी-कभी अपने अत्याचार का खेद होताथा। विचारते कि इसीसम्पत्ति के कारण मैं इस समय भलामानुष बनाबैठा हूँ। यदि भौतिक आश्वासन औरसूखी सहानुभूति से स्थिति मेंसुधार हो सकता हो, उन्हें कदाचित् कोई आपत्तिन होती, परन्तुविशेष व्यय का भय उनकी सुचेष्टा को दबाए रखता था। यहाँ तककि यदिद्वार पर कोई भला आदमी बैठा होता और बूढ़ी काकी उस समय अपना रागअलापने लगतीं तो वह आग हो जाते और घर में आकर उन्हें जोर से डाँटते। लड़कोंको बुड्ढों से स्वाभाविक विद्वेष होता ही है और फिर जब माता-पिताका यह रंगदेखते तो वे बूढ़ी काकी को और सताया करते। कोई चुटकीकाटकर भागता, कोई इनपर पानी की कुल्ली कर देता। काकी चीख़ मारकररोतीं परन्तु यह बात प्रसिद्धथी कि वह केवल खाने के लिए रोतीहैं, अतएव उनके संताप और आर्तनाद पर कोईध्यान नहीं देता था। हाँ, काकी क्रोधातुर होकर बच्चों को गालियाँ देनेलगतीं तो रूपाघटनास्थल पर आ पहुँचती। इस भय से काकी अपनी जिह्वा कृपाण काकदाचित् ही प्रयोग करती थीं, यद्यपि उपद्रव-शान्ति का यह उपाय रोने से कहींअधिक उपयुक्त था।
सम्पूर्ण परिवार में यदि काकी सेकिसी को अनुराग था, तो वह बुद्धिराम कीछोटी लड़की लाडली थी।लाडली अपने दोनों भाइयों के भय से अपने हिस्से कीमिठाई-चबैनाबूढ़ी काकी के पास बैठकर खाया करती थी। यही उसका रक्षागार थाऔरयद्यपि काकी की शरण उनकी लोलुपता के कारण बहुत मंहगी पड़ती थी, तथापिभाइयों के अन्याय से सुरक्षा कहीं सुलभ थी तो बस यहीं। इसीस्वार्थानुकूलताने उन दोनों में सहानुभूति का आरोपण कर दिया था।


                                                2


रात का समय था। बुद्धिराम के द्वार पर शहनाई बज रही थी और गाँव केबच्चोंका झुंड विस्मयपूर्ण नेत्रों से गाने का रसास्वादन कर रहाथा। चारपाइयों परमेहमान विश्राम करते हुए नाइयों से मुक्कियाँलगवा रहे थे। समीप खड़ा भाटविरुदावली सुना रहा था और कुछ भावज्ञमेहमानों की 'वाह, वाह' पर ऐसा ख़ुशहो रहा था मानो इस 'वाह-वाह' का यथार्थ में वही अधिकारी है। दो-एकअंग्रेज़ी पढ़े हुए नवयुवकइन व्यवहारों से उदासीन थे। वे इस गँवार मंडलीमें बोलना अथवासम्मिलित होना अपनी प्रतिष्ठा के प्रतिकूल समझते थे।
आजबुद्धिराम के बड़े लड़के मुखराम का तिलक आया है। यह उसी का उत्सव है। घरके भीतर स्त्रियाँ गा रही थीं और रूपा मेहमानों के लिए भोजन मेंव्यस्त थी।भट्टियों पर कड़ाह चढ़ रहे थे। एक मेंपूड़ियाँ-कचौड़ियाँ निकल रही थीं, दूसरे में अन्य पकवान बनते थे।एक बड़े हंडे में मसालेदार तरकारी पक रहीथी। घी और मसाले कीक्षुधावर्धक सुगंधि चारों ओर फैली हुई थी।
बूढ़ी काकी अपनीकोठरी में शोकमय विचार की भाँति बैठी हुई थीं। यह स्वादमिश्रितसुगंधि उन्हें बेचैन कर रही थी। वे मन-ही-मन विचार कर रही थीं, संभवतः मुझे पूड़ियाँ न मिलेंगीं। इतनी देर हो गई, कोई भोजन लेकर नहीं आया।मालूम होता है सब लोग भोजन कर चुके हैं। मेरे लिए कुछ न बचा। यहसोचकरउन्हें रोना आया, परन्तु अपशकुन के भय से वह रो न सकीं।

'आहा...कैसी सुगंधिहै?अब मुझे कौन पूछता है। जब रोटियों के ही लालेपड़े हैं तब ऐसे भाग्यकहाँ कि भरपेट पूड़ियाँ मिलें?' यह विचारकर उन्हें रोना आया, कलेजे मेंहूक-सी उठने लगी। परंतु रूपा के भयसे उन्होंने फिर मौन धारण कर लिया।
बूढ़ी काकी देर तक इन्हीदुखदायक विचारों में डूबी रहीं। घी और मसालों कीसुगंधि रह-रहकरमन को आपे से बाहर किए देती थी। मुँह में पानी भर-भर आताथा।पूड़ियों का स्वाद स्मरण करके हृदय में गुदगुदी होने लगती थी। किसेपुकारूँ, आज लाडली बेटी भी नहीं आई। दोनों छोकरे सदा दिक दिया करते हैं।आजउनका भी कहीं पता नहीं। कुछ मालूम तो होता कि क्या बन रहा है।
बूढ़ी काकी की कल्पना में पूड़ियों की तस्वीर नाचने लगी। ख़ूबलाल-लाल, फूली-फूली, नरम-नरम होंगीं। रूपा ने भली-भाँति भोजन कियाहोगा। कचौड़ियोंमें अजवाइन और इलायची की महक आ रही होगी। एकपूड़ी मिलती तो जरा हाथ मेंलेकर देखती। क्यों न चल कर कड़ाह केसामने ही बैठूँ। पूड़ियाँ छन-छनकरतैयार होंगी। कड़ाह से गरम-गरमनिकालकर थाल में रखी जाती होंगी। फूल हम घरमें भी सूँघ सकते हैं, परन्तु वाटिका में कुछ और बात होती है। इस प्रकारनिर्णय करकेबूढ़ी काकी उकड़ूँ बैठकर हाथों के बल सरकती हुई बड़ी कठिनाई सेचौखट से उतरीं और धीरे-धीरे रेंगती हुई कड़ाह के पास जा बैठीं। यहाँ आने परउन्हें उतना ही धैर्य हुआ जितना भूखे कुत्ते को खाने वाले केसम्मुख बैठनेमें होता है।
रूपा उस समय कार्यभार सेउद्विग्न हो रही थी। कभी इस कोठे में जाती, कभी उसकोठे में, कभीकड़ाह के पास जाती, कभी भंडार में जाती। किसी ने बाहर से आकरकहा--'महाराज ठंडई मांग रहे हैं।' ठंडई देने लगी। इतने में फिर किसी ने आकरकहा--'भाट आया है, उसे कुछ दे दो।' भाट के लिए सीधा निकाल रही थीकि एकतीसरे आदमी ने आकर पूछा--'अभी भोजन तैयार होने में कितनाविलम्ब है? जराढोल, मजीरा उतार दो।' बेचारी अकेली स्त्रीदौड़ते-दौड़ते व्याकुल हो रहीथी, झुंझलाती थी, कुढ़ती थी, परन्तुक्रोध प्रकट करने का अवसर न पाती थी।भय होता, कहीं पड़ोसिनें यहन कहने लगें कि इतने में उबल पड़ीं। प्यास सेस्वयं कंठ सूख रहाथा। गर्मी के मारे फुँकी जाती थी, परन्तु इतना अवकाश नथा कि जरापानी पी ले अथवा पंखा लेकर झले। यह भी खटका था कि जरा आँख हटी औरचीज़ों की लूट मची। इस अवस्था में उसने बूढ़ी काकी को कड़ाह के पास बैठीदेखा तो जल गई। क्रोध न रुक सका। इसका भी ध्यान न रहा कि पड़ोसिनेंबैठीहुई हैं, मन में क्या कहेंगीं। पुरुषों में लोग सुनेंगे तोक्या कहेंगे।जिस प्रकार मेंढक केंचुए पर झपटता है, उसी प्रकार वहबूढ़ी काकी पर झपटी औरउन्हें दोनों हाथों से झटक कर बोली-- ऐसेपेट में आग लगे, पेट है या भाड़? कोठरी में बैठते हुए क्या दमघुटता था? अभी मेहमानों ने नहीं खाया, भगवानको भोग नहीं लगा, तबतक धैर्य न हो सका? आकर छाती पर सवर हो गई। जल जाए ऐसीजीभ। दिनभर खाती न होती तो जाने किसकी हांडी में मुँह डालती? गाँव देखेगातो कहेगा कि बुढ़िया भरपेट खाने को नहीं पाती तभी तो इस तरह मुँह बाए फिरतीहै। डायन न मरे न मांचा छोड़े। नाम बेचने पर लगी है। नाक कटवा करदम लेगी।इतनी ठूँसती है न जाने कहां भस्म हो जाता है। भला चाहतीहो तो जाकर कोठरीमें बैठो, जब घर के लोग खाने लगेंगे, तब तुम्हेभी मिलेगा। तुम कोई देवीनहीं हो कि चाहे किसी के मुँह में पानी नजाए, परन्तु तुम्हारी पूजा पहलेही हो जाए।
बूढ़ीकाकी ने सिर उठाया, न रोईं न बोलीं। चुपचाप रेंगती हुई अपनी कोठरीमें चली गईं। आवाज़ ऐसी कठोर थी कि हृदय और मष्तिष्क की सम्पूर्णशक्तियाँ, सम्पूर्ण विचार और सम्पूर्ण भार उसी ओर आकर्षित हो गएथे। नदी में जब कगारका कोई वृहद खंड कटकर गिरता है तो आस-पास काजल समूह चारों ओर से उसी स्थानको पूरा करने के लिए दौड़ता है।


                                           3


भोजन तैयार हो गया है। आंगन में पत्तलें पड़ गईं, मेहमान खाने लगे।स्त्रियों ने जेवनार-गीत गाना आरम्भ कर दिया। मेहमानों के नाई औरसेवकगण भीउसी मंडली के साथ, किंतु कुछ हटकर भोजन करने बैठे थे, परन्तु सभ्यतानुसारजब तक सब-के-सब खा न चुकें कोई उठ नहीं सकताथा। दो-एक मेहमान जो कुछपढ़े-लिखे थे, सेवकों के दीर्घाहार परझुंझला रहे थे। वे इस बंधन को व्यर्थऔर बेकार की बात समझते थे।
बूढ़ी काकी अपनी कोठरी में जाकर पश्चाताप कर रही थी कि मैंकहाँ-से-कहाँ आगई। उन्हें रूपा पर क्रोध नहीं था। अपनी जल्दबाज़ीपर दुख था। सच ही तो हैजब तक मेहमान लोग भोजन न कर चुकेंगे, घरवाले कैसे खाएंगे। मुझ से इतनी देरभी न रहा गया। सबके सामने पानीउतर गया। अब जब तक कोई बुलाने नहीं आएगा, नजाऊंगी।
मन-ही-मन इस प्रकार का विचार कर वह बुलाने की प्रतीक्षा करने लगीं। परन्तुघी की रुचिकर सुवास बड़ी धैर्य़-परीक्षक प्रतीत हो रही थी। उन्हेंएक-एक पलएक-एक युग के समान मालूम होता था। अब पत्तल बिछ गईहोगी। अब मेहमान आ गएहोंगे। लोग हाथ पैर धो रहे हैं, नाई पानी देरहा है। मालूम होता है लोगखाने बैठ गए। जेवनार गाया जा रहा है, यह विचार कर वह मन को बहलाने के लिएलेट गईं। धीरे-धीरे एक गीतगुनगुनाने लगीं। उन्हें मालूम हुआ कि मुझे गातेदेर हो गई। क्याइतनी देर तक लोग भोजन कर ही रहे होंगे। किसी की आवाज़सुनाई नहींदेती। अवश्य ही लोग खा-पीकर चले गए। मुझे कोई बुलाने नहीं आयाहै।रूपा चिढ़ गई है, क्या जाने न बुलाए। सोचती हो कि आप ही आवेंगीं, वहकोई मेहमान तो नहीं जो उन्हें बुलाऊँ। बूढ़ी काकी चलने को तैयार हुईं।यहविश्वास कि एक मिनट में पूड़ियाँ और मसालेदार तरकारियां सामनेआएंगीं, उनकीस्वादेन्द्रियों को गुदगुदाने लगा। उन्होंने मन मेंतरह-तरह के मंसूबेबांधे-- पहले तरकारी से पूड़ियाँ खाऊंगी, फिरदही और शक्कर से, कचौरियाँरायते के साथ मज़ेदार मालूम होंगी।चाहे कोई बुरा माने चाहे भला, मैं तोमांग-मांगकर खाऊंगी। यही नलोग कहेंगे कि इन्हें विचार नहीं? कहा करें, इतने दिन के बादपूड़ियाँ मिल रही हैं तो मुँह झूठा करके थोड़े ही उठजाऊंगी ।
वह उकड़ूँ बैठकर सरकते हुए आंगन में आईं। परन्तु हाय दुर्भाग्य!अभिलाषा नेअपने पुराने स्वभाव के अनुसार समय की मिथ्या कल्पना कीथी। मेहमान-मंडलीअभी बैठी हुई थी। कोई खाकर उंगलियाँ चाटता था, कोई तिरछे नेत्रों से देखताथा कि और लोग अभी खा रहे हैं या नहीं।कोई इस चिंता में था कि पत्तल परपूड़ियाँ छूटी जाती हैं किसीतरह इन्हें भीतर रख लेता। कोई दही खाकरचटकारता था, परन्तु दूसरादोना मांगते संकोच करता था कि इतने में बूढ़ीकाकी रेंगती हुईउनके बीच में आ पहुँची। कई आदमी चौंककर उठ खड़े हुए।पुकारनेलगे-- अरे, यह बुढ़िया कौन है? यहाँ कहाँ से आ गई? देखो, किसी कोछू न दे।
पंडित बुद्धिराम काकी को देखते ही क्रोध से तिलमिलागए। पूड़ियों का थाललिए खड़े थे। थाल को ज़मीन पर पटक दिया औरजिस प्रकार निर्दयी महाजन अपनेकिसी बेइमान और भगोड़े कर्ज़दार कोदेखते ही उसका टेंटुआ पकड़ लेता है उसीतरह लपक कर उन्होंने काकीके दोनों हाथ पकड़े और घसीटते हुए लाकर उन्हेंअंधेरी कोठरी मेंधम से पटक दिया। आशारूपी वटिका लू के एक झोंके में विनष्टहो गई।
मेहमानों ने भोजन किया। घरवालों ने भोजन किया। बाजे वाले, धोबी, चमार भीभोजन कर चुके, परन्तु बूढ़ी काकी को किसी ने न पूछा।बुद्धिराम और रूपादोनों ही बूढ़ी काकी को उनकी निर्लज्जता के लिएदंड देने क निश्चय कर चुकेथे। उनके बुढ़ापे पर, दीनता पर, हत्ज्ञान पर किसी को करुणा न आई थी। अकेलीलाडली उनके लिए कुढ़रही थी।
लाडली को काकी से अत्यंत प्रेम था। बेचारी भोली लड़कीथी। बाल-विनोद औरचंचलता की उसमें गंध तक न थी। दोनों बार जब उसकेमाता-पिता ने काकी कोनिर्दयता से घसीटा तो लाडली का हृदय ऎंठकररह गया। वह झुंझला रही थी कि हमलोग काकी को क्यों बहुत-सीपूड़ियाँ नहीं देते। क्या मेहमान सब-की-सब खाजाएंगे? और यदि काकीने मेहमानों से पहले खा लिया तो क्या बिगड़ जाएगा? वहकाकी केपास जाकर उन्हें धैर्य देना चाहती थी, परन्तु माता के भय से न जातीथी। उसने अपने हिस्से की पूड़ियाँ बिल्कुल न खाईं थीं। अपनी गुड़िया कीपिटारी में बन्द कर रखी थीं। उन पूड़ियों को काकी के पास ले जानाचाहती थी।उसका हृदय अधीर हो रहा था। बूढ़ी काकी मेरी बात सुनतेही उठ बैठेंगीं, पूड़ियाँ देखकर कैसी प्रसन्न होंगीं! मुझे खूबप्यार करेंगीं।


                                            4


रात को ग्यारह बज गए थे। रूपा आंगन में पड़ी सो रही थी। लाडली कीआँखों मेंनींद न आती थी। काकी को पूड़ियाँ खिलाने की खुशी उसेसोने न देती थी। उसनेगु़ड़ियों की पिटारी सामने रखी थी। जबविश्वास हो गया कि अम्मा सो रही हैं, तो वह चुपके से उठी औरविचारने लगी, कैसे चलूँ। चारों ओर अंधेरा था। केवलचूल्हों में आगचमक रही थी और चूल्हों के पास एक कुत्ता लेटा हुआ था। लाडलीकीदृष्टि सामने वाले नीम पर गई। उसे मालूम हुआ कि उस पर हनुमान जी बैठेहुए हैं। उनकी पूँछ, उनकी गदा, वह स्पष्ट दिखलाई दे रही है। मारे भय केउसने आँखें बंद कर लीं। इतने में कुत्ता उठ बैठा, लाडली को ढाढ़सहुआ। कईसोए हुए मनुष्यों के बदले एक भागता हुआ कुत्ता उसके लिएअधिक धैर्य का कारणहुआ। उसने पिटारी उठाई और बूढ़ी काकी की कोठरीकी ओर चली।


                                              5


बूढ़ी काकी को केवल इतना स्मरण था कि किसी ने मेरे हाथ पकड़करघसीटे, फिरऐसा मालूम हुआ कि जैसे कोई पहाड़ पर उड़ाए लिए जाताहै। उनके पैर बार-बारपत्थरों से टकराए तब किसी ने उन्हें पहाड़पर से पटका, वे मूर्छित हो गईं।
जब वे सचेत हुईं तो किसी कीज़रा भी आहट न मिलती थी। समझी कि सब लोगखा-पीकर सो गए और उनकेसाथ मेरी तकदीर भी सो गई। रात कैसे कटेगी? राम! क्याखाऊँ? पेटमें अग्नि धधक रही है। हा! किसी ने मेरी सुधि न ली। क्या मेरापेटकाटने से धन जुड़ जाएगा? इन लोगों को इतनी भी दया नहीं आती कि न जानेबुढ़िया कब मर जाए? उसका जी क्यों दुखावें? मैं पेट की रोटियाँ हीखाती हूँकि और कुछ? इस पर यह हाल। मैं अंधी, अपाहिज ठहरी, न कुछसुनूँ, न बूझूँ।यदि आंगन में चली गई तो क्या बुद्धिराम से इतनाकहते न बनता था कि काकी अभीलोग खाना खा रहे हैं फिर आना। मुझेघसीटा, पटका। उन्ही पूड़ियों के लिएरूपा ने सबके सामने गालियाँदीं। उन्हीं पूड़ियों के लिए इतनी दुर्गति करनेपर भी उनका पत्थरका कलेजा न पसीजा। सबको खिलाया, मेरी बात तक न पूछी। जबतब ही नदीं, तब अब क्या देंगे? यह विचार कर काकी निराशामय संतोष के साथलेट गई। ग्लानि से गला भर-भर आता था, परन्तु मेहमानों के भय से रोती न थीं।सहसा कानों में आवाज़ आई-- 'काकी उठो, मैं पूड़ियां लाई हूँ।' काकी नेलाड़ली की बोली पहचानी। चटपट उठ बैठीं। दोनों हाथों सेलाडली को टटोला औरउसे गोद में बिठा लिया। लाडली ने पूड़ियाँनिकालकर दीं।
काकी ने पूछा-- क्या तुम्हारी अम्मा ने दी है?
लाडली ने कहा-- नहीं, यह मेरे हिस्से की हैं।
काकी पूड़ियों पर टूट पडीं। पाँच मिनट में पिटारी खाली हो गई। लाडली नेपूछा-- काकी पेट भर गया।
जैसे थोड़ी-सी वर्षा ठंडक के स्थान पर और भी गर्मी पैदा कर देती हैउसभाँति इन थोड़ी पूड़ियों ने काकी की क्षुधा और इक्षा को औरउत्तेजित करदिया था। बोलीं-- नहीं बेटी, जाकर अम्मा से और मांगलाओ।

लाड़ली ने कहा--अम्मा सोती हैं, जगाऊंगी तो मारेंगीं।
काकी ने पिटारी को फिर टटोला। उसमें कुछ खुर्चन गिरी थी। बार-बार होंठचाटती थीं, चटखारे भरती थीं।
हृदय मसोस रहा था कि और पूड़ियाँ कैसे पाऊँ। संतोष-सेतु जब टूटजाता है तबइच्छा का बहाव अपरिमित हो जाता है। मतवालों को मद कास्मरण करना उन्हेंमदांध बनाता है। काकी का अधीर मन इच्छाओं केप्रबल प्रवाह में बह गया। उचितऔर अनुचित का विचार जाता रहा। वेकुछ देर तक उस इच्छा को रोकती रहीं। सहसालाडली से बोलीं-- मेराहाथ पकड़कर वहाँ ले चलो, जहाँ मेहमानों ने बैठकरभोजन किया है।
लाडली उनका अभिप्राय समझ न सकी। उसने काकी का हाथ पकड़ा और ले जाकरझूठेपत्तलों के पास बिठा दिया। दीन, क्षुधातुर, हत् ज्ञानबुढ़िया पत्तलों सेपूड़ियों के टुकड़े चुन-चुनकर भक्षण करने लगी।ओह... दही कितना स्वादिष्टथा, कचौड़ियाँ कितनी सलोनी, ख़स्ताकितने सुकोमल। काकी बुद्धिहीन होते हुएभी इतना जानती थीं कि मैंवह काम कर रही हूं, जो मुझे कदापि न करना चाहिए।मैं दूसरों कीझूठी पत्तल चाट रही हूँ। परन्तु बुढ़ापा तृष्णा रोग का अंतिमसमयहै, जब सम्पूर्ण इच्छाएँ एक ही केन्द्र पर आ लगती हैं। बूढ़ी काकी मेंयह केन्द्र उनकी स्वादेन्द्रिय थी।
ठीक उसी समय रूपा कीआँख खुली। उसे मालूम हुआ कि लाड़ली मेरे पास नहीं है।वह चौंकी, चारपाई के इधर-उधर ताकने लगी कि कहीं नीचे तो नहीं गिर पड़ी। उसेवहाँ न पाकर वह उठी तो क्या देखती है कि लाड़ली जूठे पत्तलों के पास चुपचापखड़ी है और बूढ़ी काकी पत्तलों पर से पूड़ियों के टुकड़ेउठा-उठाकर खा रहीहै। रूपा का हृदय सन्न हो गया। किसी गाय की गरदनपर छुरी चलते देखकर जोअवस्था उसकी होती, वही उस समय हुई। एकब्राह्मणी दूसरों की झूठी पत्तलटटोले, इससे अधिक शोकमय दृश्यअसंभव था। पूड़ियों के कुछ ग्रासों के लिएउसकी चचेरी सास ऐसानिष्कृष्ट कर्म कर रही है। यह वह दृश्य था जिसे देखकरदेखने वालोंके हृदय काँप उठते हैं। ऐसा प्रतीत होता मानो ज़मीन रुक गई, आसमान चक्कर खा रहा है। संसार पर कोई आपत्ति आने वाली है। रूपा को क्रोध नआया। शोक के सम्मुख क्रोध कहाँ? करुणा और भय से उसकी आँखें भरआईं। इसअधर्म का भागी कौन है? उसने सच्चे हृदय से गगन मंडल की ओरहाथ उठाकर कहा--परमात्मा, मेरे बच्चों पर दया करो। इस अधर्म कादंड मुझे मत दो, नहीं तोमेरा सत्यानाश हो जाएगा।
रूपाको अपनी स्वार्थपरता और अन्याय इस प्रकार प्रत्यक्ष रूप में कभी न दिखपड़े थे। वह सोचने लगी-- हाय! कितनी निर्दय हूँ। जिसकी सम्पति सेमुझे दोसौ रुपया आय हो रही है, उसकी यह दुर्गति। और मेरे कारण।हे दयामय भगवान!मुझसे बड़ी भारी चूक हुई है, मुझे क्षमा करो। आजमेरे बेटे का तिलक था।सैकड़ों मनुष्यों ने भोजन पाया। मैं उनकेइशारों की दासी बनी रही। अपने नामके लिए सैकड़ों रुपए व्यय करदिए, परन्तु जिसकी बदौलत हज़ारों रुपए खाए, उसे इस उत्सव में भीभरपेट भोजन न दे सकी। केवल इसी कारण तो, वह वृद्धाअसहाय है।
रूपा ने दिया जलाया, अपने भंडार का द्वार खोला और एक थाली में सम्पूर्णसामग्रियां सजाकर बूढ़ी काकी की ओर चली।
आधी रात जा चुकी थी, आकाश पर तारों के थाल सजे हुए थे और उन परबैठे हुएदेवगण स्वर्गीय पदार्थ सजा रहे थे, परन्तु उसमें किसी कोवह परमानंदप्राप्त न हो सकता था, जो बूढ़ी काकी को अपने सम्मुखथाल देखकर प्राप्तहुआ। रूपा ने कंठारुद्ध स्वर में कहा---काकीउठो, भोजन कर लो। मुझसे आजबड़ी भूल हुई, उसका बुरा न मानना।परमात्मा से प्रार्थना कर दो कि वह मेराअपराध क्षमा कर दें।

भोले-भोलेबच्चोंकी भाँति, जो मिठाइयाँ पाकर मार और तिरस्कार सब भूलजाता है, बूढ़ी काकीवैसे ही सब भुलाकर बैठी हुई खाना खा रहीथी। उनके एक-एक रोंए से सच्चीसदिच्छाएँ निकल रही थीं और रूपाबैठी स्वर्गीय दृश्य का आनन्द लेने मेंनिमग्न थी।

 

बेटोंवाली विधवा - प्रेमचंद

पंडित अयोध्यानाथ का देहान्त हुआ तो सबने कहा, ईश्वर आदमी की ऐसी ही मौतदे। चार जवान बेटे थे, एक लड़की। चारों लड़कों के विवाह हो चुके थे, केवललड़की क्वॉँरी थी। सम्पत्ति भी काफी छोड़ी थी। एक पक्का मकान, दो बगीचे, कईहजार के गहने और बीस हजार नकद। विधवा फूलमती को शोक तो हुआ और कई दिन तकबेहाल पड़ी रही, लेकिन जवान बेटों को सामने देखकर उसे ढाढ़स हुआ। चारोंलड़के एक-से-एक सुशील, चारों बहुऍं एक-से-एक बढ़कर आज्ञाकारिणी। जब वह रातको लेटती, तो चारों बारी-बारी से उसके पॉँव दबातीं; वह स्नान करके उठती, तोउसकी साड़ी छॉँटती। सारा घर उसके इशारे पर चलता था। बड़ा लड़का कामता एकदफ्तर में 50 रू. पर नौकर था, छोटा उमानाथ डाक्टरी पास कर चुका था और कहींऔषधालय खोलने की फिक्र में था, तीसरा दयानाथ बी. ए. में फेल हो गया था औरपत्रिकाओं में लेख लिखकर कुछ-न-कुछ कमा लेता था, चौथा सीतानाथ चारों मेंसबसे कुशाग्र बुद्धि और होनहार था और अबकी साल बी. ए. प्रथम श्रेणी में पासकरके एम. ए. की तैयारी में लगा हुआ था। किसी लड़के में वह दुर्व्यसन, वहछैलापन, वह लुटाऊपन न था, जो माता-पिता को जलाता और कुल-मर्यादा को डुबाताहै। फूलमती घर की मालकिन थी। गोकि कुंजियॉँ बड़ी बहू के पास रहती थीं – बुढ़िया में वह अधिकार-प्रेम न था, जो वृद्धजनों को कटु और कलहशील बना दियाकरता है; किन्तु उसकी इच्छा के बिना कोई बालक मिठाई तक न मँगा सकता था।

संध्याहो गई थी। पंडित को मरे आज बारहवाँ दिन था। कल तेरहीं हैं। ब्रह्मभोजहोगा। बिरादरी के लोग निमंत्रित होंगे। उसी की तैयारियॉँ हो रही थीं।फूलमती अपनी कोठरी में बैठी देख रही थी, पल्लेदार बोरे में आटा लाकर रख रहेहैं। घी के टिन आ रहें हैं। शाक-भाजी के टोकरे, शक्कर की बोरियॉँ, दही केमटके चले आ रहें हैं। महापात्र के लिए दान की चीजें लाई गईं-बर्तन, कपड़े, पलंग, बिछावन, छाते, जूते, छड़ियॉँ, लालटेनें आदि; किन्तु फूलमती को कोईचीज नहीं दिखाई गई। नियमानुसार ये सब सामान उसके पास आने चाहिए थे। वहप्रत्येक वस्तु को देखती उसे पसंद करती, उसकी मात्रा में कमी-बेशी का फैसलाकरती; तब इन चीजों को भंडारे में रखा जाता। क्यों उसे दिखाने और उसकी रायलेने की जरूरत नहीं समझी गई? अच्छा वह आटा तीन ही बोरा क्यों आया? उसने तोपॉँच बोरों के लिए कहा था। घी भी पॉँच ही कनस्तर है। उसने तो दस कनस्तरमंगवाए थे। इसी तरह शाक-भाजी, शक्कर, दही आदि में भी कमी की गई होगी। किसनेउसके हुक्म में हस्तक्षेप किया? जब उसने एक बात तय कर दी, तब किसे उसकोघटाने-बढ़ाने का अधिकार है?
आज चालीस वर्षों से घर के प्रत्येक मामलेमें फूलमती की बात सर्वमान्य थी। उसने सौ कहा तो सौ खर्च किए गए, एक कहा तोएक। किसी ने मीन-मेख न की। यहॉँ तक कि पं. अयोध्यानाथ भी उसकी इच्छा केविरूद्ध कुछ न करते थे; पर आज उसकी ऑंखों के सामने प्रत्यक्ष रूप से उसकेहुक्म की उपेक्षा की जा रही है! इसे वह क्योंकर स्वीकार कर सकती?
कुछदेर तक तो वह जब्त किए बैठी रही; पर अंत में न रहा गया। स्वायत्त शासन उसकास्वभाव हो गया था। वह क्रोध में भरी हुई आयी और कामतानाथ से बोली-क्या आटातीन ही बोरे लाये? मैंने तो पॉँच बोरों के लिए कहा था। और घी भी पॉँच हीटिन मँगवाया! तुम्हें याद है, मैंने दस कनस्तर कहा था? किफायत को मैं बुरानहीं समझती; लेकिन जिसने यह कुऑं खोदा, उसी की आत्मा पानी को तरसे, यहकितनी लज्जा की बात है!
कामतानाथ ने क्षमा-याचना न की, अपनी भूल भीस्वीकार न की, लज्जित भी नहीं हुआ। एक मिनट तो विद्रोही भाव से खड़ा रहा, फिर बोला-हम लोगों की सलाह तीन ही बोरों की हुई और तीन बोरे के लिए पॉँचटिन घी काफी था। इसी हिसाब से और चीजें भी कम कर दी गई हैं।
फूलमती उग्र होकर बोली-किसकी राय से आटा कम किया गया?
‘हम लोगों की राय से।‘
‘तो मेरी राय कोई चीज नहीं है?’
‘है क्यों नहीं; लेकिन अपना हानि-लाभ तो हम समझते हैं?’
फूलमतीहक्की-बक्की होकर उसका मुँह ताकने लगी। इस वाक्य का आशय उसकी समझ में नआया। अपना हानि-लाभ! अपने घर में हानि-लाभ की जिम्मेदार वह आप है। दूसरोंको, चाहे वे उसके पेट के जन्मे पुत्र ही क्यों न हों, उसके कामों मेंहस्तक्षेप करने का क्या अधिकार? यह लौंडा तो इस ढिठाई से जवाब दे रहा है, मानो घर उसी का है, उसी ने मर-मरकर गृहस्थी जोड़ी है, मैं तो गैर हूँ! जराइसकी हेकड़ी तो देखो।
उसने तमतमाए हुए मुख से कहा मेरे हानि-लाभ केजिम्मेदार तुम नहीं हो। मुझे अख्तियार है, जो उचित समझूँ, वह करूँ। अभीजाकर दो बोरे आटा और पॉँच टिन घी और लाओ और आगे के लिए खबरदार, जो किसी नेमेरी बात काटी।
अपने विचार में उसने काफी तम्बीह कर दी थी। शायद इतनीकठोरता अनावश्यक थी। उसे अपनी उग्रता पर खेद हुआ। लड़के ही तो हैं, समझेहोंगे कुछ किफायत करनी चाहिए। मुझसे इसलिए न पूछा होगा कि अम्मा तो खुदहरेक काम में किफायत करती हैं। अगर इन्हें मालूम होता कि इस काम में मैंकिफायत पसंद न करूँगी, तो कभी इन्हें मेरी उपेक्षा करने का साहस न होता।यद्यपि कामतानाथ अब भी उसी जगह खड़ा था और उसकी भावभंगी से ऐसा ज्ञात होताथा कि इस आज्ञा का पालन करने के लिए वह बहुत उत्सुक नहीं, पर फूलमतीनिश्चिंत होकर अपनी कोठरी में चली गयी। इतनी तम्बीह पर भी किसी को अवज्ञाकरने की सामर्थ्य हो सकती है, इसकी संभावना का ध्यान भी उसे न आया।
परज्यों-ज्यों समय बीतने लगा, उस पर यह हकीकत खुलने लगी कि इस घर में अब उसकीवह हैसियत नहीं रही, जो दस-बारह दिन पहले थी। सम्बंधियों के यहॉँ के नेवतेमें शक्कर, मिठाई, दही, अचार आदि आ रहे थे। बड़ी बहू इन वस्तुओं कोस्वामिनी-भाव से सँभाल-सँभालकर रख रही थी। कोई भी उससे पूछने नहीं आता।बिरादरी के लोग जो कुछ पूछते हैं, कामतानाथ से या बड़ी बहू से। कामतानाथकहॉँ का बड़ा इंतजामकार है, रात-दिन भंग पिये पड़ा रहता हैं किसी तरहरो-धोकर दफ्तर चला जाता है। उसमें भी महीने में पंद्रह नागों से कम नहींहोते। वह तो कहो, साहब पंडितजी का लिहाज करता है, नहीं अब तक कभी का निकालदेता। और बड़ी बहू जैसी फूहड़ औरत भला इन सब बातों को क्या समझेगी! अपनेकपड़े-लत्ते तक तो जतन से रख नहीं सकती, चली है गृहस्थी चलाने! भद होगी औरक्या। सब मिलकर कुल की नाक कटवाऍंगे। वक्त पर कोई-न-कोई चीज कम हो जायेगी।इन कामों के लिए बड़ा अनुभव चाहिए। कोई चीज तो इतनी बन जाएगी कि मारी-मारीफिरेगा। कोई चीज इतनी कम बनेगी कि किसी पत्तल पर पहूँचेगी, किसी पर नहीं।आखिर इन सबों को हो क्या गया है! अच्छा, बहू तिजोरी क्यों खोल रही है? वहमेरी आज्ञा के बिना तिजोरी खोलनेवाली कौन होती है? कुंजी उसके पास हैअवश्य; लेकिन जब तक मैं रूपये न निकलवाऊँ, तिजोरी नहीं खुलती। आज तो इस तरहखोल रही है, मानो मैं कुछ हूँ ही नहीं। यह मुझसे न बर्दाश्त होगा!
वहझमककर उठी और बहू के पास जाकर कठोर स्वर में बोली-तिजोरी क्यों खोलती हो बहू, मैंने तो खोलने को नहीं कहा?
बड़ी बहू ने निस्संकोच भाव से उत्तर दिया-बाजार से सामान आया है, तो दाम न दिया जाएगा।
‘कौन चीज किस भाव में आई है और कितनी आई है, यह मुझे कुछ नहीं मालूम! जब तक हिसाब-किताब न हो जाए, रूपये कैसे दिये जाऍं?’
‘हिसाब-किताब सब हो गया है।‘
‘किसने किया?’
‘अब मैं क्या जानूँ किसने किया? जाकर मरदों से पूछो! मुझे हुक्म मिला, रूपये लाकर दे दो, रूपये लिये जाती हूँ!’
फूलमतीखून का घूँट पीकर रह गई। इस वक्त बिगड़ने का अवसर न था। घर में मेहमानस्त्री-पुरूष भरे हुए थे। अगर इस वक्त उसने लड़कों को डॉँटा, तो लोग यहीकहेंगे कि इनके घर में पंडितजी के मरते ही फूट पड़ गई। दिल पर पत्थर रखकरफिर अपनी कोठरी में चली गयी। जब मेहमान विदा हो जायेंगे, तब वह एक-एक कीखबर लेगी। तब देखेगी, कौन उसके सामने आता है और क्या कहता है। इनकी सारीचौकड़ी भुला देगी।
किन्तु कोठरी के एकांत में भी वह निश्चिन्त न बैठीथी। सारी परिस्थिति को गिद्घ दृष्टि से देख रही थी, कहॉँ सत्कार का कौन-सानियम भंग होता है, कहॉँ मर्यादाओं की उपेक्षा की जाती है। भोज आरम्भ होगया। सारी बिरादरी एक साथ पंगत में बैठा दी गई। ऑंगन में मुश्किल से दो सौआदमी बैठ सकते हैं। ये पॉँच सौ आदमी इतनी-सी जगह में कैसे बैठ जायेंगे? क्या आदमी के ऊपर आदमी बिठाए जायेंगे? दो पंगतों में लोग बिठाए जाते तोक्या बुराई हो जाती? यही तो होता है कि बारह बजे की जगह भोज दो बजे समाप्तहोता; मगर यहॉँ तो सबको सोने की जल्दी पड़ी हुई है। किसी तरह यह बला सिर सेटले और चैन से सोएं! लोग कितने सटकर बैठे हुए हैं कि किसी को हिलने की भीजगह नहीं। पत्तल एक-पर-एक रखे हुए हैं। पूरियां ठंडी हो गईं। लोग गरम-गरममॉँग रहें हैं। मैदे की पूरियाँ ठंडी होकर चिमड़ी हो जाती हैं। इन्हें कौनखाएगा? रसोइए को कढ़ाव पर से न जाने क्यों उठा दिया गया? यही सब बातें नाककाटने की हैं।
सहसा शोर मचा, तरकारियों में नमक नहीं। बड़ी बहूजल्दी-जल्दी नमक पीसने लगी। फूलमती क्रोध के मारे ओ चबा रही थी, पर इस अवसरपर मुँह न खोल सकती थी। बोरे-भर नमक पिसा और पत्तलों पर डाला गया। इतनेमें फिर शोर मचा-पानी गरम है, ठंडा पानी लाओ! ठंडे पानी का कोई प्रबन्ध नथा, बर्फ भी न मँगाई गई। आदमी बाजार दौड़ाया गया, मगर बाजार में इतनी रातगए बर्फ कहॉँ? आदमी खाली हाथ लौट आया। मेहमानों को वही नल का गरम पानी पीनापड़ा। फूलमती का बस चलता, तो लड़कों का मुँह नोच लेती। ऐसी छीछालेदर उसकेघर में कभी न हुई थी। उस पर सब मालिक बनने के लिए मरते हैं। बर्फ जैसीजरूरी चीज मँगवाने की भी किसी को सुधि न थी! सुधि कहॉँ से रहे-जब किसी कोगप लड़ाने से फुर्सत न मिले। मेहमान अपने दिल में क्या कहेंगे कि चले हैंबिरादरी को भोज देने और घर में बर्फ तक नहीं!
अच्छा, फिर यह हलचल क्यों मच गई? अरे, लोग पंगत से उठे जा रहे हैं। क्या मामला है?
फूलमतीउदासीन न रह सकी। कोठरी से निकलकर बरामदे में आयी और कामतानाथ सेपूछा-क्या बात हो गई लल्ला? लोग उठे क्यों जा रहे हैं? कामता ने कोई जवाब नदिया। वहॉँ से खिसक गया। फूलमती झुँझलाकर रह गई। सहसा कहारिन मिल गई।फूलमती ने उससे भी यह प्रश्न किया। मालूम हुआ, किसी के शोरबे में मरी हुईचुहिया निकल आई। फूलमती चित्रलिखित-सी वहीं खड़ी रह गई। भीतर ऐसा उबाल उठाकि दीवार से सिर टकरा ले! अभागे भोज का प्रबन्ध करने चले थे। इस फूहड़पन कीकोई हद है, कितने आदमियों का धर्म सत्यानाश हो गया! फिर पंगत क्यों न उठजाए? ऑंखों से देखकर अपना धर्म कौन गॅवाएगा? हा! सारा किया-धरा मिट्टी मेंमिल गया। सैकड़ों रूपये पर पानी फिर गया! बदनामी हुई वह अलग।
मेहमान उठचुके थे। पत्तलों पर खाना ज्यों-का-त्यों पड़ा हुआ था। चारों लड़के ऑंगनमें लज्जित खड़े थे। एक दूसरे को इलजाम दे रहा था। बड़ी बहू अपनीदेवरानियों पर बिगड़ रही थी। देवरानियॉँ सारा दोष कुमुद के सिर डालती थी।कुमुद खड़ी रो रही थी। उसी वक्त फूलमती झल्लाई हुई आकर बोली-मुँह में कालिखलगी कि नहीं या अभी कुछ कसर बाकी हैं? डूब मरो, सब-के-सब जाकर चिल्लू-भरपानी में! शहर में कहीं मुँह दिखाने लायक भी नहीं रहे।
किसी लड़के ने जवाब न दिया।
फूलमतीऔर भी प्रचंड होकर बोली-तुम लोगों को क्या? किसी को शर्म-हया तो है नहीं।आत्मा तो उनकी रो रही है, जिन्होंने अपनी जिन्दगी घर की मरजाद बनाने मेंखराब कर दी। उनकी पवित्र आत्मा को तुमने यों कलंकित किया? शहर मेंथुड़ी-थुड़ी हो रही है। अब कोई तुम्हारे द्वार पर पेशाब करने तो आएगा नहीं!
कामतानाथकुछ देर तक तो चुपचाप खड़ा सुनता रहा। आखिर झुंझला कर बोला-अच्छा, अब चुपरहो अम्मॉँ। भूल हुई, हम सब मानते हैं, बड़ी भंयकर भूल हुई, लेकिन अब क्याउसके लिए घर के प्राणियों को हलाल-कर डालोगी? सभी से भूलें होती हैं। आदमीपछताकर रह जाता है। किसी की जान तो नहीं मारी जाती?
बड़ी बहू ने अपनीसफाई दी-हम क्या जानते थे कि बीबी (कुमुद) से इतना-सा काम भी न होगा।इन्हें चाहिए था कि देखकर तरकारी कढ़ाव में डालतीं। टोकरी उठाकर कढ़ाव मेडाल दी! हमारा क्या दोष!
कामतानाथ ने पत्नी को डॉँटा-इसमें न कुमुद काकसूर है, न तुम्हारा, न मेरा। संयोग की बात है। बदनामी भाग में लिखी थी, वहहुई। इतने बड़े भोज में एक-एक मुट्ठी तरकारी कढ़ाव में नहीं डाली जाती!टोकरे-के-टोकरे उड़ेल दिए जाते हैं। कभी-कभी ऐसी दुर्घटना होती है। परइसमें कैसी जग-हँसाई और कैसी नक-कटाई। तुम खामखाह जले पर नमक छिड़कती हो!
फूलमती ने दांत पीसकर कहा-शरमाते तो नहीं, उलटे और बेहयाई की बातें करते हो।
कामतानाथने नि:संकोच होकर कहा-शरमाऊँ क्यों, किसी की चोरी की हैं? चीनी में चींटेऔर आटे में घुन, यह नहीं देखे जाते। पहले हमारी निगाह न पड़ी, बस, यहीं बातबिगड़ गई। नहीं, चुपके से चुहिया निकालकर फेंक देते। किसी को खबर भी नहोती।
फूलमती ने चकित होकर कहा-क्या कहता है, मरी चुहिया खिलाकर सबका धर्म बिगाड़ देता?
कामताहँसकर बोला-क्या पुराने जमाने की बातें करती हो अम्मॉँ। इन बातों से धर्मनहीं जाता? यह धर्मात्मा लोग जो पत्तल पर से उठ गए हैं, इनमें से कौन है, जो भेड़-बकरी का मांस न खाता हो? तालाब के कछुए और घोंघे तक तो किसी सेबचते नहीं। जरा-सी चुहिया में क्या रखा था!
फूलमती को ऐसा प्रतीत हुआ किअब प्रलय आने में बहुत देर नहीं है। जब पढे-लिखे आदमियों के मन मे ऐसेअधार्मिक भाव आने लगे, तो फिर धर्म की भगवान ही रक्षा करें। अपना-सा मुंहलेकर चली गयी।

                                                 2

दो महीने गुजर गए हैं। रात का समय है। चारोंभाई दिन के काम से छुट्टी पाकर कमरे में बैठे गप-शप कर रहे हैं। बड़ी बहूभी षड्यंत्र में शरीक है। कुमुद के विवाह का प्रश्न छिड़ा हुआ है।
कामतानाथने मसनद पर टेक लगाते हुए कहा-दादा की बात दादा के साथ गई। पंडित विद्वान्भी हैं और कुलीन भी होंगे। लेकिन जो आदमी अपनी विद्या और कुलीनता कोरूपयों पर बेचे, वह नीच है। ऐसे नीच आदमी के लड़के से हम कुमुद का विवाहसेंत में भी न करेंगे, पॉँच हजार तो दूर की बात है। उसे बताओ धता और किसीदूसरे वर की तलाश करो। हमारे पास कुल बीस हजार ही तो हैं। एक-एक के हिस्सेमें पॉँच-पॉँच हजार आते हैं। पॉँच हजार दहेज में दे दें, और पॉँच हजारनेग-न्योछावर, बाजे-गाजे में उड़ा दें, तो फिर हमारी बधिया ही बैठ जाएगी।
उमानाथबोले-मुझे अपना औषधालय खोलने के लिए कम-से-कम पाँच हजार की जरूरत है। मैंअपने हिस्से में से एक पाई भी नहीं दे सकता। फिर खुलते ही आमदनी तो होगीनहीं। कम-से-कम साल-भर घर से खाना पड़ेगा।
दयानाथ एक समाचार-पत्र देखरहे थे। ऑंखों से ऐनक उतारते हुए बोले-मेरा विचार भी एक पत्र निकालने काहै। प्रेस और पत्र में कम-से-कम दस हजार का कैपिटल चाहिए। पॉँच हजार मेरेरहेंगे तो कोई-न-कोई साझेदार भी मिल जाएगा। पत्रों में लेख लिखकर मेरानिर्वाह नहीं हो सकता।
कामतानाथ ने सिर हिलाते हुए कहा—अजी, राम भजो, सेंत में कोई लेख छपता नहीं, रूपये कौन देता है।
दयानाथ ने प्रतिवाद किया—नहीं, यह बात तो नहीं है। मैं तो कहीं भी बिना पेशगी पुरस्कार लिये नहीं लिखता।
कामता ने जैसे अपने शब्द वापस लिये—तुम्हारी बात मैं नहीं कहता भाई। तुम तो थोड़ा-बहुत मार लेते हो, लेकिन सबको तो नहीं मिलता।
बड़ीबहू ने श्रद्घा भाव ने कहा—कन्या भग्यवान् हो तो दरिद्र घर में भी सुखी रहसकती है। अभागी हो, तो राजा के घर में भी रोएगी। यह सब नसीबों का खेल है।
कामतानाथ ने स्त्री की ओर प्रशंसा-भाव से देखा-फिर इसी साल हमें सीता का विवाह भी तो करना है।
सीतानाथसबसे छोटा था। सिर झुकाए भाइयों की स्वार्थ-भरी बातें सुन-सुनकर कुछ कहनेके लिए उतावला हो रहा था। अपना नाम सुनते ही बोला—मेरे विवाह की आप लोगचिन्ता न करें। मैं जब तक किसी धंधे में न लग जाऊँगा, विवाह का नाम भी नलूँगा; और सच पूछिए तो मैं विवाह करना ही नहीं चाहता। देश को इस समय बालकोंकी जरूरत नहीं, काम करने वालों की जरूरत है। मेरे हिस्से के रूपये आपकुमुद के विवाह में खर्च कर दें। सारी बातें तय हो जाने के बाद यह उचितनहीं है कि पंडित मुरारीलाल से सम्बंध तोड़ लिया जाए।
उमा ने तीव्र स्वर में कहा—दस हजार कहॉँ से आऍंगे?
सीता ने डरते हुए कहा—मैं तो अपने हिस्से के रूपये देने को कहता हूँ।
‘और शेष?’
‘मुरारीलालसे कहा जाए कि दहेज में कुछ कमी कर दें। वे इतने स्वार्थान्ध नहीं हैं किइस अवसर पर कुछ बल खाने को तैयार न हो जाऍं, अगर वह तीन हजार में संतुष्टहो जाएं तो पॉँच हजार में विवाह हो सकता है।
उमा ने कामतानाथ से कहा—सुनते हैं भाई साहब, इसकी बातें।
दयानाथबोल उठे-तो इसमें आप लोगों का क्या नुकसान है? मुझे तो इस बात से खुशी होरही है कि भला, हममे कोई तो त्याग करने योग्य है। इन्हें तत्काल रूपये कीजरूरत नहीं है। सरकार से वजीफा पाते ही हैं। पास होने पर कहीं-न-कहीं जगहमिल जाएगी। हम लोगों की हालत तो ऐसी नहीं है।
कामतानाथ ने दूरदर्शिता कापरिचय दिया—नुकसान की एक ही कही। हममें से एक को कष्ट हो तो क्या और लोगबैठे देखेंगे? यह अभी लड़के हैं, इन्हें क्या मालूम, समय पर एक रूपया एकलाख का काम करता है। कौन जानता है, कल इन्हें विलायत जाकर पढ़ने के लिएसरकारी वजीफा मिल जाए या सिविल सर्विस में आ जाऍं। उस वक्त सफर कीतैयारियों में चार-पॉँच हजार लग जाएँगे। तब किसके सामने हाथ फैलातेफिरेंगे? मैं यह नहीं चाहता कि दहेज के पीछे इनकी जिन्दगी नष्ट हो जाए।
इस तर्क ने सीतानाथ को भी तोड़ लिया। सकुचाता हुआ बोला—हॉँ, यदि ऐसा हुआ तो बेशक मुझे रूपये की जरूरत होगी।
‘क्या ऐसा होना असंभव है?’
‘असभंव तो मैं नहीं समझता; लेकिन कठिन अवश्य है। वजीफे उन्हें मिलते हैं, जिनके पास सिफारिशें होती हैं, मुझे कौन पूछता है।‘
‘कभी-कभी सिफारिशें धरी रह जाती हैं और बिना सिफारिश वाले बाजी मार ले जाते हैं।’
‘तो आप जैसा उचित समझें। मुझे यहॉँ तक मंजूर है कि चाहे मैं विलायत न जाऊँ; पर कुमुद अच्छे घर जाए।‘
कामतानाथने निष्ठा—भाव से कहा—अच्छा घर दहेज देने ही से नहीं मिलता भैया! जैसातुम्हारी भाभी ने कहा, यह नसीबों का खेल है। मैं तो चाहता हूँ कि मुरारीलालको जवाब दे दिया जाए और कोई ऐसा घर खोजा जाए, जो थोड़े में राजी हो जाए।इस विवाह में मैं एक हजार से ज्यादा नहीं खर्च कर सकता। पंडित दीनदयाल कैसेहैं?
उमा ने प्रसन्न होकर कहा—बहुत अच्छे। एम.ए., बी.ए. न सही, यजमानों से अच्छी आमदनी है।
दयानाथ ने आपत्ति की—अम्मॉँ से भी पूछ तो लेना चाहिए।
कामतानाथको इसकी कोई जरूरत न मालूम हुई। बोले-उनकी तो जैसे बुद्धि ही भ्रष्ट होगई। वही पुराने युग की बातें! मुरारीलाल के नाम पर उधार खाए बैठी हैं। यहनहीं समझतीं कि वह जमाना नहीं रहा। उनको तो बस, कुमुद मुरारी पंडित के घरजाए, चाहे हम लोग तबाह हो जाऍं।
उमा ने एक शंका उपस्थित की—अम्मॉँ अपने सब गहने कुमुद को दे देंगी, देख लीजिएगा।
कामतानाथ का स्वार्थ नीति से विद्रोह न कर सका। बोले-गहनों पर उनका पूरा अधिकार है। यह उनका स्त्रीधन है। जिसे चाहें, दे सकती हैं।
उमा ने कहा—स्त्रीधन है तो क्या वह उसे लुटा देंगी। आखिर वह भी तो दादा ही की कमाई है।
‘किसी की कमाई हो। स्त्रीधन पर उनका पूरा अधिकार है!’
‘यहकानूनी गोरखधंधे हैं। बीस हजार में तो चार हिस्सेदार हों और दस हजार केगहने अम्मॉँ के पास रह जाऍं। देख लेना, इन्हीं के बल पर वह कुमुद का विवाहमुरारी पंडित के घर करेंगी।‘
उमानाथ इतनी बड़ी रकम को इतनी आसानी सेनहीं छोड़ सकता। वह कपट-नीति में कुशल है। कोई कौशल रचकर माता से सारे गहनेले लेगा। उस वक्त तक कुमुद के विवाह की चर्चा करके फूलमती को भड़काना उचितनहीं। कामतानाथ ने सिर हिलाकर कहा—भाई, मैं इन चालों को पसंद नहीं करता।
उमानाथ ने खिसियाकर कहा—गहने दस हजार से कम के न होंगे।
कामता अविचलित स्वर में बोले—कितने ही के हों; मैं अनीति में हाथ नहीं डालना चाहता।
‘तो आप अलग बैठिए। हां, बीच में भांजी न मारिएगा।‘
‘मैं अलग रहूंगा।‘
‘और तुम सीता?’
‘अलग रहूंगा।‘
लेकिनजब दयानाथ से यही प्रश्न किया गया, तो वह उमानाथ से सहयोग करने को तैयारहो गया। दस हजार में ढ़ाई हजार तो उसके होंगे ही। इतनी बड़ी रकम के लिए यदिकुछ कौशल भी करना पड़े तो क्षम्य है।

                                                  3

फूलमती रात को भोजनकरके लेटी थी कि उमा और दया उसके पास जा कर बैठ गए। दोनों ऐसा मुँह बनाएहुए थे, मानो कोई भरी विपत्ति आ पड़ी है। फूलमती ने सशंक होकर पूछा—तुमदोनों घबड़ाए हुए मालूम होते हो?
उमा ने सिर खुजलाते हुएकहा—समाचार-पत्रों में लेख लिखना बड़े जोखिम का काम है अम्मा! कितना हीबचकर लिखो, लेकिन कहीं-न-कहीं पकड़ हो ही जाती है। दयानाथ ने एक लेख लिखाथा। उस पर पॉँच हजार की जमानत मॉँगी गई है। अगर कल तक जमा न कर दी गई, तोगिरफ्तार हो जाऍंगे और दस साल की सजा ठुक जाएगी।
फूलमती ने सिर पीटकर कहा—ऐसी बातें क्यों लिखते हो बेटा? जानते नहीं हो, आजकल हमारे अदिन आए हुए हैं। जमानत किसी तरह टल नहीं सकती?
दयानाथने अपराधी—भाव से उत्तर दिया—मैंने तो अम्मा, ऐसी कोई बात नहीं लिखी थी; लेकिन किस्मत को क्या करूँ। हाकिम जिला इतना कड़ा है कि जरा भी रियायत नहींकरता। मैंने जितनी दौंड़-धूप हो सकती थी, वह सब कर ली।
‘तो तुमने कामता से रूपये का प्रबन्ध करने को नहीं कहा?’
उमाने मुँह बनाया—उनका स्वभाव तो तुम जानती हो अम्मा, उन्हें रूपये प्राणोंसे प्यारे हैं। इन्हें चाहे कालापानी ही हो जाए, वह एक पाई न देंगे।
दयानाथ ने समर्थन किया—मैंने तो उनसे इसका जिक्र ही नहीं किया।
फूलमती ने चारपाई से उठते हुए कहा—चलो, मैं कहती हूँ, देगा कैसे नहीं? रूपये इसी दिन के लिए होते हैं कि गाड़कर रखने के लिए?
उमानाथने माता को रोककर कहा-नहीं अम्मा, उनसे कुछ न कहो। रूपये तो न देंगे, उल्टे और हाय-हाय मचाऍंगे। उनको अपनी नौकरी की खैरियत मनानी है, इन्हें घरमें रहने भी न देंगे। अफ़सरों में जाकर खबर दे दें तो आश्चर्य नहीं।
फूलमतीने लाचार होकर कहा—तो फिर जमानत का क्या प्रबन्ध करोगे? मेरे पास तो कुछनहीं है। हॉँ, मेरे गहने हैं, इन्हें ले जाओ, कहीं गिरों रखकर जमानत दे दो।और आज से कान पकड़ो कि किसी पत्र में एक शब्द भी न लिखोगे।
दयानाथकानों पर हाथ रखकर बोला—यह तो नहीं हो सकता अम्मा, कि तुम्हारे जेवर लेकरमैं अपनी जान बचाऊँ। दस-पॉँच साल की कैद ही तो होगी, झेल लूँगा। यहींबैठा-बैठा क्या कर रहा हूँ!
फूलमती छाती पीटते हुए बोली—कैसी बातें मुँहसे निकालते हो बेटा, मेरे जीते-जी तम्हें कौन गिरफ्तार कर सकता है! उसकामुँह झुलस दूंगी। गहने इसी दिन के लिए हैं या और किसी दिन के लिए! जबतुम्हीं न रहोगे, तो गहने लेकर क्या आग में झोकूँगीं!
उसने पिटारी लाकर उसके सामने रख दी।
दयाने उमा की ओर जैसे फरियाद की ऑंखों से देखा और बोला—आपकी क्या राय है भाईसाहब? इसी मारे मैं कहता था, अम्मा को बताने की जरूरत नहीं। जेल ही तो होजाती या और कुछ?
उमा ने जैसे सिफारिश करते हुए कहा—यह कैसे हो सकता थाकि इतनी बड़ी वारदात हो जाती और अम्मा को खबर न होती। मुझसे यह नहीं होसकता था कि सुनकर पेट में डाल लेता; मगर अब करना क्या चाहिए, यह मैं खुदनिर्णय नहीं कर सकता। न तो यही अच्छा लगता है कि तुम जेल जाओ और न यहीअच्छा लगता है कि अम्मॉँ के गहने गिरों रखे जाऍं।
फूलमती ने व्यथित कंठसे पूछा—क्या तुम समझते हो, मुझे गहने तुमसे ज्यादा प्यारे हैं? मैं तोप्राण तक तुम्हारे ऊपर न्योछावर कर दूँ, गहनों की बिसात ही क्या है।
दयाने दृढ़ता से कहा—अम्मा, तुम्हारे गहने तो न लूँगा, चाहे मुझ पर कुछ हीक्यों न आ पड़े। जब आज तक तुम्हारी कुछ सेवा न कर सका, तो किस मुँह सेतुम्हारे गहने उठा ले जाऊँ? मुझ जैसे कपूत को तो तुम्हारी कोख से जन्म ही नलेना चाहिए था। सदा तुम्हें कष्ट ही देता रहा।
फूलमती ने भी उतनी हीदृढ़ता से कहा-अगर यों न लोगे, तो मैं खुद जाकर इन्हें गिरों रख दूँगी औरखुद हाकिम जिला के पास जाकर जमानत जमा कर आऊँगी; अगर इच्छा हो तो यहपरीक्षा भी ले लो। ऑंखें बंद हो जाने के बाद क्या होगा, भगवान् जानें, लेकिन जब तक जीती हूँ तुम्हारी ओर कोई तिरछी आंखों से देख नहीं सकता।
उमानाथने मानो माता पर एहसान रखकर कहा—अब तो तुम्हारे लिए कोई रास्ता नहीं रहादयानाथ। क्या हरज है, ले लो; मगर याद रखो, ज्यों ही हाथ में रूपये आ जाऍं, गहने छुड़ाने पड़ेंगे। सच कहते हैं, मातृत्व दीर्घ तपस्या है। माता केसिवाय इतना स्नेह और कौन कर सकता है? हम बड़े अभागे हैं कि माता के प्रतिजितनी श्रद्घा रखनी चाहिए, उसका शतांश भी नहीं रखते।
दोनों ने जैसे बड़ेधर्मसंकट में पड़कर गहनों की पिटारी सँभाली और चलते बने। मातावात्सल्य-भरी ऑंखों से उनकी ओर देख रही थी और उसकी संपूर्ण आत्मा काआशीर्वाद जैसे उन्हें अपनी गोद में समेट लेने के लिए व्याकुल हो रहा था। आजकई महीने के बाद उसके भग्न मातृ-हृदय को अपना सर्वस्व अर्पण करके जैसेआनन्द की विभूति मिली। उसकी स्वामिनी कल्पना इसी त्याग के लिए, इसीआत्मसमर्पण के लिए जैसे कोई मार्ग ढूँढ़ती रहती थी। अधिकार या लोभ या ममताकी वहॉँ गँध तक न थी। त्याग ही उसका आनन्द और त्याग ही उसका अधिकार है। आजअपना खोया हुआ अधिकार पाकर अपनी सिरजी हुई प्रतिमा पर अपने
प्राणों की भेंट करके वह निहाल हो गई।

                                               4

तीनमहीने और गुजर गये। मॉँ के गहनों पर हाथ साफ करके चारों भाई उसकी दिलजोईकरने लगे थे। अपनी स्त्रियों को भी समझाते थे कि उसका दिल न दुखाऍं। अगरथोड़े-से शिष्टाचार से उसकी आत्मा को शांति मिलती है, तो इसमें क्या हानिहै। चारों करते अपने मन की, पर माता से सलाह ले लेते या ऐसा जाल फैलाते किवह सरला उनकी बातों में आ जाती और हरेक काम में सहमत हो जाती। बाग को बेचनाउसे बहुत बुरा लगता था; लेकिन चारों ने ऐसी माया रची कि वह उसे बेचते परराजी हो गई, किन्तु कुमुद के विवाह के विषय में मतैक्य न हो सका। मॉँ पं.पुरारीलाल पर जमी हुई थी, लड़के दीनदयाल पर अड़े हुए थे। एक दिन आपस मेंकलह हो गई।
फूलमती ने कहा—मॉँ-बाप की कमाई में बेटी काहिस्सा भी है।तुम्हें सोलह हजार का एक बाग मिला, पच्चीस हजार का एक मकान। बीस हजार नकदमें क्या पॉँच हजार भी कुमुद का हिस्सा नहीं है?
कामता ने नम्रता सेकहा—अम्मॉँ, कुमुद आपकी लड़की है, तो हमारी बहन है। आप दो-चार साल मेंप्रस्थान कर जाऍंगी; पर हमार और उसका बहुत दिनों तक सम्बन्ध रहेगा। तब हमयथाशक्ति कोई ऐसी बात न करेंगे, जिससे उसका अमंगल हो; लेकिन हिस्से की बातकहती हो, तो कुमुद का हिस्सा कुछ नहीं। दादा जीवित थे, तब और बात थी। वहउसके विवाह में जितना चाहते, खर्च करते। कोई उनका हाथ न पकड़ सकता था; लेकिन अब तो हमें एक-एक पैसे की किफायत करनी पड़ेगी। जो काम हजार में होजाए, उसके लिए पॉँच हजार खर्च करना कहॉँ की बुद्धिमानी है?
उमानाथ से सुधारा—पॉँच हजार क्यों, दस हजार कहिए।
कामता ने भवें सिकोड़कर कहा—नहीं, मैं पाँच हजार ही कहूँगा; एक विवाह में पॉँच हजार खर्च करने की हमारी हैसियत नहीं है।
फूलमतीने जिद पकड़कर कहा—विवाह तो मुरारीलाल के पुत्र से ही होगा, पॉँच हजारखर्च हो, चाहे दस हजार। मेरे पति की कमाई है। मैंने मर-मरकर जोड़ा है। अपनीइच्छा से खर्च करूँगी। तुम्हीं ने मेरी कोख से नहीं जन्म लिया है। कुमुदभी उसी कोख से आयी है। मेरी ऑंखों में तुम सब बराबर हो। मैं किसी से कुछमॉँगती नहीं। तुम बैठे तमाशा देखो, मैं सब—कुछ कर लूँगी। बीस हजार में पॉँचहजार कुमुद का है।
कामतानाथ को अब कड़वे सत्य की शरण लेने के सिवा औरमार्ग न रहा। बोला-अम्मा, तुम बरबस बात बढ़ाती हो। जिन रूपयों को तुम अपनासमझती हो, वह तुम्हारे नहीं हैं; तुम हमारी अनुमति के बिना उनमें से कुछनहीं खर्च कर सकती।
फूलमती को जैसे सर्प ने डस लिया—क्या कहा! फिर तो कहना! मैं अपने ही संचे रूपये अपनी इच्छा से नहीं खर्च कर सकती?
‘वह रूपये तुम्हारे नहीं रहे, हमारे हो गए।‘
‘तुम्हारे होंगे; लेकिन मेरे मरने के पीछे।‘
‘नहीं, दादा के मरते ही हमारे हो गए!’
उमानाथ ने बेहयाई से कहा—अम्मा, कानून—कायदा तो जानतीं नहीं, नाहक उछलती हैं।
फूलमतीक्रोध—विहृल रोकर बोली—भाड़ में जाए तुम्हारा कानून। मैं ऐसे कानून कोनहीं जानती। तुम्हारे दादा ऐसे कोई धन्नासेठ नहीं थे। मैंने ही पेट और तनकाटकर यह गृहस्थी जोड़ी है, नहीं आज बैठने की छॉँह न मिलती! मेरे जीते-जीतुम मेरे रूपये नहीं छू सकते। मैंने तीन भाइयों के विवाह में दस-दस हजारखर्च किए हैं। वही मैं कुमुद के विवाह में भी खर्च करूँगी।
कामतानाथ भी गर्म पड़ा—आपको कुछ भी खर्च करने का अधिकार नहीं है।
उमानाथने बड़े भाई को डॉँटा—आप खामख्वाह अम्मॉँ के मुँह लगते हैं भाई साहब!मुरारीलाल को पत्र लिख दीजिए कि तुम्हारे यहॉँ कुमुद का विवाह न होगा। बस, छुट्टी हुई। कायदा-कानून तो जानतीं नहीं, व्यर्थ की बहस करती हैं।
फूलमती ने संयमित स्वर में कही—अच्छा, क्या कानून है, जरा मैं भी सुनूँ।
उमा ने निरीह भाव से कहा—कानून यही है कि बाप के मरने के बाद जायदाद बेटों की हो जाती है। मॉँ का हक केवल रोटी-कपड़े का है।
फूलमती ने तड़पकर पूछा— किसने यह कानून बनाया है?
उमा शांत स्थिर स्वर में बोला—हमारे ऋषियों ने, महाराज मनु ने, और किसने?
फूलमती एक क्षण अवाक् रहकर आहत कंठ से बोली—तो इस घर में मैं तुम्हारे टुकड़ों पर पड़ी हुई हूँ?
उमानाथ ने न्यायाधीश की निर्ममता से कहा—तुम जैसा समझो।
फूलमतीकी संपूर्ण आत्मा मानो इस वज्रपात से चीत्कार करने लगी। उसके मुख से जलतीहुई चिगांरियों की भॉँति यह शब्द निकल पड़े—मैंने घर बनवाया, मैंने संपत्तिजोड़ी, मैंने तुम्हें जन्म दिया, पाला और आज मैं इस घर में गैर हूँ? मनुका यही कानून है? और तुम उसी कानून पर चलना चाहते हो? अच्छी बात है। अपनाघर-द्वार लो। मुझे तुम्हारी आश्रिता बनकर रहता स्वीकार नहीं। इससे कहींअच्छा है कि मर जाऊँ। वाह रे अंधेर! मैंने पेड़ लगाया और मैं ही उसकी छॉँहमें खड़ी हो सकती; अगर यही कानून है, तो इसमें आग लग जाए।
चारों युवक परमाता के इस क्रोध और आंतक का कोई असर न हुआ। कानून का फौलादी कवच उनकीरक्षा कर रहा था। इन कॉँटों का उन पर क्या असर हो सकता था?
जरा देर मेंफूलमती उठकर चली गयी। आज जीवन में पहली बार उसका वात्सल्य मग्न मातृत्वअभिशाप बनकर उसे धिक्कारने लगा। जिस मातृत्व को उसने जीवन की विभूति समझाथा, जिसके चरणों पर वह सदैव अपनी समस्त अभिलाषाओं और कामनाओं को अर्पितकरके अपने को धन्य मानती थी, वही मातृत्व आज उसे अग्निकुंड-सा जान पड़ा, जिसमें उसका जीवन जलकर भस्म हो गया।
संध्या हो गई थी। द्वार पर नीम कावृक्ष सिर झुकाए, निस्तब्ध खड़ा था, मानो संसार की गति पर क्षुब्ध हो रहाहो। अस्ताचल की ओर प्रकाश और जीवन का देवता फूलवती के मातृत्व ही की भॉँतिअपनी चिता में जल रहा था।

                                                5

फूलमती अपने कमरे में जाकरलेटी, तो उसे मालूम हुआ, उसकी कमर टूट गई है। पति के मरते ही अपने पेट केलड़के उसके शत्रु हो जायेंगे, उसको स्वप्न में भी अनुमान न था। जिन लड़कोंको उसने अपना हृदय-रक्त पिला-पिलाकर पाला, वही आज उसके हृदय पर यों आघात कररहे हैं! अब वह घर उसे कॉँटों की सेज हो रहा था। जहॉँ उसकी कुछ कद्र नहीं, कुछ गिनती नहीं, वहॉँ अनाथों की भांति पड़ी रोटियॉँ खाए, यह उसकी अभिमानीप्रकृति के लिए असह्य था।
पर उपाय ही क्या था? वह लड़कों से अलग होकररहे भी तो नाक किसकी कटेगी! संसार उसे थूके तो क्या, और लड़कों को थूके तोक्या; बदमानी तो उसी की है। दुनिया यही तो कहेगी कि चार जवान बेटों के होतेबुढ़िया अलग पड़ी हुई मजूरी करके पेट पाल रही है! जिन्हें उसने हमेशा नीचसमझा, वही उस पर हँसेंगे। नहीं, वह अपमान इस अनादर से कहीं ज्यादाहृदयविदारक था। अब अपना और घर का परदा ढका रखने में ही कुशल है। हाँ, अबउसे अपने को नई परिस्थितियों के अनुकूल बनाना पड़ेगा। समय बदल गया है। अबतक स्वामिनी बनकर रही, अब लौंडी बनकर रहना पड़ेगा। ईश्वर की यही इच्छा है।अपने बेटों की बातें और लातें गैरों ककी बातों और लातों की अपेक्षा फिर भीगनीमत हैं।
वह बड़ी देर तक मुँह ढॉँपे अपनी दशा पर रोती रही। सारी रातइसी आत्म-वेदना में कट गई। शरद् का प्रभाव डरता-डरता उषा की गोद से निकला, जैसे कोई कैदी छिपकर जेल से भाग आया हो। फूलमती अपने नियम के विरूद्ध आजलड़के ही उठी, रात-भर मे उसका मानसिक परिवर्तन हो चुका था। सारा घर सो रहाथा और वह आंगन में झाडू लगा रही थी। रात-भर ओस में भीगी हुई उसकी पक्कीजमीन उसके नंगे पैरों में कॉँटों की तरह चुभ रही थी। पंडितजी उसे कभी इतनेसवेरे उठने न देते थे। शीत उसके लिए बहुत हानिकारक था। पर अब वह दिन नहींरहे। प्रकृति उस को भी समय के साथ बदल देने का प्रयत्न कर रही थी। झाडू सेफुरसत पाकर उसने आग जलायी और चावल-दाल की कंकड़ियॉँ चुनने लगी। कुछ देर मेंलड़के जागे। बहुऍं उठीं। सभों ने बुढ़िया को सर्दी से सिकुड़े हुए कामकरते देखा; पर किसी ने यह न कहा कि अम्मॉँ, क्यों हलकान होती हो? शायदसब-के-सब बुढ़िया के इस मान-मर्दन पर प्रसन्न थे।
आज से फूलमती का यहीनियम हो गया कि जी तोड़कर घर का काम करना और अंतरंग नीति से अलग रहना। उसकेमुख पर जो एक आत्मगौरव झलकता रहता था, उसकी जगह अब गहरी वेदना छायी हुईनजर आती थी। जहां बिजली जलती थी, वहां अब तेल का दिया टिमटिमा रहा था, जिसेबुझा देने के लिए हवा का एक हलका-सा झोंका काफी है।
मुरारीलाल कोइनकारी-पत्र लिखने की बात पक्की हो चुकी थी। दूसरे दिन पत्र लिख दिया गया।दीनदयाल से कुमुद का विवाह निश्चित हो गया। दीनदयाल की उम्र चालीस से कुछअधिक थी, मर्यादा में भी कुछ हेठे थे, पर रोटी-दाल से खुश थे। बिना किसीठहराव के विवाह करने पर राजी हो गए। तिथि नियत हुई, बारात आयी, विवाह हुआऔर कुमुद बिदा कर दी गई फूलमती के दिल पर क्या गुजर रही थी, इसे कौन जानसकता है; पर चारों भाई बहुत प्रसन्न थे, मानो उनके हृदय का कॉँटा निकल गयाहो। ऊँचे कुल की कन्या, मुँह कैसे खोलती? भाग्य में सुख भोगना लिखा होगा, सुख भोगेगी; दुख भोगना लिखा होगा, दुख झेलेगी। हरि-इच्छा बेकसों का अंतिमअवलम्ब है। घरवालों ने जिससे विवाह कर दिया, उसमें हजार ऐब हों, तो भी वहउसका उपास्य, उसका स्वामी है। प्रतिरोध उसकी कल्पना से परे था।
फूलमतीने किसी काम मे दखल न दिया। कुमुद को क्या दिया गया, मेहमानों का कैसासत्कार किया गया, किसके यहॉँ से नेवते में क्या आया, किसी बात से भी उसेसरोकार न था। उससे कोई सलाह भी ली गई तो यही-बेटा, तुम लोग जो करते हो, अच्छा ही करते हो। मुझसे क्या पूछते हो!
जब कुमुद के लिए द्वार पर डोली आगई और कुमुद मॉँ के गले लिपटकर रोने लगी, तो वह बेटी को अपनी कोठरी में लेगयी और जो कुछ सौ पचास रूपये और दो-चार मामूली गहने उसके पास बच रहे थे, बेटी की अंचल में डालकर बोली—बेटी, मेरी तो मन की मन में रह गई, नहीं तोक्या आज तुम्हारा विवाह इस तरह होता और तुम इस तरह विदा की जातीं!
आज तकफूलमती ने अपने गहनों की बात किसी से न कही थी। लड़कों ने उसके साथ जोकपट-व्यवहार किया था, इसे चाहे अब तक न समझी हो, लेकिन इतना जानती थी किगहने फिर न मिलेंगे और मनोमालिन्य बढ़ने के सिवा कुछ हाथ न लगेगा; लेकिन इसअवसर पर उसे अपनी सफाई देने की जरूरत मालूम हुई। कुमुद यह भाव मन मे लेकरजाए कि अम्मां ने अपने गहने बहुओं के लिए रख छोड़े, इसे वह किसी तरह न सहसकती थी, इसलिए वह उसे अपनी कोठरी में ले गयी थी। लेकिन कुमुद को पहले हीइस कौशल की टोह मिल चुकी थी; उसने गहने और रूपये ऑंचल से निकालकर माता केचरणों में रख दिए और बोली-अम्मा, मेरे लिए तुम्हारा आशीर्वाद लाखों रूपयोंके बराबर है। तुम इन चीजों को अपने पास रखो। न जाने अभी तुम्हें किनविपत्तियों को सामना करना पड़े।
फूलमती कुछ कहना ही चाहती थी कि उमानाथने आकर कहा—क्या कर रही है कुमुद? चल, जल्दी कर। साइत टली जाती है। वह लोगहाय-हाय कर रहे हैं, फिर तो दो-चार महीने में आएगी ही, जो कुछ लेना-देनाहो, ले लेना।
फूलमती के घाव पर जैसे मानो नमक पड़ गया। बोली-मेरे पास अबक्या है भैया, जो इसे मैं दूगी? जाओ बेटी, भगवान् तुम्हारा सोहाग अमरकरें।
कुमुद विदा हो गई। फूलमती पछाड़ गिर पड़ी। जीवन की लालसा नष्ट हो गई।

                                                 6

एक साल बीत गया।
फूलमतीका कमरा घर में सब कमरों से बड़ा और हवादार था। कई महीनों से उसने बड़ीबहू के लिए खाली कर दिया था और खुद एक छोटी-सी कोठरी में रहने लगी, जैसेकोई भिखारिन हो। बेटों और बहुओं से अब उसे जरा भी स्नेह न था, वह अब घर कीलौंडी थी। घर के किसी प्राणी, किसी वस्तु, किसी प्रसंग से उसे प्रयोजन नथा। वह केवल इसलिए जीती थी कि मौत न आती थी। सुख या दु:ख का अब उसेलेशमात्र भी ज्ञान न था।
उमानाथ का औषधालय खुला, मित्रों की दावत हुई, नाच-तमाशा हुआ। दयानाथ का प्रेस खुला, फिर जलसा हुआ। सीतानाथ को वजीफा मिलाऔर विलायत गया, फिर उत्सव हुआ। कामतानाथ के बड़े लड़के का यज्ञोपवीतसंस्कार हुआ, फिर धूम-धाम हुई; लेकिन फूलमती के मुख पर आनंद की छाया तक नआई! कामताप्रसाद टाइफाइड में महीने-भर बीमार रहा और मरकर उठा। दयानाथ नेअबकी अपने पत्र का प्रचार बढ़ाने के लिए वास्तव में एक आपत्तिजनक लेख लिखाऔर छ: महीने की सजा पायी। उमानाथ ने एक फौजदारी के मामले में रिश्वत लेकरगलत रिपोर्ट लिखी और उसकी सनद छीन ली गई; पर फूलमती के चेहरे पर रंज कीपरछाईं तक न पड़ी। उसके जीवन में अब कोई आशा, कोई दिलचस्पी, कोई चिन्ता नथी। बस, पशुओं की तरह काम करना और खाना, यही उसकी जिन्दगी के दो काम थे।जानवर मारने से काम करता है; पर खाता है मन से। फूलमती बेकहे काम करती थी; पर खाती थी विष के कौर की तरह। महीनों सिर में तेल न पड़ता, महीनों कपड़े नधुलते, कुछ परवाह नहीं। चेतनाशून्य हो गई थी।
सावन की झड़ी लगी हुई थी।मलेरिया फैल रहा था। आकाश में मटियाले बादल थे, जमीन पर मटियाला पानी।आर्द्र वायु शीत-ज्वर और श्वास का वितरणा करती फिरती थी। घर की महरी बीमारपड़ गई। फूलमती ने घर के सारे बरतन मॉँजे, पानी में भीग-भीगकर सारा कामकिया। फिर आग जलायी और चूल्हे पर पतीलियॉँ चढ़ा दीं। लड़कों को समय पर भोजनमिलना चाहिए। सहसा उसे याद आया, कामतानाथ नल का पानी नहीं पीते। उसी वर्षामें गंगाजल लाने चली।
कामतानाथ ने पलंग पर लेटे-लेटे कहा-रहने दो अम्मा, मैं पानी भर लाऊँगा, आज महरी खूब बैठ रही।
फूलमती ने मटियाले आकाश की ओर देखकर कहा—तुम भीग जाओगे बेटा, सर्दी हो जायगी।
कामतानाथ बोले—तुम भी तो भीग रही हो। कहीं बीमार न पड़ जाओ।
फूलमती निर्मम भाव से बोली—मैं बीमार न पडूँगी। मुझे भगवान् ने अमर कर दिया है।
उमानाथभी वहीं बैठा हुआ था। उसके औषधालय में कुछ आमदनी न होती थी, इसलिए बहुतचिन्तित था। भाई-भवाज की मुँहदेखी करता रहता था। बोला—जाने भी दो भैया!बहुत दिनों बहुओं पर राज कर चुकी है, उसका प्रायश्चित्त तो करने दो।
गंगाबढ़ी हुई थी, जैसे समुद्र हो। क्षितिज के सामने के कूल से मिला हुआ था।किनारों के वृक्षों की केवल फुनगियॉँ पानी के ऊपर रह गई थीं। घाट ऊपर तकपानी में डूब गए थे। फूलमती कलसा लिये नीचे उतरी, पानी भरा और ऊपर जा रहीथी कि पॉँव फिसला। सँभल न सकी। पानी में गिर पड़ी। पल-भर हाथ-पाँव चलाये, फिर लहरें उसे नीचे खींच ले गईं। किनारे पर दो-चार पंडे चिल्लाए-‘अरेदौड़ो, बुढ़िया डूबी जाती है।’ दो-चार आदमी दौड़े भी लेकिन फूलमती लहरोंमें समा गई थी, उन बल खाती हुई लहरों में, जिन्हें देखकर ही हृदय कॉँप उठताथा।
एक ने पूछा—यह कौन बुढ़िया थी?
‘अरे, वही पंडित अयोध्यानाथ की विधवा है।‘
‘अयोध्यानाथ तो बड़े आदमी थे?’
‘हॉँ थे तो, पर इसके भाग्य में ठोकर खाना लिखा था।‘
‘उनके तो कई लड़के बड़े-बड़े हैं और सब कमाते हैं?’
‘हॉँ, सब हैं भाई; मगर भाग्य भी तो कोई वस्तु है!’

 

ताई - कौशिक

ताऊजी, हमें लेलगाडी (रेलगाडी) ला दोगे – कहता हुआ एक पंचवर्षीय बालक बाबू रामजीदास की ओर दौडा।

बाबू साहब ने दोनों बाहें फैलाकर कहा – हाँ बेटा, ला देंगे। उनके इतना कहते- कहते बालक उनके निकट आ गया। उन्होंने बालक को गोद में उटा लिया और उसका मुख चूमकर बोले- क्या करेगा रेलकाडी

बालक बोला- उसमें बैटकर बली दूल जायेंगे। हम भी जायेंगे, चुत्री को भी ले जायेंगे। बाबूजी को नहीं ले जायोंगे। हमें लेलगाडी नहीं ला देते। ताऊजी, तुम ला दोगे तो तुम्हें ले जायेंगे।

बाबू – और किसको ले जायोंगा

बालक दम-भर सेचकर- बछ, औल किसी को नहीं ले जायेंगे। पास ही बाबू रामजीदास

की अर्धांगिनि बैटी थी। बाबू साहब ने उनकी ओर इशारा करके कह- और अपनी ताई को नहीं ले जायेंगे

लाईजी सूपारी काटती हुई बोली – अपने ताऊजी ही को ले जा। मेरे ऊपर दया रख।

ताईजी ने यह बात बडी रूखाई के साथ कही। बालक ताई के शुष्क व्यवहार को तुरन्त ताड गया।

बाबू साहब ने फिर पूछा – तई को क्यों नहीं ले जायेगा

बालक – ताई हमें प्याल (प्यार) नहीं कलतीं।

बाबू – जो प्यार करे, तो ले जायेगा

बालक को इसमें कुछ सन्देह था। ताई का भाव देखकर उसे यह आशा नहीं थी कि वह प्यार करेंगी। इससे बालक मौन रहा। बाबू साहब ने फिर पूचा – क्यों रे, बोलता नहीं तई प्यार करें तो रेल पर बिटाकर ले जायेगा..

बालक ने ताऊजी को प्रसत्र करने के लिए केवल सिर हिलाकर स्वीकार कर लिया, परन्तु मुख से कुछ नहीं कहा।

 

          बाबू साहब उसे अपनी अर्घांगिनीजी के पास ले जाकर उनसे बोले – लो इस प्यार कर लो, तो यह तुम्हें भी ले जायेगा। परन्तु बच्चे की ताई श्रीमति रामेश्वरी को पति की यह चुहलबाजी अच्छी न लगी। वह तुनक कर बोली- तुम्हीं रेल पर बैटकर जाओ, मुझे नहीं जाना है।

          बाबू साहब ने रामेश्र्वरी की बात पर ध्यान नहीं दिया। बच्चे को उनकी गोद में बिटाने की चेष्टा करते हुए बोले – प्यार नहीं करोगी, तो फिर रेल में नहीं बिटावेगा।– क्यों रे मनोहर।

          मनोहर ने ताऊ की बात का उत्तर नहीं दिया। उधर ताई ने मनोहर को अपनी गोद से ढकेल दिया। मनोहर नीचे गिर पडा। शरीर पर चोट नहीं लगी पर ह्रदय पर चोट लगी। बालक रो पडा।

          बाबू साहब ने बालक को गोद में उटा लिया, चुमकर-पुचकार कर चुप किया, और तत्पश्चात, उसे कुछ पैसे तथा रेलगाडी ला देने का वचन देकर छोड दिया। बालक मनोहर भयपूर्ण दृष्टि से अपनी ताई की ओर ताकता हुआ उस स्थान से चला गया।

          मनोहर के चले जाने पर बाबू रामजीदास रामेश्वरी से बोले- तुम्हारा यह कैसा व्यवहार है बच्चे को ढकेल दिया। जो उसको चोट लग जाती तो

          रामेश्वरी मुँह मटकाकर बोली – लग जाती तो अच्छा होता। क्यों मेरी खोपडी पर लाद देते थे आप ही उसे मेरे ऊपर डालते थे, और आप ही तो आब ऐसी बातें करते हैं

          बाबू साहब कुढकर बोले- इसी को खोपडी पर लादना कहते हैं

          रामेश्वरी – और नहीं किसे कहते हैं। तुम्हें तो अपने आगे और किसी का दुःख-सुख सूझता ही नहीं। न जाने कब किसका जी कैसा होता है। तुम्हें इन बातों की कोई परवाह ही नहीं, अपनी चुहल से काम है।

          बाबू- बच्चों की प्यारी-प्यारी बातें सुनकर तो चाहे जैसा जी हो, प्रसत्र हो जाता है, मगर तुम्हारा ह्रदय न जाने किस धातु का बना हूआं है।

          रामेश्वरी – तुम्हारा हो जाता होगा और होने को होता भी है, मगर वैसा पच्चा भी तो हो। पराये धन से भी कहीं घर भरता है।

          बाबू साहब कुछ देर पुच रहकर बोले- यदि अपना सगा भतीजा भी पराया धन कहा जा सकता है, तो फिर मैं नहीं समक्षता कि अपना धन किसे कहेंगे।

            रामेश्वरी कुछ उत्तेजित होकर बोली- बातें बनाना बहुत आता है। तुम्हारा भतीजा है, तुम चाहे जो समझोः पर मुझे ये बातें अच्छी नहीं लगतीं। हमारे भाग ही फूटे हैं। नहीं तो ये दिन काहे को देखने पडते। तुम्हारा चलन तो दुनिया से निराला है। आदमी संतान के लिए क्या-क्या करते हैं – पूजा-पाट करते हैं। व्रत रखते हैं, पर तुम्हें इन बातों से क्या काम, रात-दिन भाई-भतीजों में मगन रहते हो।

          बाबू साहब के मुख पर घृणा का भाव झलक आया। अन्हेंने कहा- पूजा-पाट व्रत, सब ढकोसला है। जो वस्तु भाग में नहीं, वह पूजा-पाट से कभी प्राप्त नहीं हो सकती। मेरा तो यह अटल विश्वास है।

          श्रीमती जी कुछ-कुछ रूआँ से स्वर में बोलीं- इस विश्वास ने तो सब चौपट कर रखा है। ऐसे ही विश्वास पर सब बैट जायँ, तो काम कैसे चले सब विश्वास पर ही बैटे रहें, आदमी काहे को किसी बात के लिए चेष्टा करें।

बाबू साहब ने सोचा कि मूर्ख स्त्री के मुँह लगना टीक नहीं, उतएव वह स्त्र की बात का कुछ उत्तर न देकर वहाँ से टल गये।

 

(2)

          बाबू रामजीदास धनी आदमी हैं। कपडे की आढत का काम करते हैं। लेन-देन भी है। इनका एक छोटा भाई भी है। उसका नाम है – कृष्णदास। दोनों भइयों का परिवार एक ही में है। बाबू रामजीदास की आयु 34 वर्ष के लगभग है और छोटो भाई कृष्णदास की इक्कीस वर्ष के लगभग। रामजीदास नस्संतान है। कृष्णदास के दो संतान हैं। एक पुत्र – वही पुत्र, जिससे पाटक परिचित हो चुके हैं और एक कन्या है। कन्या की आयु दो वर्ष के लगभग है।

          रामजीदास अपने भाई और उनकी संतान पर बडा स्नेह रखते हैं – ऐसा स्नेह कि उसके प्रभाव से उन्हें अपनी संतानहीनता कभी खटकती ही नहीं। छोटे भाई की संतान को वे अपनी संतान समझते हैं। दोनों बच्चे भी रामजीदास से इतने हिले-मिले हैं कि उन्हें अपने पिता से भी अधिक समझते हैं।

          परन्तु रामजीदास की पत्नी रामेश्वरी को अपनी संतानहीनता का बडा दुःख है। वह दिन-रात संतान ही के सोच में घुला करती है। छोटे भाई की संतान पर पति का प्रेम उनकी आँखों में काँटे की तरह खटकता है।

          रात को भोजन इत्यादि से निवृत्त होकर रामजीदास शय्या पर लेटे हुए शीतल और मन्द वायु का आनन्द ले रहे थे। पास ही दूसरी शय्या पर रामश्वरी हथेली पर सीर रखे, किसी चिन्ता में डूबी हुई थी। दोनों बच्चे अभी बाबू साहब के पास से उटकर अपनी माँ के पास गये थे।

          बाबू साहब ने अपनी स्त्री की ओर करवट लेकर कहा – आज तुमने मनोहर को इस बुरी तरह से ढकेला था कि मुझे अब तक उसका दुःख है। कभी-कभी तो तुम्हारा व्यवहार बिलकुल ही अमानुषिक हो उटता है।

          रामेश्वरी बोली – तुम्हीं ने मुझे ऐसा बना रखा है। उस दिन उस पंडित ने कहा था कि हम दोनों के जन्मपत्र में संतान का जोग है, पर तुमने उसमें से एक भी उपाय करके न देखा। बस, तुम तो इन्हीं दोनों में मगन हो। तुम्हारी इस बात से रात-दिन मेरा कलेजा सुलगता रहता है। आदमी उपाय तो करके देखता है। फिर होना तो भगवान के आधीन है।

          बाबू साहब हँसकर बोले – तुम्हारे जैसी सीधी स्त्र भी .... क्या कहूँ, तुम इन ज्योतिषियों की बातों पर विश्वास करती हो, जो दुनिया भर के झूटे और धूर्त हैं। ये झुट बोलनें ही की रोदियाँ खाते हैं।

          रामेश्वरी सुनकर बोली – तुम्हें तो सारा संसार झुटा ही दिखायी पडता है। ये पोथी-पूराण भी सब झुटे हैं – पण्डित कुछ अपनी तरफ से बनकर तो कहते नहीं है।शास्त्र में जो लिखा है, वही वे भी कहते हैं। शास्त्र झुटा है, तो वे भी झुटे हैं। अँगरेजी क्या पढी, अपने आगे किसी को गिनतेही नहीं। जो बातें बाप-दादा के जमाने से चली आयी हैं, उन्हें भी झुटा बताते हैं।

          बाबू साहब – तुम बात तो समझती नहीं, अपनी ही ओटे जाती हो। मैं यह नहीं कहता कि ज्योतिष-शास्त्र झूटा है। संभव है वह सच्चा हो, परन्तु ज्योतिषियों में अधिकांश झूटे होतै हैं। उन्हें ज्योतिष का पूर्ण ञान तो होता नहीं, दो-एक छोटी पुस्तकें पढकर ज्योतिषी बन बैटते हैं और लोगों को टगते फिरते हैं। ऐसी दशा में उनकी बातों पर कैसे विश्वास किया जा सकता है।

          रामेश्वरी – हूँ सब झूटे ही हैं, तुम्हीं एक बडे सच्चे हो। अच्छा एक बात पूछती हूँ।  भला तुम्हारे जी में सन्तान की इच्छा क्या कभी नहीं होती।

          इस बार रामेश्वरी ने बाबूसाहब के ह्रदय का कोमल स्थान पकडा। वह कुछ देर चु रहे। तत्पश्चात, एक लम्बी साँस लेकर बोले- भला ऐसा कौन मनुष्य होगा, जिसके ह्रदय में सन्तान का मुख देखने की इच्छा न हो, परंतु किया क्या जाय, जब नहीं है और न होने की आशा ही है, तब उसके लिए व्यर्थ चिन्ता करने से क्या लाभ, इसके सिवा जो बात अपनी सन्तान से होती, बह भाई के सन्तान से भी तो हो रही है। जितना स्नेह अपनी सन्तान पर होता, उतना ही इनपर है। जो आनन्द उनकी बाल-क्रीडा से आता, वही इनकी क्रीडा से भी आ रहा है। फिर मैं नहीं समझता कि चिन्ता क्यों की जाव।

          रामेश्वरी कुढकर बोली- तुम्हारी समक्ष को मैं क्या कहूँ। इसी से तो रात-दिन जला करती हूँ। भला यंह तो बताओ कि तुम्हारे पीछे क्या इन्हीं से तुम्हारा नाम चलेगा

          बाबू साहब हँसकर बोले- अरे तुम भी कहाँ की पोच बातें लायी। नाम सन्तान से नहीं चलता, नाम अपनी सुकृति से चलता है। तुलसीदास को देश का बच्चा-बच्चा जानता है। सूरदास को मरे कितने दिन हो चुके, इस प्रकार जितने महात्मा हो गये हैं, उन सबका नाम क्या सन्तान ही की बदौलत चल रहा है, सच पुछो तो सन्तान से जितनी नाम चलने की आशा रहती है, उतनी ही नाम डूब जाने की सम्भावना रहती है, परन्तु सुकृति एक ऐसी वस्तु है, जिससे नाम बढने के सिवा घटने की कभी आशंका रहती ही नहीं। हमारे शहर में रायगिरधारी लाल कितने नामी आदमी थे उनके सन्तान कहाँ हैं, पर उनकी धर्मशाला और अनाथालय से उनका नाम अब तक चल रहा है, और जाने कितने दिनों तक चला जायेगा।

            रामेश्वरी- शास्त्र में लिखा है कि जिसका पुत्र नहीं होता, उसकी मुक्ति नहीं होती।

          बाबू – मुक्ति पर मुझे विश्वास ही नहीं। मुक्ति है किस चिडिया का नाम, यादि मुक्ति होना मान भी लिया जाय, तो यह कैसे माना जा सकता है कि सब पुत्रवानों की मुक्ति है ही जाती है, मुक्ति का भी क्या सहज उपाय है। ये जितने सन्तान वाले हैं, सभी की तो मुक्ति हो जाती होगी,

          रामेश्वरी निरूत्तर होकर बोलीं – अब तुमसे कौन बकवास करे। तुम तो अपने सामने किसी को मानते ही नहीं।

(3)

          मनुष्य का ह्रदय बडा ममत्व-प्रेमी है। कैसी ही उपयेगी और किनती ही सुन्दर वस्तु क्यों न हो, जब तक मनुष्य उसको परायी समझता है, तब तक उससे प्रेम नहीं करतः किन्तु भच्छी और बिलकुल काम में न आने वाली वस्तु को भी मनुष्य अपनी समझता है, तो उससे प्रेम करता है। परायी वस्तु कितनी ही मूल्यवान क्यों न हो, कितनी ही उपयोगी क्यों न हो, कितनी ही सुन्दर क्यों न हो, उसके नष्ट होने पर मनुष्य कुछ भी दुःख का अनुभव नहीं करता है. इसलिए कि वह चीजा अपनी नहीं, परायी है। अपनी वस्तु कितनी ही भर्धो हो, काम में न आने वाली हो, उसके नष्ट होने पर मनुष्य को दुःख होता है, इसलिए कि वह अपनी चीज है। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि मनुष्य परायी चीज से प्रेम करने लगता है। ऐसी दशा में भी जब तक मनुष्य उस वस्तु को अपनी बनाकर नहीं छोडता अथवा अपने ह्रदय में यह विचार नहीं दृढ कर लेता कि यह वस्तु मेरी है, तब तक उसे संतोष नहीं होता। ममत्व से प्रेम उत्पत्र होता है, प्रेम से ममत्व। इन दोनें का साथ चोली-दामन का-सा होता है, ये कभी पृथक नहीं किये जा सकते।

          यधपि रामेश्वरी को माता बनने ता सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ था, तथापि उनका ह्रदय एक माता का ह्रदय बनने की पूरी योग्यता रखता था। उनके ह्रदय में वे गुँ विधमान और अंतर्निहित थे, जो एक माता के ह्रदय में होते हैं, परन्तु उनका विकास नहीं हुआ था। उनका ह्रजय उस भूमि की तरह था, जिसमें बीज तो पडा हुआ है, पर उसको सींच कर और प्रस्फुटित करके भूमि के ऊपर लानेवाला कोई नहीं था। इसलिए उनके ह्रदय में उनके प्रति द्देष उत्पत्र होता था, धृणा पैदा होती थी। विशेषकर उस समय उनके द्देष की मात्रा और भी बढ जाती थी, जब यह देखती थी कि उनके पतिदेव उन बच्चों पर प्राण देते हैं, जो उनके (रामेश्वरी के) नहीं हैं।

            शाम का समय था। रामेश्वरी खुली छत पर बैजी हवा खा रही थी। पास ही उनकी देवरानी भी बौटी थी। दोनों बच्चे छल पर दौड-दौड कर खेल रहे थे। रामेश्वरी उनके खेल को देख रही थी। इस समय रामेश्वरी को उन पच्चों का खेलना-कूदना बडा भला मालूम हो रहा था। हवा में उडते हुए उनके बाल, कमल की तरह खिले हुए उनके नन्हें-नन्हें मुख, उनकी प्यारी-प्यारी तोतली बातें, उनका चिल्लाना, भागना, लोट जाना इत्यादि कीडाएँ उनके ह्रदय को शीतल कर रही थीं। सहसा मनोहर अपनी बहन को मारने दौडा। वह खिलखिलाती हुई दौडकर रामेश्वरी की गोद में जा गिरी। उसके पीछे-पीछे मनोहर भी दौडता हुआ आया और वह भी उन्हीं की गोद में जा गिरा। रामेश्वरी उस समय सारा द्देष भूल गयी। उन्होंने दोनें बच्चों को उसी प्रकार ह्रदय से लगा लिया, जिस प्रकार वह मनुष्य लगाता है, जो कि बच्चों के लिए तरस रहा हो। उन्होंने बडी सतृष्णता से दोनों को प्यार किया। उस समय यदि कोई अपरिचित मनुष्य उन्हें देखता, तो उसे यही विश्वास होता कि रामेश्वरी ही उन बच्चों की माता हैं।

          दोनों बच्चे बडी देर तक उनकी गोद में रहे। सहसा उसी समय किसी के आने की आहट पाकर बच्चों की माता वहाँ से उटकर चली गयी।

          मनोहर, ले रेलगाडी। कहते हुए बाबू रामजीदास छत पर आये। उनका स्वर सुनते ही दोनों बच्चे रामेश्वरी की गोज से तडप कर निकल भागे। रामजीदास ने पहले दोनों के खूब प्यार किया, फिर बैटकर रेलगाडी दिखाने लगे।

          इधर रामेश्वरी की नींद-सी टूटी। पति को बच्चों में मगन होते देख उनकी भौंहें तन गयीं। बच्चों के प्रति ह्रदय में फिर से वही घृणा और द्देष का भाव जाग उटा।

          बच्चों को रेलगाडी देकर बाबू साहब रामेश्वरी के पास आये और मुस्करा कर बोले आज तो तुम बच्चों को बडा प्यार कर रही थी। इससे मालूम होता है कि तुम्हारे ह्रदय में भी इनके प्रति कुछ प्रेम अवश्य है।

          रामेश्वरी को पति की यह बात बहुत बुरी लगी। उन्हें अपनी कमजोरी पर बडा दुःख हुआ। केवल दुःख ही नहीं, अपने ऊपर क्रोध भी आया। वह दुःख और क्रोध पति के उत्त्क वाक्य से और भी बढ गया। उनकी कमजोरी पति पर प्रकट हो गयी। यह बात उनके लिए असह्य हो उटी।

          रामजीदास बोले- इसलिए मैं कहता हूँ कि अपनी संतान के लिए सोच करना वृथा है। यदि इनसे प्रेम करने लगो, तो तुम्हें ये ही अपनी संतान प्रतीत होने लगेंगे। मुझे इस बात से प्रसत्रता है कि तुम इनसे स्नेह करना सीक रही हो।

          यह बात बाबू साहब ने नितान्त शुद्ध ह्रदय से कही थी, परन्तु रामेश्वरी को इसमें व्यग्य की तीक्ष्ण गंध मालूम हुई। उन्होंने कुढकर मन में कहा – इन्हें मौत भी नहीं आती। मर जायँ, पाप कटे। आटों प्रहर आँखों के सामने रहने से प्यार करने को जी ललचा ही उटता है। इनके मारे कलेजा और भी जला करता है।

          बाबू साहब ने पत्नी को मौन देखकर कहा – अब झोंपने से क्या लाभ, अपने प्रेम को छिपाने की चेष्टा करना व्यर्थ है। छिपाने की आवश्यकता भी नहीं।

          रामेश्वरी जल-भुन कर बोली- मुझे क्या पडी है जो मैं प्रेम करूँगी, तुम्हीं को मुबारक रहें। निगोडे आप ही आ-आके घुसते हैं। एक घर में रहने से कभी-कभी हँसना बोलना पडता है। अभी परसों जरा यों ही ढकेल दिया, उसपर तुमने सैकडों बाते सुनायीं। संकट में प्राण हैं, न यों चैन, न वो चैन।

          बाबू साहब को पत्नी के वाक्य सुनकर बडा क्रोध आया। उन्होंने कर्कश स्वर में कहा – न जाने कैसे ह्रदय की स्त्री है। अभी अच्छी-खासी बैटी बच्चों को प्यार कर रही थी। मेरे आते ही गिरगिट की तरह रंग बदलन लगा। अपनी इच्छा से चाहे जो करे, पर मेरे कहने पर बल्लियों उछलती है। न जाने मेरी बातों में कैन-सा विष घुला रहता है। यदि मेरा कहना ही बुरा मालूम होता है, तो न कहा करूँगा, पर इतना याद रखो कि आब जो कभी इनके विषय में निगोडे-सिगोडे इत्यादि अपशब्द निकाले, तो अच्छा न होगा। तुमसे मुझे, ये बच्चे कहीं अधिक प्यारे हैं।

          रामेश्वरी ने इसका कोई अत्तर नहीं दिया। अपने क्षोम तथा क्रोध को वह आँखों द्दारा निकालने लगीं।

          जैसे-ही-जैसे बाबू रामजीदास का स्नेह दोनों बच्चों पर बढता जाता था, वैसे-ही-वैसे रामेश्वरी के द्देष और घृणा की मात्र भी बढती जाती थी। प्रायः बच्चों के पीछे पति-पत्नी में कह-सुली हो जाती थी, और रामेश्वरी को पति के कटु वचन सुनने पडते थे। जब रामेश्वरी ने यह देख कि बच्चों के कारण वह पति की नजर से गिरती जा रही हैं, तब उनके ह्रदय में बडा तूफान उटा। उन्हेंने सोचा – पराये बच्चों के पीछे यह मुझसे प्रेम कम करते जाते हैं, मुझे हर समय बुरा-भला कहा करते हैं, इनके लिए ये बच्चे ही सब कुछ हैं, मैं कुछ भी नहीं। दुनिया मरती जाती है, पर इन दोनों को मौत नहीं आती। ये पैदा होते ही क्यों न मर गये। न ये होते, न ये होते, न मुझे, ये दिन देखने पडने पडते। जिस दिन ये मरेंगे, उस दिन घी के दिये जलाऊँगीः इन्होंने ही मेरा घर सत्यानाश कर रखा है।

          इस प्रकार कुछ दिन व्यतीत हुए। एक दिन नियमानुसार रामेश्वरी छत पर अकेली बैटी हुई थी। उनके ह्रदय में अनेक प्रकार के विचार आ रहे थे। विचार और कुछ नहीं, वही अपनी निज की सन्तान का अभाव। पति का भाई की सन्तान के प्रति अनुराग इत्यादि। कुथ देर बाद जब उनके विचार स्वयं उन्हीं के लिए कष्टदायक मालूम होने लगे, तब वह अपना ध्यान दूसरी ओर लगाने के लिए उटकर टहलने लगीं।

          वह टहल ही रही थी कि मनोहर दौडता हुआ आया। मनोहर को देखकर उनकी भृकुटी चढ गयी और वह छत की चहार-दीवारी पर हाथ रख कर खडी हो गयी।

          संध्या का समय था। आकाश में रंग-विरंगी पतंगें उड रही थीं। मनोहर कुछ देर तक खडा पतंगों को देखता और सोचता रहा कि कोई पतंग कटकर उसकी छत पर गिरे, तो क्या ही आनन्द आवे। देर तक पतंग गिरने की आशा करने के बाद वह दौडकर रामेश्वरी के पास आया और उनकी टाँगों में लिपटकर बोला – ताई, हमें पतंग मँगा दो। रामेश्वरी ने झिडककर कहा – चल हट, अपने ताऊ से माँग जाकर।

          मनोहर कुछ अप्रतिभ होकर फिर आकाश की ओर ताकने लगा। थोडी देर बाद उससे फिर नहीं रहा गया। इस बार उसने बडे लाड से आकर अत्यन्त करूण स्वर में कहा – ताई पतंग मँगा दो – हम भी उडावेंगे।

          इस बार उसकी भोली प्रार्थना से रामेश्वरी का कलेजा कुछ पसीज गया। वह कुछ देर तक उसको स्थिर दृष्टि से देखती रही, फिर उन्होंने एक लम्बी साँस लेकर मन ही मन कहा – यदि मेरा पुत्र होता, तो आज मुझसे बढकर भग्यवान स्त्री संसार में दूसरी न होती।

          निगोडे-मारा कितना सुन्दर है, प्यारी-प्यारी बातें करता है, यही जी चाहता है कि छाती से लगा लों।

          यह सोचकर वह उसके सिर पर हाथ फेरने वाली ही थीं, कि इतने में मनोहर उन्हें मौन देखकर बोला – तुम हमें पतंग नहीं मँगवा दोगी तो ताऊजी से कहकर पिटवावेंगे।

          यधपि बच्चो की इस भोली बात में भी बडी मधुरता थी, तथापि रामेश्वरी का मुख क्रोध के मारे लाल हो गया। वह उसे झिडककर बोली – जा कह दे अपने ताऊजी से। देखूँ वह मेरा क्या कर लेंगे..

          मनोहर मयभीत होकर उनके पास से हट आया और फिर सतूष्णे नेत्रों से आकाश में उडती हुई पतंगों को देखने लगा।

          इदर रामेश्वरी ने सोचा – यह सब ताऊजी के दुलार का फल है कि बालिस्त भर का लडका मुझे धमकाला है। ईस्वर करे इस दुलार पर बिजली टूटे।

          उसी समय आकाश से एक पतंग कटकर उसी छत की ओर आयी और रामेश्वरी के ऊपर से होती हुई छज्जे की ओर गयी। छत के चारों ओर चार-दीवारी थी। जहाँ रामेश्वरी खडी हुई थी केवल वहीं पर एक द्दार था, जिससे छज्जे पर आ-जा सकते थे। रामेश्वरी उस द्दार से सटी हुई खडी थीं। मनोहर ने पतंग को छज्जे पर जाते देखा। पतंग पकडने के लिए वह दौडकर छज्जे की ओर चला। रामेश्वरी खडी देखती रही। मनोहर उनके पास से होकर छज्जे पर चला गया और उनसे दो फीट की दूरी पर खडा होकर पतंग को देखने लगा। पतंग छज्जे पर से होती हुई नीचे घर के आँगन में जा गिरी। एक पैर छज्जे की मुँडेर पर रखकर मनोहर ने नीचे आँगन में झाँका और पतंग को आँगन में गिरते देख प्रसत्रता के मारे फूला न समाया। वह नीचे जाने के लिए शीघ्रता से घूमाः परन्तु घूमते समय मुँडेर पर से उसका पैर फिसल गया। वह नीचे की ओर चला। नीचे जाते-जाते उसके दोनों हाथों में मुँडेर आ गयी। वह उसे पकडकर लटक गया और रामेश्वरी की ओर देखकर चिल्लाया – ताई, रामेश्वरी ने धडकते हुए ह्रदय से इस घटना को देखा।

उसके मन में आया कि अच्छा है, मरने दो, सदा का पाप कट जायेगा। यह सोचकर वह एक क्षण के लिए रूकी। उधर मनोहर के हाथ मुँडेर पर से फिसलने लगे। वह अत्यन्त भय तथा करूणापूर्ण नेत्रों से रामेश्वरी की ओर देखकर चिल्लाया – अरी ताई, रामेश्वरी की आँखों मनोहर की आँखों से जा मिलीं। मनोहर की वह करूण-दृष्टि देखकर रामेश्वरी का कलेजा मुँह को आ गया। उन्होंने व्याकुल होकर मनोहर को पकडने के लिए अपना हाथ बढाया। उनका हाथ मनोहर के हथ तक पहुँचा ही था कि मनोहर के हाथ से मुडेर छूट गयी। वह नीचे आ गीरा। रामेश्वरी चीख मारकर छज्जे पर गिर पडी।

          रामेश्वरी एक सप्ताह तक बुखार में बेहोश पडी रही। कभी-कभी वह जोर से चिल्ला उटती और कहती – देखो-देखो, वह गिरा जा रहा है – उसे बचाओ – दौडो- मेरे मनोहर को बचा लो। कभी वह कहती  बेटा मनोहर, मैंने तुझे नहीं बच

          हाँ हाँ, मैं चाहती तो बचा सकती थी – मैंने देर कर दी । इसी प्रकार के प्रलाप वह किया करती ।

          मनोहर की टाँग उखड गयी थी। टाँग बिटा दी गयीः वह क्रमशः फर अपनी असली हालत पर ओने लगा।

          एक स्पताह बाद रामेश्वरी का ज्वर कम हुआ। अच्छी तरह होश आने पर उन्होंने पूछा – मनोहर कैसा है,

          रामजीदास ने उत्तर दिया – अच्छा है।

          रामेश्वरी – उसे मेरे पास ले आओ ।

          मनोहर रामेश्वरी के पास लाया गया। रामेश्वरी ने उसे बडे प्यार से ह्रदय से लगाया। आँखो से आँसुओं की झडी लगा गयी। हिचकियों से गला रूँध गया।

          रामेश्वरी कुछ दिनों बाद पूर्ण स्वस्थ हो गयी।

          अब वह मनोहर की बहन चुत्री से भी द्देष और घृणा नहीं करती। और मनोहर तो उनका प्रणाधार हो गया है। उसके बिना उन्हें एक क्षण भी कल नहीं पडता।